"बिन माँगे मोती मिले"
***राजीव तनेजा*** "बात सर के ऊपर से निकले जा रही थी...कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर!...माजरा क्या है?" जिस बीवी को मैँ कभी फूटी आँख नहीं सुहाया,वो ही मुझ पर दिन पर दिन मेहरबान हुए जा रही थी। बहुत दिमाग लड़ाने के बाद भी इस सब का कोई वाजिब कारण मुझे दिखाई नहीं दे रहा था|जो कल तक मुझे देख 'नाक-भों' सिकोडा करती थी,वही अब मौका देख जाने-अनजाने मुझसे लिपटने की कोशिश कर रही थी|मेरी पसन्द के पकवानों का तो मानो तांता लगा था|मेरी हर छोटी-बडी खुशी का ख्याल रखा जा...