"बिन माँगे मोती मिले"

***राजीव तनेजा***      "बात सर के ऊपर से निकले जा रही थी...कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर!...माजरा क्या है?" जिस बीवी को मैँ कभी फूटी आँख नहीं सुहाया,वो ही मुझ पर दिन पर दिन मेहरबान हुए जा रही थी। बहुत दिमाग लड़ाने के बाद भी इस सब का कोई  वाजिब कारण मुझे दिखाई नहीं दे रहा था|जो कल तक मुझे देख 'नाक-भों' सिकोडा करती थी,वही अब मौका देख जाने-अनजाने मुझसे लिपटने की कोशिश कर रही थी|मेरी पसन्द के पकवानों का तो मानो तांता लगा था|मेरी हर छोटी-बडी खुशी का ख्याल रखा जा...

मेरी सातवीं कहानी नवभारत टाईम्स पर

पहली कहानी- बताएँ तुझे कैसे होता है बच्चा दूसरी कहानी- बस बन गया डाक्टर तीसरी कहानी- नामर्द हूँ,पर मर्द से बेहतर हूँ चौथी कहानी- बाबा की माया पाँचवी कहानी- व्यथा-झोलाछाप डॉक्टर की छटी कहानी-काश एक बार फिर मिल जाए सैंटा सातवीं कहानी-थमा दो गर मुझे सत्ता   नोट: इस कहानी के एक हिस्से को लिखने के लिए मुझे 'बामुलाहिज़ा' वाले श्री क्रितिश भट्ट जी के नैनो वाले कार्टूनों से प्रेरणा मिली।मैँ उनका तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने मुझे अपने कार्टूनों को तथा आईडिए को इस्तेमाल करने की...
 
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