मेरी आठवीं कहानी नवभारत टाईम्स पर

पहली कहानी- बताएँ तुझे कैसे होता है बच्चा दूसरी कहानी- बस बन गया डाक्टर तीसरी कहानी- नामर्द हूँ,पर मर्द से बेहतर हूँ चौथी कहानी- बाबा की माया पाँचवी कहानी- व्यथा-झोलाछाप डॉक्टर की छटी कहानी-काश एक बार फिर मिल जाए सैंटा सातवीं कहानी-थमा दो गर मुझे सत्ता आठवी कहानी- मेड फॉर ईच अदर   Navbharat Times - Breaking news, views. reviews, cricket from across India   मेड फॉर ईच अदर 14 Mar 2009, 1538 hrs IST,नवभारतटाइम्स.कॉम  राजीव तनेजा हेलो। मे आई स्पीक टू मिस्टर...

मेरा खुला पत्र योगेश समदर्शी के नाम

समदर्शी जी नमस्कार.... ये खुला पत्र मैँ आपको इसलिए नहीं लिख रहा हूँ कि मेरे पास लिफाफा खरीदने के लिए खुले पैसे नहीं हैँ। एक्चुअली क्या है कि मेरे पास लिफाफे को बन्द करने लायक ज़रूरी गोंद नहीं थी तो मैँने सोचा कि.......अब आप कहेंगे कि गोंद नहीं थी तो क्या हुआ?...अपना चबड़-चबड़ करती गज़ भर लम्बी ज़बान तो थी...अपना झट से लिफाफे के किनारे पे उसी को सर्र से सरसराते हुए फिराते और फट से दाब देते अँगूठे से।....मुआफ कीजिएगा समदर्शी जी....आपने मुझे सही से नहीं पहचाना.....अपने शरीर के 'अँगूठे' जैसे पवित्र और...

कोई होली-वोली नहीं खेलनी है इस बार

***राजीव तनेजा*** कोई होली-वोली नहीं खेलनी है इस बार कान खोल के सुन लो...कहे देती हूँ कसम से,'' बीवी भाषण पे भाषण पिलाए चली जा रही थी। "खबरदार! जो इस बार होली का नाम भी लिया ज़ुबान से, छोड़-छाड़ के चली जाऊँगी सब, फिर भुगतते रहना अपने आप पिछली बार का याद है ना? या भूले बैठे हैं जनाब कि कितने डंडे पड़े थे? और कहाँ-कहाँ पड़े थे? सिकाई तो मुझी को करनी पड़ी थी ना? तुम्हारा क्या है? मज़े से चारपाई पे लेटे-लेटे कराह रहे थे चुप-चाप.... "हाय!...मैं मर गया" "हाय!.... मैं मर गया" नोट:इस बार आलस्य...

आसमान से गिरा

***राजीव तनेजा*** 'हाँ आ जाओ बाहर... कोई डर नहीं है अब...चले गए हैं सब के सब।' मैं कंपकंपाता हुआ आहिस्ता से जीने के नीचे बनी पुरानी कोठरी से बाहर निकला। एक तो कम जगह ऊपर से सीलन और बदबू भरा माहौल, रही-सही कसर इन कमबख़्तमारे चूहों ने पूरी कर दी थी। जीना दूभर हो गया था मेरा। पूरे दो दिन तक वहीं बंद रहा मैं। ना खाना, ना पीना, ना ही कुछ और। डर के मारे बुरा हाल था। सब ज्यों का त्यों मेरी आँखों के सामने सीन-दर-सीन आता जा रहा था। मानों किसी फ़िल्म का फ्लैशबैक चल रहा हो। बीवी बिना रुके चिल्लाती...

बुरा ना मानो...होली है-7

हमसे का भूल हुई जो ये सज़ा हमका मिली     ...

बुरा ना मानो...होली है-6

देख के तुमको...क्या होता है कुछ ना बताएँगे कुछ भी कहे कोई हम तो तुमको देखे जाएँगे   ...

बुरा ना मानो...होली है-5

मेरी किस्मत में तू नहीं शायद क्यूँ तेरा इंतज़ार करती हूँ मैँ तुझे कल भी प्यार करती थी मैँ तुझे अब भी प्यार करती हूँ       ...

बुरा ना मानो...होली है-4

  क्या अदा....क्या जलवे तेरे पारो....ओ पारो     ...

बुरा ना मानो...होली है-3

  मेरे दिल में आज क्या है तू कहे तो मैँ बता दूँ ...

बुरा ना मानो...होली है-2

दिन ढल जाए...हाय रात ना जाए तू तो ना आए ...तेरी याद सताए   ...

बुरा ना मानो...होली है-1

छोड़ गए बालम.... हाय अकेला छोड़ गए ...

कुछ चित्र

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अच्छा...अच्छा...बहुत अच्छा

चुनाव के इस माहौल में बिन माँगे धोती मिले पहले माँगे से भी ना मिलता कभी था कच्छा अब तो हमारी हर माँग पर नेता जी बस इतना कहें अच्छा...अच्छा...बहुत अच्छा     ***राजीव तनेजा***   चित्र सौजन्य: पंगेबाज़,गूगल इमेज सर्च...

नवभारत टाईम्स पर मेरी कविता-सौगंध राम की खाऊँ कैसे

नवभारत टाईम्स पर मेरी कविता-सौगंध राम की खाऊँ कैसे   नोट:कल नवभारत टाईम्स ऑनलाईन की सर्च में ऐसे ही अचानक जब मैँने अपना नाम टाईप किया तो इस कविता के लिंक के मुझे दर्शन हुए,तो सोचा कि क्यों ना इसे आप सभी के साथ शेयर किया जाए ताकि प्रसाद स्वरूप कुछ अतिरिक्त टिप्पणियाँ हासिल हो सकें। :-) तत्कालीन घटनाओं पर आधारित मेरी यह कविता लगभग एक साल पहले नवभारत टाईम्स ऑनलाईन पर आई थी,जिसका मुझे तब पता नहीं चला क्योंकि नवभारत टाईम्स वाले अपनी व्यस्त्तता के चलते लेखकों को उनके लेख छपने की सूचना नहीं देते...
 
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