निकाल इसी बात पै सौ का नोट
***राजीव तनेजा***
“रुक...अबे रुक"....
"ज्जी...मैँ?"....
"ओर तेरा फूफ्फा?".…
"जी...बोलिए"...
"बेट्टे!....बोलूँगा तो मैँ जरूर और सुणेगा बी तू जरूर"अपनी मूँछों को ताव दे बैरियर पे खड़ा सिपाही बोला
"हाँ जी!...बोलिए"...
"के बात?....तैन्ने दीखया कोणी यो गज भर लाम्बा... ठाढा सा(तगड़ा) पूरे अढाई किलो का हाथ?"...
"ज्जी....शायद!...म्रेरा ध्यान दूसरी तरफ था"...
"वोई तो...निकाल इसी बात पै सौ का नोट"...
"सौ का नोट?...वो किसलिए?"....
"वो इसलिए मेरे फूफ्फा...के मन्ने आज घर पै बाहमण(ब्राहमण) जीमाणे...