घंटा…मेरे बाबा जी का

***राजीव तनेजा***   “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “ओ….कुण्डी ना खड़का …सोणया सिद्धा अन्दर आ"… “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “अरे!…कौन है भाई?….ज़रा रुको तो सही…अभी खोलता हूँ…..पहले ज़रा नाड़ा तो ठीक से बाँध लूँ”… “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “तनेजा जी!…दरवाज़ा खोलिए……खोलिए ना"….. “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “ओफ्फो!…क्या मुसीबत है?”मैं अपने सरकते हुए पायाजामे को ऊपर खींच नाड़ा बाँधने की कोशिश करते हुए बोलता हूँ … “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “अमां यार!…काठ का दरवाज़ा है कोई ईंट-पत्थर का नहीं जो इस कदर बेरहमी से बजाए चले जा रहे...

रूपचंद शास्त्री जी…शब्दों के साथ ऐसा खिलवाड क्यूँ?…क्यूँ?…क्यूँ?

आदरणीय एवं माननीय  रूपचंद शास्त्री जी ,नमस्कार सबसे पहले तो मैं तहेदिल से आपका शुक्रगुजार हूँ और जीवनपर्यंत रहूँगा कि आपने मुझ जैसे अदना से ब्लॉगर द्वारा… आपके ब्लॉग पर की गई कुछ निरर्थक (आपके हिसाब से) एवं तीखी टिप्पणियों(मेरे हिसाब से) का जवाब देने के लिए अपना कीमती समय खर्च कर मुझे पत्र …ऊप्स!…सारी ईमेल भेजा… उसी सन्दर्भ में मैं आपको ये पोस्ट लिख रहा हूँ   आपका ये कहना १०० % सही है कि मैं सदैव ‘हँसते रहो’ का नारा बुलंद करता हूँ और इसके...

नहीं परहेज़ मुझे किसी से सभी मुझको प्रिय सभी मुझको प्यारी

***राजीव तनेजा***   मैँ हूँ बाल ब्रह्मचारी... कन्या हो या हो कुंवारी ब्याहता हो,,, या हो परित्यक्ता नारी नहीं परहेज़ मुझे किसी से सभी मुझको प्रिय सभी मुझको प्यारी हलकी हो  या हो भारी चौरसी हो  या हो ऑरी मिर्ची चलेगी तेज़ करारी मिलूँगा सबको बारी-बारी नहीं परहेज़ मुझे किसी से सभी मुझको प्रिय सभी मुझको प्यारी   गोरी हो या हो काली हो बस जो मस्त औ मतवाली बनेगी वही मेरी घरवाली खेलूँगा मैँ सबसे लम्बी पारी ...
 
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