घंटा…मेरे बाबा जी का
***राजीव तनेजा*** “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “ओ….कुण्डी ना खड़का …सोणया सिद्धा अन्दर आ"… “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “अरे!…कौन है भाई?….ज़रा रुको तो सही…अभी खोलता हूँ…..पहले ज़रा नाड़ा तो ठीक से बाँध लूँ”… “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “तनेजा जी!…दरवाज़ा खोलिए……खोलिए ना"….. “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “ओफ्फो!…क्या मुसीबत है?”मैं अपने सरकते हुए पायाजामे को ऊपर खींच नाड़ा बाँधने की कोशिश करते हुए बोलता हूँ … “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “अमां यार!…काठ का दरवाज़ा है कोई ईंट-पत्थर का नहीं जो इस कदर बेरहमी से बजाए चले जा रहे...