ना बाप बड़ा ना मईय्या- राजीव तनेजा

“अब क्या करूँ शर्मा जी…इस स्साले चपड़गंजू का?…ना मौक़ा देखता है और ना ही उसकी नज़ाकत….बिना माहौल देखे ही पट्ठा…बात-बात में …बिना बात के तिया-पांचा करने को बेताब हो…नाक में दम करता हुआ सीधा बाप पर पहुँच जाता है"… “तो लट्ठ मार के मुंह तोड़ दो ना ससुरे का…अपने आप ठीक हो जाएगा"… “नहीं तोड़ सकता"… “क्यों?”… “इसमें ससुर बेचारे का क्या दोष?”… “तो उसके नाती का ही मुंह तोड़ दो…वो भी तो कई बार…. “लेकिन वो तो बस…ऐसे ही…कभी-कभार लाड-प्यार में…यहाँ-वहाँ…. “मूत जाता है?"… “नहीं!…थूक जाता है"… “हम्म!…यही तो...

इक चतुर नार…बड़ी होशियार- राजीव तनेजा

कार्टून सौजन्य- इरफ़ान “हद हो गई यार ये तो….हम अभी अंधे हुए नहीं और इन स्सालों के हाथ बटेर भी लग गई…इस सुसरे लोकराज में जो हो जाए…थोड़ा है”मैं गुस्से से अपने  पैर पटकता हुआ बोला… “क्या हुआ तनेजा जी?…इस कदर बौखलाए-बौखलाए से क्यों घूम रहे हैं?”… “कमाल करते हैं शर्मा जी आप भी…बौखलाऊँ नहीं तो और क्या करूँ?…पहले तो औकात ना होने के बावजूद हम लोगों को महफ़िल सजाने का सुनहरा मौक़ा दे दिया जाता है और फिर चलो …भूले से ही सही…दे दिया तो दे दिया…अब काहे को बेफालतू में इस खुशनुमा माहौल के तम्बू का बम्बू...
 
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