थोडा-बहुत..सच…बहुत कुछ झूठ- राजीव तनेजा
“सजन रे…बूट मत खोलो…अभी बाज़ार जाना है… ना दालें हैं ..ना सब्जी है…अभी तो राशन लाना है"… अरे!…ये क्या?….मैं तो असली गीत गाने के बजाय उसकी पैरोडी गाने लगा?…गा-गा मस्ताने लगा….असली गाना तो शायद…कुछ इस तरह से था ना?… “सजन रे…झूठ मत बोलो…खुदा के पास जाना है… ना हाथी है..ना घोड़ा है…वहाँ तो बस…पैदल ही जाना है"… हाँ-हाँ…अब इस बुढियाती हुई उम्र के चालीसवें बसन्त में आप मुझे पैदल ही चलवाओगे?…हाथी…घोड़े तो सब भेज दिए ना चपड़गंजुओं की बारात में नाचने-गाने और हिनहिनाने के लिए?…और उम्मीद...