लुंगी संभाल भोगी…खिसकी चली जाए रे- राजीव तनेजा

“माना कि मैं खुर्राट हूँ…आला दर्जे का खुर्राट…..अव्वल दर्जे का खुर्राट…तो इसमें आखिर…गलत क्या है?….क्या अपने फायदे के लिए चालाक होना…गलत होना….सही नहीं है…..गलत है?…और अगर है…तो भी मुझे किसी की चिंता नहीं…किसी की परवाह नहीं…..मुझे गर्व है कि मैं अव्वल दर्जे का कमीना होने के साथ-साथ थाली का वो(हाँ-हाँ…वही वाला) बैंगन हूँ जो जहाँ ढाल देखता है…वहीँ लुडक लेता है….तो आखिर इसमें गलत क्या है?…क्या अपने फायदे के लिए पिछले किए गए सभी वायदों से मुकर जाने में भलाई नहीं है?…. समझदारी नहीं है?”… “हाँ-हाँ!…आप...

कॉल करती….ना मिस कॉल करती- राजीव तनेजा

“हद हो गई बेशर्मी की ये तो …कोई भरोसा नहीं इन कंबख्तमारी औरतों का….किसी की सगी नहीं होती हैं ये"… “आखिर!…हुआ क्या तनेजा जी?….क्यों इस कदर बडबड़ाए चले जा रहे हैं?”… “बडबड़ाऊँ नहीं तो और क्या करूँ गुप्ता जी?….और छोड़ा ही किस लायक है उस  कंबख्तमारी ने मुझे?"… “जी!…सो तो है"मेरी दयनीय हालत देख गुप्ता जी का स्वर भी उदास होने को हुआ… “जी!… “यही बात तो मुझे बिलकुल पसंद नहीं आती इन कंबख्तमारी औरतों की…पहले तो बात-बात पे बिना बात खुद ही तू-तड़ाक करेंगी और फिर अपना बस ना चलता देख खुद ही बिना किसी...

चढ जा बेटा सूली पे-राजीव तनेजा

“हाँ!…तो पप्पू जी…मेरे ख्याल से काफी आराम हो गया है….अब आगे की कहानी शुरू करें?”… “जी!…ज़रूर"… “तो फिर बताइये…क्या टैंशन है”… नोट: दोस्तों मेरी पिछली कहानी ‘भोगी को क्या भोगना…भोगी मांगे दाम' ज़रूरत से ज्यादा बड़ी हो रही थी…इसलिए मैंने उस कहानी को दो भागों में विभक्त कर दिया था| लीजिए अब आपके समक्ष पेश है उस कहानी का दूसरा और अंतिम भाग “मैं बताऊँ?”… “जी!… “टैंशन आपको है और मैं बताऊँ?”… “नहीं!…अपनी टैंशन तो मैं खुद बयाँ कर दूंगा…आप अपनी बताइए"… “आपको भी टैंशन है?”.....

यार ने ही लूट लिया घर यार का-राजीव तनेजा

समझ में नहीं आ रहा मुझे कि आखिर!…हो क्या गया है हमारे देश को…इसकी भोली-भाली जनता को?…. कभी जनता के जनार्दन को सरेआम जूता दिखा दिया जाता है तो कभी जूता दिखाने वाले को दिग्गी द्वारा भरी भीड़ में बेदर्दी से लतिया दिया जाता है…पीट दिया जाता है…आखिर!..ये होता क्या जा रहा है हमारे देश की भोली-भाली जनता को?…वो पहले तो ऐसी नहीं थी.. क्यों बात-बात में बिना बात के बाल की खाल निकाली जा रही है?…निकाली क्या जा रही है?…सर से पाँव तक और नख से लेकर शिखर तक…नीचता भरी नीयत के साथ तमाम हदों को पार करते हुए…बेदर्दी...

आक!…थू …थू है मेरे मुँह पर- राजीव तनेजा

प्रिय पुत्र अनामदास, कैसे हो?…मैं यहाँ अपने घर में…अपने बलबूते पर एकदम से सही-सलामत हूँ और उम्मीद करता हूँ कि तुम भी  अपने घर में…अपने ही दम पर सुख एवं शान्ति के साथ जीवन व्यतीत कर रहे होगे….’शान्ति’ कैसी है?….बहुत दिन हो गए उससे मिले हुए…मेरा सलाम कहना उसे|ये सब पढकर तुम सोच रहे होगे कि बुड्ढा सठिया गया है लेकिन सच पूछो तो यार….इस उम्र में भी बड़ी याद आती है उसकी…दिन-रात उसका और तुम्हारा चेहरा ही अक्स बन मेरे दिल औ दिमाग पर छाया रहता है…उससे कहना कि अपने किए पे मैं बहुत शर्मिंदा हूँ…अफ़सोस...
 
Copyright © 2009. हँसते रहो All Rights Reserved. | Post RSS | Comments RSS | Design maintain by: Shah Nawaz