लुंगी संभाल भोगी…खिसकी चली जाए रे- राजीव तनेजा
“माना कि मैं खुर्राट हूँ…आला दर्जे का खुर्राट…..अव्वल दर्जे का खुर्राट…तो इसमें आखिर…गलत क्या है?….क्या अपने फायदे के लिए चालाक होना…गलत होना….सही नहीं है…..गलत है?…और अगर है…तो भी मुझे किसी की चिंता नहीं…किसी की परवाह नहीं…..मुझे गर्व है कि मैं अव्वल दर्जे का कमीना होने के साथ-साथ थाली का वो(हाँ-हाँ…वही वाला) बैंगन हूँ जो जहाँ ढाल देखता है…वहीँ लुडक लेता है….तो आखिर इसमें गलत क्या है?…क्या अपने फायदे के लिए पिछले किए गए सभी वायदों से मुकर जाने में भलाई नहीं है?…. समझदारी नहीं है?”… “हाँ-हाँ!…आप...