इन्तिहा हो गई…हर बात की(अंतिम भाग) राजीव तनेजा

दोस्तों…जैसा कि इस कहानी के पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कैसे ‘दुबे’ नाम का एक अनजाना शख्स मुझे चने के झाड पे चढाते हुए मेरी कहानी पर फिल्म बनाने का ऑफर देता है और कई दिलचस्प मोड़ों के बाद  बदलते घटनाक्रम के दौरान वो मेरी किताब भी छपवाने का वादा करता है… क्या सच में मेरी कहानी पर फिल्म बन सकती है या जाएगी? या किताब के रूप में मेरी कहानियों को उनके असली कद्रदान याने के पाठक मिल जाएँगे? जानिये ये सब और इसके अलावा बहुत कुछ मेरी इस हिन्दी ब्लोगजगत में छुपे हुए सफेदपोशों के चेहरे से उनके नकाब को उधेड़ कर फेंकती हुई कहानी के माध्यम से… राजीव तनेजा...

इन्तिहा हो गयी...हर बात की(1)- राजीव तनेजा

नोट: दोस्तों….हाल ही में हिन्दी ब्लॉगजगत में घटित एक सच्ची घटना एवं कल्पना का ये समिश्रण आपको कैसा लगा?…ज़रूर बताएँ “हैलो….तनेजा जी?”… “हाँ!…जी बोल रहा हूँ…आप कौन?”… “मैं दुबे…जौनपुर से"… “जी!…दुबे जी…कहिये…क्या खिदमत कर सकता हूँ मैं आपकी?”… “अजी!…खिदमत कैसी?…मैं तो धन्य हो गया जो आपसे बात हो गई"… “हें…हें…हें…दुबे जी…आप भी कमाल करते हैं…मैं भला इस लायक कहाँ कि मुझसे बात कर के लोग धन्य होने लगे?”… “अजी!…हीरे की कद्र भला हीरा खुद कहाँ जानता है?…ये तो जौहरी ही होता है जो उसकी सही कीमत का आकलन करता है"… “मैं कुछ समझा नहीं"… “अभी जस्ट…आपका व्यंग्य ‘तीतर के दो आगे तीतर' पढ़ने के बाद मन हुआ कि आपसे बात...

रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं और नाम है…?..?…?..?- राजीव तनेजा

क्या?…क्या है महान आखिर आपके इस देश में?…किस गुरुर में?…किस घमण्ड में इतराए चले जा रहे हैं आप लोग?…ले-दे के एक ताजमहल या फिर कुछ पुराने टूटे-टाटे…बाबा आदम के ज़माने के खंडहरों समेत ‘हँसते रहो' का  राजीव तनेजा ही तो बचा है आपके इस अजब-गज़ब देश में देखने लायक चीज़.. किस?…किसकी बात कर रहे हैं आप?… उस ईंटनुमा बन्द गोल मीनार की?… नहीं!…मैं राजीव की नहीं बल्कि क़ुतुब…क़ुतुब मीनार की बात कर रहा हूँ…. है ही क्या बचा आखिर उसमें खास बस इसके अलावा कि उसे कुतुबद्दीन एबक द्वारा फलाने-फलाने सन में फलाने-फलाने...
 
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