इन्तिहा हो गई…हर बात की(अंतिम भाग) राजीव तनेजा
दोस्तों…जैसा कि इस कहानी के पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कैसे ‘दुबे’ नाम का एक अनजाना शख्स मुझे चने के झाड पे चढाते हुए मेरी कहानी पर फिल्म बनाने का ऑफर देता है और कई दिलचस्प मोड़ों के बाद बदलते घटनाक्रम के दौरान वो मेरी किताब भी छपवाने का वादा करता है… क्या सच में मेरी कहानी पर फिल्म बन सकती है या जाएगी? या किताब के रूप में मेरी कहानियों को उनके असली कद्रदान याने के पाठक मिल जाएँगे? जानिये ये सब और इसके अलावा बहुत कुछ मेरी इस हिन्दी ब्लोगजगत में छुपे हुए सफेदपोशों के चेहरे से उनके नकाब को उधेड़ कर फेंकती हुई कहानी के माध्यम से… राजीव तनेजा...