टाएं-टाएं फिस्स- राजीव तनेजा
“ओहो!…शर्मा जी…आप….धन भाग हमारे जो दर्शन हुए तुम्हारे”… “जी!…तनेजा जी….धन भाग तो मेरे जो आपसे मुलाक़ात हो गयी"… “हें…हें…हें…शर्मा जी….काहे को शर्मिन्दा कर रहे हैं?….मैं भला किस खेत की मूली हूँ?….कहिये!…कैसे याद किया?”… “अब…यार…क्या बताऊँ?…मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है"… “जब खुद की ही समझ में नहीं आ रहा है तो मुझे क्या ख़ाक समझाएंगे?”मैं झल्लाने को हुआ… “न्नहीं!…दरअसल मैं समझाने नहीं बल्कि समझने आया हूँ?”…. “क्या?”…. “यही तो समझ नहीं आ रहा है"… “क्क्या?”…. “जी!…. “आपको खुद ही...