या तो नूँ ऐ चालेगी

“हद हो गयी ये तो एकदम पागलपन की…नासमझ है स्साले सब के सब….अक्ल नहीं है किसी एक में भी…लाठी..फन फैलाए..नाग पर भांजनी है मगर पट्ठे..ऐसे कमअक्ल कि निरीह बेचारी जनता के ही एक तबके को पीटने की फिराक में हाय तौबा मचा…अधमरे हुए जा रहे हैं"… “किसकी बात कर रहे हैं तनेजा जी?”… “हर एक को बस..अपनी ही पड़ी हुई है..बाकी सब जाएँ बेशक…भाड़ में…(मेरा बडबडाना जारी था) “हुआ क्या तनेजा जी?…कुछ बताइए तो सही"… “पेट पे लात लगी तो लगे अम्मा..अम्मा चिल्लाने…यही अगर पहले ही अक्ल से काम लिया होता तो काहे को इतनी दिक्कत…इतनी...

शोर्टकट- गाँव से शहर तक

ट्रिंग ट्रिंग.. “हैलो….कौन बोल रहा है?”.. “डॉक्टर साहब घर पर हैं?”… “हाँ!…जी बोल रहा हूँ…आप कौन?”.. “जी!..मैं शर्मा… “शरमाइए  मत…सीधे सीधे फरमाइए कि…आप हैं कौन?”… “ज्ज…जी!…म्म..मैं… “अब यूँ ही मिमियाते रहेंगे या अपना नाम..पता ठिकाना कुछ बताएँगे भी?”डॉक्टर साहब के स्वर में थोड़ी सी झुंझलाहट थी.. “जी!…मैं शर्मा…आपका दोस्त”… “ओहो!..शर्मा जी…आप हैं…पहले नहीं बता सकते थे क्या?….कहिए…कैसे हैं आप?”.. “बहुत बढ़िया…आप कैसे हैं"…. “एकदम बढ़िया…फर्स्ट क्लास"… “जी!.. “क्या बात?….बड़े...

हत्या

  "हत्या" पढना चाहता हूँ मैं... बड़े प्रेम और लगन से... मंत्रमुग्ध हो.. पन्ना दर पन्ना... तुम्हारे उजले...निष्कलंक..अतीत और... स्वाभीमानी वर्तमान का ताकि भविष्य में तुम्हारे... कभी मैं कर सकूँ... आसानी से...निसंकोच तुम्हारे ही...उजले चरित्र की... 'हत्या'...

फैलसूफियाँ नहीं तो ना सही

  “पागल हो गए हैं स्साले सब के सब….दिमाग घास चरने चला गया है पट्ठों का…इन्हें तो वोट दे के ही गलती कर ली मैंने…अच्छा भला झाडू वाला भाडू तरले कर रहा था दुनिया भर के लेकिन नहीं..मुझे तो अच्छे दिनों के कीड़े ने काट खाया था ना?..लो!..आ गए अच्छे दिन..अब ले लो वडेवें…इन स्साले अच्छे दिनों की तो मैं”मैं दांत किटकिटाता हुआ गुस्से से बडबडा रहा था “क्या हो गया तनेजा जी…ऐसे..इतने गुस्से में किसकी ऐसी तैसी करने पे तुले हैं?”… “ऐसी तैसी तो हम लोगों की हुई है जनाब..हमने भला किसी ऎसी तैसी करनी है?”मैं...

इश्क कैसे कैसे

“ओह!…शिट..पहुँच जाना चाहिए था अब तक तो उसे….पता भी है कि मुझे फिल्म की स्टार्टिंग मिस करना बिलकुल भी पसंद नहीं”… “कहीं ट्रैफिक की वजह से तो नहीं…इस वक्त ट्रैफिक भी तो सड़कों पे बहुत होता है लेकिन अगर ऐसी ही बात थी तो घर से जल्दी निकलना चाहिए था उसे"सड़क पे भारी जाम देख बडबडाते हुए मेरे चेहरे पे चिन्तायुक्त झल्लाहट के भाव थे… “चलो!…माना कि किसी वजह से घर से ही देर से निकला होगा और फिर ट्रैफिक में भी फँस गया होगा मगर फोन तो उठाए कम से कम मेरा”माथे पे चुह आए पसीने को पोंछते हुए मैं इधर उधर टहलता...

चुनिदा तुकबंदियाँ -1

तेरे आँसूओं की कीमत कम नहीं..…………........बहुत है मेरे लिए डॉक्टर ने जो कहा है..सेलाइन वाटर बैस्ट नेज़ल ड्राप है मेरे लिए -------------------------------------------------------------------------- प्रभु...क्यों ना उतारूं सुबह शाम मैं..आरती जामुन सारे तोड़ ले जाती...ऊपर से मारती ---------------------------------------------------------------------------- प्यार करने से जानूं..कब मैंने इनकार किया है याद करो...जब भी किया है..इन कार किया है --------------------------------------------------------------------------- दर से ऐ राजीव उसके........कोई ना खाली गया चल उसके यहाँ जो..हर एक का नोट..जाली गया ---------------------------------------------------------------------------...
 
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