हद कर दी आपने- सुभाष चंदर

जब कभी आप धीर गंभीर मुद्रा में कोई किताब पढ़ रहे हों और बीच-बीच में ही अचानक पढ़ना छोड़, ठठा कर हँसने लगें  तो आसपास बैठे लोगों का चौंक कर देखना लाज़मी है। ऐसा ही कुछ इस बार हुआ जब मैं प्रसिद्ध व्यंग्यकार सुभाष चंदर जी की किताब "हद कर दी आपने" अपने मेट्रो के सफ़र के दौरान पढ़ रहा था। सच में हद ही कर दी उन्होंने तो। क्या कोई इस तरह...इतना ग़ज़ब का लिखता है कि पढ़ते वक्त आपका, आपके जज़्बातों पर ही नियंत्रण ना रहे? कम से कम सोचना चाहिए उन्हें कि ऐसे..किसी की सरेराह भद्द पिटवाना क्या सही है? मेरा...

डार्क हॉर्स- नीलोत्पल मृणाल- समीक्षा

कई बार कुछ कहानियाँ या उपन्यास अपनी भाषा...अपने कथ्य..अपनी रोचकता..अपनी तारतम्यता के बल पर  आपको निशब्द कर देते हैं। उनको पूरा पढ़ने के बाद भी आप उसी कहानी..उसी परिवेश और उन्हीं पात्रों के साथ खुद को उसी माहौल में विचरता पाते हैं। ऐसा ही कुछ मेरे साथ इस बार हुआ जब मैंने नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास "डार्क हॉर्स" पढ़ने के लिए उठाया।इस उपन्यास में कहानी है दिल्ली के एजुकेशन हब माने जाने वाले इलाके मुखर्जी नगर और उसके आसपास के सटे इलाकों की जहाँ पर पूरे साल देश भर से गाँव देहात के हज़ारों लाखों युवा...

मिसेज फनीबोन्स - ट्विंकल खन्ना

माना जाता है कि किसी को हँसाना सबसे मुश्किल काम है। इस काम को आसान बनाने के लिए कुछ लोगों द्वारा किसी एक की खिल्ली उड़ा, उसे हँसी का पात्र बना सबको हँसाया जाता है लेकिन यकीन मानिए ऐसे..इस तरह..किसी एक का माखौल उड़ा सबको हँसाने की प्रवृति सही नहीं है। ना ही ऐसे हास्य की लंबी उम्र ही होती है। बिना किसी को ठेस पहुँचाए खुद अपना मज़ाक उड़ा, दूसरों को हँसाने का तरीका ही सही मायनों में श्रेयस्कर होता है। किसी की वजह से अगर किसी को मुस्कुराने की ज़रा सी भी वजह मिल जाती है तो समझिए कि उसका दिन बन जाता है। ऐसे...

घुसपैठ-लघुकथा

"घुसपैठ"- लघुकथाआज मुझे किसी बुज़ुर्ग रिश्तेदार की श्रद्धांजलि सभा में जाना पड़ा। हँसते खिलखिलाते जब हम वहाँ पर पहुँचे तो औरों की तरह हमारे चेहरे पर भी मुर्दनी छा चुकी थी। सब कुछ सही तरीके से विधिनुसार ठीकठाक चल रहा था, बढ़िया खाना पीना...शोकसंतप्त परिवार, हँसते-खिलखिलाते या फिर रो-रो कर भैढे़ मुँह बनाते इधर-इधर से टपकते  रिश्तेदार, खामख्वाह टाइप के मिलने जुलने वालों का तो मानों तांता सा लगा था, सुरमयी आवाज़ में हारमोनियम एवं ढोलक की थाप के साथ प्रवचन इत्यादि... रिहर्सलानुसार सब का सब एकदम सधे एवं सही तरीके से विधिवत चल रहा था।मधुर प्रवचन के बाद पंडित जी ने जब विराम लिया तो शोकसंतप्त परिवार की बेटी और दामाद ने शोक संदेश पढ़ने...

स्वादानुसार

"स्वादानुसार"बुरकना चाहता हूँ मैं तुम्हारे...अद्ध पनपे...अद्ध विकसित..मगर पनपने को आतुर..खिलखिलाते सपनों पर...अपनी पसंद का...नमक और मिर्च..ताकि तुम बन सको...मेरे अनुकूल..मेरे...सिर्फ मेरे...स्वादानु...

भाई जान

"सुनो!...रात का वक्त है और पहली बार तुम पर विश्वास कर के तुम्हें अकेला भेज रहे हैं। हमें ग़लत साबित मत करना बेटा।" "जी...अब्बू जान।" "ध्यान से जाना और किसी से फ़ालतू बात मत करना और अगर कोई कुछ खाने या पीने के लिए भी दे तो बिलकुल मत लेना।" "जी!.. "और हाँ!...वहाँ उस लफंगे तैय्यब से ज़रा दूर रहना। नीयत ठीक नहीं उसकी...जब भी देखो..तुम्हें घूरता रहता है।" "जी!...अब्बू जान।" इन नसीहतों के खत्म होते ही ट्रेन ने धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ ली।    "सुनो!... क्या कह रहे थे तुम्हारे अब्बू जान?" धम्म...

पाप

"अररर..अरे!..ये क्या कर रहा है बेवकूफ़? मत उठा..पाप लगेगा..टोना है।" बीच सड़क कुछ फूल, मिठाई और छुटकर पड़े पैसों को उठाने के लिए लपकते हुए मेरे हाथों को वो जबरन खींच कर रोकता हुआ बोला।"हुंह!...मुझे भला क्यूँ पाप लगेगा? पाप तो उस ऊपर बैठे ऊपरवाले को लगेगा जो हमें कई दिनों से भूखा मार रहा है।" मैं फिर झटके से अपना हाथ छुड़ा..नीचे झुकता हुआ बोला। ...

सोच

वो दफ्तर को पहले ही लेट हो चुकी थी। हाँफते हाँफते बस में चढ़ी तो पाया कि पूरी बस ठसाठस भरी हुई है। चेहरे पे निराशा के भाव आने को ही थे कि अचानक एक सीट खाली दिखाई दी मगर ये क्या? उसकी बगल में बैठा लड़का तो उसी की तरफ देख रहा है। शर्म भी नहीं आती ऐसे लोगों को...घर में माँ-बहन, बेटियां नहीं हैं क्या? "खैर!..देखी जाएगी..कुछ भी फ़ालतू बोला तो यहीं के यहीं मुँह तोड़ दूँगी।" ये सोच वो उस सीट की तरफ बैठने के लिए बढ़ी। मगर ये क्या बैठने से पहले ही कंबख्त ने उसे छूने के लिए हाथ बढ़ा दिया। वो बौखला...
 
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