संकल्प- लघुकथा

"तुझे पता है ना... मैं हमेशा सच बोलता हूँ मगर कड़वा बोलता हूँ। सीधी सच्ची बात अगर मेरे मुँह से तू सुनना चाहता है ना तो सुन... तू कामचोर था...तू कामचोर है।" राजेश, मयंक को समझा समझा कर थक जाने के बाद अपने हाथ खड़े करता हुआ बोला।"लेकिन भइय्या....(मयंक ने कुछ कहने का प्रयास किया।)" अब मुझे ही देख...मैं भी तो तेरी तरह इसी शहर में पिछले दो साल से हूँ लेकिन देख...गांव में इसी शहर की बदौलत मैंने पक्का मकान बना लिया...नयी मोटरसाइकिल खरीद ली और तूने बता इन दो सालों में क्या कमाया है? तेरे राशन...

चढ़ी जवानी बुड्ढे नूं

{पति ड्रेसिंग टेबल के आगे सज संवर रहा है ।उसको देख कर उसकी पत्नी कैमरे की तरफ मुंह करके शुरू हो जाती है।}"देखा आपने कैसे बुढ़ापे में इनको ये सब चोंचले सूझ रहे हैं।  बताओ...ज़रा से बाल बचे हैं सिर पर लेकिन जनाब को तो हफ्ते में दो बार शैम्पू विद कंडीशनर इस्तेमाल करना है और ड्रायर...ड्रायर तो बिना नागा रोज़ ही फेरना है। अब आप ही बताओ क्या रोज़ रोज़ ड्रायर फेरना सही है? एक तो पहले से ही खेत बंजर होता जा रहा है। ऊपर से ये क्या कि बची खुची फसल को सुखा मारो? माना की कभी शशि कपूर जैसी पर्सनैलिटी...

हींग लगी ना फिटकरी

"अच्छा...सुनो...मैं सोच रही थी कि बड़े दिन हो गए सिंपल सिंपल सा बनाते खाते हुए...तो  आज कुछ अच्छा बना लेती हूँ। बोलो..क्या बनाऊँ?""अपने आप देख लो।""नहीं...तुम बताओ..."सबसे अच्छा तो मेरे ख्याल से तुम मुँह बनाती हो।""तुम भी ना...हर टाइम बस मज़ाक ही करते रहा करो और कोई काम तो है नहीं।""अरे!....काम का तो तुम नाम ही मत लो। जब से ये मुय्या कोरोना शुरू हुआ है। काम धंधे तो वैसे ही सारे के सारे ठप्प पड़ गए हैं।""हम्म!...बात तो तुम सही ही कह रहे हो।""अच्छा...अब अगर तुम तशरीफ़ ले जाओ तो अपना मैं काम कर लूँ?""हुंह!...ये...

खिड़कियों से झाँकती आँखें- सुधा ओम ढींगरा

आमतौर पर जब हम किसी फ़िल्म को देखते हैं तो पाते हैं कि उसमें कुछ सीन तो हर तरह से बढ़िया लिखे एवं शूट किए गए हैं लेकिन कुछ माल औसत या फिर उससे भी नीचे के दर्ज़े का निकल आया है।  ऐसे बहुत कम अपवाद होते हैं कि पूरी फ़िल्म का हर सीन...हर ट्रीटमेंट...हर शॉट...हर एंगल आपको बढ़िया ही लगे। कमोबेश ऐसी ही स्थिति किसी किताब को पढ़ते वक्त भी हमारे सामने आती है जब हमें लगता है कि इसमें फलानी फलानी कहानी तो बहुत बढ़िया निकली लेकिन एक दो कहानियाँ... ट्रीटमेंट या फिर कथ्य इत्यादि के हिसाब से औसत दर्ज़े की भी...

बहुत दूर गुलमोहर- शोभा रस्तोगी

जब कभी भी हम अपने समकालीन कथाकारों के बारे में सोचते हैं तो हमारे ज़हन में बिना किसी दुविधा के एक नाम शोभा रस्तोगी जी का भी आता है जो आज की तारीख में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लघुकथाओं के क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय काम किया है। ऐसे में जब पता चला कि इस बार जनवरी के पुस्तक मेले में उनकी एक नई किताब "बहुत दूर गुलमोहर" आ रही है तो उसे लेना तो बनता ही था। अब फुरसत के इन पलों में जब उनकी किताब को पढ़ने के लिए उठाया तो सुखद आश्चर्य के तहत पाया कि इस किताब में उनकी लघुकथाएँ नहीं बल्कि कुछ ...

खट्टर काका- हरिमोहन झा

कहते हैं कि समय से पहले और किस्मत से ज़्यादा कभी कुछ नहीं मिलता। हम कितना भी प्रयास...कितना भी उद्यम कर लें लेकिन होनी...हो कर ही रहती है। ऐसा ही इस बार मेरे साथ हुआ जब मुझे प्रसिद्ध लेखक हरिमोहन झा जी द्वारा लिखित किताब "खट्टर काका" पढ़ने को मिली। इस उपन्यास को वैसे मैंने सात आठ महीने पहले अमेज़न से मँगवा तो लिया था लेकिन जाने क्यों हर बार मैं खुद ही इसकी उपस्तिथि को एक तरह से नकारता तो नहीं लेकिन हाँ...नज़रंदाज़ ज़रूर करता रहा। बार बार ये किताब अन्य किताबों को खंगालते वक्त स्वयं मेरे हाथ...

नॉस्टेल्जिया

"नॉस्टेल्जिया"बताओ ना...पुन: क्यूँ रचें...लिखें...पढ़ें..या फिर स्मरण करें..एक दूसरे को ध्यान में रख कर लिखी गयी उन सब तमाम..बासी..रंगहीन..रसहीन प्रेम कविताओं को बताओ ना...क्यूँ स्मरण करें हम...अपने उस रूमानी..खुशनुमा दौर को क्या मिलेगा या फिर मिलने वाला है..आखिर!..इस सबसे अब हमें..सिवाए ज़िल्लत...परेशानी और दुःख के अलावा अब जब हम जानते हैं..अच्छी तरह से कि...अब इन सब बातों का..कोई असितत्व..कोई औचित्य नहीं...तुम भी खुले मन और अपने अंत:करण से...किसी और को स्वीकार कर चुकी हो...और...

सब्र

"सब्र"मुंह में दांत नहीं...पेट में आंत नहीं..फिर भी देख..मौजूद कितना..मुझमें सब्र है ब्याह करने को..अब भी उतावला हूँ..बेशक..पाँव लटके हैं..और तैयार देखो..हो रही मेरी कब्र है ...

कचरा- लघुकथा

"तंग आ गए यार खाली बैठे बैठे। तू बात कर ना शायद कहीं कोई ऑनलाइन काम ही मिल जाए। लॉक डाउन की वजह से यहाँ बाहर तो सब का सब ठप्प पड़ा है।""हाँ!...यार...खाली बैठे बैठे तो रोटियों तक के लाले पड़ने को हो रहे हैं।""तू बात कर ना कहीं। तेरी तो इतनी जान पहचान है।""हम्म....बात तो तू सही कह रहा है। खाली बैठे-बैठे तो मेरा दिमाग भी...लेकिन इस लॉक डाउन के चक्कर में अव्वल तो कोई काम मिलेगा नहीं और अगर कहीं कोई काम मिल भो गया तो पैसे बहुत थोड़े मिलेंगे।""पेट भरने लायक ही मिल जाएँ फ़िलहाल तो बस। कमाने की बाद में देख...
 
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