चोरों की बारात- सुरेन्द्र मोहन पाठक

अगर आप परदेस के किसी होटल में बंद कमरे के भीतर बेसुध हो कर रात में सो रहे हों और अचानक नींद टूटने पर आप पलंग से उठें और आपको पता चले कि आपके पैरों के नीचे समतल ज़मीन नहीं बल्कि एक लाश है। तो मेरे ख्याल से आप खुद ही समझ सकते हैं कि उस वक्त ज़हनी तौर पर आपकी दिमाग़ी हालत कैसी होगी? दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक के एक रौंगटे खड़े कर देने वाले तेज़ रफ़्तार उपन्यास 'चोरों की बारात' की। उपन्यास पर आगे बढ़ने से पहले सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के थ्रिलर उपन्यासों...

बम बम भोले- विनोद पाण्डेय

व्यंग्य लेखन एक तरह से तेल से तरबतर सड़क पर नपे तुले अंदाज़ में संभली..संतुलित एवं सधी हुई गति से गाड़ी चलाने के समान है। ज़्यादा तेज़ हुए तो रपटे..फिसले और धड़ाम। ज़्यादा धीमे हुए तो वहीं खड़े खड़े रपटते..लटपटाते हुए फिर से धड़ाम। दोस्तों...आज व्यंग्य की बातें इसलिए कि आज मैं बात करने जा रहा हूँ कवि /व्यंग्यकार विनोद पाण्डेय जी के व्यंग्य संग्रह 'बम बम भोले' और उसमें छपे उनके व्यंग्यों की। इनके  व्यंग्यों को पढ़ कर हम आसानी से जान सकते हैं कि लेखक अपने आसपास के माहौल और ताज़ातरीन ख़बरों को समझने...जांचने...
 
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