काला सोना - रेनु यादव
कुदरती तौर पर हर लेखक/कवि या किसी भी अन्य विधा में लिखने वाले साहित्यकार में यह गुण होता है कि वह अपने आसपास घट रही साधारण से दिखने वाली घटनाओं से भी कुछ न कुछ ग्रहण कर, उसे अपनी कल्पना एवं लेखनशक्ति के मिले-जुले श्रम से संवार कर किसी न किसी रचना का रूप दे देता है। अब यह उस लेखक या कवि पर निर्भर करता है कि उसने किस हुनर एवं संजीदगी से अपने रचनाकर्म को अंजाम दिया है। कई बार एक जैसा विषय होने पर भी किसी-किसी की रचना अपने धाराप्रवाह लेखन, भाषाशैली एवं ट्रीटमेंट की वजह से औरों की रचना से मीलों आगे पहुँच...