"काम हो गया है...मार दो हथोड़ा"

 

"काम हो गया है...हथोड़ा मार दो"

 

***राजीव तनेजा***

 

With_Sadhu_and_Tero_at_Dharamsala_Ashram__Feb__2005

 

"हैलो'

"इज़ इट...+91 804325678 ?...

 

"जी"...

 

"सैटिंगानन्द महराज जी है?"

 

"हाँ जी!...बोल रहा हूँ"..

"आप कौन?"

 

"जी मैँ!...राजीव बोल रहा हूँ"

 

"कहाँ से?

 

"मुँह से"...

 

"वहाँ से तो सभी बोलते हैँ"...

"क्या आप कहीं और से भी बोलने में महारथ रखते हैँ?"

 

"जी?"...

"जी नहीं!...मेरा मतलब ये नहीं था"...

 

"फिर क्या तात्पर्य था आपकी बात का?"...

 

"जी!...मैँ कहना चाहता था कि मैँ शालीमार बाग से बोल रहा हूँ"

 

"ठीक है!...लेकिन पहले आप ये बताएँ कि आपको मेरा ये पर्सनल नम्बर कहाँ से मिला?..और...

उसके बाद फोन करने का मकसद बताएँ""

 

"जी!...मुझे श्री लौटाचन्द जी ने वाराणसी से लौटते समय आपका नम्बर दिया था"

 

"अच्छा!...अच्छा"...

 

"जी!...मुझे पता चला था कि इस बार दिल्ली में शिविर का आयोजन होना है"...

 

"आपने सही सुना है"...

 

"तो मैँ चाहता था कि इस बार का ठेका...

 

"देखिए!...आजकल  हमारे फोनों के टेप-टाप होने का खतरा बना रहता है इसलिए अभी ज़्यादा बात करना उचित नहीं"...

 

"ऐसा करते हैँ...मैँ दो दिन बाद मैँ दिल्ली आ रहा हूँ...आप अपना पता और फोन नम्बर मुझे मेल कर दें"...

मैँ आपके घर पे ही आ जाता हूँ और फिर आराम से बैठ के सारी बातें...सारे मैटर विस्तार से डिस्कस कर लेंगे"...

 

"ठीक है!...जैसा आप उचित समझें"...

 

आप मेरी ई-मेल आई.डी नोट कर लें....

 

"जी!...बताएँ"...

 

आई.डी है व्यवस्थानन्द@नकदनरायण.कॉम

 

"ठीक है!...मैँ अभी मेल करता हूँ"...

 

"ओ.के...आपका दिन मँगलमय हो"

 

"आपका भी"

 

(दो दिन बाद)

 

ट्रिंग...ट्रिंग...ट्रिंग....

 

हैलो ...राजीव जी?...

 

"जी!...बोल रहा हूँ"...

 

"मैँ सैटिंगानन्द!.....बाहर खड़ा कब से कॉलबैल बजा रहा हूँ...लेकिन कोई दरवाज़ा ही नहीं खोल रहा है।"..

 

"ओह!...अच्छा....अभी खोल रहा हूँ।"...

"आईए...आईए"..

'यहाँ...यहाँ सोफे पे विराजिए"..

"वो दरअसल क्या है कि आजकल हमारी कॉलबैल खराब  है।"...

"और ये पड़ोसियों के बच्चे ना!...पूरी की पूरी..आफत हैँ आफत"...

"एक से एक नौटंकीबाज ...एक से एक ड्रामेबाज भरा पड़ा है हमारे मोहल्ले में"...

 

"बच्चे हैँ...बच्चों का काम है शरारत करना"...

 

"ये बच्चे तो ऐसे हैँ कि बड़े-बड़ों के कान कतर डालें"...

"वक्त-बेवक्त तंग करना तो कोई इनसे सीखे"...

"ना दिन देखते हैँ ना रात....

फट्ट से घंटी बजाते हैँ  और झट से फुर्र हो जाते हैँ"

"इसलिए इस बार जो घंटी खराब हुई तो ठीक करवाना उचित नहीं समझा"...

 

"बिलकुल सही किया आपने"...

"आजकल तो वैसे भी बच्चे-बच्चे के पास मोबाईल है"...

"जो आएगा...अपने आप कॉल कर लेगा"...

"क्यों?...है कि नहीं"

"खैर!...अब सुनाएँ.....कैसे हैँ आप?"...

 

"मैँ ठीकठाक!...आप सुनाएँ"...

"सफर में कोई दिक्कत..कोई परेशानी तो नहीं?"...

 

"नहीं!...ऐसी कोई खास दिक्कत या परेशानी नहीं लेकिन बस थकावट तो हो ही जाती है लम्बे सफर में...

सो!..बदन कुछ-कुछ टूट-टूट सा रहा है"...

"आपसे मिलने को मन बहुत उतावला था"...

इसलिए इधर स्टेशन पे गाड़ी रुकी और उधर मैँने ऑटो पकड़ा और सीधा आपके यहाँ पहुँच गया"....

 

"अच्छा किया"...

 

"पहले सोचा कि किसी होटल-वोटल में कोई आराम दायक कमरा ले के घंटे दो घंटे आराम करता हूँ...

उसके बाद आपसे मिलने चला आऊँगा"..

"लेकिन यू नो!...टाईम वेस्ट इज़ मनी वेस्ट"

"और ऊपर से टू बी फ्रैंक!..मुझे पराए देस में होटल वगैरा का पानी रास नहीं आता है और...

 

"तो किसी धर्मशाला या सराय....

 

"नहीं जी!..धर्मशाला या सराय में रहने से तो अच्छा है कि बन्दा प्लैटफार्म पर ही लेट-लाट के कमर सीधी कर घड़ी दो घड़ी सुस्ता ले"

"दरअसल!..इन सस्ते होटलों के भिचभिचे माहौल से बड़ी कोफ्त होती है मुझे"...

"एक तो पैसे के पैसे खर्चो करो...ऊपर से दूसरों के इस्तेमालशुदा बिस्तर पे...

छी...

पता नहीं कैसे-कैसे लोग वहाँ आ के ठहरते होंगे?..और ना जाने क्या-क्या पुट्ठे-सीधे काम करते होंगे"...

"मैँ तो कहता हूँ आग लगी हुई है आजकल की नौजवान पीढी को.."...

 

"स्वामी जी!...ज़माना बदल गया है...ट्रैंड बदल गए हैँ"..

"जीने के सारे मायने....सारे कायदे बदल गए हैँ"...

"देश प्रगति की राह पर बाकी सभी उन्नत देशों के साथ कदम से कदम...कँधे से कँधा मिला के चल रहा है।"

"और वैसे भी ग्लोबलाईज़ेशन का ज़माना है...इसलिए!..बाहरले देशों का असर तो आएगा ही"...


"राम...राम!...आग लगे ऐसे ग्लोबलाईज़ेशन को...ऐसी उन्नति को...ऐसी प्रगति को"...

"ऐसी भी क्या आगे बढने की...ऊँचा उठने की अँधी हवस....जो देश को...देश के आवाम को गर्त में ले जाए...पतन की राह पे ले जाए?"

"खैर!..छोड़ो इस सब को...जिनका काम है...वही गौर करेंगे इस सब पर"

"अपना क्या है?..हम तो ठहरे मलंग मस्तमौले फकीर"...

"जहाँ किस्मत ने धक्का देना है...वहीं झुल्ली-बिस्तरा उठा के चल देना है"...

"बस!..यही सब सोच कि किसी होटल-वोटल में डेरा जमा...धूनी रमाना अपने बस का नहीं"...

"सीधा!...आपके यहाँ चला आया कि दो-चार...दस दिन जितना भी मन करेगा....राजीव जी के साथ उन्हीं के घर पे

बिता लूँगा"

"आखिर!..हमारे लौटाचन्द जी के परम मित्र जो ठहरे"

 

"हे हे हे हे....कोई बात नहीं जी"...

"ये भी आप ही का घर है"...

"जब तक जी में आए ..तब तक अलख जगा धूनी रमाएँ"...

 

"ठीक है!...फिर कब करवा रहे हो कागज़ात मेरे नाम?..

 

"कागज़ात?"...

 

"अभी आप ही ने कहा ना"...

 

"क्या?"...

 

"यही कि ..ये भी आप ही का घर है"..

 

"हे हे हे हे"...

"स्वामी जी!...आपके सैंस ऑफ ह्यूमर का भी कोई जवाब नहीं"..

'खैर!...ये सब बातें तो चलती ही रहेंगी...पहले आप नहा-धो के फ्रैश हो लें...तब तक मैँ चाय-वाय का प्रबन्ध करवाता हूँ"...

 

"नहीं वत्स!...चाय की इच्छा नहीं है...आप बेकार की तकलीफ रहने दें"...

 

"महराज जी!...इसमें तकलीफ कैसी?"..

 

"दरअसल!...मैँ चाय पीता ही नहीं हूँ"...

 

"चाय नहीं पीते हैँ?"...

"ओ.के...जैसी आपकी मर्ज़ी"...

"लेकिन अपनी कहूँ तो...सुबह आँख तब खुलती है जब चाय की प्याली बिस्कुट या रस्क के साथ सामने मेज़ पे सज चुकी होती है और...

दिन भर तो किसी ना किसी का आया-गया लगा ही रहता है"...

"सो!... पूरे दिन में यही कोई आठ से दस कप चाय आराम से हो जाती है"...

 

""आठ से दस कप?"...

"वत्स!...क्या कर रहे हो?"..

"सेहत के साथ यूँ खिलवाड़ अच्छा नहीं"...

"जानते नहीं कि सेहत अच्छी हो..तो सब अच्छा लगता है"...

"वक्त-बेवक्त किसी और ने नहीं बल्कि तुम्हारे शरीर ने ही तुम्हारा साथ देना है"...

इसलिए...इसे संभाल कर रखो...स्वस्थ रखो"...

"मुझे देखो!...चाय पीना तो दूर की बात है ...मैँने आजतक कभी इसकी खाली प्याली को भी सूँघ के नहीं देखा"...

 

"ठीक है स्वामी जी!...कोशिश करूँगा कि चाय से दूर रहूँ"...

 

"कोशिश नहीं...वचन दो मुझे"..

"तुम्हें कसम है तुम्हारे आने वाले कल की....खेतों में चलते हल की...

जो तुमने आज के बाद कभी चाय को छुआ भी तो"...

 

"ठीक है स्वामी जी!....आपका मान तो रखना ही पड़ेगा"...

"मैँ आपके लिए दूध मँगवाता हूँ?"...

"ठण्डा या गर्म?"....

"कैसा लेना पसन्द करेंगे आप?"...

 

"दूध?"...

"वो तो मैँ दिन में सिर्फ एक बार....

सुबह चार बजे की पूजा के बाद...

दो चम्मच शुद्ध देसी घी या फिर...शहद के साथ लेता हूँ"...

"ये सब कष्ट आप रहने दें और एक काम करें"...

 

"जी"...

 

"वहाँ!....वहाँ उधर मेरा कमंडल रखा है...उसे मुझे ला के दे दें"...

 

"कमंडल?...अभी क्या करेंगे उसका?"..

 

"दरअसल!..क्या है कि उसमें एक 'अरिस्टोक्रैट'  का अद्धा रखा है"...

"ट्रेन में ऐसे ही किसी श्रधालु का हाथ देख रहा था...तो उसी ने ...ऐज़ ए गिफ्ट प्रैज़ैंट कर दिया"...

 

"ओह!...

 

"आप उसे!...हाँ उसे ही मुझे पकड़ा दें और हो सके तो कुछ नमकीन वगैरा...स्नैक्स वगैरा भिजवा दें"...

"जब तक मैँ इसे गटकता हूँ तब तक आप खाने का आर्डर भी कर ही दें"...

 

"सोडा भी लेता आऊँ?"...

 

"नहीं!...यू नो...सोडे से मुझे गैस बनती है...और बार-बार गैस छोड़ना बड़ा अजीब सा लगता है...ऑकवर्ड सा लगता है"..

 

"गैस?"...

 

"पता नहीं इन कोला कम्पनियाँ को इस अच्छे भले...साफ-सुथरे पानी में गैस मिला के क्या मिलता है?"...

"ना जाने  क्यों मिलावट कर वो इसे गन्दा कर देती हैँ...अपवित्र  कर देती हैँ?"मेरी बात सुने बिना वो बोलते चले गए

 

"जी"...

 

"आप एक काम करें...

उधर!...हाँ उधर मेरे झोले में शुद्ध गंगाजल पड़ा है ..'

हाँ!...उसी...उसी 'बैगपाईपर' की बोतल में ही रखा है..

उसे ही दे दें...काम चल जाएगा"वो थैले की तरफ इशारा करते हुए बोले...

 

"ठीक है!...जैसी आपकी मर्ज़ी"...

"आप बताएँ कि सफर कैसे कटा?"...

 

"बस!...सफर की तो आप पूछें मत.....

"एक तो दुनिया भर का भीड़ भड़क्का..ऊपर से लम्बा सफर

धकम्मपेल में हुई थकावट के कारण सारा बदन चूर-चूर हो रहा था और ऊपर से भूख भी लगी हुई थी"...

सो!.. मैने सोचा कि स्टेशन पे उतरने के बाद किसी अच्छे से रैस्टोरैंट में जा कर शाही पनीर के साथ 'चूर-चूर नॉन' खाए जाएँ...

"यू नो!...शाही पनीर और चूर-चूर नॉन का मज़ा ही कुछ और है"

 

"जी!...ये तो मेरे भी फेवरेट हैँ"...

 

"फिर मैँने सोचा कि बेकार में सौ दो सौ फूंक के क्या फायदा?"...

"लंच टाईम भी होने ही वाला है और...राजीव जी भी तो भोजन करेंगे ही"...

"सो!...क्यों ना उन्हीं के घर का प्रसाद चख पेट-पूजा कर ली जाए"

उन्होंने मेरे लिए भी तो बनवाया ही होगा"

 

"हे हे हे हे....क्यों नहीं..क्यों नहीं"

"बिलकुल सही किया आपने"...

"हाँ!...तो अब काम की बात करें?"...

 

"नहीं!...जब तक मैँ ये अद्धा गटकता हूँ...तब तक आप खाना लगवा दें क्योंके..

पहले पेट पूजा...बाद में काम दूजा"...

 

"जी!...जैसा आप उचित समझें"...

 

"भय्यी!...और कोई चाहे कुछ भी कहता रहे लेकिन अपने तो पेट में तो जब तक दो जून अन्न का नहीं पहुँच जाता....

तब तक कुछ करने का मन ही नहीं करता"...

"वो कहते हैँ ना कि भूखे पेट तो भजन भी ना सुहाए"

 

(खाना खाने के बाद)

 

"मज़ा आ गया...अति स्वादिष्ट....अति स्वादिष्ट"सैटिंगानन्द जी लम्बी डकार मारते हुए बोले

"हाँ!..अब बताएँ कि आप उन्हें कैसे जानते हैँ?"

 

"किन्हें?"...

 

"अरे!...अपने लौटाचन्द जी को और किन्हे?"...

 

"ओह!...अच्छा"...

"जी!...दरअसल वो हमारे और हम उनके लंग़ोटिया यार हैँ"...

"अभी कुछ हफ्ते पहले ही मुलाकात हुई थी उनसे"

 

"अभी आप कह रहे थे कि वो आपके लँगोटिया यार हैँ"...

 

"जी"...

 
"फिर आप कहने लगे कि अभी कुछ ही हफ्ते पहले मुलाकात हुई"

 

"जी"...

 
"लेकिन लँगोटिया यार तो उसे कहते हैँ जिसके साथ बचपन की यारी हो...दोस्ती हो"...

 
"ओह!...सॉरी....आई.एम वैरी सॉरी"...

दरअसल!...लंगोटिया यार से मेरा ये तात्पर्य नहीं था"

 

"फिर क्या मतलब था आपका?"...

 
"जी!...दरअसल बात ये है कि वो मुझे पहली बार हरिद्वार में गंगा मैय्या के तट पे नंगे नहाते हुए मिले थे"

 

"नंगे?"...

 
'अब!...वहाँ 'हर की पौढी' में तेज़ बहाव के चलते उनकी लंगोटी जो बह गई थी"...

"तो नंगे ही नहाएंगे ना?"...

 

"ओह!...अच्छा"...

"तो क्या घर से एक ही लंगोटी ले के निकले थे?"

 

"यही सब डाउट तो मुझे भी हुआ था और मैँने इस बाबत पूछा भी था लेकिन वो कुछ बताने को राज़ी ही नहीं थे"...

"मैँने उन्हें अपनी ताज़ी-ताज़ी हुई दोस्ती का वास्ता भी दिया लेकिन वो नहीं माने"...

"आखिर में जब मैँने तंग आ कर अपना लँगोट वापिस लेने की धमकी दी तो थोड़ी नानुकर के बाद सब बताने को राज़ी हुए"..

 

"अच्छा...फिर?"

 

"उन्होंने बताया कि घर से तो वो तीन ठौ लंगोटी ले के चले थे"...

"एक खुद पहने थे और दो सूटकेस में नौकर के हाथों पैक करवा दी थी"...

 

"फिर तो उनके पास एक पहनी हुई और दो पैक की हुई याने के कुल जमा तीन लँगोटियाँ होनी चाहिए थी?"...

 

"जी!..लेकिन...उनमें से एक को तो उनके साले साहब बिना पूछे ही उठा के चलते बने"...

"बाद में जब फोन आया तो पता चला कि वो तो 'मँसूरी' पहुँच गए हैँ 'कैम्पटी फॉल' में नहाने के लिए"...

 

"हाँ!...फिर तो लँगोटी ले जा के उसने ठीक ही किया क्योंकि सख्ती के चलते मँसूरी का प्रशासन वहाँ नंगे नहाने की अनुमति बिलकुल नहीं देता है"..

"लेकिन मेरे ख्याल से तो लौटाचन्द जी को साफ-साफ कह देना चाहिए था अपने साले साहब को कि वो अपनी लँगोटी खुद खरीदें"...

 

"किस मुँह से मना करते लौटाचन्द जी उसे?"...

"वो खुद कई बार उसी की लँगोटी माँग के ले जा चुके थे...कभी गोवा भ्रमण के नाम पर तो कभी काँवड़ यात्रा के नाम पर"...

"और ऊपर से ये जीजा-साले का रिश्ता ही ऐसा है कोई कोई इनकार करे तो कैसे?"...

"वो कहते हैँ ना कि सारी खुदाई एक तरफ और...जोरू का भाई एक तरफ"...

 

"जी"

 

"इसलिए मना नहीं कर पाए उसे"...

"आखिर लाडली जोरू का इकलौता भाई जो ठहरा"...

 

"लेकिन हिसाब से देखा जाए तो एक लँगोटी तो फिर भी बची रहनी चाहिए थी उनके पास"...

 

"बची रहनी चाहिए थी?"...

"वो कैसे?"..

"हाँ!..याद आया....आप तो जानते ही हैँ लौटाचन्द जी की पी के कहीं भी इधर-उधर लुड़क जाने की आदत को"...

 

"जी"...

 

"बस!...सोचा कि हरिद्वार तो ड्राई सिटी है...वहाँ तो कुछ मिलेगा नहीं"...

"सो!...दिल्ली से ही इंग्लिश-देसी सबका पूरा  इंतज़ाम कर के चले थे कि सफर में कोई दिक्कत ना हो"...

 

"ठीक किया उन्होंने...रास्ते में अगर मिल भी जाती तो बहुत मँहगी पड़ती"...

 

"उसके बाद तो बस सारे रस्ते...बस पीते गए....बस पीते गए"...

"नतीजन!...ऐसी चढी कि हरिद्वार पहुँचने के बाद भी ...लाख उतारे ना उतरी"...

 

"ओह"...

 

"रात भर पता नहीं कहाँ लुड़कते-पुड़कते रहे"...

"अगले दिन म्यूनिसिपल वालों को गंदी नाली में बेहोश पड़े मिले थे"....

"पूरा बदन कीचड़ से सना हुआ...बदबू के मारे बुरा हाल"...

 

"ओह:...

 

"बदन से धोती लँगोट सब गायब"...

 

"धोती..लंगोट सब गायब?"...

"कोई चोर-चार ले गया होगा"...

 

"अजी कहाँ?...हरिद्वार के चोर इतने गए गुज़रे भी नहीं कि किसी की इज़्ज़त...किसी की आबरू के साथ यूँ खिलवाड़ करते फिरें"...

 

"तो फिर?"...

 

"शायद!...रात भर चूहे  डिनर में इन्हीं के कपड़े चबा गए होंगे"

"और बस तभी से हमारी उनकी घनिष्ठ मित्रता हो गई"...

 

"ओ.के...ओ.के"

 

"वैसे...एक राज़ की बात बताऊँ?"

"उनसे कहिएगा नहीं"...

 

"जी"...

 

"परम मित्र हैँ...बुरा मान जाएँगे"...

 

"जी!..आप चिंता ना करें"...

"बेशक सारी दुनिया इधर की उधर हो जाए लेकिन मेरी तरफ से इस बाबत आपको कोई शिकायत नहीं मिलेगी"...

"आप बेफिक्र हो के कोई भी राज़ की बात मुझ से कह सकते हैँ"...

 

"कहीं उनको पता चल गया तो?"...

 

" यूँ समझिए कि जहाँ कोई कॉंफीडैंशल बात इन कानों में पड़ी...वहीं इन कानों को शीला दीक्षित की सरकारी  'सील' लग गई"

"और साथ ही लगे हाथ..ये बड़ा....मोटा सा ...फुल साईज़ का ताला लग गया इस कलमुँही ज़ुबान पे"

"जहाँ बारह-बारह सी.बी.आई वाले भी लाख कोशिश के बावजूद कुछ उगलवा नहीं पाए...वहाँ ये लौटानन्द चीज़ ही क्या है?"...

 

"सी..बी.आई. वाले?"...

 

"अरे!...बस ऐसे ही!...

उल्लू के चर्खे...स्साले!..थर्ड डिग्री अपना के बाबा जी के बारे अंट-संट निकलवाना चाहते थे मेरी ज़ुबान से लेकिन मजाल है जो मैँने उफ तक की हो या ....एक शब्द भी मुँह से निकाला हो"..."...

"ये सब तो खैर!..आए साल चलता रहता है...

"कभी इनकम टैक्स और सेल्स टैक्स वालों के छापे...तो कभी  पुलिस और 'सी.बी.आई' की रेड"...

 

"इनकम टैक्स और सेल्स टैक्स वालों का मामला तो अखबार और मीडिया में भी खूब उछला था कि इनकी फर्म हर साल लाखों करोड़ रुपयों की आयुर्वेदिक दवायियाँ  बेचती है और एक्सपोर्ट भी करती है लेकिन उसके मुकाबले टैक्स आधा भी नहीं भरा जाता"...

 

"आधा?...

अरे!...हमारा बस चले तो आधा  क्या हम अधूरा भी ना भरें"...

 

"लेकिन स्वामी जी!...टैक्स तो भरना ही चाहिए आपको"...

देश के लिए ...देश के लोगों के भले के लिए"...

 

"पहले अपना...फिर अपनों का...भला कर लें..

बाद में देश की..देश के लोगों की सोचेंगे"...

 

"एक आरोप और भी तो लगा था ना आप पर?"...

 

"कौन सा?"...

 

"यही कि आपकी दवाईयों में जानवरो की...

 

"ओह...अच्छा...वो वाला...

उसमें तो एक लाल झण्डे वालों की ताज़ी-ताज़ी बनी अभिनेत्री...

ऊप्स!...सॉरी ...नेत्री ने इलज़ाम लगाया था कि...

हम अपनी दवाईयों में जानवरों की हड्डियाँ मिलाते....गो मूत्र मिलाते हैँ"..

"उस उल्लू की चरखी को कोई जा के ये बताए तो सही कि बिना हड्डियाँ मिलाए...

आयुर्वेदिक या यूनानी दवाईयों का निर्माण नहीं हो सकता है"...

"और रही गोमूत्र की बात!...तो उस जैसी लाभदायक चीज़...उस जैसा एंटीसैप्टिक तो पूरी दुनिया में और कोई नहीं"...

 

"हाँ!..मैँने भी उसए कई बार देखा था टीवी....रेडियो वगैरा में बड़बड़ाते हुए"...

 

अरे!..औरतज़ात थी इसलिए बाबा जी ने मेहर की और...बक्श दिया...

वर्ना हमारे सेवादार तो उनके  एक हलके से...महीन से इशारे का इंतज़ार कर रहे थे"...

पता भी नहीं चलना था कि कब उस अभिनेत्री...ऊप्स सॉरी नेत्री की हड्डियों का सुरमा बना ...

और कब वो सुरमा मिक्सर में पिसती दवाईयों के संग घोटे में घुट गया"...

 

"ये सब तो खैर आपके समझाने से समझ आ गया लेकिन ये पुलिस वाले बाबा जी के पीछे क्यों पड़े हुए थे?"....

 

"वैसे तो हर महीने...बिना कहे ही पुलिस वालों को और टैक्स वालों को उनकी मंथली पहुँच जाती है लेकिन...

इस बार मामला कुछ ज़्यादा ही पेचीदा हो गया था"...

 

"ओह!...क्या हुआ था?"...

 

"अभी दो महीने पहले ही एक पागल से आदमी ने  पुलिस में झूठी शिकायत कर दी कि बाबा जी ने उसकी बीवी और जवान बेटी को

बहला-फुसला के अपनी सेवादारी में....अपनी तिमारदारी में लगा लिया है"...

 

"अरे!..उसकी बीवी या फिर उसकी बेटी दूध पीती बच्ची है जो बहला लिया...फुसला लिया?"

 

"वोही तो"...

"अब अपनी मर्ज़ी से कोई बाबा जी की शरण में आना चाहे तो क्या बाबा जी उसे दुत्कार दें... भगा दें?"...

"उसकी पागल की देखादेखी एक-दो और ने भी सीधे-सीधे बाबा जी पे ही अपनी बहन...अपनी बहू को अगवा करने का आरोप जड़ दिया"

 

"फिर?"...

 

"फिर क्या?...कोई और आम इनसान  होता तो गुस्से से बौखला उठता...बदला लेने की नीयत से सोचता लेकिन....

बाबा जी महान हैँ...बाबा जी देवता हैँ"...

 

"जी!..ये तो है"...

 

"चुपचाप मौन धारण कर  बिना किसी को बताए समाधि में लीन हो गए"....

 

"ओह"...

 

"बाद में मामला ठण्डा होने पर ही समाधि से बाहर निकले"...

"सहनशक्ति देखो बाबा जी की....विनम्रता देखो बाबा जी की

इतना ज़लील..इतना अपमानित...इतना बेइज़्ज़त होने के बावजूद भी उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा"...

"बस!...सबसे शांति बनाए रखने की अपील करते रहे"...

 

"जी"...

 

"और जब बचाव का कोई रास्ता नहीं दिखा तो अपने वकीलों..अपने शुभचिंतकों से सलाह मशवरा करने के बाद...

कोई चारा ना देख...पुलिस वालों से सैटिंग कर ली और उन्होंने ने जो जो माँगा...चुपचाप बिना किसी ना नुकुर के दे दिया"..

 

"बिलकुल ठीक किया...कौन कुत्तों को मुँह लगाता फिरे?"..

"बदले में पुलिस वालों ने शहर में अमन और शांति बनाए रखने की गर्ज़ से दोनों पक्षों  में समझौता करा दिया"...

"जब शिकायतकर्ताओं ने आपसी रज़ामंदी और म्यूचुअल अण्डरस्टैडिंग के चलते अपनी सभी शिकायतें वापिस ले ली तो बाबा जी के

आश्रम ने भी उन पर थोपे गए सभी केस..सभी मुकदमे बिना किसी शर्त वापिस ले लिए"..

"खैर!...ये तो हो रही थी बाबा जी की दरियादिली की बात"...

"आप शायद कोई राज़ की बात बताने वाले थे?"...


"राज़ की बात?"...

 

"हाँ!...याद आया...

मैँ तो बस इतना ही कहना चाहता था कि उन्होंने याने के लौटाचन्द जी ने अभी तक मेरी लंगोटी वापिस नहीं की है"...

 

"हा...हा...हा"...

"वैरी फन्नी"...

"आप तो बहुत हँसाते हो यार"...

 

"क्या करू?..ऊपरवाले ने बनाया ही कुछ ऐसा है"

 

"ये ऊपरवाला!...कहीं आपसे ऊपरवाली मंज़िल पे तो नहीं रहता?"...

 

"ही...ही....ही"...

"यू ऑर आल सो वैरी फन्नी"...

 

"स्वामी जी!..एक जिज्ञासा थी"...

 

"पूछो वत्स"...

 

"ये जो स्वामी जी के शिविर वगैरा लगते रहते हैँ ...पूरे देश में"...

 

"जी"...

 

"इन्हें आर्गेनाईज़ करने वाले को भी कोई फायदा होता है"...

 

"फायदा?"...

"अरे!...उसके अगले-पिछले सब पाप मुक्त हो जाते हैँ...आज़ाद हो जाते हैँ"...

"मन शांत और निर्मल रहने लगता है"...

 

"ये बात तो ठीक है आपकी लेकिन मेरा मतलब था कि इतने सब इंतज़ाम करने में वक्त और पैसा सब लगता है"...

 

"वत्स!...हमारे बाबा जी का जो एक बार सतसंग या योग शिविर रखवा लेता है.....वो सारे खर्चे...सारी लागत निकालने के बाद आराम

से अपनी तथा अपने परिवार की छ से आठ महीने तक की रोटी निकाल लेता है"...

"सिर्फ रोटी?"...
'

"और नहीं तो क्या लड्डू=पेड़े?"...

"एक्चुअली टू बी फ्रैंक!...बचता तो बहुत ज़्यादा ही है लेकिन हमें  ऐसा कहना पड़ता है.....

नहीं तो कभी-कभार कम टिकटें बिकने पर आर्गेनाईज़र लोगों के ऊँची परवान चढे सपने धाराशाई हो जाते हैँ ना"...

और हम ठहरे ईश्वर के प्रकोप से डरने वाले बन्दे...

इसलिए अपने भगतों को दुखी नहीं देख सकते...निराश नहीं देख सकते" ..

"वैसे आजकल बाबा जी का रेट क्या चल रहा है"...

"फॉर यूअर काईंड इंफार्मेशन बाबा जी बिकाऊ नहीं हैँ"...

"मेरा मतलब था कि वो अपने विज़िट के चार्जेज़ कितने लेते हैँ?"...

"सात दिनों के शिविर के पचास लाख"..

 

"लेकिन मेरी जानकारी के हिसाब से तो पाँच साल पहले तो बाबा जी का रॆट तीस लाख रुपए था"


"यू नो!...पाँच साल में मँहगाई कितनी बढ गई है?"...

"अगर बैंक में भी रुपए डालो तो लगभग दुगने हो जाते हैँ"..

"इस हिसाब से देखा जाए तो बाबा जी ने सबका ध्यान रखते हुए तीस के पचास किए हैँ...साठ नहीं"...

 

खैर!...बातें तो बहुत हो गई...अब क्यों ना हम काम की बात करते हुए असल मुद्दे पे आएँ?"...

 

"जी बिलकुल!...मुझे भी इसी का इंतज़ार था"..

 

"तो फिर आप बताएँ!...क्या कहना चाहते थे आप?"...

 

"एक्चुअली मुझे फाल्तू बात करने की आदत नहीं है ...

इसलिए मैँ टू दा प्बाईट बात करता हूँ कि इस बार उनके शिविर का ठेका मुझे मिलना चाहिए"...

"आप अपना बता दें कि आपको कितना चाहिए?"...

"लेकिन इस बार की डील तो शायद मेहरा ग्रुप वालों से फायनल होने जा रही है"...

 

"सब आपके हाथ में है...आप जिसे चाहेंगे...वही नोट कूटेगा"

 

"बात तो आपकी ठीक है लेकिन वो गैडगिल का बच्चा...

 

"अजी!...लेकिन वेकिन को मारिए गोली और टू बी फ्रैंक होके सीधे-सीधे बताईए कि आपका पेट कितने में भरेगा?

"मुझे वही लोग पसन्द आते हैँ जो फाल्तू बातों में टाईम वेस्ट नहीं करते और सीधे मुद्दे पे आते हैँ"...

"साफ-साफ शब्दों में कहूँ तो ज़्यादा लालच नहीं है मुझे"...

 

"फिर भी कितना?"...

 

"जो मन में आए...दे देना"....

 

"लेकिन बात पहले खुल जाए तो ज़्यादा बेहतर...बाद में दिक्कत पेश नहीं आती"...

"यू नो!...पैसा चीज़ ही ऐसी है कि बाद में बड़ों बड़ों के मन डोल जाते हैँ"

 

"मैँ तो यार!...तुच्छ सा..अदना सा प्राणी हूँ"...

"ज़्यादा ऊँची उड़ान उड़ने के बजाय ज़मीन पे चलना पसन्द करता हूँ मैँ"...

"बस!...आटे में नमक बराबर दे देना"...

 

"आप साफ-साफ कहें ना ...कितना?"...

 

"ठीक है!...बाबा जी का तो आपको पता ही है ...पचास लाख उनके और उसका दस परसैंट...याने के पाँच लाख मेरा"...

"टोटल हो गया पचपन लाख"...

 

"लेकिन मुझे पता चला है कि मेहरा ग्रुप वाले तो आपसे काफी कम में डील फाईनल करने जा रहे थे"...

 

"आपकी खबर सौ परसैंट सही है...सच्ची है लेकिन उनके मुँह से निवाला छीनने में यू नो...

"मुझे भी कोई ना कोई जवाब दे उन्हें टालना पड़ेगा"..

'साथ ही ऊपर से नीचे तक काफी उठा-पटक करने की ज़रूरत पड़ेगी"...

"कईयों के मुँह बन्द करने पड़ेंगे"

 

"जी!...वो लौटाचन्द जी ने कहा था किसी और से बात करने के बजाय सीधा 'सैटिंगानन्द' जी से ही बात करना"

इसलिए मैँने सीधे-सीधे आपको कांटैक्ट किया वर्ना वो गैडगिल तो बाबा जी से भी डिस्काउंट दिलाने की बात कह रहा था"

 

"उस स्साले!...गैडगिल की तो मैँ...

"कोई भरोसा नहीं उसका...कई पार्टियों से एडवांस ले भी मुकर चुका है"..

"आप चाहें तो खुद पता कर लें"...

"मैँ तो कहता हूँ कि ऐसे काम से क्या फायदा?...बाद में उसके चक्कर काटते रहोगे"...

"वैसे एक बात टू बी फ्रैंक हो के कहूँ?....

 

"जी!...ज़रूर"...

 

'खाना उसने भी है और खाना मैँने भी है लेकिन जहाँ वो आजकल मोटा होने के लिए ज़्यादा फैट्स...ज़्यादा प्रोटींन वगैरा ले रहा है...

वहीं मैँने आजकल पतला होने की ठानी है "...

इसलिए मार्निंग वॉक के अलावा  'रामदेव' जी का योगा शुरू कर दिया है"....

"कमाल के चीज़ है ये योगा भी"...

"यू नो!... पिछले बीस दिनों में...मैँ पंद्र्ह किलो वेट लूज़ कर चुका हूँ"...

 

"इसलिए आप फिट-फिट भी लग रहे हैँ"...

 

"ट्रिंग...ट्रिंग...."...

 

"हैलो...कौन?"...

"लौटाचन्द जी....

"नमस्कार"...

"हाँ जी!...उसी के बारे में बात कर रहे थे"...

"बस!...फाईनल ही समझिए"...

"ठीक है!...एडवांस दिए देता हूँ"...

"कितना?"...

"पाँच लाख से कम नहीं?"...

"लेकिन अभी तो मेरे पास यही कोई तीन...सवा तीन के आस-पास पड़ा होगा"...

"ठीक है!...आप दो लाख लेते आएँ"...

"आज ही साईनिंग एमाउंट दे के डील फाईनल कर लेते हैँ"...

"नेक काम में देरी कैसे?"...

"आधे घंटे में पहुँच जाएँगे?"...

"ठीक है!..मैँ वेट कर रहा हूँ"...

ओ.के..."...

"बाय-बाय"फोन रख दिया जाता है...

 

"अपने लौटाचन्द जी थे"...

"बस..अभी आते ही होंगे"..

 

"तो क्या लौटाचन्द जी भी आपके साथ?"...

 

"जी!...पहली बार आर्गेनाईज़ करने की सोची है ना"...

"इसलिए अभी पूरा कॉंफीडैंस नहीं है"...

 

"चिंता ना करो..राम जी सब भली करेंगे"...

"मैँ तो कहता हूँ कि ऐसा चस्का लगेगा कि सारे काम..सारे धन्धे भूल जाओगे"...

"लाखों के वारे-न्यारे होंगे..लाखों के"...

 

"एक मिनट!..आप बैठें ..मैँ पेमैंट ले आता हूँ"...

"ठीक है...गिनने में भी तो वक्त लगेगा..एण्ड यू नो.....

 

"टाईम वेस्ट इज़ मनी वेस्ट"...

 

"हा हा हा हा..वैरी क्लैवर"...

 

"लीजिए...स्वामी जी!...गिन लीजिए..पूरे साढे तीन लाख है"...
बाकि के ढेढ लाख भी बस आते ही होंगे"...
और बाबा जी के पेमैंट तो डाईरैक्ट उनके आश्रम में पहुँचानी है ना?"...

"नहीं आजकल सख्ती चल रही है...

उड़ती-उड़ती खबर पता चली है कि  कुछ 'सी,बी.आई' वाले सेवादारो के भेष में आश्रम के चप्पे-चप्पे पे नज़र रखे बैठे हैँ"...

 

"तो फिर?"...

 

"चिंता की कोई बात नहीं है...हम आपको एक कोड वर्ड बताएँगे"...

 

"जी"..

"जो कोई भी वो कोड वर्ड आपको बताए..आप रकम उसके हवाले कर देना"...

"वो उसे हवाला के जरिए बाहरले मुल्कों में बाबा जी के बेनामी खातो में जमा करवा देगा"..

"ठीक है जी...जैसा आप उचित समझें"...

 

"ठक...ठक..ठक.."

"लगता है कि लौटाचन्द जी आ गए"...

 

"जी!..यही लगता है"...

 

"एक मिनट!...मैँ दरवाज़ा खोल के आता हूँ...आप आराम से गिनिए"...

 

"ठीक है"...

 

"आईए!...आईए...'एस.एच.ओ' साहब और....

गिरफ्तार कर लीजिए इस ढोंगी और पाखँडी को"...

 

"धोखा"....

 

"सारे सबूत!...आवाज़ और विडियो की शक्ल में रिकार्ड कर लिए हैँ मैँने इसके खिलाफ"...

"और आपके दिए इन नोटों पर भी इसकी उँगलियों  के निशान छप ही चुके होंगे"

 

"कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी पुलिस मेरा"...

"दो दिन भी अन्दर नहीं रख पाएगी तेरी ये पुलिस मुझे"..

"जानता नहीं!...पहचानता नहीं कि "बाबा जी महान है"...उनकी की पहुँच कहाँ तक है"...


"किंता ना कर...तेरे चहेते बाबा जी के आश्रम में भी रेड पड़ चुकी है"...

 

"क्या?"...

 

"इधर तेरा विडियो बन रहा था तो उधर उनका भी बन रहा था"...

 

"क्या?"...

"लौटाचन्द जी वहीं है और उन्हीं का फोन था उस वक्त कि....

काम हो गया है...हथोड़ा मार दो"

***राजीव तनेजा***

Rajiv Taneja

Delhi(India)

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+919810821361

+919896397625

"व्यथा-एक उभरते 'ब्लात्कारी' ब्लागर की"

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"व्यथा-एक उभरते 'ब्लात्कारी' ब्लागर की"

 

***राजीव तनेजा***

 

"सुनो....ये बलात्कार कैसे किया जाता है?

 

"तुम्हें करना है?"

 

"नहीं"...

 

"फिर बेफाल्तू में ऐसे बेतुके...बेमतलब के सवाल पूछ के मेरे दिमाग का दही क्यों करने पे तुले हो?"...

 

"वो दरअसल क्या है कि आजकल लिखने लिखाने के लायक कोई बढिया सा टॉपिक नहीं मिल रहा...

तो सोचा कि खाली वेल्ले बैठने से क्या फायदा?"...

 

"सही है!...लगे रहो"...

"जब तक लिखने-लिखाने के लिए कोई बढिया सा...धाँसू सा आईडिया ना मिल जाए..

तब तक बेकार में इधर-उधर बैठ के बेफाल्तू में उल्टी-सीधी हाँकने से तो अच्छा है कि 'ब्लात्कार-व्लात्कार' कर के ही टाईम पास कर लिया जाए?"

"क्यों!...है कि नहीं?

 

"और नहीं तो क्या?"

"सही ही तो है...फुल्ल एंजायमैंट के साथ टाईम का टाईम पास होगा और सीखने-सिखाने को अलग से मिलेगा"

"सीखने को मिलेगा?"...

 

"अब इस 'ब्लात्कार'जैसे सिम्पल काम में तुम्हें कौन सी नॉलेज की बात दिख गई?"

"मुझे तो इसमें सिर्फ 'कुँठित मानसिकता'...'कुत्सित विचारधारा' और घटिया सोच के अलावा और कुछ नहीं दिखता"

"हद है !...इतनी घटिया सोच?...वो भी एक लेखक की?"...

 

"क्यों?...कोई दूसरा ब्लॉगर मुझसे पहले बाज़ी मार ले जाए..उस से पहले मैँ खुद क्यों नहीं?

 

"कौन है जो तुमसे...या तुम उस से आगे निकलने की सोच रहे हो?"...

 

"अरे!...है एक सिरफिरा...जो आजकल अपने 'यश' से 'वंचित' हो खूब नाम कमा रहा है"

 

"तो क्या तुम भी अपने 'यश'...अपनी 'कीर्ति' से हाथ धोना चाहते हो?"

 

"किस 'कीर्ति'की बात कर रही हो तुम?"...

"कहीं वो'टैगोर गार्डन'वाली कवित्री 'कीर्ति वैद्य'की तो नहीं..जिसकी शायद कोई किताब छपने वाली थी?"...

 

"अरे बेवाकूफ!...मैँ उस 'कीर्ति'की नहीं बल्कि उस 'कीर्ति की बात कर रही थी जिसे अँग्रेज़ी में 'पापुलैरिटी'कहा जाता है"...

 

"खैर!..छोड़ो ये सब"...

"बदनाम होंगे तो क्या नाम ना होगा?"वाली फिलॉसफी ही कामयाब रहती है आज के ज़माने में"

 

"लेकिन ऐसी भी क्या फ्रस्ट्रेशन कि आगे निकलने की होड़ में तुम सारे नियम...सारे कायदे तोड़ दो?"

 

"तुम समझती नहीं हो...इस मकड़जाल की दुनिया याने के इंटरनैट में वही ब्लॉगर सबसे आगे...

सबसे तेज़...सबसे जुदा माना जाता है जो किसी ना किसी जायज़-नाजायज़ कारण सभी ब्लॉगों पर छाया रहता है"

 

"हम्म!...तो ये बात है"...

"लेकिन एक डाउट है मेरे दिल में"...

 

"क्या?"...

 

"यही कि एक स्त्री होते हुए मैँ तुम्हें ब्लात्कार की ट्रेनिंग देती भला अच्छी लगूँगी?"...

"लोग क्या कहेंगे?"...

 

"अरे!...लोगों की छोड़ो...लोगों का काम है कहना"...

"किसी की परवाह ना करते हुए तुम बेधड़क हो के मुझे शुरू से आखिर तक याने के 'ए' टू 'ज़ैड'तक सब समझाओ"...

 

"तुम एक काम क्यों नहीं करते?"...

 

"क्या?"

 

"पुरानी फिल्मों के 'डी.वी.डी' ले आओ बाज़ार से और उनमें जितने भी ब्लात्कार के सीन हों उनको बार-बार गौर से देख....

'रणजीत'से लेकर 'प्रेम चोपड़ा'..और..'गुलशन ग्रोवर'से लेकर 'शक्ति कपूर'तक...

सभी की  डायलाग डिलीवरी से लेकर उनके चलने तक के अन्दाज़ को हूबहू क़ापी करने की कोशिश करो...फालो करने की कोशिश करो"

 

"यार!...पुरानी फिल्मों को देखता ही कौन है?"...

"अगर तुम कहो तो नई फिल्मों के 'डी.वी.डी' ले आऊँ?"...

 

"नहीं...बिलकुल नहीं"...

 

"क्यों?...क्या खराबी है उनमें?"...

 

"अरे यार!...नई फिल्मों की हिरोईनों का सब कुछ तो पहले से ही इतना खुला-खुलाया होता है कि. ..

बेचारे विलेन का ज़रा सा भी मन ही नहीं करता है उनके साथ ब्लात्कार करने का"

 

"हम्म...अब समझा"...

 

"क्या?"...

 

"यही कि आजकल की फिल्मों में अधिकतर विलेन नायिका के भाई का रोल करना या फिर मसखरी करना ही क्यों पसन्द करते हैँ"...

 

"चलो!...खुदा का शुक्र है कि तुम्हें जल्दी ही बात समझ में आ गई"...

"ठीक है!...फिर शुरू करते हैँ"...

"पहला सबक ये कि सब कुछ पहले से ही सोच-साच के इस ढंग से प्लैन बनाना होगा कि ऐन टाईम पे कोई कंफ्यूज़न पैदा ना हो"......

 

"कैसा प्लैन? और किस तरह कि प्लानिंग?"...

 

"यही कि...किस का ब्लात्कार करना है?"...

"कैसे ब्लात्कार करना है?... वगैरा...वगैरा

 

"वो क्यों?"...

 

"ये सब इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि कई बार ऐन मौके पे क्राईम करने के लिए क्लाईंट ढूँढना मुश्किल हो जाता है"....

"कहीं ये ना हो कि बाद में तुम बावलों की तरह हर आती-जाती लड़की से ये पूछते फिरो कि...

"बहन जी!...क्या आप मुझ नाचीज़ के हाथों ब्लात्कार करा अपना उद्धार करवाना पसन्द करेंगी?"

 

"रहने दो...रहने दो!...इतना भी गोबर गणेश नहीं हूँ मैँ कि इत्ता सा...छोटा सा...बित्ते भर का काम भी ठीक ढंग से ना कर सकूँ"

 

"अरे!...तुम्हें नहीं पता...ये काम देखने सुनने को बेशक जितना भी आसान काम लगे लेकिन इसे करना उतना ही मुश्किल काम है जितना कि.... जम्बोजैट को कलाबाज़ियाँ खिला हवा में उड़ाना"

 

"फुल ट्रेनिंग...और परफैक्ट टाईमिंग की ज़रूरत होती है इस सब में"...

 

"तुम्हें फुल्ल बटा फुल्ल एक्यूरेसी याने के...सौ प्रतिशत शुद्धता चाहिए ना काम में?"...

 

"बिना किसी शक और शुबह के मिल जाएगी"...

 

"ओ.के!...फिर तो मेरी दुआएँ तुम्हारे साथ हैँ"...

"ऊपरवाले ने चाहा तो तुम अपनी बदचलनी के चलते इस नेक और पाक मकसद में ज़रूर कामयाब होगे और....

जहाँ तक रही सफलता की बात...तो वो तो यकीनन तुम्हारे ही कदम चूमेगी...आमीन"...

"हाँ!...बस इतना ज़रूर ध्यान रहे कि पूरी सावधानी और गोपनियता के साथ फुल-फुल एहतिहात बरतते हुए.....

ये काम कुछ इस तरीके से होना चाहिए कि किसी को कानोंकान खबर ना हो"

"खुदा ना खास्ता!..अगर कहीं किसी छोटी-बड़ी...माड़ी-मोटी गल्ती से फँसने-फँसाने का नम्बर आ भी जाए....

तो पूरी तैयारी रखना कि....क्या कहकर...क्या बोल कर कर अपना बचाव करना है?

 

"कहना सोचना क्या है?..सीधे-सीधे झूठ बोल दूँगा कि मैँ नहीं बल्कि ये कलमुँही ही खुद मेरा ब्लात्कार करने पे उतारू थी...सिम्पल"

 

"हाँ!...तब तो हो लिया बचाव-वचाव"....

"जानते नहीं 'पिल्ली दुल्लिस'...ऊप्स सॉरी...'दिल्ली पुलिस'को?"...

"हर अच्छे-बुरे काम में 'सदैव साथ'रहती है"

 

"तो?"...

 

"ठुल्लों ने पकड़ के वो धुलाई...वो मरम्मत करनी है कि समझो गए नौ साल के लिए सीधा जेल के अन्दर"

 

"क्यों!...लड़कों के ब्लात्कार नहीं होते हैँ क्या"...

 

"होते हैँ...और बखूबी होते हैँ...मैँने कब ना करी है?"...

 

"तो?"...

 

"लेकिन ये तो देखो कि कितने मुकदमे...कितने केस दर्ज होते हैँ हमारी कोतवालियों में इस बाबत?"

 

"यही तो कमी है हम हिन्दुस्तानी मर्दों में जो आज के इस कलयुगी ज़माने में भी औरतों को.....

पूरी इज़्ज़त...पूरा मान देते हुए इनके इस कदर गुलाम बने हुए हैँ कि इन पर मानहानि जैसे  छोटे-मोटे मुकदमे तक दर्ज करवाने से कतराते हैँ"

"मैँ तो कहता हूँ कि लानत है ऐसे तमाम नामर्दों पर जो हर तरह के लांछन सहते हुए भी...

इन हसीनाओं के जायज़-नाजायज़ हर ज़ुल्म-ओ-सितम को हँस-हँस कर सह जाते हैँ और...

तमाम तरह के कष्ट..हर तरह की तकलीफें सहने के बाद भी अपनी हँगामी बैठकों और पार्टियों में उनके बारे में एक-दूसरे को हँस-हँस कर ऐसे बतियाते हैँ....

मानों कोई मैडल जीत कर आए हों...कोई किला फतह कर के आए हों"...

 

"लेकिन मेरे ख्याल से तो दाद देनी चाहिए ऐसे हिम्मत वाले जवाँ मर्दों की जो तमाम तरह की मुश्किलों को सहते हुए भी कभी उफ तक नहीं करते...चूँ तक नहीं करते"

 

"हाँ!...एक और निहायत ही ज़रूरी और गौर करने लायक बात कि जब तक कोई खास मजबूरी ना हो....

तब तक मैँ इस ज़ोर-ज़बर्दस्ती की पॉलिसी या फिलॉसफी में यकीन नहीं रखती ह"...

"मेरे हिसाब से तो ऐसे सम्बन्ध आपसी प्यार से...दुलार से...और आपसी मनुहार से होने चाहिए"

"ये भी भला क्या बात हुई?कि मौका ताड़ कोई भी अन्धेरी सुनसान सी जगह ढूँढो और....

पागलों की तरह झपट्टा मार उड़ते हुए पँछी के पँख दबोच उन्हें कतर डालो"

 

"फॉर यूअर काईंड इंफार्मेशन!...पहले बात कि सभी ब्लात्कारी पागल नहीं होते और दूसरी बात ये कि....

अभी कुछ देर पहले हम जिस ब्लॉगर भाई का जिक्र कर रहे थे...

वो तो निहायत ही शरीफ ...एकदम ज़हीन किस्म का...सुलझा हुआ समझदार दिखने वाला इनसान है"

 

"मुझे तो अभी भी विश्वास नहीं हो रहा कि कोई ब्लॉगर बन्धु 'ब्लात्कार'जैसे टैक्नीकल और आर्टिस्टिक काम को अंजाम दे सकता है"...

 

"अब इसमें टैक्नीक और आर्ट कहाँ से घुस गया?"...

 

"मेरी कैल्कूलेशन के हिसाब से तो इस सब के लिए किसी इनसान(या जानवर कहें तो बेहतर)में....

पत्थर सा कठोर दिल...शुद्ध इस्पात से निर्मित टफ मज़बूत कलेजा और...अशोक की लाट के लोखंड जैसा तगड़ा गुर्दा होना ही बहुत है...सफिशिएंट है"...

 

"हाँ!..ये सब तो खैर कम्पलसरी आईटम्ज़ है ही लेकिन असली चीज़ ' कान होते हुए भी रोने-बिल्खने की आवाज़ों को ना सुनने' की टैक्नीक है और....

अच्छी भली खूबसूरत आँखे होते हुए किसी अबला नारी के आँसुओं को अनदेखा करना आर्ट है...कला है"...

 

"और ये सब दिलेरी नहीं बल्कि महा दिलेरी वाले काम हैँ...और तुम जैसे नौसिखिए ब्लॉगरों के बस का नहीं है इस सब को हैण्डल करना"...

 

"क्यों?...क्या कमी है हम में?"...

 

"यही कि जहाँ एक तरफ ब्लात्कार के वक्त लड़की ने ज़रा सा तनिक सा...रोने का ड्रामा  करना है ...

वहीं झट से तुम्हारी आँखों ने अश्रूधारा का सैलाब छोड़ सारे माहौल को सैंटीमैंटल बना तुम्हें भावुक कर देना है"...

"और किसी भी दुनिया का कोई भी कानून इस सब की इज़ाज़त नहीं देता है...परमिशन नहीं देता है"...

"आखिर!...हर चीज़ के कायदे होते हैँ....नियम होते हैँ"...

"और कोई पहले से बने-बनाए...तय नियमों को छेड़. ..अच्छे भले चलते हुए खेल से खिलवाड़ करे...ऐसा मुझे बिलकुल पसन्द नहीं...कतई पसन्द नहीं"...

 

"मैडम जी!...इतना कमज़ोर भी ना समझें आप हमें"...

"हम चाहें तो क्या नहीं कर सकते?"..

"क्या हम ब्लॉगर इनसान नहीं हैँ?"....

"क्या हमारी  इच्छाएँ ...हमारे अरमान...हमारे सपने नहीं हो सकते?

"लेकिन एक बात सही कही आपने...हम इतने निर्दयी भी नहीं कि बिना बात जोर आजमाईश पे उतर आएँ"

"अपुन ने तो अपना उसूल बनाया हुआ है कि जब तक भली भांति जान नहीं लेंगे कि लाड से...प्यार से...दुलार से...मनुहार से काम नहीं बनने वाला है"...

"तब तक कोई हाथापाई नहीं...कोई ज़ोर-आजमाईश नहीं"...

"लेकिन उसके बाद हमारे माथे ने भी घूमना है और ना चाहते हुए भी हमें ज़ोर-ज़बरदस्ती से अपनी बात मनवाने पे मजबूर होना पड़ना है"

 

"क्यों?...क्या डाक्टर कहता है कि ज़ोर आजमाईश करो?"....

"अपना प्यार से नहीं पटा सकते क्या?कि..पटने वाली भी खुश और पटाने वाला भी खुश"

 

"अब क्या हम पटें और क्या किसी को पटाएँ?"...

 

"क्यों?...क्या हुआ?"...

 

"ये लड़कियाँ खुद ही पहले तरह-तरह के बहाने बना लिफ्ट देती हैँ कि..'आजा मेरे गाड़ी में बैठ जा'और....

बाद में जब बन्दा खुद अपने हिसाब से ड्राईविंग करना चाहे ...थोड़ी एक्सट्रा स्पीड पकड़ना चाहे तो बेफाल्तू में हाय-तबा मचाने लगती हैँ कि...

"हाय!..मैँ लुट गई"...

"हाय!...मैँ बरबाद हो गई"मैँ मुँह टेढा कर हँसता हुआ बोला

 

"उड़ा लो!...उड़ा लो जितना मज़ाक उड़ाना है अभी उड़ा लो"...

"रात को कमरे में आना...तब बताऊँगी"....

"भिनभिनाते मच्छरों की बीच नंगी ज़मीन पे ...बिना चद्दर...बिना तकिए...बिना गिलाफ के ना सुला दिया तो मेरा नाम भी'वैजंतीमाला'नहीं"...

 

"डार्लिंग!...मैँ तो...मैँ तो ऐसे ही मज़ाक कर रहा था"...

 

"कितनी बार कह चुकी हूँ कि मुझे ऐसे बेहूदा..बेढंगे मज़ाक बिलकुल पसन्द नहीं"

 

"वो तो ऐसे ही बातों में से बात निकले जा रही थी तो मैँने कह दिया"...

"वर्ना मेरा कभी भी आपके दिल को ठेस पहुँचाने का कोई इरादा नहीं रहा"...

 

"खैर छोड़ो!...बेकार में बहस बढाने से क्या फायदा?"...

"हाँ तो हम!...कुछ पकड़ने पकड़ाने की बात कर रहे थे ना?"...

 

"जी"...

 

"तो मेरा कहना और मानना ये है कि हम औरतें तो सिर्फ उँगली ही पकड़ाती हैँ...

 

"और बाकि हाथ जैसे हम खुद लपक लेते हैँ?"...

 

"बिलकुल!...सारे के सारे मर्द एक जैसे होते हैँ...इनसान की शक्ल में छुपे हुए मादक भेड़िए"...

 

"किस बिनाह और किस शक-ओ-शुबह के आधार पर आप ऐसा कह रही हैँ?"..

 

"हर कहीं...हर किसी का ब्लात्कार तो नहीं करने बैठ जाते हम मर्द?"

 

"क्यों? रोज़ ही तो अखबारों और टीवी में इस तरह की खबरें सुर्खियाँ बन छाई होती हैँ कि फलानी फलानी जगह पे नाबालिग लड़की से सामुहिक ब्लात्कार किया गया"

 

"हाँ!...छाई रहती है...क्योंकि इनके सहारे उन्हें अपना अखबार बेचना होता है ...अपने चैनल की 'टी.आर.पी' बढा 'एड' बटॉर माल कमाना होता है"...

 

"तुम लोग भी तो बड़े चाव से नमक-मिर्च लगा ऐसी खबरों हवा दे दे फैलाते हो"...

"ठण्डी आहें भर ऐसी खबरों को देखने सुनने में तुम्हें अजीब सा...अच्छा सा सुकून मिलता है"...

"खूब मज़ा आता है ना तुम्हें इस सब में?"

 

"अरे !...मज़ा कहाँ आता है?"...

"उल्टा!...हमें तो खुन्दक आ रही होती है उस ब्लात्कारी पर"

 

"खुन्दक आ रही होती है या रश्क कर रहे होते हो उसकी किस्मत से?"

 

"क्या?...क्या मतलब है तुम्हारी बात का?

"कहना क्या चाहती हैँ आप?कि जब किसी का ब्लात्कार होता है...रेप होता है तो हमें खुशी महसूस होती है...गर्व महसूस होता है"

 

"और नहीं तो क्या?...सब के सब मर्द एक जैसे ही होते हैँ"

 

"और तुम औरतें कौन सी दूध की धुली हो?"..

 

"क्यों?...हम औरतों ने अब तुम्हारा क्या उखाड़ लिया?"...

 

"तुम औरतें भी तो खूब पोर्न साईटस देखती हो...उन्हें एंजाय करती हो और जब कभी मौका हाथ लगता है तो....

किसी निहत्थे मर्द को अकेला पाकर उसका ब्लात्कार करने से भी नहीं चूकती हो"...

"अभी कुछ महीने पहले की ही तो खबर है कि समालखा या चण्डीगढ ...पता नहीं कहाँ...

हाँ!..याद आया...शायद इन्दौर की ही बात है ....

वहाँ चार मुस्टंडी लड़कियों ने ब्लू फिल्म देखने के राह चलते एक किशोर को दिनदहाड़े दबोच लिया और...

ज़बरदस्ती उसकी मर्ज़ी के बिना उस से कुकर्म करते हुए उसका यौन...उसका शील भंग कर डाला"

 

"तो क्या हुआ?"...

"आम बात है ये तो...बाहरले देशों में तो ऐसा अक्सर होता रहता है"...

 

"आपके लिए आम बात होगी ये "...

"उस बेचारे...निरीह...लाचार प्राणी से पूछो कि क्या बीत रही होगी उस पर ?...

जिसे उन हवस की अँधी पुजारिनों ने वक्त से पहले ही सब अंतर...सब भेद बता नाबालिग से बालिग बना दिया"

"जहाँ एक तरफ दैहिक...मानसिक और नैतिक प्रताड़ना के चलते वो बेचारा दुनिया भर की तकलीफें सहन कर रहा होगा....दुख झेल रहा होगा...

वहीं दूसरी तरफ उसके दुखों...उसकी तकलीफों से मुँह फेर तुम औरतें जानबूझ कर अनजान बन..

आराम से अपनी किट्टी पार्टियों में उसकी खिल्ली उड़ा हँसी ठट्ठा कर रही होगी"

 

"तो क्या फर्क पड़ता है इस सब से तुम्हें?"

 

"फर्क?...

 

"अरे!...हमसे पूछो कि हमारे दिल पे उस वक्त क्या बीतती है जब हमें हमारे घर से...हमारे समाज से...बेदखल हो निर्वासित जीवन जीना पड़ता है"

 

"तो?"

 

"पत्थर दिल हो तुम...तुम्हें हमारी ...हमारे अरमानों की कोई परवाह नहीं होप्ती"...

 

"लेकिन मैँने तो किसी पुरानी फिल्म में ...

हाँ!...याद आया...'मर्द'फिल्म में 'बच्चन साहब'को डॉयलॉग मारते सुना था कि..."मर्द को दर्द नहीं होता"

 

"अरे!...वो सब फिल्मी बातें है...उनका क्या है?"...

"देखा नहीं?...आजकल टीवी चैनलों पर खुद 'बच्चन साहब'आड़े-तिरछे 'दर्दों'से बचने के लिए एक नामी मशहूर कम्पनी का बेनामी 'दर्द निरोधक तेल'रहे हैँ"...

"अब अगर ऐसी महान हस्ती को भी दर्द होता है तो हम नाचीज़ भला किस खेत की मूली या गाजर हैँ?"

"सच यही है कि...हमें भी तुम्हारी बातें..तुम्हारे ताने दुखते हैँ...अन्दर तक चुभते हैँ"...

लेकिन हिम्मत देखो उसकी...हौसला देखो उसका..

मजाल है जो उसने इस अन्याय की...इस बेशर्मी की कहीं भी चर्चा की हो..ढिढोड़ा पीटा हो....या तमाशा खड़ा किया हो"

 

"तो?...

 

"लेकिन तुम औरतें...अपनी मर्ज़ी से तुम किसी भी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे से दिन भर चिपकी फिरो...उसका कुछ नहीं परंतु ...

तुम्हारी मर्ज़ी...तुम्हारी इज़ाज़त के बिना कोई ज़रा सा छू ले सही...टच कर ले सही...

ताड़का बन तुरंत हाय तौबा मचा आसमान सर पे उठा लेती हो"

"देखा!...कितना फर्क है तुम में और हम में?"...

"हम मर्दों में अभी भी शर्म बाकि है...हया बाकि है"...

"हम लोग अपनी इज़्ज़त के चलते खोखली पापुलैरिटी हासिल करने की खातिर ऐसी बातों को हवा नहीं देते...तूल नहीं देते और...

तुम औरतों के हर ज़ुल्म...हर सितम को चुपचाप अपना नसीब मान कर सह जाते हैँ"...

"लेकिन कभी तो सवेरा होगा...किसी का तो सोया ज़मीर जागेगा और वो इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा अलख जगाएगा"

"याद रखना!...उस दिन इंकलाब आएगा...सैलाब आएगा जो...तुम्हें...तुम्हारे इन दकियानूसी ख्यालों को बहा ले जाएगा"

 

तो आओ दोस्तों!...हम सब मिलकर ये अहद करें...ये कसम लें कि आज से...अभी से....

इस ब्लात्कार के काम में हमने इन औरतों से बिलकुल भी पीछे नहीं रहना है और....

खुलेआम इनके वर्चस्व को चुनौती देते हुए अपना एकाधिकार जमाना है"...

 

"ब्लात्कारी यूनियन'...ज़िन्दाबाद...

 

"ज़िन्दाबाद...ज़िन्दाबाद"

 

"जय हिन्द"...

 

"भारत माता की जय"

 

"अरे!...ये किसके खिलाफ नींद में बड़बड़ाते हुए नारे लगा रहे हो?"...

"उठो!...सात बज चुके हैँ...पानीपत जाना है कि नहीं?"...

"कितनी बार कह चुकी हूँ कि ये कहानियाँ-वहानियाँ सिर्फ छुट्टी के दिन ही लिखा करो लेकिन....

तुम हो कि रात रात भर जाग के पता नहीं कम्प्यूटर के साथ क्या टक टकाटक करते रहते हो"

 

***राजीव तनेजा***

"व्यथा-ब्लैकिए की"



"व्यथा-ब्लैकिए की"

"काला धन्धा गोरे लोग"

***राजीव तनेजा***

मैँ आप से...हाँ!..आप से...आप सभी से पूछना चाहता हूँ कि...

क्या ऊपर उठना या...उठने की चाह रखना गलत है?

क्या उन्नति के ख्वाब देखना...और उन्हें पूरा करने की भरसक कोशिश करते हुए आगे बढना....

गुनाह है?...पाप है?...अपराध है?


अगर ये सब गलत है...सही नहीं है....तो मैँ दावे के साथ कह सकता हूँ कि दुनिया का हर इन्सान..हर आदमी गलत है।

उसकी सोच ...उसकी विचारधारा...उसका चिंतन गलत है।


क्या आप अपने परिवार को फलता फूलता देख खुशी से फूले नहीं समाते?

या आप में आगे बढने...ऊँचा...और ऊँचा उठने की चाह हमेशा कुलाँचे नहीं भरती?

अगर!..यही सब बातें...यही सब गुण मुझ में भी कुदरती तौर पर मौजूद हैँ...उपलब्ध हैँ...

तो इसमें गलत क्या है?...बुरा क्या है?

ठीक है!...माना कि जहाँ एक तरफ आपका चरित्र एकदम साफ-सुथरा...दूध का धुला...बेदाग है और ....

वहीं दूसरी तरफ मुझ पर आए दिन कोई ना कोई केस दर्ज होता रहता है...

कभी मिट्टी के तेल की कालाबाज़ारी का...तो कभी सरकारी गेहूँ को दुकानदारों को सप्लाई करने का

हाँ!...मैँ ब्लैकिया हूँ...और कालाबाज़ारी करना मेरा पेशा है।

मैँ मिट्टी के तेल से लेकर...गैस सिलैण्डर तक...हर उस चीज़ की कालाबाज़ारी करता हूँ...जो डिमांड में होती है...माँग में होती है।

क्या कहा?...कानूनन जुर्म है ये?

हुँह!...जुर्म है....

है तो होता रहे ....मुझे परवाह नहीं।

आज इसी वजह से मैँ अच्छा खा रहा हूँ...अच्छा पी रहा हूँ...अच्छा पहन रहा हूँ...अच्छा ओढ रहा हूँ...

तो आप सबको मिर्ची लगने लगी?

उस वक्त कहाँ थे आप?....

जब मैँ...मेरा परिवार बाज़ार में छाई गलाकाट प्रतियोगिता के चलते फैली मंदी के कारण कई काम बदलने के बावजूद भुखमरी की कगार पे था?

मरता...क्या ना करता वाली कँडीशन थी मेरे सामने।....

बच्चे पालने के लिए जो रास्ता सही लगा..आसान लगा...उसी को अपनाता चला गया

तो क्या बुरा किया मैँने?

अब कुछ गिने-चुने सरफिरे लोग .....या चन्द पागल इसे गलत कहें...सही नहीं समझें...

तो ये उनके दिमाग का कसूर है...मेरे दिमाग का नहीं।

मैँ कभी आप के आगे हाथ-पाँव जोड़ के विनति नहीं करता कि आप मेरे पास आ के अपनी जेबें ढीली करवाएँ।

आप खुद अपनी गर्ज़ के चलते सौ-सौ धक्के खाने के बाद मेरी शरण में तब आते हैँ...

जब आप अपने नकारा सरकारी सिस्टम की पूरी तरह निराश हो चुके होते हैँ..हताश हो चुके होते हैँ।

और ये कहाँ की भलमसत है कि आप मेरी शरण में आएँ और मैँ आपको दुत्कार दूँ?...या बेइज़्ज़त कर के भगा दूँ?

शास्त्रों में भी लिखा है कि 'शरणागत' की रक्षा करना...उसका भला करना...धर्म का काम है ...पुण्य का काम है।

तो ऐसे में मुझ जैसा धर्मभीरू आदमी भला अपने फर्ज़ से कैसे मुँह मोड़ ले?...

या किसी को परेशान देख...दुखी देख...अपनी आँखें मूंद ले?


आप कहते हैँ कि ये सिलैण्डरों की अल्टा-पलटी रिस्की काम है।

तो मेरे दोस्त!...ये बताओ कि रिस्क कहाँ नहीं है?....किस काम में नहीं है?...

आराम से अपनी राह चलते बन्दे भी बिना कसूर....बिना गलती के सिर्फ पाँव भर फिसलने से ही मरते देखे हैँ मैँने।

ठीक है!...कई बार बड़े से छोटे सिलैण्डर में गैस भरने के दौरान ना चाहते हुए भी हादसे हो जाया करते हैँ।...

इसमें चोट-चाट भी लग लगा जाती है और....

अब इसे वर्कलोड ज़्यादा होने के कारण कह लो या फिर...लापरवाही कह लो कि. ...

कई बार गैस वगैरा के लीक हो जाने से आग-वाग भी लग जाती है।

जिससे सिलैण्डरों के फटफटा जाने का खतरा भी हर हमेशा बना रहता है लेकिन ऐसा रोज़ थोड़े ही होता है?

ये तो जब 'टैंशन' के चलते कभी बीड़ी-बाड़ी की तलब उठती है और बिना सूट्टा मारे रहा नहीं जाता है तब...


अब महीने दो महीने में एक-आधा विरला केस अखबारों में सुर्खियों बन छा भी गया तो इसमें ना तो घबराने की ज़रूरत है और...

ना ही हाय-तौबा मचाने की।

वैसे तो हम लोगों की पूरी कोशिश रहती है कि ऐसी खबरें लीक ना हों और इन सब बातों से पब्लिक में घबराहट ना फैले...'पैनिक' ना फैले लेकिन...

फिर भी यदि कोई तेज़ तरार मीडिया पर्सन सूँघसाँघ के मामले की जड़ तक पहुँचने की कोशिश करता भी है तो उसे ले दे के चुप करा लिया जाता है।

हाँ!...थोड़ी बहुत...माड़ी-मोटी दिक्कत तब पेश आती है जब कोई जागरूक नागरिक ऐसे मामलों को उठाने की कोशिश करता है।

तब रिश्वत के चलते बिकी हुई पुलिस अपना जलवा दिखा उसे किसी ना किसी तरीके शांत कर देती है।

लेकिन गाहे-बगाहे कोई ना कोई ऐसा अड़ियल निकल ही बैठता है जिस पर....

पैसे का...प्यार का..लाड़ का...दुलार का...दबाव का कोई असर ही नहीं होता है।

तो ऐसे में कई बार फर्ज़ी केस कास भी दर्ज करने कराने पड़ जाते हैँ इन अड़ियल टटुओं को सीधा करने के लिए।

ऐसा करना इसलिए भी निहायत ज़रूरी होता है कि बाकी के लोग इस सब से सबक लें और इधर-उधर ताका-झाँकी के बजाए अपने काम से काम रखें।


मानता हूँ कि आपके लिए आँखोंदेखी मक्खी निगलना कष्टकर होता है...मुश्किल होता है...रुचिकर नहीं होता है।

ये भी जानता हूँ कि Rs.305 के माल के Rs.600 वसूलना गलत है..पाप है।

दिल मेरा भी इस सब के लिए गवाही नहीं देता है लेकिन....दोस्त!..मैँ करूँ भी तो क्या करूँ?...

पेट मेरे साथ भी लगा हुआ है...बच्चे मैँने भी पालने हैँ।

और फिर मैँ तो थोड़े से ही पेट भर लूँ...गुज़ारा कर लूँ।

लेकिन क्या करूँ इस दिन प्रतिदिन बढती मँहगाई का?

आराम से...शांति से...चैन से...जीने ही नहीं देती।


हो सकता है कि आपको मेरे ये 'लोजिक'...मेरे ये तर्क बेकार के...बेफाल्तू के लग रहे हों लेकिन...

कुछ खबर भी है आपको कि आजकल 'इंग्लिश'की बोतल कितने में आती है?

या'स्पाईसी'वाले ने ही पिछले दो महीनों में 'बटर चिकन'के दाम कितनी बार बढा दिए हैँ?

ऊपर से ये 'रोज़ी'की रोज़ की किचकिच....

उल्लू की पट्ठी!..'फुल नाईट' के लिए तीन हज़ार से कम में मानती ही नहीं।

बारगेनिंग करने की ज़रा सी भी कोशिश करो तो आँखे दिखा मिनट भर में ही बना बनाया मूड खराब कर सारा का सारा सुरूर उतार देती है।


जानता हूँ!...जानता हूँ मैँ कि पीने-पिलाने से सेहत खराब होती है और....

दुनिया भर के सर्वे भी यही बताते हैँ कि शाकाहारी मनुष्य को माँसाहारी की अपेक्षा बिमारियाँ कम पकड़ती हैँ...

वो ज़्यादा दिन जीता है।...

तो मेरे दोस्त!...ज़्यादा जीना ही कौन चाहता है?

ये भी 'टीवी'...'अखबार'...और 'रेडियो'के जरिए जान चुका हूँ कि इधर-उधर मुँह मारना...

एडस बिमारी के चलते सीधे-सीधे मौत को दावत देने के बराबर है लेकिन कोई यही सब भाषण जा के मेरी बीवी को क्यों नहीं पिलाता?...

जिसे मेरी भावनाओं की...मेरी इच्छाओ की कोई कद्र नहीं है।


वैसे एक बात बताऊँ?...

अगर आप सब की नेक सलाहों के चलते मैँ ना चाहते हुए भी इन सारे ऐबों से दूरी बना लूँ तो भी कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है क्योंकि..

इस सड़ांध मारते बदबूदार सिस्टम की मैँ बहुत छोटी सी...अदना सी मछली हूँ।

ये सोचो कि इन बड़े मगरमच्छों से कौन बचाएगा तुम्हें?

लोडर से लेकर गेटकीपर तक...डिलीवरी ब्वाय से लेकर चपरासी तक...

यहाँ तक कि काऊँटर पे बैठ पर्ची काटने वाली रिसैपश्निस्ट भी सूखी-सूखी खाली हाथ घर नहीं जाना चाहती।

उसे भी फी पर्ची कम से कम पैंतीस रुपए चाहिए होते हैँ।

इनमें से कोई भी हर महीने बीस से पच्चीस हज़ार बनाए बिना नहीं छोड़ता।

खैर!..इनकी छोड़ो...ये सब तो नौकर आदमी हैँ...कमाने-खाने के लिए ही सुबह से लेकर शाम तक उल्टी-सीधी मगजमारी करते रहते हैँ।

लेकिन खुद एजेंसी मालिक तक हम ब्लैकियों को शह देते हैँ और कुछ फाल्तू रुपयों के लालच में बोगस पर्चियाँ काट-काट हमारी हथेलियों पे धरते हैँ कि

जाओ!..गोदाम से उठवा लो सिलैण्डर...जितने चाहिए।

"वो बेचारा भी आखिर क्या करे?"...

ऊपर से नीचे तक कई करोड़ स्वाहा करने के बाद तो उसने बड़ी मुश्किल से गैस ऐजैन्सी हासिल की है।


दोस्त!...किस-किस को कोसोगे तुम?....किस-किस से लड़ोगे तुम?

इस हमाम में सभी नंगे हैँ।



अब किस-किस को दोष दे ये 'राजीव'...जब खुद अपनी राज्य सरकारें ही इस कालाबाज़ारी में लगी हुई हैँ।

अब आप चौंकेंगे कि राज्य सरकारें?...और काले धन्धे में?

जी हाँ मेरे दोस्त!...राज्य सरकारें।

अब आपके चौखटे पे एक और सवाल मँडराएगा कि ..."कैसे?"


तो वो ये कि..ये जो राज्य सरकारों की रजिस्ट्रेशन अथारिटियाँ गाड़ियों के 'वी.आई.पी'नम्बरों की 'ब्लैक'करती है....वो क्या है?

अब आप जैसे कुछ एक दिमागदार महानुभाव कहने को ये भी कह सकते हैँ कि सरकार ब्लैक में नहीं बल्कि 'प्रीमियम' पर नम्बर बेचती है।

तो बन्धु मेरे!..ये प्रीमियम आखिर है किस चिड़िया का नाम?

सच्ची बात तो ये है कि ये भी खुलेआम लूट का ही एक तरीका है...

बस!..इस सरकारी लूट को जायज़ ठहराने के लिए इसे 'ब्लैक' या 'कालाबाज़ारी' का नाम ना देते हुए 'प्रीमियम' का नाम दे दिया गया है।

आप खुद ही बताएँ कि'वी.आई.पी'नम्बर मिलने के बाद आप की गाड़ी में कौन से सुर्खाब के पर लग जाते हैँ?

क्या ये तथाकथित 'वी.आई.पी' नम्बर मिलने के बाद गाड़ियाँ 'पैट्रोल' या 'डीज़ल' की जुगलबन्दी छोड़ पानी के सहारे लैफ्ट-राईट करना शुरू कर देती है?

या फिर ये देश की खस्ताहाल सड़कों पे हिचकोले खाने के बजाए आराम से हवा में उड़ते हुए आपको जन्नत की सैर कराने में जुट जाती है?

नहीं ना?

फिर ऐसी कौन सी अनोखी बात हो जाती है 'वी.आई.पी'नम्बर मिल जाने से?

अरे!...जिस प्रकार हमें तुम्हें हमारे माँ-बाप नाम देते हैँ पहचान के लिए...ठीक वैसे ही गाड़ियों को नम्बर दिया जाता है

कि फलाने-फलाने नम्बर से ये जाना जा सके कि फलानी फलानी गाड़ी किसके नाम से...किस पते पर रजिस्टर्ड है?....

इसका वली-वारिस कौन?...मालिक कौन है?...वगैरा..वगैरा

हाँ!...इतना तो मैँ भी मानूँगा कि 'वी.आई.पी'नम्बर की गाड़ी देखने के बाद वो अफसर या पुलिसवाले जिनका ज़मीर बिक चुका है..

आपको सलाम बजाने के वास्ते सावधान मुद्रा में ज़रूर खड़े हो जाते होंगे।

मुझे तो यही लगता है कि 'वी.आई.पी' नम्बरों की चाह सिर्फ उन्हें ही होती है जो गलत काम करते हैँ...

हाँ!..कुछ एक अमीरज़ादे...जिनका ताज़ा-ताज़ा बाप मरा होता है ...

अपने को भीड़ से अलग...औरों से जुदा दिखाने के चक्कर में ऐसे नम्बरों को हासिल करने के लिए दिल खोल के पैसा खर्च करने से भी नहीं चूकते।


अब तो सरकार की देखादेखी मोबाईल कम्पनियाँ भी इस कालाबाज़ारी के धन्धे में उतर चुकी हैँ और धड़ाधड़ मुनाफे पे मुनाफा कूट रही हैँ।

जब से इनके नोटिस में ये बात आई कि कुछ खास तरह नम्बरों को पाने के लिए लोगबाग ज़्यादा उत्सुक्त दिखाई देते हैँ....

अपने शौक के चलते अलग से पैसे देने को तैयार रहते हैँ।

तो उन्होंने भी अपना दिमाग लड़ाया और खुली ऑक्शन के जरिए अपने 'वी.आई.पी'नम्बरज़ को बेचना शुरू कर दिया।

चलो...उनका तो काम है...हर जायज़-नाजायज़ तरीके से पैसा कमाना लेकिन पब्लिक को तो सोचना चाहिए।

आखिर!..क्या मिल जाएगा उसे कोई खास...तथाकथित'वी.आई.पी' नम्बर हासिल करके?

क्या'वी.आई.पी' नम्बर पाने के बाद वो सचमुच में 'वी.आई.पी'बन जाएगा?और उसकी गिनती...

'बिग.बी....रजनीकाँत और ऐश्वर्या के साथ होने लगेगी?...

या फिर 'वी.आई.पी' नम्बर हासिल करने के बाद उसकी'सोनिया गाँधी'...'जार्ज बुश'...और 'ओसामा बिन लादेन'से...

डाईरैक्ट हॉटलाईन जुड़ जाएगी?ताकि...

वो जब चाहे किसी भी ऐरे-गैरे...नत्थू-खैरे को को प्रधानमंत्री बनवा अपनी उँगलियों पे नचा सके..

या फिर जिस मर्ज़ी देश को अपनी धौंस...अपनी दादागिरी दिखा ..उसके तेल के कुओं पे कब्ज़ा जमा सके...

या फिर जब मर्ज़ी किसी भी देश पर कायरतापूर्ण आंतकवादी हमला कर उसके ट्रेड सैंटर को गिरवा सके?

"दोस्त!...ना ऐसा कभी हुआ है और ना ही कभी ऐसा होने की उम्मीद है।


अगर सरकार सच में आवाम का...पब्लिक का भला चाहती है तो क्यों नहीं अँकुश लगाती हम पर?

क्यों अपनी सड़ी-गली नीतियों को दुरस्त नहीं करती?

सब जानते हैँ कि शार्टेज की वजह से होती है ब्लैक...तो क्यों नहीं ज़रूरी चीज़ों की पूर्ति बढाती?

क्यों इस्तेमाल होने दिया जाता है लाल सिलैंण्डरों का घरेलू इस्तेमाल के अलावा दूसरे कामों में?

सब जानते हैँ कि सौ में से अस्सी-नब्बे परसैंट तक फैक्ट्रियाँ डोमैस्टिक वाले लाल सिलैण्डर से ही अपना काम चलाती हैँ।

बची खुची पाँच से सात परसैट फैक्ट्रियाँ ही असल में कमर्शियल सिलैण्डरों का प्रयोग करती हैँ।

और ध्यान देने की बात है कि इस 'कमर्शियल सिलैण्डर' के इस्तेमाल में भी लोचा है।

दरअसल गलाकाट पर्तियोगिता के चलते सबको अपनी लागत कम करने की पड़ी होती है।...

ऐसे में मँहगा वाला 'कमर्शियल सिलैण्डर' इस्तेमाल कर के कोई अपने खर्चे बढाए भी तो क्यों?

इसलिए फैक्ट्री वाले...होटल वाले...थोड़ी ईमानदारी बरतते हुए इस्तेमाल तो कमर्शियल सिलैण्डर ही करते हैँ लेकिन...

उनमें हम जैसे ब्लैकियों से लाल सिलैण्डर की अलटा-पलटी करवा लेते हैँ।

अब आप पूछेंगे कि इस बेकार की मगजमारी से फायदा?

अरे!...इस अलटा-पलटी में फैक्ट्री वाला ही कम से कम Rs.500 बचा जाता है क्योंकि जहाँ एक तरफ सब्सिडी के चलते...

14 kg.के लाल सिलैण्डर का दाम Rs.305 है...

वहीं दूसरी तरफ सरकार की बेवाकूफी के चलते 19Kg.के कमर्शियल सिलैण्डर के दाम Rs.1400 रखा गया है।

हिसाब लगाओ तो कमर्शियल सिलैण्डर में लाल वाला डेढ सिलैण्डर तक घुस जाता है।

तो इस हिसाब से ब्लैक के पैसे जोड़ने के बाद खरीदार को (Rs.305)वाला लाल सिलैण्डर (Rs.600)का पड़ता है

तो डेढ सिलैण्डर के हो गए (Rs.600+Rs.300=Rs.900)

याने के शुद्ध लाभ हो गया पूरे (Rs.1400-Rs.900=Rs.500)का।


सरकार सोचती है कि सब्सिडी देने से लोगों का भला होगा लेकिन इस सब से लोगों का नहीं हम जैसों का भला होता है।

अगर सही में ईमानदारी से सरकार हमारे वजूद...हमारे अस्तित्व को खत्म करना चाहती है...हमें नेस्तनाबूत करना चाहती है तो...

सबसे पहले सब्सिडी को खत्म करे और उसके बाद सप्लाई को बढाए...और चीज़ों के दाम जायज़ रखे।


"क्यों?...है कि नहीं?


"जय हिन्द"

"भारत माता की जय"


***राजीव तनेजा***


Rajiv Taneja

Delhi(India)

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+919896397625

व्यथा झोलाछाप डाक्टर की-राजीव तनेजा


[कार्टून प्रस्तुति: अभिषेक तिवारी]
कसम ले लो मुझसे...'खुदा' की...या फिर किसी भी मनचाहे भगवान की.....तसल्ली ना हो तो बेशक!...'बाबा रामदेव'के यहाँ मत्था टिकवा के पूरे सात के सात वचन ले लो जो मैँने या मेरे पूरे खानदान में....कभी किसी ने 'वी.आई.पी' या 'अरिस्टोक्रैट'के फैशनेबल लगेज के अलावा कोई देसी लगेज जैसे...थैला....बोरी...कट्टा...ट्रंक ...अटैची...या फिर कोई और बारदाना इस्तेमाल किया हो। कुछ एक सरफिरे अमीरज़ादे तो 'सैम्सोनाईट'का मँहगा लगेज भी इस्तेमाल करने लग गए हैँ आजकल। आखिर स्टैडर्ड नाम की भी कोई चीज़ होती है। लेकिन इस सब में भला आपको क्या इंटरैस्ट?...आपने तो ना कुछ पूछना है ...ना पाछना है और...सीधे ही बिना सोचे समझे झट से सौ के सौ इलज़ाम लगा देने हैँ हम मासूमों पर।मानों हम जीते-जागते इनसान ना होकर कसाई खाने में बँधी भेड़-बकरियाँ हो गयी कि....जब चाहा...जहाँ चाहा....झट से मारी सैंटी और....फट से हाँक दिया।
अच्छा लगता है क्या कि किसी अच्छे भले सूटेड-बूटेड आदमी को 'छोला छाप' कह उसकी पूरी पर्सनैलिटी ...पूरी इज़्ज़त की वाट लगाना? मज़ा आता होगा ना आपको हमें सड़कछाप कह...हमारे काम...हमारे धन्धे की तौहीन करते हुए? सीधे-सीधे कह क्यों नहीं देते कि अपार खुशी का मीठा-मीठा एहसास होता है आपको...हमें नीचा दिखाने में?....वैसे ये कहाँ की भलमनसत है कि हमारे मुँह पर ही...हमें...हमारे छोटेपन का एहसास कराया जाए?
ये सब इसलिए ना कि हम आपकी तरह ज़्यादा पढे-लिखे नहीं...ज़्यादा सभ्य नहीं....ज़्यादा समझदार नहीं? हमारे साथ ये दोहरा मापदंड...ये सौतेला व्यवहार इसलिए ना कि...हमारे पास 'डिग्री' नहीं...सर्टिफिकेट नहीं? मैँ आपसे पूछता हूँ... हाँ!...आप से कि हकीम 'लुकमान' के पास कौन से कॉलेज या विश्वविद्यालय की डिग्री थी? या 'धनवंतरी' ने ही कौन से मैडिकल कॉलेज से 'एम.बी.बी.एस' या...'एम.डी' पास आऊट किया था? सच तो यही है दोस्त कि उनके पास कोई डिग्री नहीं थी...कोई सर्टिफिकेट नहीं था।...फिर भी वो देश के जाने-माने हकीम थे....वैद्य थे...लाखों-करोड़ों लोगों का सफलतापूर्वक इलाज किया था उन्होंने।"क्यों है कि नहीं?"
उनके इस बेमिसाल हुनर....इस बेमिसाल इल्म के पीछे उनका सालों का तजुर्बा था...ना कि कोई डिग्री...या फिर कोई सर्टिफिकेट। हमारी 'कँडीशन'भी कुछ-कुछ उनके जैसी ही है याने के...'ऑलमोस्ट सेम टू सेम' बिकाझ...जैसे उनके पास कोई डिग्री नहीं...वैसे ही हमारे पास भी कोई डिग्री नहीं...सिम्पल।
वैसे आपकी जानकारी के लिए मैँ एक बात और बता दूँ कि ये लहराते ...बलखाते बाल मैँने ऐसे ही धूप में हाँडते-फिरते सफेद नहीं किए हैँ बल्कि..इस डाक्टरी की लाईन का पूरे पौने नौ साल का प्रैक्टिकल तजुर्बा है मुझे। और खास बात ये कि ये तजुर्बा...ये एक्सपीरिएंस मैँने इन तथाकथित 'एम.बी.बी.एस'या 'एम.डी' डाक्टरों की तरह....लैबोरेट्री में किसी बेज़ुबान 'चूहे'या'मैँढक'का पेट काटते हुए हासिल नहीं किया है बल्कि...इसके लिए खुद इन्हीं...हाँ!...इन्हीं नायाब हाथों से कई जीते-जागते ज़िन्दा इनसानो के बदन चीरे हैँ मैँने।
"है क्या आपके किसी 'डिग्रीधारी'डाक्टर या फिर...मैडिकल आफिसर में ऐसा करने की हिम्मत?.....ऐसा करने का माद्दा?" "और ये आपसे किस गधे ने कह दिया कि डिग्रीधारी डाक्टरों के हाथों मरीज़ मरते नहीं हैँ?" रोज़ ही तो अखबारों में इसी तरह का कोई ना कोई केस छाया रहता है कि फलाने-फलाने सरकारी अस्पताल में फलाने फलाने डाक्टर ने लापरवाही से...आप्रेशन करते वक्त सरकारी कैंची को गुम कर दिया।..."अब कर दिया तो कर दिया लेकिन नहीं...अपनी सरकार भी ना...पता नहीं क्या सोच के एक छोटी सी...अदना सी...सस्ती सी...कैंची का रोना ले के बैठ जाती है। ये भी नहीं देखती कि कई बार बेचारे डाक्टरों के नोकिया 'एन' सीरिज़ तक के मँहगे-मँहगे फोन भी....मरीज़ों के पेट में बिना कोई शोर-शराबा किए गर्क हो जाते हैँ...धवस्त हो जाते हैँ लेकिन...शराफत देखो उनकी...वो उफ तक नहीं करते...चूँ तक नहीं करते। अब कोई छोटा-मोटा सस्ता वाला चायनीज़ मोबाईल हो तो बन्दा भूल-भाल भी जाए लेकिन....फोन...वो भी नोकिया का...और ऊपर से 'एन'सीरिज़...कोई भूले भी तो कैसे भूले? अब इसे कुछ डाक्टरों की किस्मत कह लें या फिर...उनका खून-पसीने की मेहनत से कमाया पैसा कि उन्होंने अपने फोन को बॉय डिफाल्ट.....'वाईब्रेशन'मोड पे सैट किया हुआ होता है। जिससे...ना चाहते हुए भी कुछ मरीज़ पूरी ईमानदारी बरत पेट में बार-बार मरोड़ उठने की शिकायत ले कर...उसी अस्पताल का रुख करते हैँ जहाँ उनका इलाज हुआ था।
वैसे 'बाबा रामदेव' झूठ ना बुलवाए...तो यही कोई दस बारह केस तो अपने भी बिगड़ ही चुके होंगे इन पौने नौ सालों में लेकिन....इसमें इतनी हाय तौबा मचाने की कोई ज़रूरत नहीं। आखिर इनसान हूँ...गल्ती हो भी जाती है। लेकिन अफसोस!..संबको मेरी गल्ती नज़र आती है..मकसद नहीं।क्या किसी घायल...किसी बिमार की सेवा कर...उसका इलाज कर...उसे ठीक...भला-चंगा करना गलत है? नहीं ना?...फिर ऐसे में अगर कभी गल्ती से लापरवाही के चलते कोई छोटी-बड़ी चूक हो भी गई तो इसके लिए इतना शोर-शराबा क्यों?...इतनी हाय तौबा क्यों?
मुझ में भी आप ही की तरह देश-सेवा का जज़्बा है। मैँ भी आप सभी की तरह सच्चा देशभग्त हूँ और सही मायने में देश की भलाई के लिए काम कर रहा हूँ।
आप भले ही मेरी बात से सहमत हों या ना हों मुझे अपनी सरकार का ये दोगलापन बिलकुल पसन्द नहीं कि....अन्दर से कुछ और और बाहर से कुछ और। कहने को अपनी सरकार हमेशा बढ्ती जनसंख्या का रोना रोती रहती है लेकिन अगर हम मदद के लिए आगे बढते हुए अपनी सेवाएँ दें....तो उसे फाँसी लगती है। वो करे तो...पुण्य...हम करें तो पाप।...वाह री मेरी सरकार...कहने को कुछ और करने को कुछ।
एक तरफ रोना ये कि देश जनसंख्या बोझ तले दब रहा है...इसलिए परिवार नियोजन को बढावा दो। जहाँ एक तरफ इंदिरा गाँधी के ज़माने में काँग्रेस सरकार ने टोरगैट पूरा करने के लिए जबरन नसबन्दी का सहारा लिया था...और अब वर्तमान काँग्रेस सरकार अपनी बेशर्मी के चलते जगह-जगह "कण्डोम के साथ चलें" के बैनर लगवा रही है...पोस्टर लगवा रही है। दूसरी तरफ कोई अपनी मर्ज़ी से एबार्शन करवाना चाहे तो जुर्माना लगा फटाक से अन्दर कर देती है। अरे!...किसी को अगर एबार्शन करवाना है तो बेशक करवाए ...बेधड़क करवाए...जी भर करवाए।...इसमें तुम्हारे बाप का क्या जाता है? वो चाहे एक करवाए ...या फिर सौ करवाए...उसकी मर्ज़ी...लेकिन नहीं....अपनी कलयुगी सरकार की नज़र-ए-इनायत में ये जुर्म है..पाप है...गुनाह है। ये भला कहाँ का इनसाफ है कि एबार्शन करने वालों को और करवाने वालों को पकड़कर जेल में डाल दिया जाए?....तहखाने में डाल दिया जाए?
ऐसी अन्धेरगर्दी ना तो 'नादिरशाह' के ज़माने में कभी देखी थी और ना ही कभी 'अहमदशाह अब्दाली' के ज़माने में सुनी थी। ठीक है माना कि 'एबार्शन'..या क्या कहते हैँ उसे हिन्दी में?...हाँ!..याद आया 'गर्भपात' आमतौर लड़कियों के ही होते हैँ...लड़कों के नहीं। तो आखिर!..इसमें गलत ही क्या है? कोई कुछ कहे ना कहे लेकिन मेरे जैसे लोग तो डंके की चोट पे यही कहेंगे कि अगर लड़का पैदा होगा तो....वो बड़ा हो के कमाएगा...धमाएगा...खानदान का नाम रौशन करेगा।
ठीक है!..मान ली आपकी बात कि आजकल लडकियाँ भी कमा रही हैँ और लड़कों से दुगना-तिगुना तक कमा रही हैँ लेकिन...ऐसी कमाई किस काम की जो वो शादी के बाद फुर्र हो अपने साथ ले चलती बनें?ये भला क्या बात हुई?कि चारा खिला-खिला बाप बेचारा बुढा जाए और जब दुहने की बारी आए तो....पति महाश्य क्लीन शेव होते हुए भी अपनी तेल सनी वर्चुअल मूछों को ताव देते पहुँच जाएं बाल्टी के साथ? मज़ा तो तब है जब...जो पौधे को सींचे...वही फल भी खाए। "क्यों?...है कि नहीं।खैर छोड़ो!...हमें क्या?....अपने तो सारे बेटे ही बेटे हैँ।...जिसने बेटी जनी है...वही सोचेगा।
आप कहते हैँ कि हम इलाज के दौरान हायजैनिक तरीके इस्तेमाल नहीं करते हैँ जैसे सिरिंजो को उबालना...दस्तानों का इस्तेमाल करना वगैरा वगैरा...तो क्या आप के हिसाब से पैसा मुफ्त में मिलता है?...या फिर किसी पेड़ पे उगता है? आँखे हमारी भी हैँ...हम भी भलीभांति देख सकते हैँ....अगर सिरिंजें दोबारा इस्तेमाल करने लायक होती है तभी हम उन्हें काम में लाते हैँ..वर्ना नहीं। ठीक है!...माना कि कई बार जंग लगे औज़ारो के इस्तेमाल से सैप्टिक वगैरा का चाँस बन जाता है और यदा कदा केस बिगड़ भी जाते हैँ। तो ऐसे नाज़ुक मौकों पर हम अपना पल्ला झाड़ते हुए मरीज़ों को किसी बड़े अस्पताल या फिर किसी बड़े डाक्टर के पास रैफर भी तो कर देते हैँ।
अब अगर कोई काम हम से ठीक से नहीं हो पा रहा है तो ये कहाँ का धर्म है? कि हम उस से खुद चिपके रह कर मरीज़ की जान खतरे में डालें। आखिर!...वो भी हमारी तरह जीता जागता इनसान है...कोई खिलोना नहीं।
-ट्रिंग...ट्रिंग...
-हैलो...
-कौन?...
-नमस्ते...
-बस..यहीं आस-पास ही हूँ। ...
-ठीक है!...आधे घंटे में पहुँच जाऊँगा।...
-ओ.के!...सारी तैयारियाँ कर के रखो...फायनली मैँ आने के बाद चैक कर लूँगा।
-हाँ!..मेरे आने तक पार्टी को बहला के रखो कि डाक्टर साहब 'ओ.टी' में एमरजैंसी आप्रेशन कर रहे हैँ।...
-एक बात और!...कुछ भी कह-सुन के पूरे पैसे एडवांस में जमा करवा लेना।...बाद में पेशेंट मर-मरा गया तो रिश्तेदारों ने ड्रामा खड़ा कर नाक में दम कर देना है। पहले पैसे ले लो तो ठीक...वर्ना...बाद में बड़ा दुखी करते हैँ...
अच्छा दोस्तो!....कहने-सुनने को बहुत कुछ है।...फिलहाल!....जैसा कि आपने अभी सुना...शैड्यूल थोड़ा व्यस्त है...तो फिर!..मिलते हैँ ना ब्रेक के बाद...फिर से नए शिकवों...नई शिकायतों के साथ...कुछ आप अपने मन की कहना...कुछ मैँ अपने दिल की कहूँगा।
"जय हिन्द"
"भारत माता की जय"
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जय बोलो बेईमान की - राजीव तनेजा




आज मुझसे…मेरी कामयाबी से जलने वालों की इस पूरी दुनिया में कोई कमी नहीं है।वो मुझ पर तरह-तरह के उल्टे-सीधे इलज़ाम लगाकर मेरी हिम्मत…मेरे हौंसले…मेरे आगे बढने के ज़ुनून को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैँ…
“हुंह!…पागल कहीं के…मुझसे?…मुझसे मुकाबला करना चाहते हैं?”….
“बड़ी अच्छी बात है ये तो लेकिन पहले मेरे सामने ठीक से खड़े होने की हिम्मत तो जुटा लें कम से कम …बाद में  आगे की सोचें”…
“हुंह!…स्साले…निठल्ले कहीं के”…
“अरे!…आसमान पर थूकने से पहले उसका नतीजा तो जान लो”…
बचपन से लेकर आज तक ..मैँने कभी भी इन जैसे आलसियों के माफिक खाली बैठे बैठे कुर्सी तोड़ने की नहीं सोची।जहाँ तक मुझे याद है…होश संभालते ही मैं अपने पैरों पे खड़ा हो गया था।बूट पॉलिश करने से लेकर ढाबों तक में बर्तन माँजे मैँने|बाईक से लेकर कार तक पे फटका मारने जैसे किसी भी छोटे-बड़े काम से मैँने कभी गुरेज़ नहीं किया और इसी तरह कदम दर कदम बढते हुए एक दिन मैँ एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में बेलदारी करने लगा|
वहाँ ठेकेदार की बीवी से इश्क लड़ा उसे पटाया और जल्द ही वो अपने तमाम गहने-लत्ते ले मेरे साथ भाग निकली।ठेकेदार पहुँच वाला था…सो!…हमारी दौड़ शुरू हो गई…हम आगे-आगे और वो लट्ठ लिए हमारे पीछे-पीछे…कभी इस डगर तो कभी उस डगर…कभी इस शहर तो कभी उस शहर|धीरे-धीरे मैँ कोठियों वगैरा में सफेदी-डिस्टैम्पर के छोटे-मोटे ठेके लेने लगा।वहीँ एक ठेकेदार के साथ यारी गाँठ मैँने पुरानी बिल्डिंगों की तुड़ाई के ठेके भी लेने चालू कर दिए और उसमें खूब नोट कमाए।उसके बाद तो जनाब मेरे रास्ते में जो-जो आता गया…मैं उसे ही अपनी कामयाबी की सीढी बनाता हुआ आगे बढता गया।खुदा गवाह है मेरा कि मैँने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा कि मेरे पैरों के नीचे कौन कुचला जा रहा है और कौन नहीं?

नतीजन!…आज मैँ देश का माना हुआ डिमालिशन काँट्रैक्टर कम एस्टेट डवैल्पर हूँ।
“क्या कहा?”…
“बीवी का क्या हुआ?…
“अरे!..कई साल पहले चलती लॉरी के नीचे आ जाने से अचानक उसकी मौत हो गई थी…आपको पता नहीं?”…
“मैंने खुद ही तो उसे….
“अरे!…हाँ!…याद आया…अगले महीने…उसी केस की फाईनल हीयरिंग पे तो मुझे कोर्ट में पेश होना है”…
“अब बेशक दिखावे के लिए ही सही लेकिन डर तो लग ही रहा है कि पता नहीं ऊँट किस करवट बैठे?”…
“खैर!..जो भी हो …पता है मुझे कि उसके घर देर है पर अन्धेर नहीं….सरकारी वकील से लेकर गवाहों तक और यहाँ तक कि माननीय जज साहब तक मेरा चढावा जो पहुँच चुका है।इसलिए सज़ा का तो सवाल ही नहीं पैदा होता”
”आखिर!…कब तक?..कब तक मैँ उस बुड्ढी खूसट के पल्लू से बँधा रहता? कई बार समझाया भी पट्ठी को लेकिन वो स्साली!…सीधे-सीधे प्यार-मोहब्बत से तलाक देने को राज़ी ही नहीं थी…उसकी मौत का मुझे भी दुख है लेकिन मेरे पास इसके अलावा और चारा भी क्या था?…वो ‘रोज़ी’ की बच्ची जो उसके जीते जी मेरा बिस्तर गर्म करने को राज़ी ही नहीं थी”
“खैर छोड़ो!..इन सब बातों को…ये केस-कास तो मुझ पर आए दिन चलते रहते हैँ…इनका क्या?”

कभी मुझ पर घटिया निर्माण सामग्री इस्तेमाल करने के इलज़ाम लगे… तो कभी आदिवासी मज़दूरों से बँधुआगिरी करवाने के…लेकिन मैँने कभी किसी चीज़ की परवाह नहीं की।जैसे दूसरे ठेकेदारों द्वारा बनाई गई ईमारतें गिरती रहती हैँ…ठीक वैसे ही मेरी भी दो-चार गिर गई तो कौन सी आफत आन पड़ी?


अब कौन समझाए अपने देश की इस बुद्धू पब्लिक को कि इस मायावी संसार में हर चीज़ नश्वर है।जो चीज़ पैदा हुई है उसे आज नहीं तो कल खत्म होना ही है…कोई अपने तय समय से पहले खत्म हो जाती है तो कोई तय समय के बाद लेकिन इतना ज़रूर पक्का है कि…हर एक का अंत समय आना ही है।…
अब अगर मेरे द्वारा बनाए गए दो-चार फ्लाई ओवर ज़्यादा समय तक ट्रैफिक का बोझ झेल नहीं पाए तो इसमें मैँ क्या करूँ? क्या डाक्टर ने कहा था सरकारी इजीनियरों को कि वो रातोंरात अपना कमीशन 30%  से बढा कर 40% कर दें? मुझे मजबूरन सिमेंट में रेत मिलाने के बजाय….रेत में सिमेंट मिलाना पड़ा तो इसमें मैँ क्या करूँ? पता नहीं इन मीडिया वालों को किसी की फोकट में पब्लिसिटी करके क्या मिलता है? और उनके बहकावे से आकर पब्लिक बेचारी बेकार में ही अपना कीमती वक्त ज़ाया कर मुफ्त में होहल्ला कर बैठती है।
लेकिन इस सारे ड्रामे से मुझे फायदा ही हुआ है…नुकसान नहीं क्योंकि मीडिया और पब्लिक की इस मिली जुली साठगाँठ ने मुझ जैसे अदना से बिल्डर को रातोंरात सैलीब्रिटी जो बना दिया है।अब तो नए-नए बिल्डर मुझसे हाथ मिला मेरे ऑटोग्राफ लेने को उतावले रहते हैँ और मेरी इन्हीं उपलब्धियों के चलते मुझे पाँच साल के लिए बिल्डर्स ऐसोसिएशन का प्रधान भी बना दिया गया है| हाँ!..तो मैँ बात कर रहा था अपने कैरियर की…अपनी कामयाबी की तो ये बात काबिले गौर है कि इस सारे…नीचे से ऊपर उठने के खेल में मैँने पूरी ईमानदारी…पूरी ऐहतिहात बरती।

अब जब खुला खेल फरुखाबादी का चल ही निकला है तो लगे हाथ मैँ भगवान को हाज़िर-नाज़िर जान कर एक बात और साफ करना चाहूँगा कि अपने पूरे कैरियर में मैँने कभी किसी से हराम का पैसा नहीं लिया… सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत का…अपने हक का ही पैसा लिया।खुदा गवाह है कि हमेशा मेरे ये हाथ देने के लिए ही आगे बढे हैँ…कभी लेने के लिए नहीं।अगर मेरी बात का यकीन ना हो तो किसी दिन समय निकाल के चलो मेरे साथ किसी भी सरकारी दफ्तर में।ऊपर से नीचे तक…चपरासी से लेकर बड़े बाबू तक …सभी एक टाँग पर खड़े होकर सलाम बजाते ना दिखाई दें तो फिर कहना।
और ऐसा वो करे भी क्यों ना?…सीधी बात है भाई कि हर जगह…’इस हाथ दे और उस हाथ ले’ वाला तरीका ही कामयाब रहता है|शुरू से लेकर अब तक सबकी मदद जो करता आया हूँ मैँ|जब भी ..जिस किसी ने भी…जो-जो माँगा…बेहिचक…बिना कोई सवाल किए चुपचाप दे दिया।भले ही इस सब के बदले उन्होंने मेरे वो सब जायज़-नाजायज़ काम किए जो शायद बिना पैसे दिए होने लगभग नामुमकिन ही थे जैसे…कई बार उन्होंने मुझे ब्लैक लिस्ट होने से बचाया तो कई बार नकली एक्सपीरियंस सर्टिफिकेट… बिना काबिलियत के कँस्ट्रक्शन से लेकर डिमॉलिशन तक के लाईसैंस…वगैरा…वगैरा|

  • अभी पिछले साल की ही लो ..दिल्ली मैट्रो में तुड़ाई के ठेके लेने के लिए ज़रूरी शर्त थी कि….
    ठेकेदार के पास रास्ते में आने वाली बिल्डिंगों को तोड़ गिराने के लिए ज़रूरी साज़ो सामान होना चाहिए जैसे…’जे.सी.बी’ मशीने…बुलडोज़र वगैरा…वगैरा लेकिन…अपुन के पास एक भी मशीन ना होने के बावजूद भी सारे के सारे ठेके मुझे ही मिले और अपन ने भी सबको खुश करने में किसी किस्म की कँजूसी नहीं बरती।जहाँ काम पाँच हज़ार से भी चल सकता था…वहाँ मैँने दस हज़ार भी बेझिझक खर्चा कर दिए।आखिर!..पेट तो उनके साथ भी लगा हुआ है…उन्होने भी अपने बच्चे पालने हैँ।
    “क्यों?…है कि नहीं?”…
    अपनी सरकार आखिर देती ही क्या है अपने कर्मचारियों को जो वो ईमानदारी बरतें…संयम बरतें?
    कहने को आप जो भी कहें लेकिन सच्चाई यही है कि अगर ढंग से जिया जाए तो सरकारी तनख्वाह में एक हफ्ता भी ठीक से ना गुज़रे। मोबाईल से लेकर इंटरनैट तक और …फास्टफूड से लेकर केबल टीवी तक के ही खर्चे इतने हैँ कि तनख्वाह पहले हफ्ते में ही फुर्र होती दिखती है।ऐसे में अगर रिश्वत ना लें तो बाकि के बचे हफ़्तों में क्या मन्दिरों और गुरुद्वारों में छन्नकणें बजा के अपना गुज़ारा करें?”…
    ऊपर से ये लम्बी गाड़ियाँ का सिर उठाता मँहगा शौक…उफ!…तौबा|अब ऐसी हालत में बन्दा रिश्वत ना ले तो क्या भूखों मरे? ठीक है!..माना कि आजकल ‘पे कमीशन’ की बदौलत तनख्वाहें पहले से कई गुणा ज़्यादा बढ चुकी हैँ और आगे भी बढने की पूरी उम्मीद है लेकिन इस बात पे गौर करना भी निहायत ही ज़रूरी है कि मँहगाई कितनी तेज़ी से बिना रुके बढती चली जा रही है?
    प्याज-टमाटर के दामों में लगी आग बुझने का नाम नहीं ले रही है…खाद्यानों की कीमतें काबू में नहीं आ रही हैं …पहले ही आम इनसान फाईनैंस कम्पनियो के कर्ज़ों के बोझ तले दबा जा रहा है और ऊपर से अपनी सरकार भी कभी पेट्रोल-डीज़ल के तो कभी सिलेंडर के दाम बढ़ा उसके ताबूत में कील पे कील ठोकने से परहेज़ नहीं कर रही है।
    अब कहने वाले कहने को तो ये भी कह सकते हैँ कि आम पब्लिक की भारी नाराजगी के चलते दिल्ली सरकार ने अपने करों में कटौती करते हुए डीज़ल के दाम अढाई रूपए प्रति लीटर तक घटा भी तो दिए हैँ।तो सरकार मेरी!…अढाई रूपए प्रति लीटर की छुटभैय्या छूट से आखिर होता ही क्या है? इससे से ज़्यादा के तो हम रोजाना ‘पान’..’तंबाकू’ और ‘गुट्खे’ चबा जाते हैँ।नमकीन और स्नैक्स को ना जोड़े तो भी ‘दारू’..’विहस्की’…’सोडे’ और ‘रम’ का खर्चा ही बहुतेरा आ जाता है।
    आजकल खर्चे ही इतने हैँ कि पैसा जहाँ से भी…जैसे भी…जितना मर्ज़ी आ जाए… कभी पूरा ही नहीं पड़ता।इसलिए इन बेचारे मज़लूम सरकारी कर्मचारियों का रिश्वत लेने का हक तो बनता ही है ना बॉस? मेरे हिसाब से रिश्वत के हर रूप …चाहे वो नकद नारायण हो…या फिर किसी भी छोटे-बड़े गिफ्ट की शक्ल अख्तियार किए हुए हो को…कानूनन जायज़ ठहराते हुए हर छोटे-बड़े दफ्तर के बाहर ये दो तख्तियाँ अवश्य लटकवा देनी चाहिए कि…
    ज़रूरी सूचना:
  • रिश्वत लेना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और…
  • यहाँ बिना रिश्वत के एक पन्ना भी इधर से उधर नहीं होता

और लगे हाथ जो कर्मचारी ईमानदारी से अपना काम करते हुए रंगेहाथ पकड़ा जाए उसके लिए….
ऐसी सख्त से सख्त सज़ा का प्रावधान होना चाहिए कि उसकी रूह तक काँप उठे। ऐसा करना निहायत ही ज़रूरी है क्योंकि इस सब से हमारी आने वाली नस्लों को सबक मिलेगा और वो कभी भी रिश्वत ना लेने जैसा घिनौना काम करने की जुर्रत कर पाएँगी।
मैँ तो कहता हूँ कि…पागल हैँ वो…नादान हैँ वो…जिनके लिए ईमानदारी ही सबसे बड़ी दौलत है…सबसे बड़ी नेमत है…
बेवाकूफ कहीं के!…इतना भी नहीं जानते कि खोखले आदर्शो से पेट नहीं भरा करते।

“अरे!…किस-किस से लड़ोगे तुम?…किस-किस को समझाओगे तुम?…पूरा का पूरा सिस्टम ही रिश्वतखोरों से भरा पड़ा है”..
“घिन्न आती है तुमसे मुझे…ऐसी सड़ी हुई मछली हो तुम जो पूरे तालाब को ही गन्दा करने पे उतारू है”…
“बचाव में ही समझदारी है…अभी भी संभल जाओ वर्ना पछताते देर ना लगेगी।फायदा इसी में है कि जब पानी के तेज़ बहाव म्रें उल्टी दिशा में नाव खे ना सको तो बहाव के साथ ही बह चलो”
मेरी राय में तो सारे के सारे ईमानदारों को बारी-बारी से पकड़ कर सज़ाए मौत का हुक्म सुनाते हुए सरेआम फाँसी पे लटका देना चाहिए और हाँ …उसका लाईव टैलीकास्ट करना हर चैनल वाले के लिए कानूनन मजबूरी हो।जो चैनल इस आदेश की अनदेखी करे…उसे देशद्रोह का ज़िम्मेवार मानते हुए उस पर तत्काल मुकदमा दर्ज होना चाहिए।

तो आओ दोस्तो!….हम अपने हितों की रक्षा के लिए एक हो जाएँ मिल के ये नारा लगाएँ…
ईमानदारी…
मुर्दाबाद…मुर्दाबाद…

शराफत….
नहीं चलेगी…नहीं चलेगी…
रिश्वतखोरी…
जिंदाबाद…जिंदाबाद
बेईमान!…
ज़िन्दाबाद…ज़िन्दाबाद…


“जय बोलो बेईमान की”…

“जय हिन्द”

***राजीव तनेजा***


Rajiv Taneja
(Delhi,India)
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+919810821361
+919213766753

+919136159706

"छोड़ो ना!...कौन पूछता है?"

"छोड़ो ना!...कौन पूछता है?"


***राजीव तनेजा***


"एक...दो...तीन....बारह...पंद्रह...सोलह...


"कितनी देर से आवाज़े लगा लगा के थक गई हूँ लेकिन जनाब हैँ कि अपनी ही धुन में मग्न पता नहीं क्या गिनती गिने चले जा रहे हैँ"...

"कहीं मुँशी से हिसाब लेने में तो गलती नहीं लग गयी?"...


"नहीं"..


"फिर ये उँगलियों के पोरों पर क्या गिना जा रहा है?"...


"क्क..कुछ महीं?"...


"हुँह!..सब बेफाल्तू के काम तुम्हें ही आते हैँ"....

"कुछ और नहीं सूझा तो लगे गिनती गिनने"....


"अब बीवी को कैसे बताता कि मैँ अपनी एक्स माशूकाओं को गिनने में बिज़ी था"...

"सो!...चुपचाप उसकी सुनने के अलावा और कोई चारा भी कहाँ था मेरे पास?"..


"अरे!..गिनती के बजाय अगर ढंग से पहाड़े रट लो तो कम से कम चुन्नू की ट्यूशन के पैसे तो बचें लेकिन...

जनाब को इन मुय्यी बेफाल्तू की कहानियों को लिखने से फुरसत मिले तब ना"...

"क्लास टीचर ने तो साफ कह दिया है कि इस बार अगर फाईनल टर्म में नम्बर अच्छे नहीं आए तो अगली क्लास में बच्चे को चढाना मुश्किल हो जाएगा"..


"पता भी है कि वो शारदा की बच्ची अपनी चम्पा को बरगला के वापिस झारखंड ले गयी है"...


"कौन शारदा?"...


"अरे वही!..प्लेसमैंट एजेंसी वाली कलमुँही...और कौन"...

"अब ये मत पूछ बैठना कि कौन चम्पा?"...


"हाँ!...कौन चम्पा?"मैँ कुछ सोचता हुआ बोला...


"अरे!...अपनी कामवाली बाई चम्पा को भी नहीं जानते?"...

"पता नहीं किन ख्यालों में खोए रहते हो कि ना दीन की खबर ना ही दुनिया का कोई फिक्र"..


"ओह!...क्या हुआ उसको?"...


"रोज़ तो फोन आ रहा था शारदा की बच्ची का कि...साल पूरा हो गया है"...

"नया एग्रीमैंट बनेगा और इस बार चम्पा को गाँव ले के जाऊँगी"...


"अरे यार!...तसल्ली करवानी होती है इन्हें इनके माँ-बाप को कि देख लो...ठीकठाक भली चंगी है"...

"तभी तो इनकी कमाई होती है और नई मछलियाँ फँसती हैँ इनके जाल में"..


"तो एक महीने बाद नहीं करवा सकती थी तसल्ली?"...

"लाख समझाया कि अगले महीने माँ जी की आँख का आप्रेशन होना है"...

"कम से कम तब तक के लिए तो रहने दे इसे लेकिन पट्ठी ऐसी अड़ियल निकली कि लाख मनाने पर भी टस से मस ना हुई"...

"ले जा के ही मानी"...


"तो क्या डाक्टर ने कहा था कि चम्पा की डाईरैक्ट फोन पे बात करवा दो शारदा से?"....


"और क्या करती?"...

"बार-बार फोन कर के मेरा सिर जो खाए जा रही थी कि बात करवा दो...बात करवा दो"...

"पता नहीं अब कैसे मैनेज होगा सब?"...


"क्यों?...क्या दिक्कत है?"...


"दिक्कत?"...

"एक हो तो बताऊँ...एक-एक दिन में दस-दस तो रिश्तेदार आते हैँ तुम्हारे यहाँ"..


"तो?"...


"कभी इसके लिए चाय बनाओ तो कभी उसके लिए शरबत घोलो"...

"इनसे किसी तरह निबटूँ तो पिताजी भी बिना सोचे समझे गरमागरम पकोड़ों की फरमाईश कर डालते हैँ"...


"अरे यार!..बचपन से शौक है उन्हें पकोड़ों का"...


"तो मैँ कहाँ मना करती हूँ कि शौक ना पूरे करें?"...

"कितनी बार कह चुकी हूँ कि 'माईक्रोवेव' ले दो...'माईक्रोवेव' ले दो लेकिन...

ना आप पर और ना ही पिताजी पर कोई असर होता है मेरी बातों का"...


"क्या करना है माईक्रोवेव का?"...


"पता भी है कि एक मिनट में ही सब चीज़ें गर्म हो जाती हैँ उसमें"...


"तो?"...


"अपना...एक ही बार में किलो...दो किलो पकोड़े तल के धर दिए और बाद में आराम से गरम किए और परोस दिए"....


"सिर्फ पकोड़ों भर के लिए ही माईक्रोवेव चाहिए तुम्हें?"...


"नहीं!...अगर मेरी चलने दोगे तो एक बार में ही चाय की पूरी बाल्टी उबाल के रख दूँगी कि....लो!..आराम से सुड़को"...

"सब स्साले!...मुफ्तखोर...ताश पीटने को यहीं जगह मिलती है"..


"तो?"...


"इतना भी नहीं होता किसी से कि कोई मेरी थोड़ी बहुत हैल्प ही कर दे"..

"सारा काम मुझ अकेली को ही करना पड़ता है"...


"क्यों?...कल जो पिताजी आम काटने में तुम्हारी हैल्प कर रहे थे...वो क्या था?"...


"हाँ!..वो काट रहे थे और तुम बेशर्मों की तरह ढीठ बन के दूसरी तरफ मुँह कर 'लाफ्टर चैलैंज' का आनन्द लेते हुए दीददे फाड़ रहे थे"...


"तो क्या?..मैँ भी उनकी तरह अपने हाथ लिबलिबे कर लेता?"...

"ये वेल्ला शौक नहीं पाला है मैँने कि कोई काम-धाम ना हुआ तो बैठ गए पलाथी मार के जनानियों की तरह मटर छीलने"...


"इसमें कौन सी बुरी बात है?"...


"कह दिया ना!...अपने बस का रोग नहीं है ये"...


"हुँह!...बस का रोग नहीं है"...

"मेरी शर्म नहीं है तो ना सही लेकिन पिताजी की ही थोड़ी मदद कर देते तो घिस नहीं जाना था तुमने"...

"मैँ तो तंग आ गई हूँ तुम से और तुम्हारे रिश्तेदारों से"...


"तुम तो यार!..ऐसे ही छोटी सी बात का बतंगड़ बनाने पे तुली हो"...


"छोटी सी बात?"...

"एक दिन चौके में गुज़ार के दिखा दो तो मानूँ"...

"पसीने से लथपथ बुरा हाल ना हो जाए तो कहना"...

"एक बात बताओ"...


"पूछो"...


"वैसे ऐसी बेहूदी राय तुम्हें किस उल्लू के चरखे ने दी थी?"..


"तुमसे शादी करने की?"...


"नहीं"...


"फिर?"...


"यही शमशान घाट के नज़दीक प्लाट खरीद अपना घर बनाने की"...


"तुम भी तो बड़ी राज़ी खुशी तैयार हो गयी थी कि चलो शमशान घाट के बाजू में घर होने से अनचाहे मेहमानों से छुटकारा तो मिलेगा"...


"वोही तो!...लेकिन यहाँ तो जिसे देखो मुँह उठाता है और सीधा हमारे घर चला आता है"...

"घर...घर ना हुआ ...सराय हो गई"...

"इस मुय्ये शमशान से तो अच्छा था कि तुम किसी गुरूद्वारे या मन्दिर के आसपास घर बनाते"...


"उससे क्या होता?"...


"सुबह शाम अपने इष्ट को मत्था टेक घंटियों की खनकार के बीच माला जपती और...

आए-गयों को प्रसाद में गुरू के लंगर छका खुश कर देती"....


"कम से कम रोटियाँ का ये बड़ा ढेर बनाने से तो तुम्हें मुक्ति मिल जाती"मैँ हाथ फैला रोटियों के ढेर का साईज़ बताते हुए बोला...


"और नहीं तो क्या?"...

"तुम तो अपना मज़े से काम पे चले जाते हो...पीछे सारी मुसीबतें मेरे लिए छोड़ जाते हो"...


"तो क्या काम पे भी ना जाऊँ?"...


"ये मैँने कब कहा?"...


"मेरे सामने कोई मेहमान आए तो मैँ कुछ ना कुछ कर के सिचुएशन को हैंडल भी कर लूँ लेकिन...

अब अगर कोई मेरी पीठ पीछे आ धमके तो इसमें मैँ क्या कर सकता हूँ?"...


"कर क्यों नहीं सकते?...साफ-साफ मना तो कर सकते हो अपने रिश्तेदारों को कि हमारे यहाँ ना आया करें"...


"क्या बच्चों जैसी बातें करती हो?"...

"ऐसे भी भला किसी को मना किया जाता है?"...

"ये तो अपने आप समझना चाहिए उन लोगों को"...


"साफ क्यों नहीं कहते कि तुम में हिम्मत नहीं है"...

"अगर तुम्हारे बस का नहीं है तो मैँ बात करती हूँ"...

"कुछ तो शर्म होनी चाहिए कि नहीं?"...

"ना दिन देखते हैँ और ना ही रात"...

"बाप का राज समझ के जब मन करता है...तब आ धमकते हैँ"...

"अभी परसों की ही लो...तुम्हारे दूर के चाचा आए तो थे अपने मोहल्ले के धोबी के दामाद की मौत पे लेकिन..

अपनी लाडली बहू को छोड़ गए मेरे छाती पे मूंग दलने"..


"अरे!..तबियत ठीक नहीं थी उसकी...अपने साथ ले जा के क्या करते?"..


"हुँह!...तबियत ठीक नहीं थी"... .

"अगर तबियत ठीक नहीं थी तो डाक्टर ने नहीं कहा था कि यूँ बन-ठन के किसी के घर जा के डेरा जमाओ"..

"सब ड्रामा है...निरा ड्रामा"...

"देखा नहीं था कि जब आई थी तो कैसे चुप-चुप......हाँ-हूँ के अलावा कोई और बोल-बचन ही नहीं फूट रहा था ज़बान से"...

"लेकिन ससुर के जाते ही पट्ठी चौड़ी हो के ऐसे पसर गई सोफे पे कि बस पूछो मत"...

"उसके बाद तो ऐसी शुरू हुई कि बिना रुके लगातार बोलती चली गई...चबड़...चबड़"...

"तब तक चुप नहीं हुई जब तक सामने ला के कचौड़ी और समोसे नहीं धर दिए"...

"बड़ी फन्ने खाँ समझती है अपने आपको"..


"आखिर कह क्या रही थी?"...


"ये पूछो कि क्या नहीं कह रही थी"..

"कभी अपने सास-ससुर की चुगली...तो कभी ननद जेठानी को लेकर हाय तौबा"...

"उनसे निबटी तो अपनी तबियत का रोना ले के बैठ गयी"..


"हाय!..मेरा तो 'बी पी'(ब्लड प्रैशर) लो हो गया है"...

"हाय!...मेरे घुटनों में दर्द रहने लगा है"...

"उफ!..मेरे सलोने चेहरे पे कहाँ से आ गया ये मुय्या पिम्पल?"...

"देखो!...मेरे चेहरे पे कोई रिंकल तो नहीं दिखाई दे रहे ना?"...


"अरे!...दिखण...भाँवे ना दिखण...मैणूँ अम्ब लैँणा है?(दिखें ना दिखें...मुझे आम लेना है?"

"कल की बुड्ढी होती आज बुड्ढी हो जाए...मेरी बला से"...

"मुझे क्या फर्क पड़ता है?"...


"फिर?"...

"उसके बाद जो मैडम जी ने जो अपनी तारीफें करनी शुरू की कि बस करती ही चली गई"...

"कभी अपने सुन्दर सलोने चेहरे की...तो कभी अपनी कमसिन फिगर की तारीफ"..


"तुम चुपचाप सुनती रही?"..


"मैँने भी उसे चने के झाड़ पे चढाने में कोई कसर नहीं छोड़ी"..


"कैसे?"...


"मैँने कह दिया कि तुम्हारी शक्ल तो बिलकुल कैटरीना कैफ से मिलती है"...


"अरे वाह!...क्या सचमुच?"...


"टट्टू..."...


"तो फिर?"..


"अरे!..'कैटरीना' वो...जो अमेरिका में तूफान आया था"...


"ओह!...और 'कैफ'?"मैँ हँसता हुआ बोला...


"अपना शुद्ध खालिस हिन्दुस्तानी क्रिकेटर 'मोहम्मद कैफ' ...और कौन"...



"हा...हा...हा"...



"इस से बड़ी ड्रामेबाज औरत तो मैँने अपनी ज़िन्दगी में आज तक नहीं देखी"...


"सीधी बात है!...काम ना करना पड़े किसी दूसरे के घर...इसलिए नौटंकी पे उतर आते हैँ लोग"..


"अरे यार!...क्यों बेकार में नाहक परेशान होती हो?"....

"शारदा कह तो गई है कि बीस दिन के अन्दर-अन्दर वापिस लौटा लाऊँगी"...


"क्यों झूठे सपने दिखा के मेरा दिल बहलाते हो?"..

"इतिहास गवाह है कि हमारे घर का गया नौकर कभी वापिस लौट के नहीं आया"...

"पूरे सवा ग्यारह रुपए की बूँदी चढाऊँगी शनिवार वाले दिन...बजरंगबली के पुराने मन्दिर में जो ये वापिस आ जाएगी"...


"फॉर यूअर काईंड इंफार्मेशन ...शनिवार वाले दिन शनिदेव को प्रसन्न किया जाता है ...ना कि बजरंगबली को"मैँ टोकता हुआ बोला...


"सत वचन!..लेकिन...जो एक बार बोल दिया...सो...बोल दिया"...

"अगली बार जब नौकरानी भागेगी तब मंगलवार वाले दिन शनिदेव को प्रसाद चढा के खुश कर देंगे...सिम्पल"...


"सही है!...अभी आयी नहीं है और तुम फिर से भगाने के बारे में पहले सोचने लगी"...

"गुड!...वैरी गुड"...

"इसे कहते हैँ एडवांस्ड प्लैनिंग...लगी रहो"...

"मुझे तो डाउट हो रहा है..कि कोई झारखंड-वारखंड नहीं ले के गई होगी उसे"...

"ज़्यादा पैसों के लालच में यहीं दिल्ली में ही किसी और कोठी में लगवा दिया होगा काम पे"...


"यही!...हाँ ..यही हुआ होगा....बिलकुल"...

"कोई भरोसा नहीं इनका"...


"छोड़ो उसे!...अच्छा हुआ जो अपने आप चली गई "...

"वैसे भी अपने काबू से बाहर निकलती जा रही थी आजकल"...


"हाँ!...ज़बान भी कुछ ज़्यादा ही टर्र-टर्र करने लगी थी उसकी"...

"एक-एक काम के लिए कई-कई बार आवाज़ लगानी पड़ती थी उसे"...


"जब आयी थी तो इतनी भोली कि बिजली का स्विच तक ऑन करना नहीं आता था उसे और अब...

टीवी के रिमोर्ट के साथ छेड़खानी करना तो आम बात हो गई थी उसके लिए"...

"याद है मुझे कि कैसे तुमने दिन रात एक कर के रोज़मर्रा के सारे काम सिखाए थे उसे"....


"और अब जब अच्छी खासी ट्रेंड हो गयी तो ये शारदा की बच्ची ले उड़ी उसे"...


"यही काम है इन प्लेसमैंट ऐजैंसियों का...अनट्रेंड को हम जैसों के यहाँ भेज के ट्रेंड करवाती हैँ....

"फिर दूसरी जगह भेज के मोटे पैसे कमाती हैँ"...

"मेरा कहा मानो तो बीति ताहिं बिसार के आगे की सोचो"...


"मतलब?"...


"भूल जाओ उसे और देख भाल के किसी अच्छी वाली को रख लो"..


"हाँ!..रख लूँ...जैसे धड़ाधड़ टपक रही हैँ ना आसमान से स्नो फॉल के माफिक"..

"पता भी है कि कितनी शॉर्टेज चल रही है आजकल"...

"जब से ये मुय्या 'आई.पी.एल'शुरू हुआ है ...काम वाली बाईयों का तो जैसे अकाल पड़ गया है"...


"वो कैसे?"..


"कुछ एक तो बढती मँहगाई के चलते दिल्ली छोड़ होलम्बी कलाँ और राठधना जा के बस गई हैँ"...

"और कुछ ने गर्मियों के इस सीज़न में अपने दाम दुगने से तिगुने तक बढा दिए हैँ"...

"और ऊपर से नखरे देखो इन साहबज़ादियों के कि सुबह के बर्तन मंजवाने के लिए दोपहर दो-दो बजे तक इनका रस्ता तकना पड़ता है"...

"इनके आने की आस में ना काम करते बनता है और ना ही खाली बैठे रहा जाता है "...

"ऊपर से बिना बताए कब छुट्टी मार जाएँ...कुछ पता नहीं"...


"लेकिन इस सब से 'आई.पी.एल'का क्या कनैक्शन?"...


"अरे!...ऊपर वाली दोनों तरह की कैटेगरी से बचने वाली छम्मक छल्लो टाईप बाईयों ने अपने ऊपरी खर्चे निकालने के चक्कर में ...

पार्ट टाईम में 'चीयर लीडर'का धन्धा चालू कर दिया है"...


"चीयर लीडर माने?"...


"अरे वही!...जो 'आई.पी.एल' के ट्वैंटी-ट्वैंटी मैचों में छोटे-छोटे कपड़ों में हर चौके या छक्के पर उछल-उछल कर फुदक रही होती हैँ"...


"तो क्या ये भी छोटे-छोटे कपड़ों मे?...और इनको इतने बड़े मैचों में परफार्म करने का चाँस कैसे मिल गया?"..


"अरे!...वहाँ नहीं"...


"तो फिर कहाँ?"...


"इंटर मोहल्ला ट्वैंटी-ट्वैंटी क्रिकेट मैचों में साड़ी पहन के ही ठुमके लगा रही हैँ"...

"बिलकुल आई.पी.एल की तर्ज पर ही मैच खेले जा रहे हैँ"...


"लेकिन 'आई.पी.एल' में तो पैसे का बोलबाला है...बड़े-बड़े सैलीब्रिटीज़ ने खरीदा है टीमों को"...


"तो क्या हुआ?"...

"अपने यहाँ की टीमों को भी कोई ना कोई स्पाँसर कर रहा है"...


"जैसे..?"...


"जैसे बगल वाले मोहल्ले की टीम को घासी राम हलवाई स्पाँसर कर रहा है और...अपने मोहल्ले की टीम को तो छुन्नामल ज्वैलर स्पाँसर कर रहा है"...

"घासी राम तो अपनी टीम को चाय समोसे फ्री में खिला-पिला रहा है"...


"तो क्या छुन्ना मल भी अपनी ज्वैलरी बाँट रहा है?"...


"उसे क्या अपना दिवालिया निकालना है जो ऐसी गलती करेगा?"..

"पूरे इलाके का माना हुआ खुर्राट बिज़नस मैन है वो"...

"उसके बारे में तो मशहूर है कि अच्छी तरह से ठोक बजा के जाँचने परखने के बाद ही वो अपने खीस्से में से नोट ढीले करता है"


"तो?"...


"क्रिकेट ग्राऊँड में अपने शोरूम के बैनर लगाने और मोहल्ले की दिवारों पर पोस्टर लगाने की एवज में....

अपनी क्वालिस दे दी है लड़कों को घूमने फिरने के लिए विद शर्त ऑफ पच्चीस से तीस किलोमीटर पर डे"...


"लेकिन कल ही तो मैँने अपने मोहल्ले के लौंडे लपाड़ों को टूटी-फूटी साईकिलों पे इधर-उधर हाँडते(घूमते) देखा था"...


"वोही तो!...घाटा तो उसे बिलकुल बरदाश्त नहीं है"...


"किसे?"...


"अरे!...अपने छुन्नामल को...और किसे?"...


"जहाँ अपनी टीम ने पहले मैच में ठीक से परफार्म नहीं किया...उसने फटाक से अल्टीमेटम दे दिया"...


"फिर?"...


"दूसरे मैच में भी कुछ खास नहीं कर पाने पर उसने अपने यहाँ के कैप्टन को अच्छी खासी झाड़ पिला और अपनी क्वालिस वापिस मँगवा ली"...


"अच्छा!..हमारे कप्तान का थोबड़ा सूजा-सूजा सा लग रहा था"...

"तो क्या बस दो ही टीमें भाग ले रही हैँ तुम्हारे उइस देसी 'आई.पी.एल' में?"...


"नहीं!...तीन टीमें भाग ले रही हैँ"...


"तीसरी टीम को कौन स्पाँसर कर रहा है?"...


"तीसरे टीम को जब कोई और नहीं मिला तो मजबूरी में नन्दू धोबी से ही अपने को स्पाँसर करवा लिया"...


"वो बेचारा तो अपना गुज़ारा ही बड़ी मुश्किल से करता होगा...वो क्या टट्टू स्पाँसर करेगा?"..


"अरे!...तुम्हें नहीं पता...पूरे तीन मोहल्लों में वही तो अकेला धोबी है जिसका काम चलता है बाकि सब तो वेल्ले बैठे रहते हैँ"...


"ऐसा क्यों?"...


"ज़बान का बड़ा मीठा है...हमेशा...जी.जी करके बात करता है...

"बाकि किसी को तो इतनी तमीज़ भी नहीं है कि औरतों से कैसे बात की जाती है...हमेशा तूँ तड़ाक से बात करते हैँ"..

"और आजकल वैसे भी एकता कपूर के सीरियलों की वजह से टाईम ही किस औरत के पास है कि वो खुद कपड़े प्रैस करती फिरे?"...

"सो!..सभी के घर से कपड़ॉं का गट्ठर बनता है और जा पहुँचता है सीधा धोबी के धोबी घाट में"...

"खूब मोटी कमाई है उसकी"...

"सुना है!...अब तो उसने नई आईटैन भी खरीद ली है" ...


"नकद?"....


"नहीं!...किश्तो पे"...

"आजकल उसी से आता-जाता है"....


"अरे वाह!...क्या ठाठ हैँ पट्ठे के"...


"और नहीं तो क्या".....

"उस दिन की याद है ना जब मैँ आपसे ज़िद कर रही थी अक्षरधाम मन्दिर घुमाने ले चलने के लिए और आपने गुस्से में साफ इनकार कर दिया था?"...


"तो?..."...


"पता नहीं इस मुय्ये धोबी के बच्चे को वो बात कैसे पता चल गई और बड़े मज़े से मुझसे कहने लगा कि...

"भाभी जी!...अगर राजीव जी के पास टाईम नहीं है तो मैँ ही आपको अक्षरधाम मन्दिर ही घुमा लाता हूँ"..

"हुँह!..बड़ा आया मुझे घुमाने वाला...शक्ल देखी है कभी आईने में?"


"तुमने ज़रूर किसी से जिक्र किया होगा इस बात का तभी उसे पता चला होगा"...


"मैँने भला किससे और क्यों जिक्र करना है?"...

"अपनी बाई ही पास खड़ी-खड़ी सब सुन रही थी..उसी ने कहा होगा"..


"इनका तो काम ही यही होता है...इधर की उधर लगाओ और...उधर की इधर"..


"जब से ये मुय्या 'आई.पी.एल' शुरू हुआ है..और दिमाग चढा गया है इन माईयों का"...

"मेरी राय में तो बैन लगा देना चाहिए इन चीयर लीडरों पर"...

"सारा का सारा माहौल खराब कर के रख छोड़ा है"...


"कौन सी वालियों ने?"...

"टी.वी वालियों ने या फिर ये अपनी देसी बालाओं ने?"...


"दोनों की ही बात कर रही हूँ"...

"उन्होंने क्रिकेट ग्राऊँड में माहौल बिगाड़ के रखा है तो इन्होंने यहाँ...गलियों में "...


"लोकल वालियों से तो तुम्हारी खुँदक समझ आती है लेकिन इन इन 'टी.वी'वालियों से तुम्हें क्या परेशानी है?"....

"अपना अच्छा भला खिलाड़ियों और दर्शकों...दोनों को जोश दिला रही हैँ"...


"वोही तो..."...

"वो वहाँ क्रिकेट ग्राऊँड में मिनी स्कर्टों में फुदक रही होती हैँ और यहाँ हम औरतों के दिल ओ दिमाग में हमेशा धुक्क-धुक्क होती रहती है"...


"हाथ में आए पँछी के उड़ चले जाने का खतरा?"...


"और नहीं तो क्या?"...

"क्या जादू कर जाएँ?...कुछ पता नहीं इन गोरी चिट्टी फिरंगी मेमों का"...

"और वैसे भी आजकल मन बदलते देर कहाँ लगती है?"...


"अरे!..सबके बस की कहाँ है?"...

"इतनी सस्ती भी नहीं है वे कि कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा फटाक से अपना बटुआ खोले और झटाक से ले उड़े इन्हें"...

"हाँ!...'आई.पी.एल'खिलाड़ियों की और बात है...बेइंतिहा पैसा मिला है उन्हें"...

"आराम से अफोर्ड कर लेंगे लेकिन...यहाँ अपने मोहल्ला छाप खिलंदड़ों का क्या?"...

"उनके पास तो अपने पल्ले से मूँगफली खाने के तक के पैसे नहीं मिलने के...वो भला क्या खाक खर्चा करेंगे?"...

"और सबसे बड़ी बात इन दोनों टाईप की आईटमों का आपस में क्या मुकाबला?"...

"कहाँ वो गोरी चिट्टी...एकदम मॉड...छोटे-छोटे कपड़ों में नज़र आने वाली सैक्सी बालाएँ और....

कहाँ ये एकदम सीधी-साधी सूट या फिर साड़ी में लिपटी निपट गाँव की गँवारने?"

"ना!...कोई मेल नहीं है इनका"...


"लेकिन जब गधी पे दिला आता है ना...तो सोनपरी की चमक भी फीकी दिखाई देने लगती है"...

"याद नहीं?...अभी पिछले हफ्ते ही तो सामने वाले शर्मा जी की मैडम अपने ड्राईवर के साथ उड़नछू हो गई थी और..

वो गुप्ता जी भी तो अपनी बाई के साथ खूब हँस-हँस के बाते कर रहे होते हैँ आजकल"...


"अच्छा!...तभी रोज़ नए-नए सूट पहने नज़र आती है"...


"तुमने कब से ताड़ना शुरू कर दिया उसे?"...


"वो तो!...ऐसे ही एक दिन वो सब्ज़ी ले रही थी...तभी अचानक नज़र पड़ गई"...


"सब समझती हूँ मैँ...अचनाक नज़र पड़ गयी"...

"जब मेरी नज़र किसी पे पड़ेगी ना बच्चू!...तब पता चलेगा"..

"कुछ तो अपनी उम्र का ख्याल करो...अगले महीने पूरे चालीस के हो जाओगे"...


"अब उसे कैसे बताता कि 'ऐट दा एज ऑफ फौर्टी...मैन बिकम्ज़ नॉटी?'"...


"एक बात और ...तुम्हारे इन सो कॉल्ड मॉड कपड़ों को पहन नंगपना करने मात्र से ही कोई सैक्सी नहीं हो जाता"...


"तो फिर कैसे हुआ जाता है...सैक्सी?"...

"ज़रा बताओ तो...एक्सप्लेन इट क्लीयरली"...


"देखो!...चैलैंज मत करो हमें"...

"हम हिन्दुस्तानी औरतें साड़ी और सूट में भी अपनी कातिल अदाएँ दिखा गज़ब ढा सकती हैँ"...


"सच ही तो कह रही है संजू!...तभी आजकल वो गुप्ता जी की कामवाली बाई...हर समय आँखों में छायी रहती है"मैँ मन ही मन सोचने लगा...

"तो क्या अपनी देसी चीयर लीडरस भी?"मैँ बात बदलते हुए बोला...


"अब किसी के चेहरे पे थोड़ी लिखा होता है"...

"पैसा देख मन बदलते देर कहाँ लगती है?"...


"बिलकुल सही बात!...पैसा बड़ा बलवान है"....

"अपना दर्विड़ भी तो अकृत पैसा मिलता देख ट्वैंटी-ट्वैंटी का हिमायती ना होने के बावजूद....

'माल्या जी' की डुगडुगी पे कलाबाजियाँ खाने को तैयार हो गया"


"जब ऐसे बड़े बड़े लोग पैसा देख फिसलने लगे तो इन बेचारी कामवाली बाईयों की क्या औकात?"...

"इन्होंने तो सीधे-सीधे छलांग ही लगा देनी है पैसे को जोहड़(तालाब) में"...


"हम्म!...ये बात तो है"...

"और ऊपर से दोनों जगह मैच देखने वाले तो हाड़-माँस के आम इनसान ही हैँ ना?...

"गल्ती हो भी सकती है"...

"वो वहाँ मैदान में जोश-जोश में उतावले होते हुए मतवाले हो उठेंगे और बाद में घर आ के नाहक अपनी बीवियों को परेशान करेंगे"...


"इसलिए मैँ कहती हूँ कि सभी पर ना सही लेकिन इन देसी चीयर लीडरस पर तो हमेशा के लिए बैन लगना चाहिए"..

"तभी अक्ल ठिकाने आएगी इनकी"...


"मेरा बस चले तो अभी के अभी कच्चा चबा जाऊँ इस शारदा की बच्ची को"...

"उल्लू की पट्ठी !...औकात ना होते हुए भी ऐसे बन ठन के अकड़ के चलती मानो किसी स्टेट की महरानी हो"...

"पता जो है उसे कि उसके बगैर गुज़ारा नहीं है किसी का"..

"एक मन तो करता है कि अभी के अभी जा के सीधा पुलिस में कम्प्लेंट कर दूँ उसकी"...


"अरे!...कुछ नहीं होगा वहाँ भी....उल्टे पुलिस ही चढ बैठेगी हम पर"...


"किस जुर्म में?"...


"अरे!...मालुम तो है तुम्हें...नाबालिग थी अपनी बाई और ऊपर से हमने उसकी पुलिस वैरीफिकेशन भी नहीं करवाई हुई थी"...


"हमने क्या?...पूरे मोहल्ले में सिर्फ सॉंगवान जी का ही घर है जिन्होंने सारी की सारी फारमैलिटीज़ पूरी की हैँ"...


"सही बात!...कभी मूड बना के थाने जाओ भी तो कहते हैँ...पहले लेटेस्ट फोटो ले के आओ"...


"पागल के बच्चे!...कभी पूछते हैँ....कि कौन कौन सी भाषाएँ बोलती है?"...

"तुमने इससे उपनिष्द पढवाने हैँ?...या फिर कोई गूढ अनुवाद कराना है?"...


"बेतुके सवाल ऐसे समझदारी से करेंगे मानों इन सा इंटलैक्चुअल बन्दा पूरे जहाँ में कोई हो ही नहीं"...


"उम्र कितनी है?"...

"पढी-लिखी है के नहीं?"...

"अगर है!...तो कहाँ तक पढी है?"...


"अरे!...तुमने क्या उस से डॉक्ट्रेट करवानी है जो ये सब सवालात कर रहे हो?"...

"स्साले!...सनकी कहीं के...कभी-कभी तो दोनों हाथों के फिँगर प्रिंट ला के देने तक का फरमान जारी कर देते हैँ"...

"अब इनके तुगलकी आदेश के चक्कर में अपने हाथ नीले करते फिरो"...


"हमें कोई और काम है कि नहीं?"...


"उनके कहे अनुसार सब कर भी दो तो कभी फलानी कमी निकाल देते हैँ तो कभी ढीमकी"...


"पहले तो कभी अपने यहाँ की पुलिस इतनी मुस्तैद नहीं दिखी थी...जैसी आजकल दिख रही है"...

"अच्छी भली को पता नहीं अचानक क्या बिमारी लग गयी?"...


"तुम्हारा कहना सही है!...आमतौर पर तो अपने यहाँ की पुलिस ढुलमुल रवैया ही अपनाती है लेकिन...

जब कभी कहीं कोई तगड़ी वारदात होती है...तब इन पर ऊपर से डण्डा चढता है और तभी ये पूरी फुल्ल फुल्ल मुस्तैदी दिखाते हैँ"...


"वैरीफिकेशन के काम में देरी लगाने की शिकायत करो तो जवाब मिलता है कि 'कानून' से काम करने में तो वक्त लगता ही है"...


"लेकिन कोई ये बताएगा कि ये सॉंगवान का बच्चा कैसे आधे घंटे में ही सारा काम निबटा आया था?"...


"पट्ठे ने!...ज़रूर चढावा चढाया होगा"...


"यही सब तो प्लेसमैंट एजेंसी वाले भी करते हैँ"...

"तभी तो पुलिस भी इनकी छोटी-मोटी गल्तियों को नज़र अन्दाज़ करती है और....

इसी कारण बिना किसी डर...बिना किसी खौफ के इनका धन्धा दिन दूनी रात चौगुनी तेज़ी से फलफूल रहा है"...


"अब तो कम समय में ज़्यादा कमाई के चक्कर में बहुत से बेरोज़गार मर्द-औरत इस धन्धे धड़ाधड़ उतरते जा रहे हैँ"...


"हम्म!...इसीलिए आजकल इन तथाकथित प्लेसमैंट ऐजेंसियों की बाड़ सी आ गई है"...


"घरेलू नौकरानियों की डिमांड ही इतनी ज़्यादा है कि पूरा ज़ोर लगाने पर भी पूर्ति नहीं हो पा रही है"...


"तभी तो आजकल इन प्लेसमैंट वालों के भाव बढे हुए हैँ"...


"कहने को तो ये कहते हैँ कि हम समाजसेवा का काम कर रहे हैँ"...

"गरीब...मज़लूमों को रोज़गार उपलब्ध करवा रहे हैँ लेकिन इनसा कमीना मैँने आज तक नहीं देखा"....


"वो कैसे?"...


"अरे!...इस प्लेसमैंट की आड़ में ये जो जो अनैतिक काम होता है ...उनके बारे में जो कोई भी सुनेगा तो हैरान रह जाएगा"...


"अनैतिक काम?"...


"और नहीं तो क्या?"...

"देह-व्यापार से लेकर स्मगलिंग तक कोई भी धन्धा इनसे अछूता नहीं है"...


"ओह!...


"जिन बच्चों की अभी पढने-लिखने की उम्र है उनसे ज़बर्दस्ती इधर का माल उधर कराया जाता है"...


"कैसा माल?"...


"यही!...स्मैक...ब्राऊन शुगर...पोस्त से लेकर छोटे-मोटे हथियार तक ...कुछ भी हो सकता है"...


"ओह!...स्मैक...ब्राऊन शुगर से लेकर हथियार तक...बाप रे"...


"अरे!...ये प्लेसमैंट का धन्धा तो अपनी घिनौनी करतूतों को छुपाने के लिए करते हैँ"...

"किसी से शादी करने या करवा देने का लालच देकर....

तो किसी को मोटी तनख्वाह पे आरामदायक नौकरी दिलवाने का झुनझुना थमा कर ये अपने प्यादे तैयार करते हैँ"...

"लाया गया तो उन बेचारों को किसी और काम के लिए होता है और झोंक दिया जाता है किसी और काम की भट्ठी में"...


"क्या सच?"...


"हो भी सकता है"...


"मतलब?"...अभी तो तुम ये सब कह रहे थे...वो सब क्या था?"...


"वो तो यार!...मैँ ऐसे ही...मज़ाक...


"तो इसका मतलब...इतनी देर से झूठ पे झूठ बके चले जा रहे थे?"...


"और क्या करता?"...

"तुम सुबह से कामवाली बाई को लेकर परेशान हुए बैठी थी"...


"तो?"...


"तुम्हारा ध्यान बटाने के लिए"...


"हुँह"..


"लेकिन मेरी सभी बातें झूठ नहीं हैँ और...बाकी भी सच हो सकती हैँ...कसम से"....


"वो कैसे?"...


"कलयुग है ये और इसमें कुछ भी हो सकता है क्योंकि....ज़माना बड़ा खराब है"...


"हाँ!...ये तो है"...

"सच में!..ज़माना बड़ा खराब है"...



"ट्रिंग..ट्रिग"...

"देखना तो!...किसका फोन है?"...


"हैलो.....

"कौन?"...

"अरे!...चम्पा....कहाँ है बेटा तू?"....

"दिल्ली में?"...

"लेकिन बेटा!...तू तो गाँव जाने की कह कर गई थी ना?"...

"अच्छा!...शारदा नहीं ले के गई"...

"अभी कहाँ है बेटा?"...

"क्या कहा?...पता नहीं"...

"बेटा!...रो मत...चुप हो जा"...

"यहीं आ जा हमारे पास"....

"पता मालुम है ना बेटा?"...

"अच्छी तरह तो याद करवाया था ना तुझे?"...

"हाँ!...ठीक है"...

"एक काम कर बेटा!...किसी रिक्शे या फिर ऑटो वाले को हमारे घर का पता बता दे"...

"ठीक है बेटा!...किराया हम यहीं दे देंगे"...

"तू चिंता ना कर"...

"हम तो तुझे पहले ही रोक रहे थे ना लेकिन...क्या करें?...वो शारदा नहीं मानी ना"...

"ठीक है!...ठीक है बेटा"....

"हैलो..हैलो...

"क्या हुआ?"...

"फोन क्यों काट दिया बेटा?"...


"क्या हुआ?"....

"चम्पा का फोन था"...


"अच्छा...क्या कह रही थी?"...


"यही दिल्ली में ही है"...

"किसी कोठी में काम कर रही है"....


"लेकिन वो तो गाँव जानी की कह कर गई थी ना?"...


"मैँ ना कहती थी कि सब ड्रामा है...यहीं कहीं लगवा दिया होगा"....

"कह तो रही है...कि आ रही हूँ"...


"कहाँ से फोन किया था?"...


"किसी 'पी.सी.ओ'से कर रही थी"...

"कह तो रही थी कि अभी आधे घंटे में पहुँच जाऊगी"...

"हे ऊपरवाले!...तेरा लाख-लाख शुक्र है"...


"अब तो खुश?"...


"बहुत"...


"एक मिनट!...फोन तो देना"...


"कहाँ मिलाना है?....मैँ मिला देती हूँ"...


"पुलिस स्टेशन"...


"किसलिए?"...


"वैरीफिकेशन..."...


"छोड़ो ना!...कौन पूछता है?"...


***राजीव तनेजा***
 
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