डार्क हॉर्स- नीलोत्पल मृणाल- समीक्षा
मिसेज फनीबोन्स - ट्विंकल खन्ना
घुसपैठ-लघुकथा
भाई जान
"सुनो!...रात का वक्त है और पहली बार तुम पर विश्वास कर के तुम्हें अकेला भेज रहे हैं। हमें ग़लत साबित मत करना बेटा।"
"जी...अब्बू जान।"
"ध्यान से जाना और किसी से फ़ालतू बात मत करना और अगर कोई कुछ खाने या पीने के लिए भी दे तो बिलकुल मत लेना।"
"जी!..
"और हाँ!...वहाँ उस लफंगे तैय्यब से ज़रा दूर रहना। नीयत ठीक नहीं उसकी...जब भी देखो..तुम्हें घूरता रहता है।"
"जी!...अब्बू जान।" इन नसीहतों के खत्म होते ही ट्रेन ने धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ ली।
"सुनो!... क्या कह रहे थे तुम्हारे अब्बू जान?" धम्म से पास वाली सीट पर बेतकल्लुफी से पसरते हुए एक आकर्षक नौजवान हँसता हुआ बोला।
"परे हटो...तुमसे ही दूर रहने के लिए कह रहे थे।" कहते हुए उसने भी खिलखिला कर लड़के के गले में बाहें डाल दी और फिर उस खाली कूपे में दोनों आलिंगनबद्ध हो गए। रात के और गहराते ही दोनों को एक बिस्तर में जाते देर ना लगी।
सुबह स्टेशन के आते आते दोनों के चेहरों के रंग और भाव बदल चुके थे। एक तनाव सा लड़के के चेहरे पर जोंक की मानिंद चिपक सा गया था जबकि अपनी तरफ से लड़की खुद को नार्मल रखने का प्रयास करती हुई बार-बार अपने ढुलक आए आंसुओं को दुपट्टे के किनारे से पोंछ रही थी। स्टेशन से बाहर निकल कर युवक ने ऑटो किया और बुझे मन से उसे बाय कर अपने गंतव्य की ओर बढ़ गया। लड़की ने बिना कोई जवाब दिए कुछ देर इधर उधर देखा मानों किसी का उसे इंतज़ार हो लेकिन कुछ देर तक किसी को आता ना देख उसने भी रिक्शा किया और अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ गयी।
काफ़ी देर से संकोच में डूबे आँसूओं ने अब और लिहाज़ करने से इनकार कर दिया। हिचकियों और सिसकियों के बीच रिक्शा जब तय मंजिल पर रुका तो वहाँ हर तरफ मातम पसरा हुआ था और किसी के जनाज़े की तैयारी चल रही थी। मृत शरीर के आसपास काफी लोग इकट्ठा थे और ज़ोर ज़ोर से सबके रोने तथा विलाप करने की आवाज़ें आ रही थी।
रिक्शेवाले को पैसे दे लड़की से भी अब रुका न गया और वो भाग कर दहाड़ें मार रोती हुई अंदर गयी और मृत शरीर के पास विलाप कर रहे एक युवक को झंझोड़ कर ज़ोर-ज़ोर से रोती हुई बोली “हम सब तो अनाथ हो गए भाई जान। ये सब कैसे हो गया भाई जान?...बोलो ना तैय्यब भाई जान..ये सब कैसे हो गया?”
***राजीव तनेजा***
पाप
सोच
और नहीं तो क्या?…
“हद हो गयी यार ये तो बेईमानी की…मुझ…मुझ पर विश्वास नहीं है पट्ठों को….सब स्साले बेईमान….मुझको…मुझको भी अपने जैसा समझ रखा है…एक एक..एक एक पाई का हिसाब लिखा हुआ है मेरे पास…जब चाहो…जहाँ चाहो...लैजर…खाते सब चैक करवा लो….
“क्या हुआ तनेजा जी?…किस पर राशन पानी ले के गरिया रहे हैं?”…
“एक बात बताइए शर्मा जी”….
“जी..
“म्म्म…मैं क्या आपको चोर दिखता हूँ?”…
“क्या बात कर रहे हैं तनेजा जी आप भी?…आपकी ईमानदारी के किस्से तो पूरे डिपार्टमैंट में..ऊपर से नीचे तक..पूरे शोरोगुल के साथ जबरन मशहूर हैं”….
“वोही तो…. इसलिए तो डिपार्टमैंट में सब मेरा मान करते हैं…इज्ज़त करते हैं..सबसे ज्यादा मेरा ख्याल रखते हैं"…
“मुआफ कीजिए तनेजा जी..ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती…आप मेहनत भी तो सबसे ज्यादा करते हैं…हमेशा खुद आगे बढ़कर..एक से एक मुश्किल चैलेंज अपने हाथ में लेते हैं”..
“जी!..ये बात तो है"..
“मई-जून के सूखे नींबुओं में से भी प्याली भर रस..वो भी दिसंबर के महीने में..निचोड़ निकालना कोई आपसे सीखे..तनेजा जी"…
“हें…हें…हें…चने के झाड पे चढ़ाना तो कोई आपसे सीखे शर्मा जी"…
“अब क्या करूँ तनेजा जी?…मेरा तो स्वाभाव ही ऐसा है कि…मेरी सिंपल सी कही बात को भी हर कोई सीरियसली ले..हवा में उड़ना चालू कर देता है"…
“वोही तो”..
“लेकिन इन स्सालों को इस बात से भला क्या मतलब कि सामने वाला बंदा कितना सिंसियर है?..कितना ईमानदार है?….ये क्या कि सबको एक ही फीते से हर बार नाप दो"..
“जी!…
“पहले सामने वाले की पोजीशन…..उसकी हैसियत तो देखो….फिर सोच समझ के कोई इलजाम लगाना है तो लगाओ..
“जी!..
“सब के सब स्साले…टटपूंजिए..कबाड़ी टाईप के..सो काल्ड रईस लोग….5-6 इंची स्क्रीन का एंड्राइड फोन ले के सोचते हैं कि वो तो खुदा हो गए”..
“हम्म!…
“स्सालो..पहले अपने बाप के पास ‘आई फोन’ 6 प्लस तो देख लो”मैं हांफता हुआ अपना फोन हवा में लहरा कर चिल्लाया…
“हम्म!….
“दस…दस बीस हज़ार के लिए भी स्सालों को मुझ पर विश्वास नहीं है…कहते हैं कि..”आप तो ले गए थे”…स्साले..बेशर्म कहीं के"मैं दांत पीसते हुए बडबडा रहा था…
“ओह!…
“अरे!…भाई अगर ले गया था तो कहीं ना कहीं तो कुछ ना कुछ हिसाब में आना चाहिए था ना?”मेरा तेज़ स्वर मद्ध्यम होने को हुआ …..
“जी!…बिलकुल"…
“वोही तो….कई बार मैंने खुद ही डेल्ले फाड़ फाड़ के सारे खाते खुद कर लिए लेकिन एंट्री का कहीं नामों निशाँ तक नहीं"मेरे स्वर में आत्मविश्वास झलक रहा था…
“ओह!…
“अब अगर होती तो…कहीं ना कहीं दिखती तो?”…
“जी!…बिलकुल"..
“और नहीं तो क्या"…
“कहीं ऐसा तो नहीं तनेजा जी कि..आपने कच्चे पे चढ़ा लिया हो लेकिन पक्के पे चढाने से….(शर्मा जी के स्वर में शंका सी थी)
“क्या बात करते हैं शर्मा जी आप भी?…घर जाने के बाद मेरा सबसे पहला काम होता है चिकन टिक्के के साथ दो पटियाला पैग मारते हुए पूरे दिन की रिपोर्ट अपनी श्रीमती जी को देना”मैं तैश भरे स्वर में उत्तेजित होता हुआ बोला..
“ओह!..
“उसके बिना तो खाना तक हजम नहीं होता मुझे"…
“अरे!…वाह..फिर तो दाद देनी पड़ेगी तनेजा जी आपकी भी कि..इस तरह के कलयुग में भी आप जैसे पत्नी भक्त सक्रिय तौर पर जिंदा हैं..मौजूद हैं"शर्मा जी के स्वर में प्रशंसा का भाव था..
“अजी!..काहे के पत्नी भक्त?..खाना देगी तभी तो हजम होगा"मैं खिसियानी सी आवाज़ में खुद अपनी ही खिल्ली उड़ाता हुआ बोला..
“ओह!…फिर तो आपसे गलती होने का कोई मतलब ही नहीं"शर्मा जी संतुष्ट से दिख रहे थे….
“वोही तो….
“छोड़ो तनेजा जी…हो जाता है कई बार ऐसा भी"…
“क्या छोड़ो?…मेरी इज्ज़त दाव पे लगी है और आप कह रहे हैं कि छोड़ो..ऐसे कैसे छोड़ो?”मेरा उत्तेजित हुआ स्वर उफान पकड़ने को हुआ..
“इन्हीं स्सालों से किसी दिन अठारह के छत्तीस ना वसूल किए तो मेरा भी नाम….
“लेकिन तनेजा जी…क्या ऐसा करना जायज़ होगा?….आपकी ईमानदारी के किस्से तो….
“वोही तो…मन तो नहीं करता है किसी के साथ गलत करने के लिए लेकिन क्या करूँ?…कई बार लोग खुद ही इतना मजबूर कर देते हैं कि…
“छोडी तनेजा जी….क्षमा करने वाला ही महान होता है"…
“टट्टू…ऐसी महानता भला किस काम की कि आपकी…अपनी साख ही दाव पर लग जाए?”…
“जी!..ये बात तो है लेकिन...
“एक तरफ दिल कहता है कि..”छोड़ तनेजा…दस बीस हज़ार से भला तुझे क्या फर्क पड़ जाएगा?..ऊपरवाले का दिया सब कुछ तो है तेरे पास..भर दे अपनी जेब से”..
“जी!…ये बात तो है..ऊपरवाले की बड़ी मेहर है आप पर..आँख मूँद कर भी दिल खोलते हुए खर्च करें तो भी आपकी सात पुश्तें बड़े आराम से…
“लेकिन उसके बाद का क्या?”..
“क्या?”…
“बाकी की पुश्तें क्या गुरूद्वारे में जा के अपनी ऐसी तैसी करवाएंगी?”..
“ओह!….इस बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं"…
“वोही तो…अपनी सोच हमेशा ऊँची और दूर तक मार करने वाली होनी चाहिए"…
“जी!..लेकिन ये भी तो सच है ना कि..पूत कपूत तो क्यों धन संचय..पूत सपूत तो क्यों धन संचय?”…
“जी!…माना कि मेरी सभी औलादें…
“जायज़ भी और नाजायज़ भी?”…
“जी!..बिलकुल..नाजायज़ हुई तो क्या हुआ..हैं तो सब मेरी अपनी ही”..
“जी…
“मैं मानता हूँ कि मेरी सभी औलादें..पैदायशी रूप से नालायक पैदा हुई हैं लेकिन उनका इकलौता बाप होने के नाते…
“इकलौता?”…
“जी!..
“ओह!..वैरी स्ट्रेंज”…
“वैसे..सच कहूँ तो मुझे भी कई बार ऐसा शक सा हो जाता है कि मैं पहले से ही चूसे हुए आम को आँखें मूँद कर जाने किस धुन में चूसे चला जा रहा हूँ लेकिन…
“लेकिन?”…
“लेकिन खुद को हीन भावना से ग्रस्त होने से बचाने के लिए ना चाहते हुए कई बार ऐसा मान या सोच लेता हूँ कि मैं सिंगल हैंडिड…सैल्फ ओंड गाडी..
“अपने मन मुताबिक ढंग और स्पीड से…पोजीशन बदल बदल कर..गियर को आगे पीछे करते हुए चला रहा हूँ?"…
“जी!..बिलकुल"मेरे स्वर में आत्मविश्वास हिलोरें ले उछल कूद कर रहा था..
“ओह!..फिर तो सब ठीक है"…
“क्या ठीक है?”…
“वही जो आपने कहा"…
“क्या कहा?”..
“यही कि..
“पोज़ीशन बदल बदल कर?”..
“नहीं"…
“गियर को आगे पीछे करते हुए?”…
“नहीं…
“तो फिर?”..
“यही कि…दस बीस हज़ार से भला तुझे क्या फर्क पड़ जाएगा?..ऊपरवाले का दिया सब कुछ है तेरे पास..भर दे अपनी जेब से”..
“हाँ!…ये बात तो है…दस बीस हज़ार से तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला"..
“वोही तो"..
“लेकिन शर्मा जी..एहसान उन पर करना चाहिए जो उसके लायक हों..
“जी!..ये बात तो है"..
“चलो!..एक बार के लिए मैं सब कुछ भूल भाल भी जाऊँ लेकिन उन लोगों को कुछ अक्ल तो हो कम से कम…सब स्साले..एक से बढ़कर एक बेवाकूफ”…
“कोई कहता है यहाँ ले लो..कोई कहता है वहाँ ले लो”…
“ओह!…
“तुम्हारे बाप का मैं नौकर नहीं जो तुम्हारे कहने से कहीं भी ले लूँगा”..
“जी!..बिलकुल..सैल्फ रिस्पेक्ट नाम की भी कोई चीज़ होती है"..
“जी!..बिलकुल…उन्हें बेशक अपनी इज्ज़त प्यारी हो ना हो लेकिन मेरे लिए तो भय्यी..इज्ज़त से बढ़कर कुछ भी नहीं..एक बार गयी तो समझो हमेशा के लिए गयी”…
“जी!..बिलकुल"…
“मैंने तो एकदम साफ़ साफ़ डंके की चोट पे उन्हें कह दिया कि मैं जब भी लूँगा..अपनी मर्जी से..अपनी मनपसंद जगह पर लूँगा”..
“जी!..बिलकुल सही किया"..
“जी!..मैंने तो सही किया लेकिन उन लोगों को भी तो कुछ अक्ल हो"…
“क्या हुआ?”…
“सब के सब स्साले..अनपढ़..गंवार..अक्ल घास चरने चली गयी थी पट्ठों की"…
“क्या हुआ?”…
“ये पूछो कि क्या नहीं हुआ?”..
“क्या नहीं हुआ?”..
“अरे!..ये नहीं..पूछो कि क्या हुआ?”…
“क्या हुआ?”…
“पहले तो सब स्साले…बीच सड़क ही देने लगे”…
“एक साथ?”…
“जी!…एक साथ”…
“ओह!..
“मैंने कहा भी कि एक साथ इतने ज्यादा ठीक नहीं लेकिन वो सब माने..तो ना"…
“ओह!..
“मैंने कई बार समझाया भी कि..ये क्या तरीका है ऐसे..बीच सड़क..तमाशा खडा करने का..अपना ढंग से दो..खुश हो कर दो"..
“वैसे..बुरा ना मानें तनेजा जी अगर तो एक बात कहूँ?”..
“जी!..ज़रूर"…
“कोई खुश हो कर तो किसी को देता नहीं हैं..सबकी अपनी अपनी मजबूरी होती है"…
“अब मैं कुछ कहूँ?”..
“जी!..ज़रूर"…
“आपको उन बेचारों की तो मजबूरी दिख गयी…हमारे बारे में बिलकुल नहीं सोचा..कोई बेशक माने या ना माने…हमारी भी अपनी..अलग किस्म की मजबूरियां होती हैं..बिना लिए हमें…
“खाना हजम नहीं होता है?”…
“जी!..खट्टे..खट्टे से..अजीब किस्म के डकार से आने लगते हैं..हर वक्त पेट आफ़रा आफ़रा सा लगता है..
“ओह!..
“यही सब सोच के फिर भी मैंने सोचा कि चलो..नादान उम्र के हैं..गलतियाँ इस उम्र में अक्सर हो जाया करती हैं..
“जी!..वक्त के साथ खुद समझ जाएंगे"..
“ख़ाक समझ जाएंगे…
“मैं कुछ समझा नहीं"…
“अगर समझ होती तो ऐसे तो ना करते..
“कैसे ना करते?”…
“तमीज नहीं है स्सालों को एक पैसे की..पैसा दे रहे हैं लेकिन पैसे को संभालने की तमीज तक नहीं कि..पैसे को ऐसे..खुल कर..खुले में नहीं दिया जाता है"…
“तो फिर कैसे दिया जाता है?..
“अपना लिफ़ाफ़े में डाल कर..टेबल के नीचे से"..
“लिफ़ाफ़े में डाल कर तो चलो..ठीक है लेकिन ये टेबल के नीचे से क्यों?”…
“तुम पागल हो?”…
“क्यों?..क्या हुआ?”..
“रिश्वत का पैसा भला क्या टेबल के ऊपर से लिया जाता है?”…
“क्क्क्या?”…
“और नहीं तो क्या?”..
(कथा समाप्त)
या तो नूँ ऐ चालेगी
“हद हो गयी ये तो एकदम पागलपन की…नासमझ है स्साले सब के सब….अक्ल नहीं है किसी एक में भी…लाठी..फन फैलाए..नाग पर भांजनी है मगर पट्ठे..ऐसे कमअक्ल कि निरीह बेचारी जनता के ही एक तबके को पीटने की फिराक में हाय तौबा मचा…अधमरे हुए जा रहे हैं"…
“किसकी बात कर रहे हैं तनेजा जी?”…
“हर एक को बस..अपनी ही पड़ी हुई है..बाकी सब जाएँ बेशक…भाड़ में…(मेरा बडबडाना जारी था)
“हुआ क्या तनेजा जी?…कुछ बताइए तो सही"…
“पेट पे लात लगी तो लगे अम्मा..अम्मा चिल्लाने…यही अगर पहले ही अक्ल से काम लिया होता तो काहे को इतनी दिक्कत…इतनी परेशानी आती?”मैं मेज़ पर पड़े गिलास को उठा..पानी पीता हुआ बडबडाया…
“किसे पानी पी..पी कर कोस रहे हैं तनेजा जी?…कुछ बताइए तो सही"शर्मा जी के स्वर में असमंजस भरी उत्सुकता थी….
“अरे!..उन्हीं बावलों को कोस रहा हूँ जो इन नए…जगह जगह कुकुरमुत्तों के माफिक उग आए ई-रिक्शों पर बैन लगाने की सिफारिश कर रहे हैं"मैं आवेश में हाँफते हुए अपने माथे पे चुह आई पसीने की बूंदों को रुमाल से पोंछता हुआ बोला..
“सही ही तो कर रहे हैं बेचारे…ना कोई लाईसेंस…ना कोई नंबर…
“फिर भी कमाई बंपर…भय्यी..वाह…बहुत बढ़िया”…
“वोही तो"…
“सीधी बात ये कि किसी से किसी की कमाई देखी नहीं जाती"…
“वोही तो…अच्छे भले ये पैडल वाले..आम यात्रियों को लूट..कमा धमा रहे थे लेकिन वो स्साले चुपचाप..दबे पाँव..जाने कहाँ से आसमानी फ़रिश्ते बन टपक पड़े और 10 रूपए में हवादार सवारी का होका लगा बेडागर्क कर के रख दिया पूरी लोकल ट्रांसपोर्ट जमात का"…
“और वो जो पहले दो..दो किलोमीटर के चालीस..चालीस रूपए माँग रहे थे?…वो जायज़ था?”…
“माना कि जायज़ नहीं था…नाजायज़ था लेकिन डॉक्टर ने नहीं कहा है कि नवाबों की तरह ठाठ से..हिचकोले खा..अपने पिछवाड़े की ऐसी तैसी करवाते हुए रिक्शे की ही सवारी करो…अपना..ग्रामीण सेवा में भी तो…
“धक्के खा…पसीने से लतपथ हो..खुद को खुडढल लाइन लगाया जा सकता है?”…
“जी!..बिलकुल"…
“हुंह!…बड़ी सेवा…सेवा की बात करते हैं….अरे!…काहे की सेवा?…किस बात की सेवा?..किस चीज़ की सेवा?..सब स्साले..एक नंबर के हरामी….पहले ब्लू लाईनों से आतंक मचा रखा था और अब इस तथाकथित सेवा(?) के जरिए अंधेरगर्दी मचा रखी है सरासर”….
“हम्म!…
“छह की जगह बारह-पंद्रह तक सवारियाँ ऐसे ठूसते हैं दडबे में जैसे हम लोग इनसान ना हुए…मरियल..बीमारी खाए चूजे या मुर्गियाँ हो गयी कि..होने दो ऐसी तैसी…हमरे बाप का क्या जाता है?”..
“हम्म!…ये बात तो है"…
“और बेशर्मी तो देखो ऐसी पट्ठों की कि..चेहरे पे शिकन तक नहीं"…
“हम्म!…
“कुछ कहो तो ठठा कर हँसते हुए उलटा हमें ही धमका के कहते हैं… ‘आगे से चढ़ मति जाईओ’"…
“हम्म!…
“यही अगर पहले से ही अक्ल से काम लिया होता बावलों ने तो ऐसे दुर्दिन दिन देखने की नौबत तो ना आती कि कोर्ट कचहरी के चक्कर दिहाड़ी गुल होती फिरे?”…
“हम्म!..
“मगर पहले?…पहले तो नवाबों जैसी अकड़ कि…या तो भाई…नूँ ऐ चालेगी…पाड़ सकै तो पाड़ ले म्हारा पुंज्जा”…
“वैसे…देखा जाए तो इसमें..उनका भी कसूर नहीं है..सबसे पहले तो ग्रामीण सेवा का मालिक ही मुँह फाड़ के खड़ा हो जाता है कि..मुझे तो भय्यी… शाम को हज़ार रूपए का कड़कड़ाता हुआ नोट चाहिए…बाकियों से खुद निबटो"…
“बाकी कौन?”…
“अपने ट्रैफिक पुलिस और पाँच नंबर वाले…और कौन?..सबको मंथली चाहिए बेशक कमाई हो या ना हो"…
“पहली बात तो ये सिरे से ही गलत है कि ग्रामीण सेवा को किराए पे चलाया जाए…अपना…जिसके नाम परमिट है..वही चलाए"…
“क्क..क्या?…क्या कहा?…परमिट वाले खुद चलाएँ?…कुछ होश में तो हो या फिर बिलकुल ही बौरा गए?”…
“क्यों?…क्या हुआ?”…
“कुछ पता भी है…इन जर्जर…कंडम…अधमरी सी हालत वाली..लगभग मृतप्राय हो चुकी गाड़ियों के मालिक…असल में हैं कौन?”…
“कौन हैं?”…
“कई कई आलीशान कोठियों और बंगलों के मालिक”..
“ओह!…
“और तुम चाहते हो कि..वो खुद होका लगा 5-5…10-10 रूपए इकट्ठे करते फिरें?”…
“लेकिन ग्रामीण सेवा तो गाँव के गरीब लोगों के लिए….
“हुंह!..गरीब लोगों के लिए…गरीब आदमी बस..इन्हें चला सकता है..इनका मालिक नहीं बन सकता”…
“ओह!…
“ये ब्लू लाइन वाले रसूखदार तबके के ही बिगड़े हुए लोग हैं…राजनैतिक दबाव के चलते जब ब्लू लाईनों पर बन आई तो दिल्ली की ऐसी तैसी करने के लिए इन्होने ये ग्रामीण सेवा रुपी जुगाड़ निकाल लिया"…
“ओह!…इसका मतलब इन्हीं की शह पर कोर्ट में ई रिक्शों के खिलाफ उलटा सीधा केस दर्ज कर उन्हें रस्ते से हटाने की तैयारी है"…
“हम्म!…लगता तो यही है लेकिन ये जो तुम्हारे इस ई रिक्शे वाले की टक्कर से बच्चा खौलती चासनी की कढाई में जा गिरा और बेमौत मर गया….उसका क्या?”…
“तो इसके लिए उस हलवाई को पकड़ो जो सरेआम सड़क पर मौत का सामान लिए अपना ठिय्या जमा के बैठा था"…
“ये क्या बात हुई?…ऐसे तो पूरी दिल्ली में दुकानदारों ने…रेहडी पटरी और खोमचे वालों ने सड़क किनारे अवैध कब्ज़े कर रखे हैं…उन सबको पकड़ के अन्दर कर दें?”…
“बिलकुल कर देना चाहिए"…
“फिर तो हो लिया गुज़ारा….हर तरफ अराजकता नहीं फ़ैल जाएगी?”…
“ऐसे कौन सी कम अराजकता फ़ैली हुई है?…पैदल चलने वालों की जगह पर दुकानदारों ने कब्ज़ा कर रखा है…सड़कों पर मोटर गाड़ियों ने ऐसी तैसी कर रखी है…पैदल चलने वाला बेचारा चले तो फिर चले कहाँ पर?…
“लेकिन क़ानून नाम की भी कोई चीज़ होती है…अपना क़ानून के हिसाब से तो….
“क़ानून के हिसाब से यहाँ चलता ही कौन है जनाब?…ना कोई यहाँ सही से ट्रैफिक के नियमों का पालन करता है?…ना कोई यहाँ सही से टैक्स भरता है?…ना ही कोई यहाँ सही से किसी भी नियम का अक्षरश पालन करता है?”…
“हम्म!..ये बात तो है"..
“सीधी बात ये कि ये पूरा देश ही भगवान भरोसे चल रहा है…इसका भगवान ही मालिक है"…
“जी!..बिलकुल..ये पूरा देश ही भगवान् भरोसे चल रहा है"…
“हम्म!…
“लेकिन एक बात समझ नहीं आई"…
“क्या?”…
“यही कि आपको इन ई रिक्शा वालों से इतनी क्यों हमदर्दी है?”…
“भला क्यों नहीं होगी?…कुछ पता भी है कैसे बेचारों ने पाई पाई जोड़ के पैसे जमा किए होंगे रिक्शे खरीदने के लिए?….कैसे उन्होंने बेरोजगारी से तंग आ कर..उज्जवल भविष्य की चाह में 10-10% ब्याज पर रुपया उधार लेकर अपनी ऐसी तैसी करवाई होगी?…कैसे वो बेचारे अपना पेट काट काट कर रोजाना का चार चार सौ रूपए किराया भरते होंगे?….
“लेकिन इसमें हम आप भला क्या कर सकते हैं?…अगलों की किस्मत…अगले जाने"…
“अरे!…वाह…ऐसे कैसे अगले जाने?….पैसा तो मेरा…मेरे बाप का लगा है ना ब्याज पे…मूल डूबेगा तो मेरा ही डूबेगा…किसी और का थोड़े ही डूबेगा"…
“ओह!…
“वैसे आपको क्या लगता है..ऊँट किस करवट बैठेगा?”…
“मतलब?”…
“कोर्ट का फैसला किसके पक्ष में होगा?”…
“मेरे हिसाब से तो पूरी तरह से बैन लगाना तो मुमकिन नहीं…लगाना भी नहीं चाहिए…पब्लिक को इनसे बड़ा आराम है"…
“जी!…ये बात तो है"…
“हाँ!…इनके लिए कोई ट्रेनिंग प्रोग्राम वगैरा ज़रूर होना चाहिए कि…कैसे चलाएँ…कितनी सवारियाँ बिठाएँ वगैरा वगैरा”…
“जी!…
“चिंता ना करें…आपका मूल नहीं डूबेगा"…
“ओह!…थैंक यू…आपके मुँह में घी शक्कर"…
“बस!…ये ई-रिक्शे..किसी को मारे ना टक्कर"……
हा….हा…..हा…हा…
{कथा समाप्त}
शोर्टकट- गाँव से शहर तक
ट्रिंग ट्रिंग..
“हैलो….कौन बोल रहा है?”..
“डॉक्टर साहब घर पर हैं?”…
“हाँ!…जी बोल रहा हूँ…आप कौन?”..
“जी!..मैं शर्मा…
“शरमाइए मत…सीधे सीधे फरमाइए कि…आप हैं कौन?”…
“ज्ज…जी!…म्म..मैं…
“अब यूँ ही मिमियाते रहेंगे या अपना नाम..पता ठिकाना कुछ बताएँगे भी?”डॉक्टर साहब के स्वर में थोड़ी सी झुंझलाहट थी..
“जी!…मैं शर्मा…आपका दोस्त”…
“ओहो!..शर्मा जी…आप हैं…पहले नहीं बता सकते थे क्या?….कहिए…कैसे हैं आप?”..
“बहुत बढ़िया…आप कैसे हैं"….
“एकदम बढ़िया…फर्स्ट क्लास"…
“जी!..
“क्या बात?….बड़े दिनों बाद याद किया"…
“जी!…बस ऐसे ही…आलतू फालतू का काम ही इतना हो जाता है आपकी कृपा से कि बस…बेफिजूल की बातों के लिए टाईम ही नहीं निकल पाता"…
“फालतू बातों के लिए या फालतू लोगों के लिए?”…
“एक ही बात है”…
“जी!…ये बात तो है..अब मुझे ही लो…अगर पहले से पता होता कि आपका फोन है तो मैं…
“उठाता ही नहीं?"…
“एग्जैकटली"…
“वैरी गुड…आप तो मेरे मुँह पर ही मुझे नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हैं"…
“मुँह पर नहीं…फोन पर"…
“ओह!…
“वैसे इसमें बुरा मानने की कोई बात है नहीं…...जिस गाँव जाना ही नहीं..उस गाँव का पता भी अगर हम पूछें तो पूछें मगर किसलिए?”…
“जी!…ये बात तो है लेकिन ध्यान रहे…मेरे गाँव से गुज़रे बगैर आपका शहर पहुँच पाना नामुमकिन है"..
“कुछ ज्यादा ही गुरूर में नहीं उड़ रहे तुम आजकल?’…
“जी…बस…ऐसे ही…आजकल कामधंधा ही इतना ज्यादा बढ़ गया है आप जैसे सुधि..निर्लज्ज जनों की वजह से कि….
“तुमने आसमान में उड़ना शुरू कर दिया?”…
“अब मैं कुछ कहूँगा तो अपने मुँह..मियां मिट्ठू बनने जैसे होगा…वैसे!…आप खुद समझदार हैं"…
“वैरी गुड…लेकिन यहाँ…मेरे मामले में तुम किसी गुमान में मत रहना…तुम्हारे जैसे कई गाँवों से शोर्टकट निकल गए हैं आजकल शहर तक पहुँचने के”…
“अच्छा?’…
“और नहीं तो क्या…तुम कहों तो कल से ही..कल क्या?..आज से ही मैं अपना रस्ता बदल….
“हें…हें…हें…म्म..मैं तो बस….ऐसे ही…बेफाल्तू में मज़ाक कर रहा था और आप हैं कि….
“तुम्हें अच्छी तरह पता है ना कि मुझे मज़ाक बिलकुल भी पसंद नहीं"…
“जी!…तभी तो…
“तभी तो जानबूझ कर मुझसे पंगा ले रहे थे?”..
“ज्ज…जी!…बस..ऐसे ही…टाईम पास”…
“महज़ टाईम पास के लिए तुम मुझसे पंगे ले रहे थे?”..
“ज्ज…जी!…कोई और मिला नहीं तो सोचा कि…
“मुझसे ही पंगा ले लिया जाए?”…
“एग्जैकटली"…
“ओह!…फिर ठीक है”…
“जी!…और बताएँ..सब कुशल मंगल?”..
“जी!…बिलकुल..मेरी गैर हाज़िरी में दुकान कुशल संभाल लेता है और मंगल….
“दुकान?…लेकिन आपका तो अपना..खुद का…
“क्लीनिक तो यार वो दूसरों के लिए है..हमारे अपने लिए तो वो ठिय्या ही…मतलब..दुकान ही है"…
“ज्ज…जी!…ये बात तो है…घोड़ा घास से यारी कर लेगा तो फिर खाएगा क्या?”…
“जी!…बिलकुल"…
“जी!..
“अच्छा!…कुछ खबर पता चली?”...
“उड़ती उड़ती सी?”…
“हाँ!…उड़ती उड़ती सी"…
“नहीं तो…किस बारे में?”…
“अपने उसी गोर्टीस के बारे में”…
“क्या?”…
“यही कि…लूट मचा रखी है स्सालों ने…सालों से सरासर..अंधेरगर्दी का ऐसा आलम बरपाया है पट्ठों ने कि बस..पूछो मत"…
“हुआ क्या?”…
“क्या हुआ?…ये पूछो कि क्या नहीं हुआ?”….
“मैं कुछ समझा नहीं?”…
“वो अपने ‘नपुंसक राम’ जी का मंझला वाला छोरा है ना?”…
“कौन?….वीर्यप्रधान?”..
“हाँ..हाँ..वही"…
“क्यों?…क्या हुआ उसे?”…
“पूरे 20 हज़ार की लाटरी लग गयी पट्ठे की?”…
“अरे!…वाह…फिर तो अपनी पार्टी पक्की….आज शाम को ही मैं उससे…
“शश्श…नाम भी मत लेना पार्टी का उसके आगे"…
“क्यों?…बिदक जाएगा?”…
“हम्म!…
“लेकिन क्यों?”…
“मना किया है उसने”…
“पार्टी के लिए?”…
“नहीं…जिक्र करने के लिए?”…
“पार्टी का?”…
“नहीं!…उस बात का"…
“किस बात का?”…
“वही जो मैं तुमसे करने वाला हूँ"…
“तो फिर कीजिए ना..सोच क्या रहे हैं?…
“लाटरी लग गयी पट्ठे की"…
“ये तो आप मुझे बता चुके…आगे?”…
“तुम्हें तो पता है..वो उस नामी गिरामी अस्पताल में वार्ड ब्वाय का काम करता है"…
“हम्म!…पता है…मेरे पिताजी की ही सिफारिश से तो…
“उसे वार्ड ब्वाय की नौकरी मिली थी?”…
“नहीं!..उसके खिलाफ बदसलूकी के लिए एक्शन ले…दो हफ़्तों के लिए सस्पैंड कर दिया गया था”…
“ओह!…उसी ने बताया कि यही कोई तीन चार दिन पहले उसके यहाँ इमरजेंसी में एक केस आया…काफी क्रिटिकल कंडीशन थी"…
“ये तो आम बात है…बड़ा अस्पताल है…क्रिटिकल केस तो आने ही हैं…जान से बढ़ कर कुछ नहीं है…जान बचनी चाहिए बस..पैसा तो आनी जानी चीज़ है…जितना मर्जी लग जाए..क्या फर्क पड़ता है?”…
“हम्म!…डॉक्टरों ने सीधे आई.सी.यू में भर्ती किया और जी जान लगा दी….
“बेडागर्क करने में?”…
“आप सुनो तो सही"…
“जी!…
“डॉक्टरों ने आई.सी.यू में भर्ती कर..जी जान लगा दी….
“लेकिन मरीज़ बच नहीं पाया?”…
“क्या शर्मा जी?…आपको तो हर वक्त…पहले आप मेरी बात सुनो तो सही…
“जी!…
“एक से एक महँगी..इम्पोर्टेड दवाईयाँ….बढ़िया से बढ़िया…कॉस्टली… इंजेक्शन….
“मरीज़ ने रातों रात रंग बदल लिया?”…
“जी!…गोरे से एकदम….
“मटमैला पड़ गया?”…
“नहीं!…काला…
“ओह!…उम्र क्या थी मरीज़ की?”…
“यही कोई 22-23 साल का बांका…खूबसूरत..एकदम हट्टा कट्टा नौजवान था”…
“अपने..हृतिक रौशन जैसा?”…
“नहीं!…सलमान खान जैसा"….
“ओह!…शादी वगैरा?”…
“अभी कहाँ?….शादी तो अभी नहीं हुई थी बेचारे की लेकिन ऊपरवाले के फज़ल और उसके अपने…खुद के करम से बच्चे एकदम गोरे चिट्टे…दुद्ध मलाई वरगे”…
“वैरी गुड…लिव इन का यही तो फायदा है कि शादी करो ना करो…बच्चे तुरंत…एक से एक नायाब डिलीवर हो जाते हैं"…
“जी!…ये बात तो है”….
“लेकिन यार…इम्पोर्टेड दवाईयों और महँगे इंजेक्शनों वगैरा से तो मरीज़ की तबियत रातों रात संवर जाती है”…
“जी!…लेकिन कई बार फँस..बीच भंवर भी जाती है"…
“हम्म!…
“यही हुआ…यहाँ..इस केस में भी..जाने कैसे…दिन पर दिन बिगड़ती चली गयी"…
“नर्स?”…
“नहीं!…तबियत"…
“डॉक्टरों की?”..
“नहीं!…रिश्तेदारों की"…
“डॉक्टर के?”..
“नहीं!…मरीज़ के"…
“लेकिन क्यों?”…
“बिल ही जो इतना तगड़ा बना दिया था अस्पताल वालों ने?”..
“ओह!..
“सीधे वेंटीलेटर पर लाना पड़ा"…
“रिश्तेदारों को?”…
“नहीं!…मरीज़ को”..
“ओह!…
“धीरे धीरे सेहत में कुछ सुधार आना शुरू हुआ?”…
“मरीज़ की?"…
“नहीं!…उसके रिश्तेदारों की"…
“ओह!…वैरी गुड"…
“क्या ख़ाक वैरी गुड?”…
“क्यों?…क्या हुआ?”…
“रिश्तेदार ठीक हुए थे…मरीज़ थोड़े ही ना"…
“हम्म!..
“इतने दिनों की आपाधापी में उनका बजट टैं बोल गया"…
“हम्म!…इन बड़े बड़े अस्पतालों के चक्कर में तो अच्छे अच्छों के पायजामे ढीले हो जाते हैं…इसमें कौन सी बड़ी बात है?"…
“जी!…अगले..इधर उधर से पैसे पकड़ कर फिर भी इस आस में इलाज करवाते रहे कि…एक ना एक दिन अच्छे दिन ज़रूर आएँगे”…
“ख़ाक अच्छे दिन आएँगे?…इस प्याज़ के दाम तो अभी से…
“जी!…ये बात तो है….
“फिर क्या हुआ?”..
“होना तो वही था..जो ऊपरवाले को मंज़ूर था…उसी की कृपा ने बड़े डॉक्टर के जरिए राह दिखाई दी कि..एक बड़े आपरेशन के बाद(अगर कामयाब रहा?) उनका लड़का एकदम ठीक हो जाएगा”…
“वाउ!…दैट्स नाईस"…
“लेकिन खर्चा कम से कम 3 लाख रूपए आएगा"…
“ओह!…
“मरते क्या ना करते….कहीं से जुगाड़ कर करा के बेचारे पैसे जमा करवाने जा ही रहे थे कि अचानक…
“मरीज़ टैं बोल गया?”…
“नहीं!..अपने नपुंसक राम जी का छोरा..वीर्यवान भगवान बन के बीच रस्ते में ही टपक पड़ा"…
“हनुमान के जैसे?”…
“नहीं!…हापुज़ आम के जैसे"…
“ओह!…इसे कहते हैं किस्मत का धनी होना…बेशक जेब में मनी ना होना”…
“हम्म!…किस्मत के तो वो बहुत धनी थे..पूरे 3 लाख बचवा दिए अगले ने”..
“वाह!…तभी उन्होंने उसे बतौर ईनाम 20 हज़ार दिए होंगे?"…
“हुंह!..बतौर ईनाम?…घंटों तो उससे झिकझिक करते रहे कि..कुछ कम कर ले..कुछ कम कर ले लेकिन पट्ठा इतना अड़ियल कि जो मुँह से निकल गया..सो..निकल गया…वही ले के माना”…
“हम्म!..अब तबियत कैसी है?”…
“मरीज़ की?”…
“नहीं!..वीर्यवान की?”…
“मज़े ले रहा है ज़िन्दगी के"…
“और उसकी?”..
“क्या?”…
“तबियत कैसी है अब मरीज़ की?”…
“वो तो उसी वक्त टैं बोल गया था”…
“किस वक्त?”…
“जब उसे वेंटीलेटर में रखा गया था"…
“ओह!..इसका मतलब बिना बात छला जा रहा था बेचारों को?”…
“जी!..बिलकुल…यही तो धंधा बना रखा है आजकल इन बड़े अस्पतालों ने…ऊपरी टीमटाम से इतना इम्प्रैस कर देते हैं आम पब्लिक को कि वो बस…बेचारी सोचती है कि यहीं..इसी फाईव स्टार अस्पताल में उसके नर्क समान जीवन का स्वर्ग समान उद्धार लिखा है"..
“बेशक..इसके लिए इधर उधर से क्यों अपना ज़मीर बेच के पैसा उधार लेना पड़े लेकिन इलाज करवाएंगे तो इन्हीं चंद..गिने चुने बड़े अस्पतालों में ही अपना इलाज करवाएंगे"…
“हम्म!…
“शर्म भी नहीं आती हरामखोरों को कि अगर अपनी छिलवानी ही है तो हम जैसों से…अपने आस पड़ोस के नातजुर्बेकार डॉक्टरों से छिलवाएं…ये क्या बात हुई कि ज़रा सी तकलीफ हुई नहीं और सीधा ऊह…आह….ऊह…आह कर..बिलबिलाते हुए जा पहुँचे इन बड़े अस्पतालों की शरण में?"…
“और नहीं तो क्या…ये गली कूचों में कुकुरमुत्तों के माफिक उग आए नर्सिंग होम…क्लीनिक और लैब क्या हमने अपनी ऐसी तैसी करने के लिए खोल रखे हैं?…आप जैसों के लिए ही तो खोल रखे हैं ना?”…
“जी!…ये तो वही…देवर…भाभी और खूंटे वाली कहानी हो गयी”…
“हम्म!..अपनी…अपनी अब रही नहीं..पराई वो जनानी हो गई”…
हा….हा…हा…हा… (हम दोनों का समवेत स्वर)
“आज तो यार सच में..बड़ा मज़ा आया तुमसे बात कर के"…
“जी!…मुझे भी…सच में पता ही नहीं चला कि हम आमने सामने बैठ के बात कर रहे हैं या फिर मोबाईल से"…
“क्क्या?…तुम इतनी देर से मोबाईल से बात कर रहे थे?”…
“जी!…क्यों?..क्या हुआ?”…
“फिर तो तुम्हारे बैलैंस का भट्ठा बैठ गया होगा आज तो?”…
“बिलकुल भी नहीं?”…
“वो कैसे?”…
“मैंने आज ही ‘टाटा’ टू ‘टाटा’ का अनलिमिटिड वाला रिचार्ज करवाया है"…
“ओह!..फिर तो कोई दिक्कत नहीं"..
“जी!…
“वैसे…किसी ख़ास काम से फोन किया था या फिर वैसे ही….टाईम पास…
“हें…हें….हें…आप भी कैसी बातें करते हैं डॉक्टर साहब…आजकल के बिज़ी शैड्यूल में भला किसके पास इतना वक्त है कि वो ऐसे ही खामख्वाह… बेफाल्तू में…अपने खर्चे पे किसी गैर का टाईम पास याने के मनोरंजन करता फिरे?”…
“जी!…ये बात तो है"…
“जी!…
“कहो फिर..कैसे याद किया था?”…
“कैसे क्या?…दिल से याद किया था"…
“रट्टा मार के?”…
“जी!…बिलकुल…रट्टा मार के"…
“खैर!..ये सब फोर्मैलिटी छोड़ो और सीधे सीधे बको कि..क्यों याद किया था?”…
“अब क्या बताऊँ?….दरअसल..मेरा बेटा अड़ा हुआ है..अर्टिगा के पीछे हाथ धो के पड़ा हुआ है…मान नहीं रहा है..जिद पे अड़ के समझो..ना बैठा हुआ है…ना खड़ा हुआ है..अब कैसे बताऊँ?…बूत्था उसका एकदम….बिलकुल सड़ा हुआ है”…
“ओह!…तो मान क्यों नहीं लेते उसकी बात?…कमाते किसके लिए हो?…बाल बच्चों के लिए ही ना?…तो फिर सोचते क्या हो?…जो माँगता है…जैसी माँगता है..ले दो"…
“ऐसे कैसे ले दो?…पूरे 9 लाख का है उसका डीज़ल वाला…डीलक्स वर्ज़न"…
“तो?”…
“तो क्या?…दुनिया भर के वैसे ही फालतू के खर्चे पाल रखे हैं मैंने..कभी इसका रिचार्ज करवाओ तो कभी उसका रिचार्ज करवाओ…कसम से..कभी कभी इतनी खुंदक आती मुझे अपनी इन माशूकाओं पर कि बस…पूछो मत”…
“ओह!…
“ऊपर से ये नवाबजादे..अड़ के खड़े हो गए कि…
“बस!..यही दिक्कत है या कोई और भी परेशानी है?”..…
“जी!…फिलहाल तो बस..यही…इसी ने जीना हराम कर…बेहाल कर रखा है..आगे रब्ब राक्खा”..
“इसकी तो तुम चिंता ना करो…कल से मेरा हर पेशेंट हमेशा की तरह टैस्ट वगैरा के लिए तुम्हारी ही लैब में आएगा लेकिन अब रूटीन टेस्टों के अलावा…अलग से लिस्ट में 2-4 आलतू फालतू के टैस्ट(महँगे वाले) भी होंगे…जिन्हें नहीं करना है”…
“जी!…मैं समझ गया”…
“बस..अपने हिसाब से उनकी रिपोर्ट भर दे देनी है..और कुछ नहीं करना है"..
“जी!…थैंक्स"…
“खाली जी..जी या थैंक्स से काम नहीं चलेगा…मेरा लिफाफा अब पहले से बड़ा और भारी हो जाना चाहिए"…
“ज्ज…जी!..बिलकुल…ये भी कोई कहने की बात है?”…
“अच्छा!..अब बताओ…सड़क गाँव से शहर जा रही है या शहर से गाँव आ रही है?”…
“हें…हें…हें…मैं तो बस…
“ऐसे ही मज़ाक कर रहा था?”…
“जी!…
{और फोन डिस्कनैक्ट हो गया या कर दिया गया…भगवान् जाने}
