"अभी बहुत जान बाकी है"

"अभी बहुत जान बाकी है"***राजीव तनेजा***"अनर्थ!...घोर अनर्थ..."...."राम...राम"अनुराग अपने कानों को हाथ लगाता हुआ बोला"कुछ खबर भी है कि गन्नौर स्टेशन के पास क्या हुआ?"अनुराग मानों संस्पैंस क्रिएट करने के लिए ही पैदा हुआ था "शश्श!...चुप...बिलकुल चुप"मैँ अनुराग की बात काट बीच में ही बोल पड़ा..."सूरत के पास ट्रेन से कट कर अठारह लोगों की मौत हो गई"मैँ अपने चायनीज़ मोबाईल में टीवी देखता हुआ बोला..."अठारह लोगों की?"गुप्ता जी ने हैरानी से मोबाईल में आँख गढाते हुए कहा "जी हाँ!...पूरे अठारह लोगों की"...."कब?"..."कैसे?"शर्मा जी ने एक साथ दो सवाल जड़ दिए..."तो क्या उनमें...तुम्हारी 'कम्मो' भी थी?"मुझे परेशान देख अनुराग बीच में मज़ाक उड़ाता...

"श्श्श!...कहानी अभी बाकी है"

"शश्श!...कहानी अभी बाकी है"***राजीव तनेजा***"अरे!...कुछ खबर भी है कि कितना बड़ा कांड हुआ है गन्नौर स्टॆशन पे?"अनुराग सस्पैंस सा क्रिएट करता हुआ बोला..."कब?"..."क्या हुआ?"उसकी आवाज़ सुन मेरे मुँह से बस यही निकला"उत्सुकता वश अगले पिछले सभी डेली पैसैन्जरों के कान भी हमारी तरफ हो लिए"......"छापा था क्या?"एक की आवाज़ आई..."ज़रूर!..मजिस्ट्रेट चैकिंग रही होगी"दूसरा बोल पड़ा"सब इस 'लालू' का किया धरा है"...."खुद तो चारे तक को नहीं बक्शा और अब पड़ गया है पीछे इन भोले 'टीटियों' की पूरी जमात के कि..."पूरे नकद गिन...

"कोई होली-वोली नहीं खेलनी है इस बार"

"कोई होली-वोली नहीं खेलनी है इस बार"***राजीव तनेजा***"कोई होली-वोली नहीं खेलनी है इस बार"...."कान खोल के सुन लो"..."कहे देती हूँ कसम से"बीवी भाषण पे भाषण पिलाए चली जा रही थी"खबरदार!...जो इस बार होली का नाम भी लिया ज़ुबान से"..."छोड-छाड के चली जाउंगी सब"..."फिर भुगतते रहना अपने आप""पिछली बार का याद है ना?" ..."या!...भूले बैठे हैँ जनाब कि..कितने ड्ण्डे पडे थे?और...कहाँ-कहाँ पडे थे?"..."सिकाई तो मुझी को करनी पड़ी थी ना?"...."तुम्हारा क्या है?"..."मज़े से चारपाई पे लेटे-लेटे कराह रहे थे चुप-चाप"..."हाय!..मैँ...

"राम मिलाई जोड़ी...एक अन्धा...एक कोड़ी"

"राम मिलाई जोड़ी...एक अन्धा...एक कोड़ी"***राजीव तनेजा***नोट: ये कहानी मेरी पिछली कहानी "ना हींग लगी ना फिटकरी...रंग चढा चोखा ही चोखा" का ये दूसरा भाग है "हाँ राजीव!..क्या हुआ तुम्हारी उस 'निम्मो' चूरन वाली का?"..."पिछली कहानी में जिक्र कर रहे थे ना तुम उसका"शर्मा जी मेरी तरफ देख बोले"शर्मा जी!...'निम्मो' नहीं...'कम्मो' "..."हुँह!...'निम्मो' हो या 'कम्मो'...क्या फर्क पड़ता है?"..."हाँ...हाँ!...क्या फर्क पड़ता है...कोई तुम्हारा नाम बिगाड़ दे और तुम्हें कोई फर्क ना पड़ता हो तो बेशक ना पड़े"..."मुझे फर्क...
 
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