"क्यों!...है कि नहीं?"

"क्यों!...है कि नहीं?"***राजीव तनेजा***"अब बताओगे भी या नहीं?"..."क्या?"..."ये गट्ठर उठाए-उठाए कब से तुम्हारे आगे-पीछे घूम रही हूँ".."क्यों?...क्या हुआ?....क्या है इसमें?"..."इतना टाईम नहीं है मेरे पास कि मैँ तुम्हें एक-एक बात समझाने में लगी रहूँ और...तुम मज़े से कम्प्यूटर पे इन मुय्यी बेफिजूल की कहानियों को लिखने के चक्कर में उँगलियाँ टकटकाते रहो"..."शश्श!...चुप ...एकदम चुप".."चुपचाप साईड पे बैठ के देखो कि मैँ क्या लिख रहा हूँ"..."इतनी वेल्ली नहीं हूँ मैँ जो बेफाल्तू में कम्प्यूटर में आँखें गड़ाती फिरूँ या फिर. ..बावलों की तरह चुपचाप तुम्हारा ये सड़ा सा थोबड़ा देखती फिरूँ"..."मतलब?..मतलब क्या है तुम्हारा?"..."मैँ वेल्ले काम करता...

"रहम कर रहम कर रहम कर"

"रहम कर रहम कर रहम कर"***राजीव तनेजा***मेरी बाज़ुएँ मेरे कन्धे मेरी कमरकर रही है सब की सब कड़-कड़ ओ बेरहम ..ना धुलवा बरतन और कपड़े मुझसेरहम कर रहम कर रहम कर ***राजीव तनेजा...

"मज़ा ना आए तो...पैसे वापिस"

"मज़ा ना आए तो...पैसे वापिस"***राजीव तनेजा***"इस बार पक्का है ना!...या इस बार भी गोली देने का इरादा है जनाब का?"..."किस बारे में?"..."भूल गए?"..."अरे!..उसी 'कम्मो चूरन वाली' की बात कर रहे हैँ हम जिसका तुम अपनी पिछली चार कहानियों से जिक्र करते आ रहे हो""पता नहीं ऐसा कैसा किरदार गढा है तुमने कि हवा तक नहीं लगने दे रहे हो उसकी""शर्मा जी!..इस बार राजीव ने 'कम्मो चूरन वाली' का छुई-मुई जैसा किरदार गढा है "..."ज़रा सी झलक में ही मुर्झा जाएगा"गुप्ता जी हँसते हुए बोले"क्या बात करते हो गुप्ता जी आप भी?"..."एकदम सॉलिड करैक्टर है अपनी 'कम्मो'का"..."शर्मा जी!..आप भी देखना....मज़ा ना आए तो पैसे वापिस"..."पैसे?"..."हमने दिए कौन से हैँ...जो...
 
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