"क्यों!...है कि नहीं?"
"क्यों!...है कि नहीं?"***राजीव तनेजा***"अब बताओगे भी या नहीं?"..."क्या?"..."ये गट्ठर उठाए-उठाए कब से तुम्हारे आगे-पीछे घूम रही हूँ".."क्यों?...क्या हुआ?....क्या है इसमें?"..."इतना टाईम नहीं है मेरे पास कि मैँ तुम्हें एक-एक बात समझाने में लगी रहूँ और...तुम मज़े से कम्प्यूटर पे इन मुय्यी बेफिजूल की कहानियों को लिखने के चक्कर में उँगलियाँ टकटकाते रहो"..."शश्श!...चुप ...एकदम चुप".."चुपचाप साईड पे बैठ के देखो कि मैँ क्या लिख रहा हूँ"..."इतनी वेल्ली नहीं हूँ मैँ जो बेफाल्तू में कम्प्यूटर में आँखें गड़ाती फिरूँ या फिर. ..बावलों की तरह चुपचाप तुम्हारा ये सड़ा सा थोबड़ा देखती फिरूँ"..."मतलब?..मतलब क्या है तुम्हारा?"..."मैँ वेल्ले काम करता...