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कसम कनखजूरे के तिरछे कान की

***राजीव तनेजा*** "सुनो"... "ये 'ट्यूब' कितने की आती है?".... "बूत्था(चेहरा) चमकाना है कि दाँत मंजवाने हैँ?"... "क्यों?...मेरे चौखटे को क्या हुआ है?"... "अच्छा-भला तो है"... "और दाँत?...दाँत देखे हैँ कभी आईने में?"... "क्यों?...दाँतो में मेरे क्या कमी दिख गई जनाब को".... "अच्छे भले मोतियों जैसे तो हैँ"... "तो मैँने कब कहा कि मोती सिर्फ सफेद ही हुआ करते हैँ?"... "तुम्हारा मतलब मेरे दाँत पीले हैँ?".... "ऐसा मैँने कब कहा?"... "तुम क्या मुझे घसियारिन समझते हो जो मैँ तुम्हारी इन आड़ी-तिरछी...
 
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