"फुल एण्ड फाईनल"

***राजीव तनेजा***   "अरे...तनेजा जी!...ये सब चोट-चाट कैसे लग गई?".... "अब होनी को कौन टाल सकता है....शर्मा जी?".... "फिर भी...पता तो चले कि आखिर हुआ क्या?".... "सब भुट्टा खाने का नतीजा है"... "भुट्टा खाने का?.....मैँ समझा नहीं....ज़रा खुल के बताएँ".... "यार!..मेरी किस्मत ही फूटी थी जो मैँ उस राम प्यारी की बच्ची के पास भुट्टा खाने चला गया"..... "तो क्या उसकी बिटिया इतनी बड़ी और स्यानी हो गई कि खुद अपने बूते पे काम-धन्धा सँभाल सके?"... "कमाल करते हो शर्मा जी आप भी...अभी तो उसके खेलने-कूदने...

’सखेद सधन्यवाद’

  हँसते रहो हँसाते रहो पर आनन्द पाठक जी के व्यंग्य ’सखेद सधन्यवाद’  के जरिए उनकी लेखनी की पैनी धार का आनंद लें   ***राजीव तनेजा***...

साहब!...मक्खी ही तो है

***राजीव तनेजा***   ग्राहक वेटर से:सुनो!....मेरे सूप में मक्खी है     वेटर:छोड़िए ना साहब!...मक्खी ही तो है...कितना सूप पी जाएगी? ग्राहक:बेवाकूफ!...पागल समझ रखा है क्या मुझे?... वेटर:अगर आपको एतराज़ है तो लीजिए....मैँ अभी इसका काम तमाम किए देता हूँ ...

ब्लॉग लिखना अपना काम नहीं क्योंकि इसमें मिलता दाम नहीं

  एक मित्र मिले  बोले लाला तुम किस चक्की का खाते हो? इस डेढ छटांक के राशन में भी तोंद बढाए जाते हो   क्या रखा है माँस बढाने में? मनहूस अक्ल से काम करो इंटरनैट काल की वेला है ब्लॉग लिखो जगत में नाम करो   हम बोले  रहने दो लैक्चर पिट जाओगे हो जाएगा फ्रैक्चर लिख-लिख कलम घिसते रहें इतने भी हम बेकार नहीं ब्लॉग लिखना अपना काम नहीं क्योंकि इसमें मिलता दाम नहीं   नोट:इस कविता का शुरूआती हिस्सा बचपन में स्कूल में पढा था...आज अचानक याद आ गया तो बाकी...

चमत्कार को नमस्कार

***राजीव तनेजा*** "ओ...बड़े दिनों में खुशी का दिन आया.... ओ...बड़े दिनों में खुशी का दिन आया.... आज मुझे कोई ना रोके... बतलाऊँ कैसे कि मैँने क्या पाया.... हो बड़े दिनों में..... "याहू!.... वो मारा पापड़ वाले ने"... "क्या हुआ तनेजा जी?...इस कदर बल्लियों क्यों उछल रहे हैँ?... "अरे शर्मा जी!...साक्षात  चमत्कार देख के आ रहा हूँ...साक्षात".... "क्या सच?".... "और नहीं तो क्या?"... "हम भी तो सुनें भय्यी कि क्या चमत्कार देख के आ रहे हो?"... "यूँ समझिए कि साक्षात ऊपरवाले ने...

बरसात पैसों की

***राजीव तनेजा*** "अरे तनेजा जी!...ये क्या?...मैँने सुना है कि आपकी पत्नि ने आपके ऊपर वित्तीय हिंसा का केस डाल दिया है".... "हाँ यार!...सही सुना है तुमने"मैँने लम्बी साँस लेते हुए कहा "आखिर ऐसा हुआ क्या कि नौबत कोर्ट-कचहरी तक की आ गई?"... "यार!...होना क्या था?..एक दिन बीवी प्यार ही प्यार में मुझसे कहने लगी कि तुम्हें तो ऐसी होनहार....सुन्दर....सुघड़ और घरेलू पत्नि मिली है कि तुम्हें खुश हो कर मुझ पर पैसों की बरसात करनी चाहिए"... "तो?"... '"मैँने कहा ठीक है"... "फिर?"... "फिर क्या?...एक...
 
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