मेरा खुला पत्र पं.डी.के.शर्मा "वत्स" उर्फ ‘बनवारी लाल’ के नाम

  आदरणीय पंडित जी,प्रणाम अभी कुछ घंटे पहले ही फोन पर आपसे सोहाद्रपूर्ण तरीके से बतियाने के बाद आपकी ये ताज़ी पोस्ट   बुद्धिमानों का सम्मेलन और बनवारी लाल जी की मन की पीडा   अनायास ही पढ़ने को मिली …जान कर अच्छा लगा कि आप तो पूरे किस्सागो टाईप के होते जा रहे हैं…ठीक अपुन के जैसे ही…ज़रा सी बात का बतंगड कैसे बनाया जाता है?…ये भी आपसे सीखने को मिला …उम्मीद है कि मेरे इस पत्र के बाद आपको भी मुझ से काफी कुछ सीखने को मिलेगा| चलिए!…पहले बात करते हैं आपकी उक्त पोस्ट की तो आपकी...

मिले लट्ठ मेरा तुम्हारा...तो सर फटे हमारा

***राजीव तनेजा*** “ठक्क- ठक्क”…. “ठक्क……ठक्क- ठक्क”…. “आ जाओ भाई…आ जाओ…यहाँ तो खुला दरबार है…कोई भी आ जाओ"… “नमस्कार!…गुप्ता जी….कहिये अब तबियत कैसी है आपकी?”… “मेरी तबियत को क्या हुआ है?”… “मुसद्दीलाल के मुंह से उड़ती-उड़ती खबर सुनी थी कि जब से आप उस ब्लॉगर मीटिंग से होकर आए हैं….तभी से पेट पकड़ कर संडास में बैठे हुए हैं…किसी को अंदर ही नहीं आने दे रहे"… “अभी आपको आने दिया ना?”… “आने तो दिया लेकिन कितनी मुश्किलों…कितनी दुश्वारियों के बाद?…कम से कम बीस दफा कुण्डी खड़काई होगी मैंने …मेरा हाथ...

तीन बच्चे पानीपत के और दो फरीदाबाद के पकड़ लो

***राजीव तनेजा*** “ऐसा आखिर कब तक चलेगा बॉस?”… “क्यों?…क्या हुआ?”… “क्या हुआ?..जैसे आप जानते ही नहीं हैं….यहाँ दिन-रात खाली बैठने से भूखों मरने की नौबत आ गई है… और आप कह रहे हैं कि क्या हुआ?”… “तो इस तुगलकी शीला के कुलबुलाते फरमान की आंच में मैं ही कौन सा माल-पुए सेंक रहा हूँ?…तुम्हारी तरह मैं भी तो खाली ही बैठा हूँ ना?"….. “आपका खाली बैठना…ना बैठना एक बराबर है बॉस”…. “क्या मतलब?”… “आप तो खाली बैठे-बैठे भी कंप्यूटर पर उँगलियाँ टकटका कर दो दूनी चार करते हुए इधर-उधर से अपना काम चला...

मुकद्दर का सिकंदर कौन? - समीरलाल या अनूप शुक्ल?

***राजीव तनेजा*** दोस्तों!…इस समय हिंदी ब्लॉगजगत में इस बात को लेकर धमासान मचा हुआ है कि ब्लोग्वुड  का बादशाह कौन?…हिंदी का सच्चा सेवक कौन? …इस सब का सिलसिला शुरू हुआ ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की एक विवादास्पद पोस्ट के आने के बाद|जिसको लेकर यहाँ ऐसा हंगामा मचा…ऐसा हंगामा मचा कि मानों सावन में लग गई हो आग जैसे …. आरोपों-प्रत्यारोपों के ढेर लग गए…अम्बार लग गए…कोई किसी के पक्ष में तो किसी के विपक्ष में खुल कर सामने आ गया| हद तो तब हो गई जब कोई-कोई तो दबे पाँव दोनों तरफ ही अपनी निष्ठा जताने लगा...
 
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