गुनाह क़ुबूल है मुझे- राजीव तनेजा

ट्रिंग-ट्रिंग…ट्रिंग-ट्रिंग… “हैलो".. “इज इट फ़ादर डिकोस्टा स्पीकिंग?"… “यैस…माय सन..मे आई नो हूज ऑन  दा लाइन?”.. “सर!…मैं राजीव…दिल वालों की नगरी दिल्ली से"… “व्हाट कैन आई डू फॉर यू…माय सन?”… “मैं आपसे मिलना चाहता हूँ"… “किस सिलसिले में?”.. “मैं अपने गुनाह…अपने पाप कबूल करना चाहता हूँ”… “यू मीन!…आप कन्फैस करना चाहते हैं?”… “जी!… “ओनली कन्फैस…या फिर प्रायश्चित भी?”… “फिलहाल तो सिर्फ कन्फैस….बाद में कभी मौका मिला तो प्रायश्चित भी..शायद…अगले जन्म में"… “ठीक है!…तो फिर कल सुबह…ठीक...

ऐसी आज़ादी से तो गुलामी ही भली थी- राजीव तनेजा

   मुँह में पानी ने जो आना शुरू किया तो फिर रुकने का नाम नहीं लिया…कभी पेट पकड़ कर मन मसोसते हुए..कलैंडर को ताक खुद ही…खुद को थोड़ा सब्र रखने की दकियानूसी सलाह देता तो कभी मनभावन मिठाईयों और पकवानों की वर्चुअल खुशबु के जरिये मुंह में अनायास ही पैदा हो गई लार रुपी चासनी को..एक ही झटके में सटक कर अंदर करते हुए उस ऊपर बैठे परम पिता परमात्मा को पानी पी-पी कर..जी भर कोसता कि…. “इतनी देर क्यों लगा रहा है कमबख्त…इस नेक काम को असलियत का जामा पहनाने में?”… मेरी ऐसी  मरमरी सी हालत देख बीवी...

थमा दो गर मुझे सत्ता-राजीव तनेजा

  "ओफ्फो!...पता नहीं कब अकल आएगी तुम्हें?…चलते वक्त देख तो लिया करो कम से कम कि पैर कहाँ पड़ रहे हैँ और नज़रें कहाँ घूम रही हैँ" बीवी चिल्लाई "क्यों?...क्या हुआ?"... "कुछ तो शर्म किया करो...तुम्हारी बच्ची की उम्र की है"... "तो?"... "किसी को तो बक्श दिया करो कम से कम"... "अरे!...सिर्फ देख ही तो रहा था..कोई सच में थोड़े ही…और वैसे भी कौन सा तुम्हारी सगे वाली थी जो मैं अपनी उफनती भावनाओं पर संयम रख..अपने मचलते अरमानों को काबू में रखने का ढोंग भरा प्रयास करता?”… "अरे!...अगर मेरी सगे वाली...
 
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