गुनाह क़ुबूल है मुझे- राजीव तनेजा
ट्रिंग-ट्रिंग…ट्रिंग-ट्रिंग… “हैलो".. “इज इट फ़ादर डिकोस्टा स्पीकिंग?"… “यैस…माय सन..मे आई नो हूज ऑन दा लाइन?”.. “सर!…मैं राजीव…दिल वालों की नगरी दिल्ली से"… “व्हाट कैन आई डू फॉर यू…माय सन?”… “मैं आपसे मिलना चाहता हूँ"… “किस सिलसिले में?”.. “मैं अपने गुनाह…अपने पाप कबूल करना चाहता हूँ”… “यू मीन!…आप कन्फैस करना चाहते हैं?”… “जी!… “ओनली कन्फैस…या फिर प्रायश्चित भी?”… “फिलहाल तो सिर्फ कन्फैस….बाद में कभी मौका मिला तो प्रायश्चित भी..शायद…अगले जन्म में"… “ठीक है!…तो फिर कल सुबह…ठीक...