अजब ये फेसबुक और अजब इसके रिश्ते -राजीव तनेजा

अजब ये फेसबुक और अजब इसके रिश्ते
कभी कच्ची धूप से खिलते कभी घुप्प अँधेरे में सिमटते तुरत फुरत इस पल बनते झटपट उस पल बिगड़ते अजब ये फेसबुक और अजब इसके रिश्ते बेगानों संग प्रीत जताते अनजानों संग पेंच लड़ाते कभी हँसते तो कभी रोते सपने पर नित नए संजोते अजब ये फेसबुक और अजब इसके रिश्ते कभी किले हवा में हवाई बनाते कभी रेतीली ज़मीं पर कदम अपने ठोस टिकाते कभी वीराने में मरुद्यान ढूंढते कभी छिछली रेत में समंदर उजला तलाशते अजब ये फेसबुक और अजब इसके रिश्ते अपनों को खुडढल लाइन...