फुगाटी का जूता- मनीष वैद्य

जब कभी ज़माने की विद्रूपताएं एवं विसंगतियां हमारे मन मस्तिष्क को उद्वेलित कर उसमें अपना घर बनाने लगती हैं तो हताशा और अवसाद में जीते हुए हम में से बहुत से लोग अपने मन की भड़ास को कभी आपस में बोल बतिया कर तो कभी चीख चिल्ला कर शांत कर लिया करते हैं। इसके ठीक विपरीत कोई लेखक या फिर कवि ह्रदय जब इस तरह की बातों से व्यथित होता है तो अपने मन की भावनाओं को अमली जाम पहनने के लिए वो शब्दों का...अपनी लेखनी का सहारा लेता है।इस तरह की तमाम विसंगतियों से व्यथित हो जब कोई कलमकार अपनी बात...अपनी व्यथा...अपने मनोभावों...

बन्द दरवाज़ों का शहर- रश्मि रविजा

अंतर्जाल पर जब हिंदी में लिखना और पढ़ना संभव हुआ तो सबसे पहले लिखने की सुविधा हमें ब्लॉग के ज़रिए मिली। ब्लॉग के प्लेटफार्म पर ही मेरी और मुझ जैसे कइयों की लेखन यात्रा शुरू हुई। ब्लॉग पर एक दूसरे के लेखन को पढ़ते, सराहते, कमियां निकालते और मठाधीषी करते हम लोग एक दूसरे के संपर्क में आए। बेशक एक दूसरे से हम लोग कभी ना मिले हों लेकिन अपने लेखन के ज़रिए हम लोग एक दूसरे से उसके नाम और काम(लेखन) से अवश्य परिचित थे। ऐसे में जब पता चला कि एक पुरानी ब्लॉगर साथी और आज के समय की एक सशक्त कहानीकार रश्मि...

अभ्युदय-1- नरेंद्र कोहली(समीक्षा)

मिथकीय चरित्रों की जब भी कभी बात आती है तो सनातन धर्म में आस्था रखने वालों के बीच भगवान श्री राम, पहली पंक्ति में प्रमुखता से खड़े दिखाई देते हैं। बदलते समय के साथ अनेक लेखकों ने इस कथा पर अपने विवेक एवं श्रद्धानुसार कलम चलाई और अपनी सोच, समझ एवं समर्थता के हिसाब से उनमें कुछ ना कुछ परिवर्तन करते हुए, इसके किरदारों के फिर से चरित्र चित्रण किए। नतीजन...आज मूल कथा के एक समान होते हुए भी रामायण के कुल मिला कर लगभग तीन सौ से लेकर एक हज़ार तक विविध रूप पढ़ने को मिलते हैं। इनमें संस्कृत में रचित...

अमेरिका में 45 दिन- सोनरूपा विशाल

किसी भी देश, उसकी सभ्यता, उसके रहन सहन..वहाँ के जनजीवन के बारे में जब आप जानना चाहते हैं तो आपके सामने दो ऑप्शन होते हैं। पहला ऑप्शन यह कि आप खुद वहाँ जा कर रहें और अपनी आँखों से...अपने तन मन से उस देश...उस जगह की खूबसूरती...उस जगह के अपनेपन को महसूस करें। दूसरा ऑप्शन यह होता है कि आप वहाँ के बारे में किसी ऐसे व्यक्ति से जानें जो वहाँ पर कुछ वक्त बिता चुका हो। अब ये तो ज़रूरी नहीं कि आपकी किस्मत इतनी अच्छी हो कि आप चाहें और तुरंत ऐसा व्यक्ति  आपके सामने हाज़िर नाज़िर हो जाए और...

अक्कड़ बक्कड़- सुभाष चन्दर

आम तौर पर हमारे तथाकथित सभ्य समाज दो तरह की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। एक कामकाजी लोगों की और दूसरी निठल्लों की। हमारे यहाँ कामकाजी होने से ये तात्पर्य नहीं है कि...बंदा कोई ना कोई काम करता हो या काम के चक्कर में किसी ना किसी हिल्ले से लगा हो अर्थात व्यस्त रहता हो बल्कि हमारे यहाँ कामकाजी का मतलब सिर्फ और सिर्फ ऐसे व्यक्ति से है जो अपने काम के ज़रिए पैसा कमा रहा हो। ऐसे व्यक्ति जो किसी ना किसी काम में व्यस्त तो रहते हों  लेकिन उससे धनोपार्जन बिल्कुल भी ना होता हो तो उन्हें कामकाजी नहीं बल्कि वेल्ला...

कौन..किसकी..कहाँ सुनता है?

(डायनिंग टेबल पर क्रॉकरी सैट करते करते श्रीमती जी कैमरे से मुखातिब होते हुए।) हाय फ्रैंडज़...कैसे हैं आप? उम्मीद है कि बढ़िया ही होंगे। मैं भी एकदम फर्स्ट क्लास। और सुनाएँ..कैसे चल रहा है सब? सरकार ने भले ही लॉक डाउन खोल दिया है लेकिन अपनी चिंता तो भय्यी..हमें खुद ही करनी पड़ेगी। क्यों?...सही कहा ना मैंने? दरअसल इस लॉक डाउन ने हमें बहुत कुछ सिखा और समझा दिया है। कई लोगों के नए यूट्यूब चैनल बन गए और कइयों के पुराने यूट्यूब चैनल फिर से रंवा हो.. एक्टिव हो गए। बहुत से लोगों ने वीडियो देख...

अंधेरे कोने@ फेसबुक डॉट कॉम

जिस तरह एक सामाजिक प्राणी होने के नाते हम लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए आपस में बातचीत का सहारा लेते हैं। उसी तरह अपनी भावनाओं को व्यक्त करने एवं उनका अधिक से अधिक लोगो  तक संप्रेषण करने के लिए कवि तथा लेखक,गद्य अथवा पद्य, जिस भी शैली में वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में सहज महसूस करते हैं, को ही अपनी मूल विधा के रूप में अपनाते हैं। मगर कई बार जब अपनी मूल विधा में वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में खुद को असमर्थ पाते हैं भले ही इसकी वजह विषय का व्यापक होना हो अथवा अत्यंत...

थोड़ा हँस ले यार- सुभाष चन्दर

आमतौर पर किसी कहानी संग्रह को पढ़ते वक्त हमारे ज़हन में उस उस कहानी से जुड़े पात्रों को लेकर  मन में कभी त्रासद परिस्थितियों की वजह से करुणा तो कभी क्षोभ वश कटुता उपजती है। ज़्यादा हुआ तो एक हल्की सी...महीन रेखा लिए एक छोटी सी मुस्कुराहट भी यदा कदा हमारे चेहरे पर भक्क से प्रदीप्त हो उठती है। मगर कई बार किसी किताब को पढ़ते वक्त किताब में आपकी नज़रों के सामने कोई ऐसा वाकया  या ऐसा पल भी आ जाता है कि पढ़ना छोड़ बरबस आपकी हँसी छूट जाती है। अगर ऐसा कभी आपके साथ भी हुआ है तो समझिए कि वह...

चमत्कार को नमस्कार

(कॉलबेल की आवाज़) बीवी के दरवाज़ा खोलने पर पति अन्दर आता है और अपना बैग साइड पर रखने के बाद भगवान के आगे माथा टेकता है। उसे ऐसा करते देख बीवी हैरान हो कर कहती है...."अरे!...ये अचानक सूरज पश्चिम से कैसे निकल आया? तुम और मंदिर में?...ये तो सच्ची कमाल हो गया। आज ना सच्ची...मैं बहुत खुश हूँ....भगवान ने मेरी सुन ली। तुम बस रुको एक मिनट...मैं प्रसाद ले कर आती हूँ।""अरे!....प्रसाद की तुम चिंता ना करो... मैं अभी मंदिर से ही हो कर आ रहा हूँ। लो...तुम भी प्रसाद ले लो।""मुझे ना सच्ची....विश्वास ही नहीं...

संकल्प- लघुकथा

"तुझे पता है ना... मैं हमेशा सच बोलता हूँ मगर कड़वा बोलता हूँ। सीधी सच्ची बात अगर मेरे मुँह से तू सुनना चाहता है ना तो सुन... तू कामचोर था...तू कामचोर है।" राजेश, मयंक को समझा समझा कर थक जाने के बाद अपने हाथ खड़े करता हुआ बोला।"लेकिन भइय्या....(मयंक ने कुछ कहने का प्रयास किया।)" अब मुझे ही देख...मैं भी तो तेरी तरह इसी शहर में पिछले दो साल से हूँ लेकिन देख...गांव में इसी शहर की बदौलत मैंने पक्का मकान बना लिया...नयी मोटरसाइकिल खरीद ली और तूने बता इन दो सालों में क्या कमाया है? तेरे राशन...

चढ़ी जवानी बुड्ढे नूं

{पति ड्रेसिंग टेबल के आगे सज संवर रहा है ।उसको देख कर उसकी पत्नी कैमरे की तरफ मुंह करके शुरू हो जाती है।}"देखा आपने कैसे बुढ़ापे में इनको ये सब चोंचले सूझ रहे हैं।  बताओ...ज़रा से बाल बचे हैं सिर पर लेकिन जनाब को तो हफ्ते में दो बार शैम्पू विद कंडीशनर इस्तेमाल करना है और ड्रायर...ड्रायर तो बिना नागा रोज़ ही फेरना है। अब आप ही बताओ क्या रोज़ रोज़ ड्रायर फेरना सही है? एक तो पहले से ही खेत बंजर होता जा रहा है। ऊपर से ये क्या कि बची खुची फसल को सुखा मारो? माना की कभी शशि कपूर जैसी पर्सनैलिटी...

हींग लगी ना फिटकरी

"अच्छा...सुनो...मैं सोच रही थी कि बड़े दिन हो गए सिंपल सिंपल सा बनाते खाते हुए...तो  आज कुछ अच्छा बना लेती हूँ। बोलो..क्या बनाऊँ?""अपने आप देख लो।""नहीं...तुम बताओ..."सबसे अच्छा तो मेरे ख्याल से तुम मुँह बनाती हो।""तुम भी ना...हर टाइम बस मज़ाक ही करते रहा करो और कोई काम तो है नहीं।""अरे!....काम का तो तुम नाम ही मत लो। जब से ये मुय्या कोरोना शुरू हुआ है। काम धंधे तो वैसे ही सारे के सारे ठप्प पड़ गए हैं।""हम्म!...बात तो तुम सही ही कह रहे हो।""अच्छा...अब अगर तुम तशरीफ़ ले जाओ तो अपना मैं काम कर लूँ?""हुंह!...ये...

खिड़कियों से झाँकती आँखें- सुधा ओम ढींगरा

आमतौर पर जब हम किसी फ़िल्म को देखते हैं तो पाते हैं कि उसमें कुछ सीन तो हर तरह से बढ़िया लिखे एवं शूट किए गए हैं लेकिन कुछ माल औसत या फिर उससे भी नीचे के दर्ज़े का निकल आया है।  ऐसे बहुत कम अपवाद होते हैं कि पूरी फ़िल्म का हर सीन...हर ट्रीटमेंट...हर शॉट...हर एंगल आपको बढ़िया ही लगे। कमोबेश ऐसी ही स्थिति किसी किताब को पढ़ते वक्त भी हमारे सामने आती है जब हमें लगता है कि इसमें फलानी फलानी कहानी तो बहुत बढ़िया निकली लेकिन एक दो कहानियाँ... ट्रीटमेंट या फिर कथ्य इत्यादि के हिसाब से औसत दर्ज़े की भी...

बहुत दूर गुलमोहर- शोभा रस्तोगी

जब कभी भी हम अपने समकालीन कथाकारों के बारे में सोचते हैं तो हमारे ज़हन में बिना किसी दुविधा के एक नाम शोभा रस्तोगी जी का भी आता है जो आज की तारीख में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। लघुकथाओं के क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय काम किया है। ऐसे में जब पता चला कि इस बार जनवरी के पुस्तक मेले में उनकी एक नई किताब "बहुत दूर गुलमोहर" आ रही है तो उसे लेना तो बनता ही था। अब फुरसत के इन पलों में जब उनकी किताब को पढ़ने के लिए उठाया तो सुखद आश्चर्य के तहत पाया कि इस किताब में उनकी लघुकथाएँ नहीं बल्कि कुछ ...

खट्टर काका- हरिमोहन झा

कहते हैं कि समय से पहले और किस्मत से ज़्यादा कभी कुछ नहीं मिलता। हम कितना भी प्रयास...कितना भी उद्यम कर लें लेकिन होनी...हो कर ही रहती है। ऐसा ही इस बार मेरे साथ हुआ जब मुझे प्रसिद्ध लेखक हरिमोहन झा जी द्वारा लिखित किताब "खट्टर काका" पढ़ने को मिली। इस उपन्यास को वैसे मैंने सात आठ महीने पहले अमेज़न से मँगवा तो लिया था लेकिन जाने क्यों हर बार मैं खुद ही इसकी उपस्तिथि को एक तरह से नकारता तो नहीं लेकिन हाँ...नज़रंदाज़ ज़रूर करता रहा। बार बार ये किताब अन्य किताबों को खंगालते वक्त स्वयं मेरे हाथ...

नॉस्टेल्जिया

"नॉस्टेल्जिया"बताओ ना...पुन: क्यूँ रचें...लिखें...पढ़ें..या फिर स्मरण करें..एक दूसरे को ध्यान में रख कर लिखी गयी उन सब तमाम..बासी..रंगहीन..रसहीन प्रेम कविताओं को बताओ ना...क्यूँ स्मरण करें हम...अपने उस रूमानी..खुशनुमा दौर को क्या मिलेगा या फिर मिलने वाला है..आखिर!..इस सबसे अब हमें..सिवाए ज़िल्लत...परेशानी और दुःख के अलावा अब जब हम जानते हैं..अच्छी तरह से कि...अब इन सब बातों का..कोई असितत्व..कोई औचित्य नहीं...तुम भी खुले मन और अपने अंत:करण से...किसी और को स्वीकार कर चुकी हो...और...

सब्र

"सब्र"मुंह में दांत नहीं...पेट में आंत नहीं..फिर भी देख..मौजूद कितना..मुझमें सब्र है ब्याह करने को..अब भी उतावला हूँ..बेशक..पाँव लटके हैं..और तैयार देखो..हो रही मेरी कब्र है ...

कचरा- लघुकथा

"तंग आ गए यार खाली बैठे बैठे। तू बात कर ना शायद कहीं कोई ऑनलाइन काम ही मिल जाए। लॉक डाउन की वजह से यहाँ बाहर तो सब का सब ठप्प पड़ा है।""हाँ!...यार...खाली बैठे बैठे तो रोटियों तक के लाले पड़ने को हो रहे हैं।""तू बात कर ना कहीं। तेरी तो इतनी जान पहचान है।""हम्म....बात तो तू सही कह रहा है। खाली बैठे-बैठे तो मेरा दिमाग भी...लेकिन इस लॉक डाउन के चक्कर में अव्वल तो कोई काम मिलेगा नहीं और अगर कहीं कोई काम मिल भो गया तो पैसे बहुत थोड़े मिलेंगे।""पेट भरने लायक ही मिल जाएँ फ़िलहाल तो बस। कमाने की बाद में देख...

पते की बात- लघुकथा

क्या करें यार...यहाँ इस स्साले  लॉक डाउन में फँस कर तो बहुत बुरा हाल हो गया है। पता नहीं कब छुटकारा मिलेगा। इससे अच्छा तो घर ही चले जाते।" नरेश बड़बड़ाया।"अरे!...क्या खाक घर चले जाते? कोई जाने देता तब ना। सुना नहीं तूने कि बाडर पर ही रोक के रख रहे हैं सबको...घर जाने नहीं दे रहे। तो जब घर पहुंचना ही नहीं है तो जैसे यहाँ..वैसे वहाँ।" रमेश उसे समझता हुआ बोला।"हुंह!...जैसे वहाँ...वैसे यहाँ। शक्ल देखी है इस सड़ी सी सरकारी बिल्डिंग की...पेंट प्लास्टर सब उधड़ा पड़ा है। ऐसे लग रहा है जैसे जेल...
 
Copyright © 2009. हँसते रहो All Rights Reserved. | Post RSS | Comments RSS | Design maintain by: Shah Nawaz