धोखा- सुरेन्द्र मोहन पाठक

अगर आपको कभी लगे कि जो कुछ भी आप अपनी खुली आँखों से एकदम चकाचक देख रहे हैं..कानों से साफ़ साफ़ सुन रहे हैं..उसे शिद्दत के साथ महसूस भी कर रहे है, उसी चीज़.. बात या उसी आपकी आँखों देखी घटना को हर कोई आपके मुँह पर ही सिरे से नकार रहा है..आपके दिमाग़ का खलल कह कर सिरे से ख़ारिज़ कर रहा है..उसके वजूद से ही इनकार कर रहा है। तो सोचिए कि उस वक्त आप के दिल..आपके दिमाग ..आपके ज़हन पर क्या बीतेगी? क्या आपके सामने इसके सिवा और कोई चारा नहीं होगा कि आप सीधे सीधे उन्हें पागल करार दे दें? मगर...