ये आम रास्ता नहीं- रजनी गुप्त

आम रोज़मर्रा के जीवन से ले कर कला तक के हर क्षेत्र में हम सभी अपने मन में उमड़ते घुमड़ते विचारों को बाहर लाने के लिए अपनी रुचि एवं स्वभाव के हिसाब से कोई ना कोई तरीका अपनाते है।  भले ही कोई उन्हें चित्रकारी के ज़रिए मनमोहक  चित्र बना कर तो कोई उन्हें अपनी वाकपटुता के बल पर लच्छेदार तरीके से बोल बतिया कर व्यक्त करता है। कोई उन्हें अपने दमदार..संजीदा अभिनय के ज़रिए तो कोई अपनी लेखनी के ज़रिए अपने मनोभावों को अभिव्यक्त करता है। अब अगर मैं खुद अपनी बात करूँ तो मैं सामाजिक..राजनैतिक विसंगतियों...

बाक़ी सफ़ा 5 पर- रूप सिंह- सुभाष नीरव (अनुवाद)

कई बार राजनीति में अपने लाभ..वर्चस्व इत्यादि को स्थापित करने के उद्देश्य से अपने पिट्ठू के रूप में आलाकमान अथवा अन्य राजनैतिक पार्टियों द्वारा ऐसे मोहरों को फिट कर दिया जाता है जो वक्त/बेवक्त के हिसाब से उन्हीं की गाएँ..उन्हीं की बजाएँ। मगर ऐसे ही लोग दरअसल वरद हस्त पा लेने के बाद अपनी बढ़ती महत्ता को हज़म नहीं कर पाते और मौका मिलते ही अपने आलाकमान को आँखें दिखा..रंग बदलने से भी नहीं चूकते। आँख की किरकिरी या नासूर बन चुके ऐसे लोगों को सीधा करने..उन्हें उनकी औकात दिखाने.. निबटने अथवा छुटकारा पाने के...

खिड़कियों से झाँकती आँखें- सुधा ओम ढींगरा

आमतौर पर जब हम किसी फ़िल्म को देखते हैं तो पाते हैं कि उसमें कुछ सीन तो हर तरह से बढ़िया लिखे एवं शूट किए गए हैं लेकिन कुछ माल औसत या फिर उससे भी नीचे के दर्ज़े का निकल आया है।  ऐसे बहुत कम अपवाद होते हैं कि पूरी फ़िल्म का हर सीन...हर ट्रीटमेंट...हर शॉट...हर एंगल आपको बढ़िया ही लगे। कमोबेश ऐसी ही स्थिति किसी किताब को पढ़ते वक्त भी हमारे सामने आती है जब हमें लगता है कि इसमें फलानी फलानी कहानी तो बहुत बढ़िया निकली लेकिन एक दो कहानियाँ... ट्रीटमेंट या फिर कथ्य इत्यादि के हिसाब से औसत दर्ज़े की भी...

धूप के गुलमोहर- ऋता शेखर 'मधु'

आमतौर पर अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए सब एक दूसरे से बोल बतिया कर अपने मनोभावों को प्रकट करते हैं। मगर जब अपने मन की बात को अभिव्यक्त करने और उन्हें अधिक से अधिक लोगों तक संप्रेषित करने का मंतव्य हम जैसे किसी लेखक अथवा कवि का होता है तो वह उन्हें दस्तावेजी सबूत के तौर पर लिखने के लिए गद्य या फिर पद्य शैली को अपनाता है। जिसे साहित्य कहा जाता है। आज साहित्य की अन्य विधाओं से इतर बात साहित्य की ही एक लोकप्रिय विधा 'लघुकथा' की। लघुकथा..तात्कालिक प्रतिक्रिया के चलते किसी क्षण-विशेष में उपजे...

ताश के पत्ते- सोहेल रज़ा

कहते हैं कि हर इंसान की कोई ना कोई..बेशक कम या ज़्यादा मगर कीमत होती ही है।कौन..कब..किसके..किस काम आ जाए..कह नहीं सकते। ठीक उसी तरह जिस तरह ताश की गड्ढी में मौजूद उसके हर पत्ते की वक्त ज़रूरत के हिसाब से अपनी अपनी हैसियत..अपनी अपनी कीमत होती है। जहाँ बड़े बड़े धुरंधर फेल हो जाते हैं..वहाँ एक अदना सा.. कम वैल्यू वाला पत्ता या व्यक्ति भी अपने दम पर बाज़ी जिताने की कुव्वत..हिम्मत एवं हौंसला रखता है। पुराने इतिहास के पन्नों को खंगालने पर पता चलता है कि आज से हज़ारों साल पहले चीनी राजवंश की राजकुमारी...

अनुभूति- रीटा सक्सेना

जीवन की आपाधापी से दूर जब भी कभी फुरसत के चंद लम्हों..क्षणों से हम रूबरू होते हैं तो अक्सर उन पुरानी मीठी यादों में खो जाते हैं जिनका कभी ना कभी..किसी ना किसी बहाने से हमारे जीवन से गहरा नाता रहा है। साथ ही कई बार ऐसा भी मन करता है कि हम उन अनुभवों..उन मीठी यादों से औरों को भी रूबरू करवाएँ। तो ऐसे में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक अपनी बातें..अपने विचार पहुँचाने के मकसद से ये लाज़मी हो जाता है कि हम इसके लिए किसी ऐसे सटीक माध्यम का चुनाव करें जो अन्य दृश्य/श्रव्य माध्यमों के मुक़ाबले थोड़ा किफ़ायती भी हो...

सपनों का शहर- सेनफ्रांसिस्को- जयश्री पुरवार

अपने रोज़मर्रा के जीवन से जब भी कभी थकान..बेचैनी..उकताहट या फिर बोरियत उत्पन्न होने लगे तो हम सब आमतौर पर अपना मूड रिफ्रेश करने के लिए बोरिया बिस्तर संभाल.. कहीं ना कहीं..किसी ना किसी जगह घूमने निकल पड़ते हैं। हाँ.. ये ज़रूर है कि मौसम के हिसाब से हर बार हमारी मंज़िल..हमारा डेस्टिनेशन बदलता रहता है। कभी इसका बायस गर्म या चिपचिपे मौसम को सहन ना कर पाना होता है तो कभी हाड़ कंपाती सर्दी से बचाव की क्रिया ही हमारी इस प्रतिक्रिया का कारण बनती है। वैसे तो हर शहर..हर इलाके में ऐसा कुछ ना कुछ निकल ही आता...

Tej@ज़िंदगी यू टर्न- तेजराज गहलोत

किसी भी देश..राज्य..संस्कृति अथवा अलग अलग इलाकों में बसने वाले वहाँ के बाशिंदों का जब भी आपस में किसी ना किसी बहाने से मेल मिलाप होता है तो यकीनन एक का दूसरे पर कुछ ना कुछ असर तो अवश्य ही पड़ता है। उदाहरण के तौर पर 1980-81 से पहले विरले लोग ही भारत में नूडल्स के बारे में जानते थे लेकिन उसके बाद मैग्गी के चीन से चल कर हमारे यहाँ के बाज़ारों में आने के बाद अब हालत ये है कि हर दूसरी तीसरी गली में नूडल्स बनाने और बेचने वाले मिल जाएँगे। और नूडल्स भी एक तरह की नहीं बल्कि अनेक तरह की। कोई उसमें पनीर के...

खट्टर काका- हरिमोहन झा

कहते हैं कि समय से पहले और किस्मत से ज़्यादा कभी कुछ नहीं मिलता। हम कितना भी प्रयास...कितना भी उद्यम कर लें लेकिन होनी...हो कर ही रहती है। ऐसा ही इस बार मेरे साथ हुआ जब मुझे प्रसिद्ध लेखक हरिमोहन झा जी द्वारा लिखित किताब "खट्टर काका" पढ़ने को मिली। इस उपन्यास को वैसे मैंने सात आठ महीने पहले अमेज़न से मँगवा तो लिया था लेकिन जाने क्यों हर बार मैं खुद ही इसकी उपस्तिथि को एक तरह से नकारता तो नहीं लेकिन हाँ...नज़रंदाज़ ज़रूर करता रहा। बार बार ये किताब अन्य किताबों को खंगालते वक्त स्वयं मेरे हाथ में आती रही...

मन अदहन- मधु चतुर्वेदी

अगर किसी कहानी या उपन्यास को पढ़ते वक्त आपको ऐसा लगने लगे कि..ऐसा तो सच में आपके साथ या आपके किसी जानने वाले के साथ हो चुका है। तो कुदरती तौर पर आप उस कहानी से एक जुड़ाव..एक लगाव..एक अपनापन महसूस करने लगते हैं। ऐसा ही कुछ मुझे इस बार महसूस हुआ जब मुझे मधु चतुर्वेदी जी का प्रथम कहानी संग्रह 'मन अदहन' पढ़ने का मौका मिला। यूँ तो इस किताब को मैं कुछ महीने पहले ही मँगवा चुका था लेकिन जाने क्यों हर बार अन्य किताबों को पहले पढ़ने के चक्कर में एक मुस्कुराहट के साथ इस किताब का नम्बर आते आते रह जाता था कि इसे...

जिन्हें जुर्म ए इश्क पर नाज़ था- पंकज सुबीर

किसी भी तथ्यपरक कहानी या उपन्यास को लिखने के लिए गहन शोध की इस हद तक आवश्यकता होती है कि तमाम तरह की शंकाओं का तसल्लीबख्श ढंग से निवारण हो सके और उन तथ्यों को ले कर उठने वाले हर तरह के सवालों का जवाब भी यथासंभव इसमें समिलित हो।ऐसे ही गहन शोध की झलक दिखाई दी जब मैनें पढ़ने के लिए प्रसिद्ध कथाकार पंकज सुबीर जी का उपन्यास "जिन्हें जुर्म ए इश्क पर नाज़ था" उठाया। इस उपन्यास में मुख्यत: कहानी रामेश्वर और शाहनवाज़ नाम के एक शख्स  के बीच आपसी स्नेह,विश्वास एवं भाईचारे से जुड़े रिश्ते की बॉन्डिंग की है।...

निशां चुनते चुनते- विवेक मिश्र

कई बार कुछ कहानियाँ आपको इस कदर भीतर तक हिला जाती हैं कि आप अपने लाख चाहने के बाद भी उनकी याद को अपने स्मृतिपटल से ओझल नहीं कर पाते हैं। ऐसी कहानियाँ सालों बाद भी आपके  ज़हन में आ, आपके मन मस्तिष्क को बार बार उद्वेलित करती हैं। ऐसी ही कुछ कहानियों को फिर से पढ़ने का मौका इस बार मुझे हमारे समय के सशक्त कहानीकार विवेक मिश्र जी की चुनिंदा कहानियों की किताब "निशां चुनते चुनते" को पढ़ने के दौरान मिला। इस संकलन में उनकी चुनी हुई 21 कहानियों को संग्रहित किया गया है। धाराप्रवाह लेखनशैली और आंचलिक...

नैना- संजीव पालीवाल

अगर बस चले तो अमूमन हर इनसान अपराध से जितना दूर हो सके, उतना दूर रहना चाहता है बेशक इसके पीछे की वजह को सज़ा का डर कह लें अथवा ग़लत सही की पहचान भरा हमारा विवेक। जो अपनी तरफ से हमें इन रास्तों पर चलने से रोकने का भरसक प्रयास करता है। मगर जब बात अपराध कथाओं की हो तो हर कोई इनके मोहपाश से बंधा..इनकी तरफ़ खिंचा चला आता है। भले ही वो कोई लुगदी साहित्य का तेज रफ़्तार उपन्यास हो अथवा कोई फ़िल्म या वेब सीरीज़।उपन्यासों की अगर बात करें तो बात चाहे 'इब्ने सफी' की हो या फिर 'जेम्स हेडली चेइस' के हिंदी अनुवाद वाली...
 
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