अपने अपने मेघदूत- पूनम अहमद

किसी भी कहानी या उपन्यास के लेखन का मकसद अगर  ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक उसकी पहुँच.. उसकी पकड़ को बनाना हो तो ये लाज़मी हो जाता है कि उसकी भाषा..शैली एवं ट्रीटमेंट आम आदमी की समझ के हिसाब से यानी के सहज एवं सरल हो। ऐसे में ये ज़रूरी हो जाता है कि उन कहानियों की विषय वस्तु भी ऐसी हो कि आम पाठक उससे आसानी से खुद को कनैक्ट कर सके..जोड़ सके।दोस्तों..आज मैं लेखिका पूनम अहमद द्वारा लिखे गए एक ऐसे ही कहानी संकलन की बात करने जा रहा हूँ जिसमें हमारे समाज एवं आसपास के माहौल में घट रही घटनाओं का कहानियों...

गूँगे नहीं शब्द हमारे- सुभाष नीरव/ डॉ. नीरज सुघांशु(संपादन)

पुरुषसत्तात्मक समाज होने के कारण आमतौर पर हमारे देश मे स्त्रियों की बात को..उनके विचारों..उनके जज़्बातों को..कभी अहमियत नहीं दी गयी। एक तरफ पुरुष को जहाँ स्वछंद प्रवृति का आज़ाद परिंदा मान खुली छूट दे दी गयी। तो वहीं दूसरी तरफ नैतिकता..सहनशीलता..त्याग एवं लाज के बंधनों में बाँध महिलाओं का मुँह बन्द करने के हर तरफ से सतत प्रयास किए गए। उनका हँसना बोलना..मुखर हो कर तर्कसंगत ढंग से अपनी बात रखना तथाकथित मर्दों को कभी रास नहीं आया। मगर आज जब हमारे देश..समाज की महिलाएँ, पुरुषों के मुकाबले हर क्षेत्र..हर...
 
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