धनिका - मधु चतुर्वेदी

आज भी हमारे समाज में आम मान्यता के तहत लड़कियों की बनिस्बत लड़कों को इसलिए तरजीह दी जाती है कि लड़कियों ने तो मोटा दहेज ले शादी के बाद दूसरे घर चले जाना है जबकि लड़कों ने परिवार के साथ आर्थिक एवं सामाजिक स्तर पर साथ खड़े रह उनकी वंशबेल को और अधिक विस्तृत एवं व्यापक कर आगे बढ़ाना है। लड़की की शादी में मोटा दहेज देने जैसी कुप्रथा से तंग आ कर बहुत से परिवारों में लड़की के जन्मते ही या फिर उसके भ्रूण रूप में ही उसे खत्म कर देने का चलन चल निकला।दोस्तों..आज इस सामाजिक मुद्दे से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं इसी...

चौसर - जितेन्द्र नाथ

थ्रिलर उपन्यासों का मैं शुरू से ही दीवाना रहा हूँ। बचपन में वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यासों से इस क़दर दीवाना बनाया की उनका लिखा 250-300 पेज तक का उपन्यास एक या दो सिटिंग में ही पूरा पढ़ कर फ़िर अगले उपन्यास की खोज में लग जाया करता था। इसके बाद हिंदी से नाता इस कदर टूटा कि अगले 25-26 साल तक कुछ भी नहीं पढ़ पाया। 2015-16 या इससे कुछ पहले न्यूज़ हंट एप के ज़रिए उपन्यास का डिजिटल वर्ज़न ख़रीद कर फ़िर से वेदप्रकाश शर्मा जी का लिखा पढ़ने को मिला। उसके बाद थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के...

बर्फ़खोर हवाएँ - हरप्रीत सेखा - अनुवाद (सुभाष नीरव)

साहित्य को किसी देश या भाषा के बंधनों में बाँधने के बजाय जब एक भाषा में अभिव्यक्त विचारों को किसी दूसरी भाषा में जस का तस प्रस्तुत किया जाता है तो वह अनुवाद कहलाता है। ऐसे में किसी एक भाषा में रचे गए साहित्य से रु-ब-रू हो उसका संपूर्ण आनंद लेने के ज़रूरी है कि उसका सही..सरल एवं सधे शब्दों में किए गए अनुवाद को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाया जाए। अब रचना प्रक्रिया से जुड़ी बात कि आमतौर पर यथार्थ से जुड़ी रचनाओं के सृजन के लिए हम लेखक जो कुछ भी अपने आसपास घटते देखते..सुनते या महसूस करते हैं,...
 
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