हुण मौजाँ ही मौजाँ

***राजीव तनेजा***
बात पिछले साल की है। चार दिन बचे थे , त्योहार आने में। मैं मोबाइल से दनादन ‘एस.एम.एस’ पे 'एस.एम.एस' किए जा रहा था। क्रिसमस का त्योहार जो सिर पर था लेकिन ये ‘एस.एम.एस’ मैं अपने खुदगर्ज़ दोस्तों को या फिर मतलबी रिश्तेदारों को नहीं कर रहा था बल्कि इन्हें तो मैं उन एफ.एम रेडियो चैनल वालों को भेज रहा था जो गानों के बीच - बीच में अपनी टांग अड़ाते हुए बार- बार 'एस.एम.एस' करने की गुजारिश कर नाक में दम रहे थे कि फलाने - फलाने नम्बर पर 'जैकपॉट' लिख कर 'एस.एम.एस'...