हाथ बन्द ना हो और काम *&^%$#@ ना हो- राजीव तनेजा

“हैली!…इज इट…..9810821361? “येस्स!…स्पीकिंग"… “आप फलाना एण्ड ढीमका प्लेसमेंट एजेन्सी से बोल रहे हैं?”… “जी!…बिलकुल बोल रहे हैं"… “थैंक गाड…बड़ी ही मुश्किल से आपका नंबर लगा है…सुबह से ट्राई कर रहा हूँ"… “जी!…आजकल बड़ा सीज़न चल रहा है ना…इसलिए"… “ठण्ड का?”… “नहीं!…बेरोजगारी का"… “जी!…जिसे देखो…वही…मन हो ना हो…बेरोजगार बन के घूम रहा है"… “और जिसे ना देखो?”…. “वही कामयाब नज़र आता है"… “तो फिर जो कामयाब हैं…आप उन्हें क्यों नहीं देखते?”… “कैसे देख सकता हूँ?”…. “आँखों से"… “लेकिन देखते ही जो...

बोलो तारा रारा-राजीव तनेजा

शरद को हरविंदर मिला करके लम्बे हाथ करके लम्बे हाथ   थप्पड़ जोर से मारा थप्पड़ जोर से मारा काबू रहा ना गुस्से पे चढ गया ऊपर पारा…. चढ गया ऊपर पारा सूज गयी सारी आँख सूज गया बूत्था सारा सारे मिल के बोलो  तारा रारा…तारा रारा ***राजीव तनेजा***...

यार ने ही लूट लिया कच्छा यार का- राजीव तनेजा

"उफ़्फ़!…ये कमर का दर्द तो मेरी जान ले के रहेगा"मेरा कराहते हुए डाक्टर के क्लीनिक में प्रवेश... "डाक्टर साहब...नमस्कार"....    "कहिए!...तनेजा जी...कैसे हैं आप?".... "अब...यकीनन...बढ़िया तो हूँ नहीं...तभी तो आपके पास आया हूँ".... "जी!...ये तो मैं क्लीनिक में आपके एंट्री लेते ही समझ गया था".... "जी!... "बताइये!...क्या तकलीफ है आपको?"... "तकलीफ का तो क्या बताऊँ डाक्टर साहब?...अजीब-अजीब किस्म के रंगहीन सपने आ रहे हैं आजकल...कभी मैं बाईक पे तो कभी बाईक मुझ पर सवार नज़र आती है"..... "इसके...

अपना हाथ…जगन्नाथ- राजीव तनेजा

विचार इटली के...कहानी भारत की और ज़ुबान यू.पी की "हद हो गई यार ये तो बदइंतजामी से भरी भारी भरकम  लापरवाही की...मैं क्या आप सबकी जर  खरीदी हुई गुलाम हूँ?  या फिर छुट्टी से लौट आई कोई नाबालिग बँधुआ मजदूर हूँ?... ... क्या मैं अपनी मर्ज़ी से कहीं देर-सबेर आ-जा भी नहीं सकती?.... क्या मेरे अपने कुछ निजी सपने एवं स्वार्थ भरे अरमान नहीं हो सकते?.... मेरी अपने...अपने बच्चों के प्रति भी कुछ जिम्मेदारियाँ...कुछ कर्तव्य हैं... आप चाहते हैं कि मैं इन सबको तिलांजलि...

सुख भरे दिन बीते रे भइय्या...अब दुख आयो रे- राजीव तनेजा

"ओहो!...शर्मा जी आप... लीजिये... लीजिये... मोतीचूर के लड्डू लीजिये".... "क्यों भय्यी?....किस खुशी में लड्डू बांटे जा रहे हैं?"... "खुशी तो ऐसी है शर्मा जी की आप भी सुनेंगे तो खुशी के मारे उछल पड़ेंगे"... "ओह!...तो इसका मतलब ये कि घर में चौथा मेहमान आ गया है या फिर आने वाला है?".... "अब तो शर्मा जी चौथा क्या और पाँचवाँ क्या?...जितने भी मर्ज़ी मेहमान आ जाएँ बेशक ...कोई दिक्कत नहीं...कोई वांदा नहीं...अपना आराम से सबके सब एक ही कमरे में एडजस्ट हो जाएंगे"... "नया घर ले लिया है क्या?"... "नहीं!...दीवारें...

ये तो सच्ची…कसम से…टू मच हो गया… राजीव तनेजा

हद हो गई यार ये तो नासमझी की...पगला गए हैं सब के सब...दिमाग सैंटर में नहीं है किसी का... . बताओ!...जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी दूसरों को टोपी पहनाने में...उसे टोपी पहनने की नसीहत दे रहे हैं?.... टोपी!...वो भी किसकी?....अण्णा की... क्यों भय्यी?....और कोई भलामानस नहीं मिला क्या इस भरी-पूरी दुनिया में या मेरे साथ ही अपनी सारी दुश्मनी निकालने की सोची है आपने?...हुंह!...बड़े आए कहने वाले कि....पहन के टोपी हो जाओ तुम भी अण्णा".... अरे!....भय्यी...क्यों हो जाओ अण्णा?...काहे को हो जाओ अण्णा?...और...

मेरा अल्लाह भी तू....मेरा मौला भी तू- राजीव तनेजा

हे!...ऊपरवाले...हे!...परवरदिगार....हे!... कुल देवता...  बहुतों पर उपकार किए हैं तूने...बहुतों को सर चढ़ाया है... कुछ हमारी भी खबर ले... हे!... बहुतों के देवता.....हे!...सैंकड़ों के माई-बाप... सबकी रक्षा तू सदा करता चला आया है... कुछ हमारी भी सोच... तेरे सिवा अब हमारा कोई नहीं... ये आखिर हो क्या रहा है प्रभु हमारे इस देश में?....जगह-जगह धक्के खाने के बाद तीन?....सिर्फ तीन दिन मिले हैं अन्ना को अनशन के लिए?...वो भी पूरी गिन के बाईस शर्तों के साथ?...साथ ही ये हलफनामा देने के लिए कहा जा रहा...

नतीजा फिर भी वही…ठन्न…ठन्न…. गोपाल-राजीव तनेजा

ट्रिंग…ट्रिंग….ट्रिंग…ट्रिंग… “ह्ह….हैलो…श्श….शर्मा जी?”… “हाँ!…जी….बोल रहा हूँ…आप कौन?”… “मैं…संजू”….. “संजू?”….. “जी!….संजू…..पहचाना नहीं?…..राजीव तनेजा की वाईफ"…. “ज्ज…जी भाभी जी….कहिये…क्या हुक्म है मेरे लिए?…..सब खैरियत तो है ना?”… “अरे!…खैरियत होती तो मैं भला इतनी रात को फोन करके आपको परेशान क्यों करती?”…. “अरे!…नहीं…इसमें परेशानी कैसी?…अपने लिए तो दिन-रात…सभी एक बराबर हैं….आप बस…हुक्म कीजिये"…. “तुम कई दिनों से इन्हें छत्तीसगढ़ आने का न्योता दे रहे थे ना?”… “जी!…दे तो रहा था...
 
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