जनता स्टोर- नवीन चौधरी

ये उस वक्त की बात है जब दसवीं पास करने के बाद कई राज्यों में ग्यारहवीं के लिए सीधे कॉलेज में एडमिशन लेना होता था। दसवीं पास करने के बाद जब गौहाटी (गुवाहाटी) के गौहाटी कॉमर्स कॉलेज में मेरा एडमिशन हुआ तो वहीं पहली बार छात्र राजनीति से दबंग स्वरूप से मेरा परिचय हुआ। एक तरफ़ कनात नुमा तंबू  में माइक पर मैरिट के हिसाब से एडमिशन पाने के इच्छुक उन बच्चों के नाम एनाउंस हो रहे थे जिनका एडमिशन होने जा रहा था। साथ ही साथ उन्हें उसी तंबू में एक तरफ़ टेबल कुर्सी लगा कर बैठे क्लर्कों के पास फीस जमा करने के...

मल्लिका- मनीषा कुलश्रेष्ठ

कुछ किताबें पहले से पढ़ी होने के बावजूद भी आपकी स्मृति से विलुप्त नहीं हो पाती। वे कहीं ना कहीं आपके अंतर्मन में अपनी पैठ..अपना वजूद बनाए रखती हैं। आज एक ऐसे ही उपन्यास का जिक्र जिसे मैंने वैसे तो कुछ साल पहले पढ़ा था लेकिन मन करता है कि इसका जिक्र बार बार होता रहे। दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के उपन्यास 'मल्लिका' की। हिंदी कथा क्षेत्र में इनका नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यह उपन्यास पाठक को एक अलग ही दुनिया में.. एक अलग ही माहौल में अपने साथ.. अपनी ही रौ में बहाए लिए चलता...

दिल है छोटा सा- रणविजय

जहाँ एक तरफ कुछ कहानियों को पढ़ते वक्त हम उसके किरदारों से भावनात्मक तौर पर खुद को इस तरह जोड़ लेते हैं कि उसके सुख..उसकी खुशी को अपना समझ खुद भी चैन और सुकून से भर उठते हैं। तो वहीं दूसरी तरफ कुछ कहानियॉ मन को उद्वेलित करते हुए हमें इस कदर भीतर तक छू जाती हैं कि हम किरदार की पीड़ा..उसके दुःख दर्द को अपना समझ..उसी की तरह चिंतायुक्त हो..उसी बारे में सोचने को मजबूर होने लगते हैं। अमूमन एक किताब में एक ही कलेवर की रचनाएँ पायी जाती हैं लेकिन कई बार एक ही पैकेज में कई कई रंग जैसी ऑफर्स भी तो मिलती...

गीली पाँक- उषाकिरण खान

कई बार बड़े नाम..बड़े कैनवस वाली फिल्में भी अपने भीतर तमाम ज़रूरी..गैरज़रूरी मसालों के सही अनुपात में मौजूद होने के बावजूद भी महज़ इस वजह से बॉक्सऑफिस पर औंधे मुँह धराशायी हो ..धड़ाम गिर पड़ती हैं कि उनकी एडिटिंग..याने के संपादन सही से नहीं किया गया। मगर फ़ौरी तौर पर इसका खामियाज़ा इसे बनाने वालों या इनमें काम करने वालों के बजाय उन अतिउत्साही दर्शकों को उठाना पड़ता है जिन्होंने बड़ा नाम या बैनर देख कर अपने हज़ारों..लाखों रुपए, जो कुल मिला कर करोड़ों की गिनती में बैठते हैं, उस कमज़ोर फ़िल्म पर पूज या वार दिए। कमोबेश...

वो क्या था- गीताश्री (संपादन)

समूचे विश्व में इस बारे में तरह तरह की भ्रांतियां...विवाद एवं विश्वास विद्यमान हैं कि ईश्वर..आत्मा या रूह नाम की कोई अच्छी बुरी शक्ति इस दुनिया में असलियत में भी मौजूद है या नहीं। इस विषय को ले कर हर किसी के अपने अपने तर्क..अपने अपने विश्वास हैं जो कहीं ना कहीं..किसी ना किसी मोड़ पे दूसरे की बात को काटते हुए पुख्ता रूप से अपनी बात..अपने विश्वास/अविश्वास को सही साबित करने...मनवाने का प्रयास करते हैं।दरअसल हमारी पृथ्वी इतने अधिक रहस्यों से भरी पड़ी है कि ये दावा करना मुमकिन और तर्कसंगत नहीं है कि.."हमें...सब...

पांचाली प्रतिज्ञा- राहुल राजपूत

अमूमन मैं कविताओं और उनके संकलनों से थोड़ा दूर रह..उनसे बचने का प्रयास करता हूँ। ऐसा इसलिए नहीं कि कविताएँ मुझे पसंद नहीं या मुझे उनसे किसी प्रकार की कोई एलर्जी है। दरअसल मुझे ये लगता है कि कविताओं के बारे में ठोस एवं प्रभावी ढंग से कुछ कह या लिख पाने की मेरी समझ एवं क्षमता नहीं। अब इसे ऊपरवाले की मर्ज़ी..उसकी रज़ा समझ लें कि उसने मुझे इस सब की नेमत नहीं बक्शी है। ऐसे में जब कोई बड़े प्यार..मनुहार एवं स्नेह के साथ आग्रह करता है कि मैं अपनी समझ के हिसाब से उनके कविता संकलन पर कुछ सारगर्भित टिप्पणी करूँ...

वाग्दत्ता- मंजू मिश्रा

आमतौर पर जब भी कोई नया नया लिखना शुरू करता है तो उसके मन में सहज ही यह बात अपना घर बना लेती है कि उसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक इस प्रकार पहुँचना है कि सब उसकी लेखनी को जानें..समझें और उसकी प्रतिभा..उसके मुरीद होते हुए उसके लेखन कौशल को सराहें। इसी कोशिश में वह चाहता है कि जल्द से जल्द छप कर रातों रात प्रसिद्धि की नयी ऊँचाइयों.. नयी मंज़िलों..नयी कामयाबियों को प्राप्त करे। इसी उतावलेपन में छपने के लिए जहाँ वह 'सहज पके सो मीठा होय' के पुराने ढर्रे वाले नीरस..उबाऊ और समय खपाऊ तरीके को अपनाने के...

10वीं फेल- अजय राज सिंह

हर इम्तिहान में हर कोई अव्वल दर्जे से पास हो अपनी कामयाबी के झण्डे गाड़ ले...ये कोई ज़रूरी नहीं। असलियत में हमारा, ज़िन्दगी के इम्तिहान में पास होना ज़रूरी है कि हम उसमें पास होते या फिर फेल। आरंभिक शिक्षा की बात करें तो स्कूल वगैरह  की पढ़ाई हमें समाज में उठना बैठना..बोलना बतियाना सिखाती हुई उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हमारी नींव मजबूत करती है लेकिन अगर उच्च शिक्षा पाना मकसद ना हो तो ये ले के चलें कि इसमें ऐसा किताबी ज्ञान होता है जिसकी हमारे व्यवहारिक जीवन में हमें शायद ही कभी भूल भटके...
 
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