"सलाम-नमस्ते"

"सलाम-नमस्ते"***राजीव तनेजा***"हॉय!....".."हैलो!....".."सलाम!....".."नमस्ते!..."..."आदाब!....""इन सब में से दोस्तों!...मैँ आपको कुछ भी नहीं कहने वाला"..."वो दर असल बात कुछ यूँ है कि अब ये अपने हिन्दी ब्लॉग तो ऊपरवाले की दया से और....आप जैसे दोस्तों की कडी मशक्कत से दिन दूनी रात चौगुनी तेज़ी से बढते ही जा रहे हैँ और...अपुन के ब्लॉग पे भी ट्रैफिक कुछ बढता ही जा रहा है""ब्लागज़ पे ट्रैफिक यूँ ही बढता रहेगा गर...तुम पढोगे प्यार से लेकिन...एक चीझ नोट किया हूम ने कि सिर्फ 'तीने ठौ डॉलर' भर ही इकट्ठा हो पाया है...पूरे तीन महीने कीबोर्ड पे उंगलियाँ चटखाने के बाद"..."उसके बाद भी भेजवा में कुलबुलाती हुई कशम्कश जारी के..."ई 'गूगल' वाले...

"चौथा खड्डा"

"चौथा खड्डा"बंता:संता सिंह जी!..ये खड्डा किसलिए खोदा जा रहा है?"संता:ओ!..कुछ नहीं जी मुझे अमेरिका जाना है ना...इसलिए"बंता:अमेरिका जाना है?"संता:हाँ जी!.."बंता:अमेरिका जाने के लिए खड्डा खोदना जरूरी है?संता:ओ!..कर दी ना तूने सरदारों वाली गल्ल...बेवाकूफ पॉसपोर्ट बनवाने के लिए फोटो चाहिए होती है कि नहीं?बंता:फोटो तो चाहिए होती है लेकिन...फोटो से खड्डे का क्या कनैक्शन है?संता:अरे बेवाकूफ!पॉसपोर्ट फोटो में कमर के ऊपर का हिस्सा आना चाहिए...इसलिए कमर तक गहरे खड्डे खोद रहा हूँ ताकि नीचे का हिस्सा कैमरे में न आएबंता:लेकिन यहाँ तो आप आलरैडी तीन खड्डे पहले ही खोद चुके हो...फिर ये चौथा क्यों?संता:बेवाकूफ पॉसपोर्ट में चार फोटो लगानी पडती...

"गधे के पीछे गधा"

"गधे के पीछे गधा""सरदार संता सिंह अँग्रेज़ी का माना हुआ टीचर था""उनके विधार्थी हमेशा अव्वल आते थे""एक दिन स्कूल की इंस्पैकशन थी"...."इंस्पैक्टर ने अँग्रेज़ी कक्षा का इम्तिहान लेने की सोची और...वो चुपचाप क्लास के बाहर खडा होकर सुनने लगा कि...संता सिंह क्या पढा रहा है?""इंस्पैक्टर बेचारा परेशान कि ये कैसी...किस तरीके की पढाई हो रही है?"संता सिंह:"बोलो बच्चो!...'गधा'..."सभी बच्चे:"गधा"...संता सिंह:"बोलो बच्चो!...गधा..गधे के पीछे गधा"सभी बच्चे:"गधा...गधे के पीछे गधा"संता सिंह:"बोलो बच्चो!...गधा..गधे के पीछे गधा,गधे के पीछे मैँ"सभी बच्चे:"गधा..गधे के पीछे गधा,गधे के पीछे मैँ"संता सिंह:"बोलो बच्चो...गधा..गधे के पीछे गधा,गधे के पीछे...

"शाही पनीर या फिर दाल मक्खनी"

"शाही पनीर या फिर दाल मक्खनी"***राजीव तनेजा***"बहुत दिनों बाद एक दोस्त मिला...आँखे सूजी हुई....चेहरा पीला पडा हुआ....थकान के मारे बुरा हाल...नींद के नशे में ऐसे चूर...मानों कई बोतल एक साथ चढा रखी हों""मैँ चकराया कि ये बन्दा तो ऊपरवाले ने बडा ही नेक बनाया था"..."इसे क्या हो गया?""खैर!..आराम से बिठाया अपने पास"..."फिर एक 'डबल डोज़'वाली कडक'कॉफी'बना के पेश की तो थोडी देर में आँखे खुलने लायक हुई"मैने पूछ डाला"ये क्या हाल बना रखा है?"..."कुछ लेते क्यूँ नहीं?"वो चौंक के बोला"कैसा हाल बना रखा है?"..."और..मैँ कुछ लूँ भी तो क्यूँ लूँ?""अगर कुछ लेना भी है तो...लें मेरे दुशमन""मैँ भला कुछ क्यूँ लेने लगा?"अब मेरा दिमाग घूमा,बोला"अरे वाह!...लडखडा...

"स्टिंग आप्रेशन"

"स्टिंग आप्रेशन"***राजीव तनेजा***"हद हो गयी इन'स्टिंग आप्रेशनों'की".."किसी को भी नहीं बक्शते""पता नहीं क्या मिलता है इनको गडे मुर्दे उखाडने से?"या फिर..."क्या मिल जाएगा इस सब से?" "किसी की इज़्ज़त-आबरू को कुछ समझते ही नहीं ये'मीडिया'वाले""इन्हें तो बस अपनी'टी.आर.पी'की पडी होती है कि...'कैसे भी'...'किसी भी जायज़-नाजायज़ तरीके से बस बढनी चाहिए""पता नहीं किसका हाथ है इस सब के पीछे?"..."कौन करवा रहा है ये सब?""ऐसे कई सवाल हमारे-आपके दिमाग में किलोल करते है हरदम लेकिन...कोई उत्तर नहीं शांत कर पाता हमारी...

"दुनिया आपकी जेब में"

"दुनिया आपकी जेब में" ***राजीव तनेजा***"हाँ!. ..हाँ!...."जी हाँ"..."एक रास्ता"....."सिर्फ'एक-इकलौता'रास्ता....इस गलाकाट प्रतियोगिता से निबटने का"..."जी हाँ!...""सिर्फ एक कदम"..."या फिर"..."एक सही फैसला"...और"आप दुनिया की भीड में'सबसे अलग'...'सबसे जुदा'...'सबसे आगे'होंगे""मीलों आगे"..."कोई'कम्पीटीटर'आस-पास भी नहीं फटक पाएगा"बस एक!..'सीधा-सरल'रास्ता और...."दुनिया आपकी मुट्ठी में"या यूँ कहें कि...."दुनिया आपकी जेब में होगी"...........................***राजीव तनेजा...

"क्या मालूम कल हो ना हो?"

"क्या मालूम कल हो ना हो?""राजीव तनेजा " "अजी सुनते हो!...""चुप कराओ अपने इस लाडले को""रो-रो के बुरा हाल करे बैठा है" "चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा""लाख कोशिशे कर ली पर ना जानें आज कौन सा भूत सवार हुए बैठा है कि...उतरने का नाम ही नहीं ले रहा""अब क्या हुआ?"..."सीधी तरह बताती क्यों नहीं?""जिद्द पे अड़े बैठे है जनाब!..कि'चाकलेट'लेनी है और वही लेनी है जिसका'ऐड'बार-बार'टीवी'पे आ रहा है""तो दिलवा क्यों नहीं दी?""अरे!...मैने कब ना करी है?"..."कईं बार तो भेज चुकी हूँ'शम्भू'को बाजार"..."खाली हाथ लौट आया...

"हर फिक्र को धुएँ में उडाता चला गया"

"हर फिक्र को धुएँ में उडाता चला गया"***राजीव तनेजा***'गान्धी जी'भी नहीं रहे....'सुभाष जी'भी चल बसे...'जवाहरलाल जी'भी कब के ऊपर पहुँच गए..."मेरी भी तबियत कुछ ठीक नहीं रहती..."ना जाने कब लुढक जाऊँ""पता नहीं इस देश का क्या होगा?""अब रोज़-रोज़ बिना रुके लगातार'सूटटे'मारुंगा तो तबियत तो बिगडनी ही है लेकिन...क्या करूँ ये साला!...दिल है के मानता नहीं""बहुत कोशिश कर ली...लेकिन ये मुय्यी ...ऐसी लत लगी है कि इसको सहा भी नहीं जाता और ...इसके बिना रहा भी नहीं जाता"..."अब तो आँखों के आगे अन्धेरा सा भी छाने लगा...

क्या से क्या हो गया?"

"क्या से क्या हो गया?"***राजीव तनेजा***"मैने उसे क्या समझा?और...वो क्या निकली""दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा...बरबादी की तरफ ला के छोडा""शायद ही इस पूरे जहाँ में मुझे कोई इतना प्यारा था लेकिन..."जिस से जितना प्यार करो...वो उतना ही दूर भागता है"..."ये बुज़ुर्गों का कहा आज मुझे समझ आया लेकिन क्या फायदा जब.."चिडिया चुग गयी खेत""जिस कम्भख्त मारी के नाम मैने अपनी तमाम ज़िन्दगी कर दी...उसी ने मुझे'दगा'दिया""काश!....एक बार"..."बस एक बार वो मुझ से कह के तो देखती"...."मै खुद ही अपने आप सब कुछ'सैटल'कर देता""आखिर...
 
Copyright © 2009. हँसते रहो All Rights Reserved. | Post RSS | Comments RSS | Design maintain by: Shah Nawaz