हम नहीं चंगे..बुरा ना कोय- सुरेन्द्र मोहन पाठक

टीवी...इंटरनेट और मल्टीप्लेक्स से पहले एक समय ऐसा भी था जब मनोरंजन और जानकारी के साधनों के नाम पर हमारे पास दूरदर्शन, रेडियो,अखबारें और बस किताबें होती थी। ऐसे में रेडियो और दूरदर्शन के जलवे से बच निकलने के बाद ज़्यादातर हर कोई कुछ ना कुछ पढ़ता नज़र आता था और पढ़ने की कोई ना कोई सामग्री हर किसी के हाथ में अवश्य नज़र आती थी। भले ही वो बच्चों के हाथों में कॉमिक्स के रूप में तो बड़ों के हाथों मे कोई ना कोई कहानी/कविता संकलन अथवा उपन्यास अपनी हाज़री बजा..उपस्थिति दर्ज कराता हुआ नज़र आता था। बस अड्डों और रेलवे...

आदम ग्रहण- हरकीरत कौर चहल, सुभाष नीरव (अनुवाद)

"कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता/कहीं ज़मीं नहीं मिलती..कहीं आसमां नहीं मिलता"ज़िन्दगी में हर चीज़ अगर हर बार परफैक्ट तरीके से..एकदम सही से..बिना किसी नुक्स..कमी या कोताही के एक्यूरेट हो..मेरे ख्याल से ऐसा मुमकिन नहीं। बड़े से बड़ा आर्किटेक्ट..शैफ या कोई नामीगिरामी कारीगर भी हर बार उम्दा तरीके से अपने काम को अंजाम दे..यह मुमकिन नहीं। कभी ना कभी..कहीं ना कहीं तो हर किसी से कोई ना कोई छोटी बड़ी चूक..कोताही या ग़लती हो ही सकती है। और इस बात का अपवाद तो खैर..वो ऊपर बैठा परवरदिगार भी नहीं जिसने हमारे...

ट्वेल्थ फेल- अनुराग पाठक

किसी ऐसी किताब के बारे में अगर पहले ही इतना कुछ लिखा..सुना एवं पढ़ा जा चुका हो कि उस पर लिखते वक्त सोचना पड़ जाए कि ऐसा क्या लिखा जाए जो पहले औरों ने ना लिखा हो। एक ऐसी किताब जो पहले से ही धूम मचा...पाठकों के समक्ष अपने नाम का झण्डा गाड़ चुकी हो। एक ऐसी किताब जिसका दसवाँ संस्करण आपके हाथ में हो। एक ऐसी किताब जो टीवी से ले कर अखबारों..पत्र पत्रिकाओं और यूट्यूब चैनल्स तक...हर जगह छाई हो। एक ऐसी किताब जिसकी तारीफ में सचिन तेंदुलकर, सुनील गावस्कर, राजकुमार हिरानी, विशाल भारद्वाज, आशुतोष राणा,...

सिद्धपुर की भगतणें- लक्ष्मी शर्मा

किसी भी क्षेत्र के समाज..वहाँ की संस्कृति...वहाँ की भाषा और रीति रिवाजों को जानने..समझने का सबसे बढ़िया तरीका है कि वहाँ के ग्रामीण अंचल की तसल्लीबख्श ढंग से खोज खबर लेते हुए..सुद्ध ली जाए मगर संयोग हमेशा कुछ कुछ ऐसा बना कि मैं शहरी क्षेत्र से ही हर बार वापिस निकल आया मानों शहर के एन बीचों बीच किस्मत ने कस के खूँटा गाड़ दिया हो कि..."ले!...इसके आले द्वाले जितना मर्ज़ी घूम ले मगर भीतर बड़ने का नाम भी मति ले लेइयो।"अब सिर्फ शहर भर में ही घूमने से तो बस वही चटपटा शहरी स्वाद..वही ट्रैफिक की रेलमपेल, वहीं...

शह और मात- मंजुश्री

जब भी कभी कोई कहानी या किताब आपकी अब तक की पढ़ी गयी सब कहानियों या उपन्यासों की भीड़ में अपने अलग विषय..कंटैंट एवं ट्रीटमैंट की वजह से अपना रास्ता खुद बनाती नज़र आए तो समझो..आपका दिन बन गया। दोस्तों..आज मैं धाराप्रवाह लेखन से सजी एक ऐसी किताब की बात कर रहा हूँ जिसकी पहली कहानी ने ही अपने विषय एवं ट्रीटमैंट की वजह से मुझे ऐसा आकर्षित किया कि मैं पूरी किताब एक दिन में ही पढ़ कर ख़त्म कर गया जबकि अमूमन मैं दो से तीन दिन एक किताब को तसल्लीबख्श ढंग से पढ़ने में लगा देता हूँ। 'शह और मात' नाम के...

B- 15 B फोर्थ फ्लोर- संजीव कुमार गंगवार

अमूमन अपनी जिंदगी में हम सैकड़ों हज़ारों लोगों को उनके नाम..उनके काम..उनकी पहचान से जानते हैं। मगर क्या वे सब के सब हमारे जीवन में इतना अधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं कि उन सभी का किसी कहानी या उपन्यास में असरदार तरीके से जिक्र या समावेश किया जा सके? मेरे ख्याल से..नहीं। ना ही ऐसा करना सही.. व्यवहारिक एवं तर्कसंगत भी होगा क्योंकि बिना ज़रूरत किसी भी कहानी में इतने अधिक किरदारों का समावेश उसे कुछ और नहीं बल्कि बस चूँ चूँ मुरब्बा ही बना देगा। मगर इसी अवधारणा को ग़लत साबित करने का प्रयास अपनी...

अटकन चटकन- वंदना अवस्थी दुबे

क़ुदरती तौर पर कुछ चीज़ें..कुछ बातें...कुछ रिश्ते केवल और केवल ऊपरवाले की मर्ज़ी से ही संतुलित एवं नियंत्रित होते हैं। उनमें चाह कर भी अपनी मर्ज़ी से हम कुछ भी फेरबदल नहीं कर सकते जैसे...जन्म के साथ ही किसी भी परिवार के सभी सदस्यों के बीच, आपस का रिश्ता। हम चाह कर भी अपने माता-पिता या भाई बहनों को बदल नहीं सकते कि..."हे!...मेरे परवरदिगार...है!...मेरे मौला, ये पिता या माँ अथवा भाई या बहन हमें पसंद नहीं। इन्हें बदल कर आप हमें दूसरे अभिभावक या भाई-बहन दे दीजिए।"साथ ही हर व्यक्ति की पैदाइश के साथ ही ऊपरवाले...

छाप तिलक सब छीनी- सुनीता सिंह

कहते हैं कि हर तरह की शराब में अलग अलग नशा होता है। किसी को पीते ही एकदम तेज़ नशा सोडे की माफ़िक फटाक से सर चढ़ता है जो उतनी ही तेज़ी से उतर भी जाता है। तो किसी को पीने के बाद इनसान धीरे धीरे सुरूर में आता है और देर तक याने के लंबे समय तक उसी में खोया रहता है। कुछ इसी तरह की बात किताबों को ले कर भी कही जा सकती है। कुछ किताबें शुरुआती दो चार पृष्ठों में ही पाठक को अपने रंग में रंग लेती हैं और किताब के समाप्त होने तक उसके ध्यान..उसकी एकाग्रता..उसकी तवज्जो को उससे दूर नहीं होने देती लेकिन बाद में उस किताब...
 
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