"ना हींग लगी ना फिटकरी...रंग चढा चोखा ही चोखा"

"ना हींग लगी ना फिटकरी...रंग चढा चोखा ही चोखा"***राजीव तनेजा***"शर्मा जी मुबारक हो"...."लालू ने इस बार बजट बड़ा ही धांसू पेश किया है"....."बिना लड़े ही ज़्यादातर विरोधी पहले फटके में ही चारों खाने चित्त"मैँ ट्रेन में चढते वक्त शर्मा जी से बोला"अजी काहे का धांसू बजट?"मेरे पीछे पीछे आ रहे गुप्ता जी बोले"सब आँकड़ों का खेल है..."दरअसल!...खोखले मुनाफे का ऐसा मकड़जाल बुना है हमारे चारों तरफ लालू ने कि उनके बजट की असलियलत जानने में ही कई महीने लग जाएंगे"..."और जान पाएं...इसकी भी कोई निश्चित गारंटी नहीं""बेटा!..दरअसल...

मेरी दूसरी कहानी नवभारत टाईम्स पर

मेरी दूसरी कहानी नवभारत टाईम्स पर"बस, बन गया डाक्टर"राजीव तनेजा " कई दिनों से बीवी की तबियत दुरुस्त नहीं थी ".... कई बार उसने मुझसे कहा भी कि डॉक्टर के पास ले चलो लेकिन मुझे अपने काम - धंधे से फुरसत हो तब ना। हर बार किसी न किसी बहाने से टाल देता। एक दिन बीवी ने खूब सुनाई कि मेरे लिए ही तो टाइम नहीं है जनाब के पास, वैसे पूरी दुनिया की कोई भी बेकार से बेकार, कण्डम से कण्डम भी आ के खडी हो जाए सही, लार टपक पड़ती है जनाब की। लट्टू की तरह नाचते फिरते हैं चारों तरफ। अब भला कैसे समझाऊ इस बावली को कि आजकल...

"यस!.. वी आर दा बैस्ट कॅपल"

"यस!.. वी आर दा बैस्ट कॅपल"***राजीव तनेजा***"कुछ याद भी रहता है इसे?....आज का दिन तो कम से कम बक्श देना था...लेकिन नहीं..."बरसों से पाल-पोस कर परिपक्व की हुई ब उरी आदत भला एक दिन के लिए क्यों त्यागी जाए?"...."यही सोचा होगा शायद"..."कम्भख्त मारी को कम से कम इस दिन का तो ख्याल रखना चाहिए था""ये क्या कि बाकि दिनों की तरह इस दिन भी खुशी को ठेंगा दिखा चलता कर दिया जाए?""ओफ्फो!...इस अशांति भरे महौल में कोई कुछ लिखे भी तो कैसे?"मैँ कीबोर्ड पर उँगलियाँ चटखाता हुआ गुस्से से चिल्लाया"मेरी आवाज़ दिवारों से...

"बीती ताहीं बिसार के"

"बीती ताहीं बिसार के"***राजीव तनेजा***बीती ताहीं बिसार के....आगे सोचने को जी चाहता है....बहुत गल्तियाँ कर ली...अब सुधरने को जी चाहता है चौरासी,बाबरी और गोधरा पर शर्मिंदा हैँ क्या कहें अब बस रोने को जी चाहता हैलड़ लड़ कर देख लिया बहुत बारअब शिक्वे भूल गले लगाने को जी चाहता हैउड लिए पंख फैला ऊँची उड़ानअब नीचे उतरने को जी चाहता है पूरी हुई हसरतें बहुतेरीअब बस वैराग्य को जी चाहता है जी लिए बहुत उल्टा सीधा कर केअब बस सुकून से मरने को जी चाहता हैचल के देख लिया पुराने ढर्रे पे कई मर्तबाअब नई राहें नई मंज़िलें...

"निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज है"

"निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज है"***राजीव तनेजा***माना कि...अपनों के बीच... अपने शहर मेंचलती तेरी बड़ी ही धाक है सही में...विरोधियों के राज में भी तू. ..गुंडो का सबसे बडा सरताज है ...हाँ सच!...तू तो अपने ठाकरे का ही 'राज' है...सुना है!...समूची मुम्बई पे चलता तेरा ही राज है अरे!...अपनी गली में तो कुता भी शेर होता है...आ के देख मैदान ए जंग में...देखें कौन. ..कहाँ... कैसे ढेर होता हैसुन!...सही है...सलामत है...चूँकि मुम्बई में है...आ यहाँ दिल्ली में...बताएँ तुझे ...निबटने की तुझसे कितनी हम में खाज...

अलख निरंजन -राजीव तनेजा

    "अलख निरंजन!…बोल. ..बम...चिकी बम बम….अलख निरंजन....टूट जाएं तेरे सारे बंधन" कहकर बाबा ने हुंकारा लगाया और इधर-उधर देखने के बाद मेरे साथ वाली खाली सीट पर आकर बैठ गया “पूरी ट्रेन खाली पड़ी है लेकिन नहीं…सबको इसी डिब्बे में आकर मरना है”बाबा के फटेहाल कपड़ों को देखते हुए मैं बड़बड़ाया “सबको, मेरे पास ही खाली सीट नज़र आती है। कहीं और नहीं बैठ सकता था क्या?” मैं परे हटता हुआ मन ही मन बोला “कहाँ जा रहे हो बच्चा?” मेरी तरफ देखते हुए बाबा का सवाल “पानीपत”मेरा अनमना सा संक्षिप्त जवाब था...
 
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