गुलाबी नदी की मछलियाँ- सिनीवाली

फेसबुक पर जब मैं पहले पहल आया तो खुद ब्लॉगर होने के नाते उन्हीं ब्लॉगर्स के संग दोस्ती की। समय के अंतराल के साथ इसमें बहुत से नए पुराने लेखक और कवि भी जुड़ते चले गए। उस वक्त मुझे यह खुशफहमी थी कि.. 'मैं बहुत बढ़िया लिखता हूँ।' लेकिन वो कहते हैं ना कि..'ऊँट को भी कभी ना कभी पहाड़ के नीचे आने ही पड़ता है।' तो जी..मुझे भी आना ही पड़ गया। अब जब कुछ सालों पहले मैंने औरों का लिखा थोड़ा बहुत ढंग से पढ़ना शुरू किया तो पाया कि मेरा लेखन तो उनके आसपास भी नहीं फटकता है।  खैर..इस स्वीकारोक्ति के बाद एक महत्त्वपूर्ण...

तुम्हारी लंगी- कंचन सिंह चौहान

कुछ कहानियाँ के विषय एवं प्लॉट सरंचना इतनी ज़्यादा सशक्त एवं प्रभावी होती है कि पढ़ते वक्त वे आपके मन में भीतर इस कदर रच बस जाती हैं कि घँटों तक आप उनके मोहपाश..उनके तसव्वुर से बच नहीं पाते। उन्हें पढ़ चुकने के बाद भी आप उनमें इस हद तक खोए रहते हैं कि कुछ समय तक आपको किसी अन्य चीज़ की बिल्कुल भी सुधबुध नहीं रहती। उस पर भी अगर कहानियॉं वेदना..दुख..हताशा..अवसाद से लबरेज़ हों तो आप भी उसी दुःख..उसी पीड़ा..उसी वेदना में शरीक होते हुए खुद भी ऐसा महसूस करने लगते हैं जैसे सब कुछ हूबहू आपके सामने ही घट एवं आप...

लॉक उन डेज़- कामना सिंह

सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य समाज में सबके साथ घुल मिल कर रहने का आदि है। ऐसे में यह कल्पना करना भी मुश्किल हो जाता है कि हम जहाँ पर हों, वहाँ पर दूर दूर तक हमसे बात करने..बोलने बतियाने..गुफ्तगू करने वाला कोई ना हो। किसी इनसान को देखने तक को हमारी आँखें तरस जाएँ और हम बस एकालाप करते हुए हर समय गहन सोच में डूब, अपनी बीत चुकी ज़िन्दगी को याद एवं आने वाले भयावह दिनों की कल्पना मात्र से ही डर कर सिहरते रहें। सोते जागते हर समय बस यही दुआ करते रहें कि.. काश..कोई हमसे बात करने वाला..हमें देखने सुनने...

बेरंग लिफ़ाफ़े- मनीष भार्गव

कई बार कुछ पढ़ते हुए अचानक नॉस्टेल्जिया के ज़रिए हम उस वक्त..उस समय..उस माहौल में पहुँच जाते हैं कि पुरानी यादें फिर से ताज़ा हो..सर उठाने को आमादा होने लगती हैं। दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ नॉस्टेल्जिया के ज़रिए फिर से पुराने समय..पुराने माहौल की तरफ़ ले जाते एक ऐसे ही उपन्यास 'बेरंग लिफ़ाफ़े' की। जिसे लिखा है मनीष भार्गव ने और यह उनकी पहली कृति है।मेट्रो के सफ़र से शुरू हुई इस उपन्यास की कहानी के आरंभ में ही मुख्य किरदार से मध्यप्रदेश से दिल्ली आयी हुई वहाँ की पुलिस कुछ तफ़्तीश करती दिखाई देती है। उन्हें...

मुझसे कैसा नेह- अलका सिन्हा

आम तौर पर जब हम नया नया पढ़ना शुरू करते हैं तो हमें पता नहीं होता कि किसे हम पढ़ें और किसे नहीं। ऐसे में रामबाण औषधि के रूप मे आँखें मूंद कर अन्य लोगों की तरह हम भी बड़े लेखकों और उनके रचनाकर्म को ही अपना मनमीत बना, उस पर अपने अध्यन के श्रद्धा रूपी पुष्प सुमन अर्पित कर खुद को कृतार्थ समझने लगते हैं। हमारी ज़्यादातर प्राथमिकता बड़े लेखकों...बड़े प्रकाशकों के नामों की रहती है और इस चक्कर में समकालीन एवं नवांगतुक नाम हमारी वरीयता की सूची में आने से बचे रह जाते हैं जबकि उनका लेखन भी कई बार अव्वल दर्जे का...

दुमछल्ला- निशान्त जैन

ऐसा नहीं है कि कोई भी व्यक्ति हमेशा अच्छा या फिर हमेशा बुरा ही हो। अपने व्यक्तिगत हितों को साधने..संवारने..सहेजने और बचा कर रखने के प्रयास में वो वक्त ज़रूरत के हिसाब से अच्छा या बुरा..कुछ भी हो सकता है। यह सब उसकी इच्छा.. परिस्थिति एवं मनोदशा के हिसाब से नियंत्रित होता है। दूसरी अहम बात ये कि हम चाहे जितना मर्ज़ी कह या हाँक लें कि.."हम अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं।" मगर हमारी मर्ज़ी भी कहीं ना कहीं घर परिवार या समाज द्वारा ही नियंत्रित होती है।दोस्तों..मानवीय रिश्तों को ले कर इस तरह की गूढ़ ज्ञान भरी बातें...

कितने मोर्चे- वन्दना यादव

“कितने मोर्चे”Vandana Yadav जी का यह उपन्यास अपने आप में अनूठा है। अनूठा इसलिए कि अब तक सेना की पृष्ठभूमि और उसमें भी खास तौर पर हमारे फौजियों की अकेली रह रही बीवियों की व्यथा और उनकी कथा का इस उपन्यास में बहुत ही रोचक ढंग से ताना-बाना बुना गया है। ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि स्त्री नज़रिए से किसी ने इस सन्दर्भ में अपनी...अपने मन की बात कही हो। ये अलग नज़रिया भी इस उपन्यास को आम की श्रेणी से हटा कर ख़ास बनाता है।रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के मुद्दों को लेकर इस उपन्यास में उनका विस्तार से विवरण या यूँ कह लें...

लेडीज़ सर्कल- गीताश्री

 कुछ कहानियाँ तुरत फुरत में पढ़ कर बस निबटा भर दी जाती हैं और कुछ को पढ़ते समय आपको अतिरिक्त रूप से सजग हो कर कुछ एक्स्ट्रा प्रयास करना पड़ता है कि कहीं कुछ..थोड़ा सा भी छूट ना जाए और वो कहानी अपनी तमाम विषमताओं, संवेदनाओं एवं आवेगों के साथ आपके दिमाग में  भीतर..गहरे तक अपनी पैठ बना सके।  हमारे बीच ऐसे ही गहन  विषयों को ले कर रची गयी कहानियों की रचियता हैं गीताश्री। उनकी कहानियों में हर बार मुझे एक अलग वेवलेंथ...एक अलग ट्रीटमेंट दिखाई देता है। विषयानुसार अपनी कहानियों में...

दुल्हन माँगे दहेज- वेद प्रकाश शर्मा

अगर आप पल्प फिक्शन याने के लुगदी साहित्य दीवाने या फिर मुरीद हैं या फिर कभी आपने अपने जीवन में इन तथाकथित लुगदी साहित्य के उपन्यासों पर एक गंभीर या फिर सतही तौर पर नज़र दौड़ाई है  तो यकीनन आप स्व.वेदप्रकाश शर्मा जी के नाम से अनजान नहीं होंगे। पल्प फिक्शन के जादूगर वेदप्रकाश शर्मा जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं। सैंकड़ों की संख्या में उन्होंने जासूसी तथा सामाजिक ताने बाने में रचे थ्रिलर उपन्यासों की रचना की है। उनके लिखे कुछ उपन्यासों पर सीरियल तथा फिल्में भी बनी जो काफी हिट भी हुई।कुछ...

नीली तस्वीरें- सुरेन्द्र मोहन पाठक

1980 और इससे पहले के दशक में जब हमारे यहाँ मनोरंजन के साधनों के नाम पर लुगदी साहित्य की तूती बोला करती थी। एक तरफ़ सामाजिक उपन्यासों पर जहाँ लगातार फिल्में बन रही थी तो वहीं दूसरी तरफ़ थ्रिलर और जासूसी उपन्यासों के दीवानों की भी कमी नहीं थी। एक तरफ़ सामाजिक उपन्यासों के क्षेत्र में गुलशन नंदा को सेलिब्रिटी का सा दर्ज़ा प्राप्त था। तो दूसरी तरफ़ ओम प्रकाश शर्मा, ओमप्रकाश कंबोज, वेद प्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक के दीवानों की गिनती भी कम नहीं थी। निजी तौर पर उस वक्त मैं वेद प्रकाश शर्मा के लेखन...

स्वयंसिद्धा- मंजरी शुक्ला

आमतौर पर किसी भी किताब को पढ़ने के बाद मेरी पहली कोशिश होती है कि उस पर एक आध दिन के भीतर ही मैं अपनी पाठकीय प्रतिक्रिया लिख लूँ। मगर इस बार संयोग कुछ ऐसा बना कि पहली बार किसी किताब को लगभग 4 महीने पहले पढ़ने के बावजूद भी उस पर बस इसलिए नहीं लिख पाया कि उसे मैंने हार्ड कॉपी के बजाय किंडल पर पढ़ा। मगर अपन तो ठहरे देसी टाइप के एकदम सीधे साधे जलेबी मार्का बंदे। जब तक ठोस किताब हाथ में ना आ जाए..पढ़ने का मज़ा बिल्कुल नहीं आता या कह लो कि सब कुछ होते हुए भी तसल्ली नहीं होती।खैर..अब किताब को पढ़ तो लिया लेकिन...

गाँव गुवाड़- डॉ. नरेन्द्र पारीक

स्मृतियों के जंगल से जब कभी भी गुज़रना होता है तो अनायास ही मैं फतेहाबाद(हरियाणा) के नज़दीक अपनी नानी के गाँव 'बीघड़' में पहुँच जाता हूँ। जहाँ कभी मेरी नानी गोबर और मिट्टी के घोल से फर्श और दीवारें लीपती नज़र आती तो कभी बकरी से दूध निकलते मेरे नाना। जिनकी बस यही एक स्मृति मेरे ज़हन में अब भी विद्यमान है। कभी गाँव के एक कमरे में बनी लाइब्रेरी से मुझे किताबें ना देने पर लाइब्रेरियन को धमकाती मेरे मामा की बड़ी बेटी नज़र आती। तो कभी एकादशी के मौके पर गाँव के गुरुद्वारे की दीवार के साथ ठिय्या जमाए मेरे मामा...

पार उतरना धीरे से- विवेक मिश्र

जब भी आप कोई कहानी पढ़ते हैं तो कभी मुस्कुराते हैं, कभी खिलखिलाते हैं, कभी चौंकते हुए किसी गहन सोच में डूब जाते हैं। कई बार आप किसी कहानी को पढ़ते समय उसमें इतना खो जाते हैं कि कहानी के खत्म होने के बाद भी आप उससे..उसके असर..उसके ताप से बाहर नहीं निकल पाते और अगली कहानी तक पहुँचने से पहले आपको, अपनी दिमागी थकान और मन में उमड़ रहे झंझावातों से उबरने के लिए एक विश्राम, एक अंतराल की आवश्यकता पड़ती है। ऐसा ही कुछ इस बार मेरे साथ हुआ जब मुझे प्रसिद्ध कहानीकार विवेक मिश्र जी की कहानियों...

बावली बूच- सुनील कुमार

आमतौर पर किसी व्यंग्य कहानी या उपन्यास में समाज..सरकार..व्यक्ति अथवा व्यवस्था की ग़लतियों एवं कमियों को इस प्रकार से चुटीले अंदाज़ में उजागर किया जाता है कि सामने वाले तक बात भी पहुँच जाए और वह खिसियाने..कुनमुनाने.. बौखलाने..बगलें झाँकने के अलावा और कुछ ना कर पाए। व्यंग्यात्मक उपन्यास?..वो भी हरियाणा के एक छोरे की कलम से? बताओ..इससे बढ़ कर सोने पे सुहागा और भला इब के होवेगा? *जी..हाँ...वही हरियाणा..जित दूध दही का खाणा।* वही हरियाणा, जहाँ बात बात में हास्य अपने खड़े और खरे अंदाज़ में कभी भी औचक..बिना...

लिखी हुई इबारत- ज्योत्सना 'कपिल'

तात्कालिक प्रतिक्रिया के चलते किसी क्षण-विशेष में उपजे भाव, घटना अथवा विचार, जिसमें कि आपके मन मस्तिष्क को झंझोड़ने की काबिलियत हो..माद्दा हो...की नपे तुले शब्दों में की गयी प्रभावी अभिव्यक्ति को लघुकथा कहते हैं। मोटे तौर पर अगर लघुकथा की बात करें तो लघुकथा से हमारा तात्पर्य एक ऐसी कहानी से है जिसमें सीमित मात्रा में चरित्र हों और जिसे एक बैठक में आराम से पढ़ा जा सके। आज लघुकथा का जिक्र इसलिए कि हाल ही में मुझे ज्योत्सना 'कपिल' जी का लघुकथा संग्रह "लिखी हुई इबारत" पढ़ने का मौका मिला। इस...
 
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