नीम का पेड़- राही मासूम रजा

बॉलीवुड की पुरानी फिल्मों में अक्सर बतौर डायलॉग राइटर राही मासूम रज़ा का नाम दिख जाता है। बाद में बी. आर. चोपड़ा के मेगा सीरियल "महाभारत" में भी बतौर लेखक उन्हीं का नाम दिखाई दिया। जिसमें 'समय' को सूत्रधार बना उन्होंने महाभारत की पूरी कहानी उसके माध्यम से कही थी। ठीक इसी तरह उन्होंने नीम के एक पेड़ को सूत्रधार बना अपने उपन्यास "नीम का पेड़" का सारा ताना बाना रचा। जिस पर दूरदर्शन में इसी नाम से एक सीरियल भी आया।अंग्रेजों के वक्त की ज़मींदारी से शुरू हुए इस उपन्यास में राजनैतिक उठापटक और दाव पेचों के बीच...

मन्नत टेलर्स- प्रज्ञा रोहिणी

किसी कहानी में अगर आपको बढ़िया कथानक, रोचक संवाद, धाराप्रवाह लेखनशैली, अपने आसपास के दिखते माहौल में रचे बसे विषय तथा खुद में रमे हरफनमौला टाइप के किरदार मिल जाएँ तो मेरे ख्याल से कुछ अच्छा पढ़ने का हमारा औचित्य पूरा हो जाता है। ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ जब इस बार के पुस्तक मेले में मैंने प्रज्ञा रोहिणी जी का कहानी संकलन "मन्नत टेलर्स" खरीदा। इस संग्रह की पहली कहानी "लो बजट" ही उनकी लेखनशैली की व्याख्या करने में पूरी तरह सक्षम है। ये कहानी आम मध्यमवर्गीय आदमी के शहर में उसका अपना घर होने के सपने...

काली बकसिया- आभा श्रीवास्तव

ऐसा बहुत कम होता है कि किसी का लिखा आप पहली बार पढ़ें और पहली बार में ही उसके लेखन के इस हद तक मुरीद हो जाएँ कि लव एट फर्स्ट रीड वाली बात हो जाए। आमतौर पर ऐसा देखने को मिलता है कि लेखक अपनी सबसे ज़्यादा प्रभावी..सबसे ज़्यादा मारक रचना को अपने संकलन में सबसे पहले रखते हैं लेकिन इस बार कहानियों का एक ऐसा संकलन पढ़ने को मिला जिसकी सभी रचनाएँ मुझे एक से बढ़ कर एक लगी। दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ आभा श्रीवास्तव जी के कहानी संग्रह "काली बकसिया" की। इस संकलन में कुल 16 कहानियाँ हैं और पढ़ने के बाद हर...

मृगतृष्णा- संपादन - नीलिमा शर्मा, डॉ. नीरज सुघांशु

जब नियति, परिस्थिति या फिर समाज अथवा परिवार द्वारा तय किए गए पति पत्नी के रिश्तों में किसी ना किसी कारणवश परेशानियां, दिक्कतें या दुश्वारियां पैदा हो अपना सर उठाने लगती हैं, तब उन रिश्तों में किसी ना किसी तीसरे का किसी ना किसी रूप में आगमन होता है भले हो वो सखा, मित्र, प्रेमी अथवा शुभचिंतक का रूप ही क्यों ना हो।इस तरह के रिश्तों का जादुई तिलिस्म कुछ ऐसा होता है कि इन्हें कुछ समय के लिए या जीवन के सही ढंग से व्यवस्थित हो ढर्रे पर आने के बाद परिस्तिथिवश भुलाया तो जा सकता है लेकिन जड़ से समूल कभी मिटाया...

तेरी मेरी कहानी है- अतुल प्रभा

वैश्विक महामारी कोरोना के आने के बाद मेरे ख्याल से दुनिया का एक भी शख्स ऐसा नहीं होगा जो इससे किसी ना किसी रूप में प्रभावित ना हुआ हो। सैनिटाइज़र, मास्क के अतिरिक्त हाइजीन को ले कर तरह तरह की सावधानियां तो खैर सभी ने अपनी अपनी समझ के हिसाब से अपनाई ही। इसके अलावा अगर ज़रूरी खानपान और मेडिकल से जुड़े व्यवसायों को छोड़ दें तो लॉक डाउन और इसके बाद उत्पन्न हुई परिस्थितियों की वजह से बाकी सभी के रोज़गार अथवा कामधंधों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और बहुतों के धंधे तो बिल्कुल ठप्प हो गए या होने की कगार पर पहुँच...

पुकारा है ज़िन्दगी को कई बार- लतिका बत्रा

अपने दुःख.. अपनी तकलीफ़..अपने अवसाद और निराशा से भरे क्षणों को बार बार याद करना यकीनन बहुत दुखदायी होता है। जो हमें उसी दुख..उसी कष्ट को फिर से झेलने..महसूस करने के लिए एक तरह से मजबूर कर देता है। ऐसे में अगर कोई ठान ले कि उसे एक सिरे से उन्हीं सब लम्हों..उन्हीं सब पलों..उन्हीं निराशा और अवसाद से भरे क्षणों को फिर से जीते हुए..उनकी बाँह थाम उन्हें इस इरादे से कलमबद्ध करना है कि उनके जीवन से प्रेरित हो..निराशा के भंवर में फँसे लोग अपने जीवन में आशा की नयी लौ.. नयी किरण जगाने में सफ़ल हो पाएँ।दोस्तों..आज...

रागदरबारी- श्रीलाल शुक्ल

मेरे अब तक के जीवन का सबसे कठिन उपन्यास श्रीलाल शुक्ल जी द्वारा लिखित "रागदरबारी" रहा है जो कि व्यंग्यात्मक शैली में लिखा गया है। कठिन इसलिए नहीं कि उसकी भाषा दुरूह क्लिष्ट एवं अपठनीय थी अथवा ये बहुत ज़्यादा घालमेल वाला, लंबा एवं उबाऊ था। इस सबके विपरीत उपन्यास बहुत ही रोचक ढंग से लिखा गया है और पढ़ते वक्त मन को इतना ज़्यादा आनंदित करता है कि आप उसे और ध्यान से पढ़ने लगते हैं कि कहीं कुछ छूट ना जाए। इस उपन्यास को श्रीलाल शुक्ल जी द्वारा 1964 के अंत में लिखना शुरू हुआ और 1967 में लिख कर पूरा समाप्त...

अपने पैरों पर- भवतोष पाण्डेय

कायदे से अगर देखा जाए तो अपने नागरिकों से टैक्स लेने की एवज में देश की सरकार का यह दायित्व बन जाता है कि वह देश के नागरिकों के भले के लिए काम करते हुए उसे अच्छी कानून व्यवस्था के साथ बेसिक सुविधाएँ जैसे साफ़-सफाई, शिक्षा, इलाज, रोज़गार इत्यादि तो कम से कम मुहैया करवाए। मगर यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि अब तक देश की चुनी हुई कोई भी निर्वाचित सरकार कभी भ्रष्टाचार की वजह से तो कभी आलस भरी लालफीताशाही अथवा निजी हितों के चलते के ऐसा करने में सफ़ल नहीं हो पायी है। ऐसे में अभी तक की चुनी हुई सभी सरकारों की...

देह धरे को दण्ड- सपना सिंह (संपादन)

अनछुए या फिर तथाकथित सामाजिक ताने बाने में वर्जित माने जाने वाले संबंधों से संबंधित विषयों पर जब भी कुछ लिखा गया होगा तो लेखक ने खुद को पहले अपनी आलोचना सहने के लिए मानसिक तौर पर तैयार कर लिया होगा। उसके बाद ही बेधड़क हो कर उसने उन पर अपनी कलम या फिर कीबोर्ड पर अपनी उंगलियाँ चलाई होंगी। इस तरह के विषय पर कहानी को लिखते समय लेखक या लेखिका किस तरह के मनोभावों से गुज़र रही होगी? या किस कदर मानसिक पीड़ा से व्यथित एवं लबरेज़ हो कर इस तरह के अनछुए विषयों को अपनी सोच के अनुसार छुआ होगा? यही सब सोचते हुए...

दर्द माँजता है- रणविजय

अमूमन जब भी हम किसी नए या पुराने लेखक का कोई कहानी संकलन पढ़ते हैं तो पाते हैं कि लेखक ने अपनी कहानियों के गुलदस्ते में लगभग एक ही तरह के मिज़ाज़..मूड..स्टाइल और टोन को अपनी कहानियों में बार बार दोहराया है जैसे कि किसी लेखक की कहानियाँ ट्रीटमेंट और विषय के हिसाब से आपको उदासी..अवसाद और निराशा से भरे मंज़र से हर पल रूबरू कराती चलेंगी। तो वहीं किसी अन्य लेखक की कहानियाँ अपने हल्के फुल्के सहज ढंग से आपका मनोरंजन कर बिगड़ी बातों को संभालती चलेंगी। किसी लेखक की कहानियों में आपको पल पल..हर पल गुदगुदाते रोमानी...

स्टेपल्ड पर्चियाँ- प्रगति गुप्ता

कभी अख़बारों में छपी चंद गौर करने लायक सुर्खियाँ या तमाम मीडिया चैनल्स की हैडिंग बन चुकी कुछ चुनिंदा या ख़ास ख़बरें हमारे मन मस्तिष्क में कहीं ना कहीं स्टोर हो कर अपनी जगह..अपनी पैठ बना लेती हैं और जब तक ज़रूरत ना हो..बाहर नहीं निकलती। इसी तरह हमारे आस पड़ोस में घट चुकी या घट रही कुछ काबिल ए गौर घटनाएँ अथवा कुछ अलग तरह के नोटिसेबल किरदार भी सहज ही हमारे ध्यानाकर्षण का केंद्र बन..हमारे अवचेतन मन में कहीं ना कहीं बस जाते हैं और वक्त ज़रूरत के हिसाब से तब बाहर निकलते हैं जब हम जैसे लेखकों को कुछ नया रचना...

वर्जिन मदर- संतोष कुमार

80 दशक के अंतिम सालों जैसी एक बॉलीवुड सरीखी कहानी जिसमें रेखा, जितेंद्र, राखी, बिंदु, उत्पल दत्त, चंकी पाण्डेय, गुलशन ग्रोवर इत्यादि जैसे अनेकों जाने पहचाने बिकाऊ स्टार हों और कहानी के नाम पर एक ऐसी कहानी जिसमें प्रेम, त्याग, ईर्ष्या, जलन, ममता एवं व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा/ प्रतिद्वंदिता समेत थोड़ी मारधाड़ एवं खूब मैलोड्रामा याने के सभी बिकाऊ फॉर्मूलों का मसालेदार तड़का लगा हो। वह अब..आज के माहौल में आपको पढ़ने को मिल जाए तो यकीनन आप नॉस्टेल्जिया की राह से होते हुए उस दौर में पुनः फिर से वापिस पहुँच...
 
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