विसर्जन- वन्दना वाजपेयी

कई बार किसी किताब को पढ़ते वक्त लगता है कि इस लेखक या लेखिका को हमने आज से पहले क्यों नहीं पढ़ा। ऐसा ही कुछ इस बार हुआ जब वंदना वाजपेयी जी का कहानी संकलन "विसर्जन" मैंनें पढ़ने के लिए उठाया। इस संकलन की भी एक अलग ही कहानी है। संयोग कुछ ऐसा बना कि 'अधिकरण प्रकाशन' के स्टाल जहाँ से मेरे दोनों कहानी संकलन आए हैं, वहीं पर वंदना जी ने अपना संकलन रखवाया। उस वक्त सरसरी तौर पर इसे देखा भी लेकिन लेने का पूर्ण रूप से मन नहीं बना पाया। बाद में फिर कुछ अन्य साथियों की फेसबुक पर इस किताब की समीक्षा भी आयी...

मेरी लघुकथाएँ- उमेश मोहन धवन

यूँ तो परिचय के नाम पर उमेश मोहन धवन जी से मेरा बस इतना परिचय है कि हम दोनों कई सालों से फेसबुक पर एक दूसरे की चुहलबाज़ीयों का मज़ा लेते रहे हैं। व्यंग्य मिश्रित हास्य की अच्छी समझ रखने वाले उमेश मोहन जी ने छोटे मोटे हास्य या फिर अपनी पंच लाइन्स से सहज ही मेरा ध्यान कई मर्तबा अपनी लेखनी की तरफ़ खींचा। उस वक्त कतई ये अन्दाज़ा नहीं था कि उमेश जी संजीदा किस्म की लघुकथाएँ भी लिखते हैं। 2017 में पहली बार मुझे उनकी कुछ लघुकथाएँ पढ़ने को मिली। अब जब उनकी लघुकथाओं का संकलन "मेरी लघुकथाएँ" के नाम से आ चुका है।...

कुछ अनकहा सा- कुसुम पालीवाल

जब भी कभी किसी लेखक या कवि को अपनी बात को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के सामने व्यक्त करना होता है तो वह अपनी जरूरत..काबिलियत एवं साहूलियात के हिसाब से गद्य या पद्य..किसी भी शैली का चुनाव करता है। अमूमन हर लेखक या कवि उसी..गद्य या पद्य शैली में लिखना पसंद करता है जिसमें वह स्वयं को सहज महसूस करता है। मगर कई बार समय के दबाव..विचार की ज़रूरत एवं दूसरों की देखादेखी भी हम एक से दूसरी शैली की तरफ़ स्थानांतरित होते रहते हैं। जैसे गद्य शैली में व्यंग्य कहानियाँ लिखते लिखते मैंने खुद भी कई बार कुछ कविता जैसा रचने...

सीता- मिथिला की योद्धा- अमीश त्रिपाठी

किसी भारतीय लेखक की किताब की अगर एक बार में ही 10 लाख प्रतियां प्रिंट में चली जाएँ और उसके बाद धड़ाधड़ वो बिक भी जाएँ तो यकीनन इसे चमत्कार ही कहेंगे और इस चमत्कार को इस बार भी कर दिखाया है हमारे देश के प्रसिद्ध लेखक अमीश त्रिपाठी जी की किताब "सीता-मिथिला की योद्धा" ने। जो कि राम चंद्र श्रृंखला की उनकी दूसरी किताब है। इससे पहले इसी श्रृंखला की पहली किताब "इक्ष्वाकु के वंशज" भी इसी तरह का धमाल मचा इतिहास रच चुकी है। मूलतः अंग्रेज़ी में लिखी गयी इस किताब का हिंदी में अनुवाद उर्मिला गुप्ता जी ने किया...

तक़दीर का तोहफ़ा- सुरेन्द्र मोहन पाठक

यूँ तो अब तक के जीवन में कई तरह की किताबें पढ़ने का मौका मिलता रहा है मगर वो कहते हैं कि वक्त से पहले और किस्मत से ज़्यादा कभी किसी को कुछ नहीं मिलता। अगर तक़दीर मेहरबान हो तो तय वक्त आने पर हमारे हाथ कोई ना कोई ऐसा तोहफ़ा लग जाता है कि मन बरबस खुश होते हुए.. पुलकित हो..मुस्कुरा पड़ता है। दोस्तों.. आज मैं बात कर रहा हूँ एक ऐसे कहानी संकलन की जो मँगवाने के बाद भी कम से कम एक साल तक मेरे द्वारा अपने पढ़े जाने की बाट जोहता रहा। मगर मुझे क्या पता था कि तक़दीर की मेहरबानी से एक तोहफ़ा अपने पढ़े जाने के लिए मेरा...

हैशटैग- सुबोध भारतीय

आमतौर पर जब भी किसी कहानी या उपन्यास में मुझे थोड़े अलग विषय के साथ एक उत्सुकता जगाती कहानी, जिसका ट्रीटमेंट भी आम कहानियों से थोड़ा अलग हट कर हो, पढ़ने को मिल जाता है तो समझिए कि मेरा दिन बन जाता है। दोस्तों..आज मैं धाराप्रवाह लेखन से सुसज्जित एक ऐसे ही कहानी संकलन की बात करने जा रहा हूँ जिसे '#हैशटैग' के नाम से लिखा है सुबोध भारतीय जी ने। 'नीलम जासूस' के नाम से पिता के बरसों पुराने प्रकाशन व्यवसाय को फिर से पुनर्जीवित करने वाले सुबोध भारतीय जी का वैसे तो यह पहला कहानी संकलन है मगर लेखन की परिपक्वता...

हँसी की एक डोज़- इब्राहीम अल्वी

कई बार कुछ कवि मित्र मुझसे अपनी कविताओं के संग्रह को पढ़ने का आग्रह करते हैं मगर मुझे लगता है कि मुझमें कविता के बिंबों..सही संदर्भों एवं मायनों को समझने की पूरी समझ नहीं है। इसलिए आमतौर पर मैं कविताओं को पढ़ने से बचने का थोड़ा सा प्रयास करता हूँ। हालांकि कई बार मैंने खुद भी कुछ कविताओं जैसा कुछ लिखने का प्रयास भी किया मगर जल्द ही समझ आ गया कि फिलहाल तो कविताएँ रचना या उन पर कुछ लिखना मेरे बस की बात नहीं। ऐसे में अगर कोई मित्र स्नेहवश अपना कविताओं का संकलन मुझे भेंट करता है तो मैं सकुचाहट भरी सोच में...

प्रेम नाम है मेरा- प्रेम चोपड़ा -रकिता नंदा

"प्रेम नाम है मेरा..प्रेम चोपड़ा।"इस संवाद के ज़हन में आते ही जिस अभिनेता का नाम हमारे दिलोदिमाग में आता है..वह एक घने बालों वाला..हीरो माफ़िक सुन्दर कदकाठी लिए हुए व्यक्ति का चेहरा होता है। उसके शांत..सौम्य चेहरे को देख कतई नहीं लगता कि इस व्यक्ति की दमदार नकारात्मक स्क्रीन प्रेसेंस के बल पर एक समय लड़कियाँ/ महिलाएँ छिप जाया करती थी..सामने आने से डरती थी। जी..हाँ दोस्तों...सही पहचाना आपने। मैं प्रसिद्ध खलनायक प्रेम चोपड़ा और उनकी आत्मकथा "प्रेम नाम है मेरा- प्रेम चोपड़ा" की बात कर रहा हूँ। एक ऐसा...

इसलिए हम हँसते हैं- गुरमीत बेदी

व्यंग्य के क्षेत्र में गुरमीत बेदी जी का नाम काफ़ी जाना पहचाना है लेकिन इसे संयोग कहिए या फिर मेरा आलस कि उनका लिखा पहले कभी मैं पढ़ नहीं पाया। इस बार के पुस्तक मेले में भावना प्रकाशन के स्टॉल पर जब मेरी नज़र उनकी लिखी किताबों पर पड़ी तो बरबस ही उनके शीर्षकों ने पहली नज़र में ही मेरा ध्यान आकर्षित  किया लेकिन चूंकि उस दिन मैं और अन्य लेखकों की किताबें लेने का मन पहले से ही बना चुका था इसलिए उस वक्त तो बात आयी गयी वाली हो गयी।उसके एक दिन बाद जब मैं पुनः भावना प्रकाशन के स्टॉल पर अपने मतलब की किताबें...

सुबह ऐसे आती है - अंजू शर्मा

किसी कवयित्री को कहानीकार के रूप में सफलतापूर्वक परिवर्तित हो किस्सागोई करते  देखना अपने आप में एक अलग एवं सुखद अनुभव से आपको रूबरू करवाता है। वर्तमान साहित्य जगत में अंजू शर्मा जी का नाम उनकी कविताओं के ज़रिए पहले से ही किसी पहचान या परिचय का मोहताज नहीं है। पहले उनकी अलग कलेवर से संचित कविताएं मन मोहने के साथ अलग ढंग से सोचने पर मजबूर भी करती थी और अब..अब तो साहित्य की अन्य विधाओं जैसे कहानी एवं उपन्यास के क्षेत्र में भी उनका महत्त्वपूर्ण दखल रहने लगा है।भावनाओं से लबरेज़ उनकी कहानियाँ बिना...

भली लड़कियाँ बुरी लड़कियाँ - अनु सिंह चौधरी

कहते हैं कि दुनिया गोल है और संयोगों से भरी इस अजब ग़ज़ब दुनिया में अगर एक तरफ़ भले लोग हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ बुरे भी कम नहीं हैं। मगर सवाल ये उठता है कि जो अच्छा है..क्या वो सभी के लिए अच्छा है या मात्र अपने अच्छे होने का ढोंग कर रहा है? या अगर कोई बुरा है क्या वो सभी की नज़रों में बुरा है?खैर..अच्छे बुरे की बात करने से पहले कुछ बातें संयोगों को ले कर कि क्या सचमुच में ऐसा संयोग हो सकता है कि किसी कहानी या उपन्यास के रचियता से आपका दूर दूर तक कहीं किसी किस्म का कोई नाता ना हो लेकिन बिना आपके बारे में...

जगीरा- सुभाष वर्मा

ज्यों ज्यों तकनीक के विकास के साथ सब कुछ ऑनलाइन और मशीनी होता जा रहा है। त्यों त्यों इज़ी मनी चाहने वालों की भी पौबारह होती जा रही है। ना सामने आ..किसी की आँख में धूल झोंक, सब कुछ लूट ले जाने की ज़रूरत। दूर बैठे ही बस जिसका तिया पांचा करना हो..किसी तरह का लालच दे, उससे ओ.टी.पी हासिल करो और बस बिना अपना दीदार कराए झट से उसकी खुली आँखों से काजल चुरा लो। लेकिन ऐसा नहीं है कि सब कुछ तकनीक के आ जाने से ही संभव हुआ। इससे पहले भी 'नटवरलाल' और'चार्ल्स सोभराज' जैसे तुर्रमखां ठग हुए जिन्होंने अपनी जालसाज़ी...

मेरी चुनिंदा लघुकथाएं - मधुदीप गुप्ता

आमतौर पर अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए हम सब एक दूसरे से बोल..बतिया कर अपने मन का बोझ हल्का कर लिया करते हैं। मगर जब अपने मनोभावों को अभिव्यक्त करने और उन्हें अधिक से अधिक लोगों तक संप्रेषित करने का मंतव्य किसी लेखक अथवा कवि का होता है तो वह उन्हें दस्तावेजी सबूत के तौर पर  लिखने के लिए गद्य या फिर पद्य शैली को अपनाता है। आज बाकी सब बातों से इतर, बात सिर्फ गद्य शैली की एक तेज़ी से उभरती हुई विधा, लघुकथा की। लघुकथा तात्कालिक प्रतिक्रिया के चलते किसी क्षण-विशेष में उपजे भाव, घटना अथवा...

गली हसनपुरा- रजनी मोरवाल

यूँ तो रजनी मोरवाल जी का साहित्य के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है और  मेरा भी उनसे परिचय फेसबुक के ज़रिए काफी समय से है लेकिन अब से पहले कभी उनका लिखा पढ़ने का संयोग नहीं बन पाया। इस बार के पुस्तक मेले से पहले ही ये ठान लिया था कि इस बार मुझे उनकी लिखी किताबें पढ़नी हैं। इसी कड़ी में जब मैंने उनका ताज़ा लिखा उपन्यास "गली हसनपुरा" पढ़ना शुरू किया तो शुरुआती पृष्ठों से ही उनकी धाराप्रवाह लेखनशैली और ज़मीन से जुड़े मुद्दों ने मन मोह लिया। बीच बीच में स्थानीय भाषा का प्रयोग भी अपनी तरफ से उपन्यास को प्रभावी...

धर्मयुद्ध - पवन जैन

70-80 के दशक की अगर बॉलीवुड की फिल्मों पर नज़र दौड़ाएँ तो हम पाते हैं कि उनमें जहाँ एक तरफ़ मंदिर की सीढ़ियों पर अनाथ बच्चे का मिलना, प्रेम..त्याग..ममता..धोखे..छल प्रपंच..बलात्कार इत्यादि के दृश्यों के साथ थोड़ा बहुत बोल्डनेस का तड़का लगा होता था। ऐसी मसाला टाइप कहानियों के एक ज़रूरी अव्यय के रूप में इनमें कुछ सफेदपोश टाइप के लाला..सेठ या नेता टाइप के लोग भी बतौर खलनायक होते थे जिनका बाहरी चेहरा एक भलेमानस..दयालु, कृपालु टाइप का दान पुण्य इत्यादि में विश्वास रखने वाला होता था जबकि भीतर से वो एकदम कलुषित...

लुकाछिपी- नीलिमा शर्मा (संपादन)

आमतौर पर हम अपने दैनिक जीवन में हर तरह के किरदारों से रूबरू होते हैं। उनमें बच्चे, बूढ़े, प्रौढ़...युवा..हर तरह के लोग शामिल होते हैं और हर किरदार अपनी तय मनोस्थिति के हिसाब से कार्य करता है। इसमें अगर नायक अपनी सौम्यता, चपलता, सज्जनता एवं चंचलता के साथ प्रस्तुत हो धमाल कर रहे होते हैं तो पूरे मनोयोग के साथ ठसकेदार तरीके से खलनायक भी अपने क्रोध, कुंठा, घृणा और लालच के साथ अपनी दमदार अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे होते हैं। ज़्यादातर देखा ये गया गया है कि बड़े चूंकि बड़े होते हैं, इसलिए हर जगह अपना बड़ा वाला...

बीसवीं सदी की चर्चित हास्य रचनाएं- सुभाष चन्दरसंपादन

अगर तथाकथित जुमलेबाज़ी..लफ़्फ़ाज़ी या फिर चुटकुलों इत्यादि के उम्दा/फूहड़ प्रस्तुतिकरण को छोड़ दिया जाए तोवअमूमन कहा जाता है कि किसी को हँसाना या हास्य रचना आम संजीदा या दुख भरी रचनाओं के अपेक्षाकृत काफ़ी कठिन काम है। यही काम तब और ज़्यादा कठिन और दुरह हो जाता है जब आप एक पूरी सदी की चर्चित रचनाओं को छाँटने एवं एक साथ संजोने का कार्य अपने जिम्मे ले लेते हैं। दोस्तों..इस कठिन कार्य को अपनी मेहनत..लगन और श्रम के बल पर मुमकिन कर दिखाया है हमारे समय के प्रसिद्ध व्यंग्यकार सुभाष चन्दर जी ने। जिनके संपादन...

ख्वाहिशों का खाण्डव वन- योगिता यादव

कहते हैं कि हर चीज़ का कभी ना कभी अंत हो जाता है लेकिन ख्वाहिशों..इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। एक इच्छा के पूरी होने से पहले ही दूसरी बलवती हो..सिर उठा अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने को झट से आमादा हो उठती है। ऐसी ही कुछ इच्छाऐं जो लंबे समय से अपने पूर्ण होने की बाट देख रही हैं, उन्हीं छोटी बड़ी ख़्वाहिशों की कहानी है योगिता यादव जी के उपन्यास 'ख्वाहिशों के खाण्डववन" की। यहाँ खाण्डववन से तात्पर्य एक ऐसा शहर जिसमें वास्तविकता से साथ छद्म का मेल हो।इसमें कहानी है दिल्ली महानगर के उस तथाकथित सौंदर्यीकरण एवं...
 
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