जो रंग दे व्व रंगरेज़- रोचिका अरुण शर्मा

ये बात 1978-80 के आसपास की है। तब हमारे घर में सरिता, मुक्ता जैसी पत्रिकाऐं आया करती थी। बाद में इनमें गृहशोभा और गृहलक्ष्मी जैसी पत्रिकाओं का नाम भी इसी फेहरिस्त में जुड़ गया। तब उनमें छपी पारिवारिक रिश्तों की गंध में रची बसी कहानियों को मेरी माँ के अलावा मैं भी बड़े चाव से पढ़ा करता था। उस समय जो भी...जैसा भी मिले, मौका पाते ही मैं ज़रूर पढ़ता था। अब उसी तरह के कलेवर से सुसज्जित कहानियों को पढ़ने का मौका मुझे रोचिका अरुण शर्मा जी के कहानी संग्रह  "जो रंग दे वो रंगरेज़" से मिला। अपनी कहानियों...

जुहू चौपाटी- साधना जैन

मायानगरी बॉलीवुड और उससे जुड़ी कहानियाँ सदा से ही हमारे चेतन/अवचेतन में आकर्षण का केंद्र रही हैं। फिल्मी सितारों का लक्ज़रियस जीवन, लैविश रहनसहन, लंबी चौड़ी गाड़ियाँ, उनकी मस्ती, नोक झोंक, गॉसिप, जलन, प्रतियोगिता/प्रतिस्पर्धा के चलते रंजिशें, साजिशें, बंदिशें और रोज़ाना होते करोड़ों के हेरफेर के साथ साथ हर समय असुरक्षा की बातें कभी अफ़वाह बन कर तो तड़के मिश्रित सच्ची/झूठी खबर बन कर टीवी चैनलों, अखबारों और  पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हमारा ध्यान तो अपनी तरफ़ खैर..खींचती ही है। इसमें कभी कोई रातों रात...

लाइफ आजकल- आलोक कुमार

कहते हैं कि किसी भी चीज़ के होने ना होने का पहले से तय एक मुक़र्रर वक्त होता है। किताबों के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। कुछ किताबों को पढ़ने की इच्छा से आप मँगवा तो लेते हैं मगर उन्हें पढ़ने का जाने अनजाने में मुहूर्त नहीं निकल पाता। कई बार हम एक साथ इतनी किताबें मँगवा लेते हैं कि कुछ किताबें हमारी आँखों के सामने होते हुए भी हमें नज़र नहीं आती या अगर कभी भूल से नज़र आ भी जाती हैं तो हम अन्य किताबों को पहले तरजीह देते हुए किसी अन्य किताब की तरफ बढ़ जाते हैं। मगर ऐसे में कई बार कुछ अच्छी किताबों...

और प्राण- बन्नी रुबेन( अजीत बच्छावत- अनुवाद)

किसी भी फ़िल्म में नायक के व्यक्तित्व को उभारने में खलनायक की भूमिका का बड़ा हाथ होता है। जितना बड़ा..ताकतवर खलनायक होगा, उतनी ही उसे हराने पर..पीटने पर..नायक के लिए तालियाँ बजती हैं। खलनायक की शातिर चालों पर जब नायक नहले पे दहला मारते हुए उसे पटखनी देता है तो नायक का नाम ऊँचा और बड़ा होता जाता है। खलनायक की महत्ता दर्शाने के लिए एक चली आ रही रवायत के अनुसार फ़िल्म के शुरू में नंबरिंग दिखाते वक्त खलनायक के नाम को अलग से महत्त्व देते हुए दर्शाया जाता है जैसे कि..and Pran (और 'प्राण') या and  Amrish...

कालो थियु सै- किशोर चौधरी

इस बार के पुस्तक मेले में हिन्दयुग्म के स्टॉल पर जब मैंने किशोर चौधरी जी की किताब "कालो थियु सै" ली तो यही ज़हन में था कि इसमें शीर्षकानुसार कुछ अलग सा पढ़ने को मिलेगा। ज़्यादा उम्मीद मुझे राजस्थानी कलेवर और वहाँ की मिट्टी की खुशबू में रची बसी कहानियों की थी मगर इस किताब में यात्रा संस्मरण, बिछड़े दोस्त, बाड़मेर जिले, मृत्यु, प्रेम, दार्शनिकता के साथ साथ भांग और विज्ञान के संगम से उपजी विशुद्ध गप्पबाज़ी भी है। भाषाशैली रोचक है। आप एक बार पढ़ना शुरू करते हैं तो पढ़ते चले जाते हैं। कहीं कहीं ऐसा आभास...

काली धूप- सुभाष नीरव(संपादन)

जब किसी दुख भरी कहानी को पढ़ कर आप उस दुःख.. उस दर्द..उस वेदना को स्वयं महसूस करने लगें। पढ़ते वक्त चल रहे हालात को ना बदल पाने की अपनी बेबसी पर कुंठित हो..कभी आप  तिलमिला उठें छटपटाते रहें या कभी सिर्फ सोच कर ही आप सहम जाएँ और आपके रौंगटे खड़े होने लगें। कहानी को पूरा पढ़ने के बाद भी आप घंटों तक उसी कहानी..उसी माहौल और उन्हीं घटनाओं के बीच पात्रों की बेबसी और मायूसी के बारे में सोच कर कसमसाते हुए उन्हीं की जद्दोजहद में अपने अंतःकरण तक डूबे रहें। तो इसे एक लेखक की सफलता कहेंगे कि वो आपको उस वक्त..उस...

डार्क हॉर्स- नीलोत्पल मृणाल

कई बार कुछ कहानियाँ या उपन्यास अपनी भाषा...अपने कथ्य..अपनी रोचकता..अपनी तारतम्यता के बल पर  आपको निशब्द कर देते हैं। उनको पूरा पढ़ने के बाद भी आप उसी कहानी..उसी परिवेश और उन्हीं पात्रों के साथ खुद को उसी माहौल में विचरता पाते हैं। ऐसा ही कुछ मेरे साथ इस बार हुआ जब मैंने नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास "डार्क हॉर्स" पढ़ने के लिए उठाया।इस उपन्यास में कहानी है दिल्ली के एजुकेशन हब माने जाने वाले इलाके मुखर्जी नगर और उसके आसपास के सटे इलाकों की जहाँ पर पूरे साल देश भर से गाँव देहात के हज़ारों लाखों युवा...

साँझी छत- छाया सिंह

आमतौर पर किसी का शुरुआती लेखन अगर पढ़ने को मिले तो उसमें से उसकी अनगढ़ता या सोंधी महक लिए कच्चापन स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। मगर सुखद आश्चर्य के रूप में कई बार किसी का शुरुआती लेखन ही अपने आप में संपूर्ण परिपक्वता लिए मिल जाता है। दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ छाया सिंह जी के पहले कहानी संकलन "साँझी छत"  की। 23 कहानियों के इस संकलन में उनके धाराप्रवाह लेखन को देख कर लगता है कि पूरी तैयारी के साथ  साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अपना आगाज़ किया है। मानवीय संबंधों को ले कर...

मिसेज फन्नी बोन्स- ट्विंकल खन्ना

माना जाता है कि किसी को हँसाना सबसे मुश्किल काम है। इस काम को आसान बनाने के लिए कुछ लोगों द्वारा किसी एक की खिल्ली उड़ा, उसे हँसी का पात्र बना सबको हँसाया जाता है लेकिन यकीन मानिए ऐसे..इस तरह..किसी एक का माखौल उड़ा सबको हँसाने की प्रवृति सही नहीं है। ना ही ऐसे हास्य की लंबी उम्र ही होती है। बिना किसी को ठेस पहुँचाए खुद अपना मज़ाक उड़ा, दूसरों को हँसाने का तरीका ही सही मायनों में श्रेयस्कर होता है। किसी की वजह से अगर किसी को मुस्कुराने की ज़रा सी भी वजह मिल जाती है तो समझिए कि उसका दिन बन जाता है। ऐसे...

वाया मीडिया- गीताश्री

सतही लेखन में क्या होता है कि विषय पर इधर उधर से थोड़ा बहुत मालूमात करो और फिर तुरत फुरत में उस पर अपनी कलम घसीटी कर जय राम जी की करते हुए आप उससे निज़ात पा लो लेकिन अगर किसी भी विषय पर आपको व्यापक रूप से तथ्यों एवं प्रमाणिकता के साथ लिखना है तो  उस पर आपका गहन शोध या फिर सालों का तजुर्बा बहुत मायने रखता है। ऐसा ही अनुभव एवं शोध झलकता है जब आप गीताश्री जी का उपन्यास "वाया मीडिया"  पढ़ने के लिए उठाते हैं। शुरू के पन्नों से ही उपन्यास अपनी पकड़ बनाता हुआ चलता है और अंत तक पाठक को कहीं भी निराश...

क्लीन चिट- योगिता यादव

आज के दौर के सशक्त कहानीकारों के बारे में जब मैं सोचता हूँ तो ज़हन में आए नामों में एक नाम योगिता यादव जी का भी होता है। यूँ तो अंतर्जाल पर या फिर साझा संकलनों में उनकी कुछ रचनाएँ मैं पहले भी पढ़ चुका हूँ लेकिन अब जा कर मुझे उनका पूरा कहानी संकलन "क्लीन चिट" पढ़ने का मौका मिला। सहज, सरल...प्रवाहमयी भाषा में लिखी गयी इस संकलन की कहानियों में खासी रवानगी है। अपने साथ..अपने सफ़र पर ले जाती हुई ये कहानियाँ कहीं पर भी पाठक को बोझिल नहीं करती हैं और वो उन्हें  एक के बाद एक पढ़ता हुआ किताब को बिना...

अम्बपाली(एक उत्तरगाथा)- गीताश्री

बचपन में एक समय ऐसा भी था जब मैं फंतासी चरित्रों एवं राजा महाराजाओं की काल्पनिक कहानियों से लैस बॉलीवुडीय फिल्मों का दीवाना हुआ करता था। कुछ बड़ा हुआ तो दिमाग़ ने तार्किक ढंग से सोचना प्रारम्भ किया और मुझे तथ्यों पर आधारित ऐतिहासिक चरित्रों एवं पौराणिक घटनाओं से प्रेरित फिल्में.. किताबें और कहानियाँ रुचिकर लगने लगी। उसके बाद तो इस तरह की जितनी भी सामग्री जहाँ कहीं से भी..जिस किसी भी रूप में उपलब्ध हुई..अपनी तरफ़ से मैंने उसे पढ़ने का पूरा पूरा प्रयास किया।समय के साथ साथ एक ही विषय पर अलग अलग लेखकों...

कॉनमैन- सुरेन्द्र मोहन पाठक

लुगदी साहित्य से जब मेरा पहले पहल परिचय हुआ तो वेदप्रकाश शर्मा के थ्रिलर उपन्यासों ने मुझ पर अपना इस कदर जादू चलाया कि मैं मंत्रमुग्ध हो कई मर्तबा उनके एक एक दिन में दो दो उपन्यास पढ़ जाया करता था। तब कईयों ने मुझे कहा कि एक बार सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का लिखा भी पढ़ो तो जाने क्या सोच कर मैंने तब उनके लेखन को तवज्जो नहीं दी। अब जब मुझे सुरेन्द्र मोहन पाठक जी की आत्मकथा का पहला भाग पढ़ने को मिला तो पाया कि सुरेन्द्र मोहन पाठक जी भी जादुई लेखनी के स्वामी हैं। उनके उपन्यास परत दर परत इन्वेस्टिगेटिव नेचर...

मैं भारत में पाकिस्तान का जासूस था- मोहनलाल भास्कर

किसी भी देश की सुरक्षा के लिए यह बेहद ज़रूरी हो जाता है कि सेना के साथ साथ उसकी गुप्तचर संस्थाएँ और देश विदेश में फैला उनका नेटवर्क भी एकदम चुस्त..दुरुस्त और चाकचौबंद हो। जो आने वाले तमाम छोटे बड़े खतरों से देश के हुक्मरानों एवं सुरक्षा एजेंसियों को समय रहते ही आगाह करने के साथ साथ चेता भी सके। साथ ही दुश्मन देश की ताकत में होने वाले इज़ाफ़े..तब्दीलियों तथा कमज़ोरियों का भी सही सही आकलन कर वह भावी तैयारियों के मामले में अपने देश की मदद कर सके। आज गुप्तचरों से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं पाकिस्तान...

कसाब.गांधी@यरवदा.in- पंकज सुबीर

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एक समंदर मेरे अन्दर- मधु अरोड़ा

कोई लंबी कहानी या उपन्यास अगर एक बार में ही आपके ज़रिए खुद को पूरा पढ़वा जाए तो इसे लेखक/ लेखिका की सफलता ही कहेंगे कि उसने अपनी रचना में इतने विविध रंग भर दिए कि पढ़ना वाला उनसे सराबोर हुए बिना रह नहीं सका। इस बार ऐसा ही हुआ जब मैंने मधु अरोड़ा जी का उपन्यास "एक समंदर मेरे अन्दर" पढ़ने के लिए उठाया। उनसे मेरा परिचय 2014 के पुस्तक मेले के दौरान साहित्य मंच की दर्शक दीर्घा में बैठे हुए हुआ  था। जाने क्या सोच के बिना किसी जान पहचान के  मैंने उन्हें नमस्ते कहा तो प्रतिउत्तर में सामने से स्नेहसिक्त...
 
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