ग़द्दार- राकेश अचल

किसी भी काम को करने या ना करने के पीछे हर एक की अपनी अपनी वजहें..अपने अपने तर्क..कुतर्क हो सकते हैं। साथ ही यह भी ज़रूरी नहीं कि हमारे किए से दूसरा भी हमारी ही तरह सहमत हो या हम भी दूसरे के किए से उसी की तरह इत्फ़ाक रखते हों। अपनी अपनी जगह सभी खुद को सही और दूसरे को ग़लत समझते हैं। जैसे कि अगर रामायण का उदाहरण लें तो जो श्रूपनखा के साथ लक्ष्मण ने किया, उसे लक्ष्मण ने सही माना जबकि शूर्पणखा ने ग़लत या फिर रावण ने सीता का हरण करते वक्त खुद को सही माना जबकि राम समेत बहुतों ने इसे ग़लत करार दिया। इसी तरह...

अपनी सी रंग दीन्ही रे- सपना सिंह

देशज भाषा..स्थानीयता और गांव कस्बे के हमारे आसपास दिखते चरित्रों से सुसज्जित स्त्रीविमर्श की कहानियों की अगर बात हो तो इस क्षेत्र में सपना सिंह एक उल्लेखनीय दखल रखती हैं। कई प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं तथा अंतर्जाल में छपने के अलावा उनके अब तक तीन एकल कहानी संग्रह और एक उपन्यास के अतिरिक्त उनके संपादन में वर्जित कहानियों का एक साझा संकलन 'देह धरे को दंड' भी आ चुका है। दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ हमारे समय की समकालीन लेखिका सपना सिंह के नवीतम कहानी संग्रह 'अपनी सी रंग दीन्ही रे' की। स्त्री...

शोमैन राज कपूर- रितु नंदा

कहा जाता है कि किसी को हँसाना सबसे मुश्किल काम है और वही लोग सबको हँसा पाते है जो स्वयं भीतर से बहुत दुखी होते है। सबको हँसा हँसा कर लोटपोट कर देने वाले महान अभिनेता चार्ली चैप्लिन ने भी एक बार कहा था कि.."मैं अक्सर बारिश में भीगना पसंद करता हूँ कि उस वक्त कोई मेरे आँसू नहीं देख पाता है।"दोस्तों..आज मैं आपके समक्ष चार्ली चैप्लिन को अपना आदर्श मानने वाले बॉलीवुड के एक ऐसे दिग्गज अभिनेता, निर्देशक, एडिटर, प्रोड्यूसर के बारे में लिखी गयी किताब के बारे में बात करने जा रहा हूँ जो कभी हमारे समक्ष शोमैन...

कोई खुशबू उदास करती है- नीलिमा शर्मा

आमतौर पर मानवीय स्वभाव एवं सम्बन्धों को ले कर बुनी गयी अधिकतर कहानियों को हम कहीं ना कहीं..किसी ना किसी मोड़ पर..खुद से किसी ना किसी बहाने कनैक्ट कर लेते हैं। कभी इस जुड़ाव का श्रेय जाने पहचाने या देखे भाले किरदारों को मिलता है तो कभी इसमें किसी देखी सुनी कहानी का भी थोड़ा बहुत योगदान नज़र आता है। दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ कई कहानी संग्रहों में बतौर संपादक अपनी धाक जमा चुकी नीलिमा शर्मा जी के प्रथम संपूर्ण कहानी संग्रह 'कोई खुशबू उदास करती है' की। स्त्री मन के विभिन्न मनोभावों एवं आयामों को...

स्वप्नपाश- मनीषा कुलश्रेष्ठ

कई बार हमें पढ़ने के लिए कुछ ऐसा मिल जाता है कि तमाम तरह की आड़ी तिरछी चिंताओं से मुक्त हो, हमारा मन प्रफुल्लित हो कर हल्का सा महसूस करने लगता है मगर कई बार हमारे सामने पढ़ने के लिए कुछ ऐसा आ जाता है कि हमारा मन चिंतित हो, व्यथा एवं वेदनाओं से भर जाता है और लाख चाहने पर भी हम उसमें व्यक्त पीड़ा, दुख दर्द से खुद को मुक्त नहीं कर पाते। कहानी के किरदार, हम में और हम उसके किरदारों में, कुछ इस कदर घुल मिल जाते हैं कि किताब की दुनिया को ही हम एक हद तक असली दुनिया समझने लगते हैं। ऐसा ही कुछ मुझे आभास हुआ जब...

मेघना- कुसुम गोस्वामी

मीडिया और मनोरंजन के तमाम जनसुलभ साधनों की सहज उपलब्धता से पहले एक समय ऐसा था जब हमारे यहाँ लुगदी साहित्य की तूती बोलती थी। रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और मोहल्ले की पत्र पत्रिकाओं की दुकानों तक..हर जगह इनका जलवा सर चढ़ कर बोलता था। बुज़ुर्गों के डर..शर्म और लिहाज़ के बावजूद जवानी की दहलीज चढ़ते युवाओं, विवाहितों एवं अधेड़ हाथों में या फिर उनके तकियों के नीचे चोरी छिपे इनका लुकाछिपी खेलते हुए मौजूद रहना एक आम बात थी। इनमें मुख्यतः प्रेम, बिछोह या किसी सामाजिक बुराई जैसे तमाम मसालों का इस प्रकार से...

ठौर- दिव्या शुक्ला

पिछले लगभग तीन- सवा तीन वर्षों में 300+ किताबों के पठन पाठन के दौरान मेरा सरल अथवा कठिन..याने के हर तरह के लेखन से परिचय हुआ। जहाँ एक तरफ़ धाराप्रवाह लेखन से जुड़ी कोई किताब मुझे इतनी ज्यादा रुचिकर लगी कि उसे मैं एक दिन में ही आसानी से पढ़ गया तो वहीं दूसरी तरफ़ किसी किसी किताब को पूरा करने में मुझे दस से बारह दिन तक भी लगे। ऐसा कई बार किताब की दुरह भाषा भाषा की वजह से हुआ तो कई बार विषय के कठिन एवं कॉम्प्लिकेटिड होने की वजह से। इस बीच मनमोहक शैली में लिखी गयी ऐसी दुरह किताबें भी मेरे सामने...

कुछ तो बाकी है- रजनी मोरवाल

कई बार जब कभी हम लिखने बैठते हैं तो अमूमन ये सोच के लिखने बैठते हैं कि हमें आरंभ कहाँ से करना है और किस मोड़ पर ले जा कर हमें अपनी कहानी या उपन्यास का अंत करना है मगर कई बार ऐसा होता है कि बिना सोचे हम लिखना प्रारंभ तो कर देते हैं लेकिन हमें अपनी रचना की मंज़िल..उसके अंत का पता नहीं होता। ऐसी मनोस्तिथि में हम अपनी कथा को जहाँ..जिस ओर सहजता से वह खुद ले जाए के हिसाब से, उसे बहने देते हैं। खुद रजनी मोरवाल जी का भी मानना है कि बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के इस कहानी संग्रह "कुछ तो बाकी है" में उनकी कहानियाँ...

राजनटनी- गीताश्री

बचपन से ही आमतौर पर ऐसे किस्से या कहानियाँ हमारे आकर्षण, उत्सुकता एवं जिज्ञासा का सदा से ही केंद्र बनते रहे हैं जिनमें किसी राजा की अद्वितीय प्रेम कहानी अथवा शौर्य गाथा का विशुद्ध रूप से तड़केदार वर्णन होता था। ऐसे ही किस्से कभी कहानी/उपन्यास या फिर फिल्म के रूप में हमें रोमांचित..उत्साहित करने को अब भी यदा कदा हमारे सामने आते रहते हैं। अभी कुछ दिन पहले इसी तरह की राजघरानों से जुड़ी एक अद्वितीय प्रेम कहानी मुझे पढ़ने को मिली प्रसिद्ध लेखिका गीताश्री के उपन्यास 'राजनटनी' में। इसमें मूलतः कहानी...

अकाल में उत्सव- पंकज सुबीर

कई बार कुछ ऐसा मिल जाता है पढ़ने को जो आपके अंतर्मन तक को अपने पाश में जकड़ लेता है। आप चाह कर भी उसके सम्मोहन से मुक्त नहीं हो पाते। रह रह कर आपका मन, आपको उसी तरफ धकेलता है और आप फिर से उस किताब को उठा कर पढ़ना शुरू कर देते हैं जहाँ से आपने उसे पढ़ना छोड़ा था। ऐसा ही इस बार मेरे साथ हुआ जब मैंने पंकज सुबीर जी का उपन्यास "अकाल में उत्सव" पढ़ने के लिए उठाया। इस उपन्यास को पढ़ कर पता चलता है कि पंकज सुबीर जी ने विषय को ले कर कितना गहन..कितना विस्तृत चिंतन एवं शोध किया होगा कि हर बात एकदम सटीक, कहीं कोई...

लिट्टी चोखा- गीताश्री

कुछ का लिखा कभी आपको चकित तो कभी आपको विस्मृत करता है। कभी किसी की लेखनशैली तो कभी किसी की धाराप्रवाह भाषा आपको अपनी तरफ खींचती है। किसी की किस्सागोई पर पकड़ से आप प्रभावित होते हैं तो किसी की रचनाधर्मिता के आप कायल हो उठते हैं। कभी किसी का अनूठे ट्रीटमेंट तो कभी किसी की कसी हुई बुनावट आप पर अपना असर छोड़ जाती  है। अगर अपने समकालीन रचनाकारों के लेखन पर हम नज़र दौड़ाएँ तो उपरोक्त दिए गए गुणों में से अधिकांश पर हमारे समय की चर्चित रचनाकार गीताश्री जी भी खरी उतरती हैं। उनकी लेखनशैली में उनकी...

वायरस मारेगा- अंकित वर्मा

किसी ने भी नहीं सोचा था कोरोना महामारी के कहर से भयभीत हो..हम सब इसके मकड़जाल में इस कदर घिर जाएँगे कि हमें आपस में ही एक दूसरे से हमेशा इस बात का डर सताता रहेगा कि कहीं इसकी या उसकी वजह से हम भी वायरस के लपेटे में ना आ जाएँ। उस वक्त कमोबेश दूसरे की भी हालत हमारे जैसी ही हो रही होती है कि कहीं हमारी वजह से वह खुद इस कमबख्त कोरोना की चपेट में ना आ जाए। दरअसल यही डर बने बनाए काम बिगाड़ भी सकता है और यही डर, बिगड़े हुए काम बना भी सकता है। अगर किसी चीज़ या व्यक्ति से हम डर गए तो वो कमज़ोर होते हुए भी...
 
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