"दायाँ हाथ...बायाँ हाथ"

"दायाँ हाथ...बायाँ हाथ"***राजीव तनेजा***संता सिंह का बायाँ हाथ खराद मशीन पर काम करते हुए कट गया।यार-दोस्त अफसोस प्रगट करने के लिए घर आए....एक दोस्त ने अफसोस प्रगट करते हुए कहा"शुक्र है भगवान का कि बाँया हाथ कटा है"..."अगर दाँया हाथ कट जाता तो बहुत मुश्किल हो जाती"..... संता सिंह"शुक्र!...?"..."और ऊपर वाले का?"..."ये तो संता दा ग्रेट का दिमाग काम आ गया ऐन मौके पे"..."आया तो मेरा दाँया हाथ ही था मशीन में"..."मैँने झट से दाँया हाथ बाहर निकाला और फट से बाँया हाथ मशीन में डाल दिया"***राजीव तनेजा...

बेगम मिल जाती तो

"बेगम मिल जाती तो..."***राजीव तनेजा***चार दोस्त ताश खेल रहे थे। पत्ते देखने के बाद एक बोला"काश!..बेगम मिल जाती तो मज़ा ही आ जाता।"सभी दोस्त पत्ते टेबल फैंक कर एक साथ चिल्लाए"हमारी वाली ले जाओ"***राजीव तनेजा...

भड़ास दिल की कागज़ पे उतार लेता हूँ मैँ- राजीव तनेजा

क्या लिखूँ.. कैसे लिखूँ… लिखना मुझे आता नहीं… टीवी की झकझक.. रेडियो की बकबक.. मोबाईल में एम.एम.एस.. कुछ मुझे भाता नहीं भडास दिल की… कब शब्द बन उबल पडती है टीस सी दिल में.. कब सुलग पडती है… कुछ पता नहीं सोने नहीं देती है .. दिल के चौखट पे.. ज़मीर की ठक ठक उथल-पुथल करते.. विचारों के जमघट जब बेबस हो..तमाशाई हो.. देखता हूँ अन्याय हर कहीं फेर के सच्चाई से मुँह.. कभी हँस भी लेता हूँ ज़्यादा हुआ तो.. मूंद के आँखे… ढाँप के चेहरा… पलट भाग लेता हूँ कहीं आफत गले में फँसी जान...

"इतनी शक्ति हमें देना दाता"

"इतनी शक्ति हमें देना दाता"***राजीव तनेजा***"उम्र में छोटा हुआ तो क्या हुआ?"..."अपनी करनी से तो बडे बडों के कान कतर डाले उसने".. "छोटी उम्र में ही उसने ऐसा कर दिखाया कि बडे-बडे भी पानी भर उठें...शरमा उठें""सूरमा घबरा जाएँ"..."अच्छे अच्छों के कलेजे दहल उठें"..."आम आदमी के रौंगटे खडे हो जाएँ""कुछ सोच के ही किया होगा उसने ये सब"..."कुछ तो वजह रही होगी इस सब की"..."शायद!..भीड में सबसे अलग...सबसे जुदा दिखने की चाहत"..."सैलीब्रिटी बनने का अरमाँ संजोया होगा".."या!..हो सकता है कि सामने वाले ने उसके जोश...उसके...

हाँ!...नपुंसक हूँ मैं

***राजीव तनेजा*** "बचाओ...बचाओ...की आवाज़ सुन मैं अचानक नींद से हडबड़ा कर उठ बैठा…देखा तो आस-पास कोई नहीं था… घडी की तरफ नज़र दौडाई तो रात के सवा दो बज रहे थे|पास पडे जग से पानी का गिलास भर मैँ पीने को ही था कि फिर वही रुदन...वही क्रंदन मेरे कानों में फिर गूंज उठा|कई दिनों से बीच रात ये आवाज़ मुझे सोने नहीं दे रही थी|अन्दर ही अन्दर अपराध भाव खाए जा रहा था कि उस दिन…हाँ…उस दिन अगर मैँने थोडी हिम्मत दिखाई होती तो शायद आज मैँ यूँ परेशान ना होता|जो हुआ...जैसा हुआ...अफसोस है मुझे लेकिन मैँ अकेला….निहत्था...

"तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो"

"तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो"***राजीव तनेजा***"अलार्म कई बार बजने के बाद अब और बजने से इनकार कर चुका था"..."खुमारी ऐसी छाई थी कि..निद्र देवता भी लाख भगाए ना भाग रहे थे "..."भागते भी क्योंकर?""रात पौने तीन बजे लिखने-लिखाने के बाद जो सोने को बिस्तर का मुँह ताका था मैँने""नतीजन!...सुबह पहली ट्रेन तो मिस हो चुकी थी पानीपत के लिए"..."दूसरी वाली पैसैंजर का भी कुछ भरोसा नहीं था कि पकड पाऊँगा या नहीं"..."आँख जो खुली थी साढे सात बजे "..."अब कुल एक घंटे में क्या क्या करूँ मैँ?""सुबह सवेरे नहा-धो के तैयार हो नाश्ता पाडूँ मैँ या..."कितना हुआ डाउनलोड ... चैक करूँ मैँ और...या फिर यार दोस्तों के लिए पुट्ठी सीडी तैयार करूँ मैँ""ऊपर से अपनी...

"क्यों लिखता हूँ मैँ"

"क्यों लिखता हूँ मैँ"***राजीव तनेजा***"हुह!..."खाने की तरफ देखते ही मैँ नाक-भों सिकोडता हुआ बोला"ऑय-हॉय आज फिर मूंग की दाल?"..."कुछ और नहीं बना सकती थी क्या?""कितनी बार कहा है कि इस घर में खाना बनेगा तो सिर्फ मेरी मर्ज़ी का"..."पर पता नहीं तुम्हारे कान पे जूँ तक क्यूँ नहीं रेंगती है?""हर रोज़ बस वही उल्टे-सीधे खाने...कभी 'करेला' तो कभी 'घिया'...कभी 'तोरई' तो कभी 'बैंगन का भुर्ता'""अरे!...गुस्सा तो इतना आता है कि अभी के अभी मार-मार के तुम्हारा ही भुर्ता बना दूँ"मैँ गुस्से से बिफरता हुआ बोला"तो फिर...

इस प्यार को क्या नाम दूँ-राजीव तनेजा

***राजीव तनेजा*** "दिल की ये आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले"... "आखिर तुम्हें आना है...ज़रा देर लगेगी"... आज ये सब गाने मुझे बेमानी से लग रहे थे क्योंकि सब कुछ धीरे-धीरे सैटल जो होता जा रहा था|आज भी पुराने दिन याद करता हूँ तो सिहर-सिहर उठता हूँ|उफ!..वो दिन भी क्या दिन थे जब मैँ दिन रात इसी सपने में खोया रहता कि... काश..सपने में ही दिख जाए वो मुझे किसी तरह|असलियत में तो नामुमकिन सी बात जो लगती थी|उसका चेहरा हमेशा मेरी आँखो के आगे छाया रहता|ज़मीन पर रह कर चाँद को पाने की चाहत थी मेरी|पहली बार बचपन...

"इंकलाब ज़िन्दाबाद"

"इंकलाब ज़िन्दाबाद"***राजीव तनेजा***"क्या मुझे जीने का कोई हक नहीं?".."क्या मेरे भी कुछ अरमाँ नहीं हो सकते?"..."क्या हर वक्त...हर घडी मेरे अरमानों का यूँ ही गला घोटा जाता रहेगा?"..."क्या सिवाय चुपचाप टुकुर-टुकुर ताकने के कुछ भी नहीं कर पाऊँगा मैँ?"..."क्या मेरे अरमानों कि चिता यूँ ही खुलेआम जलती रहेगी?"..."क्या मेरी तमाम हसरतें यूँ ही ज़िन्दा दफ्न होती रहेंगी हमेशा?"..."क्या मेरा साथ देने वाला कोई नहीं होगा इस पूरे जहाँ में?".."क्या मुझे कभी खुशी नसीब होगी?"..."होगी भी या नहीं?"..."क्या मुझे हर घडी...

"आओ खेलें हम ब्लॉगर बलॉगर"

"आओ खेलें हम ब्लागर-बलागर"***राजीव तनेजा*** सम-समायिक पे तुम लिखो हास्य में व्यंग्य मैँ लाता हूँचिट्ठे पे मेरे तुम टिपिआओतुम्हारे चिट्ठे मैँ टिपियाता हूँआओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...आओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...जतन से तुम ये-ये लिखो प्रयत्न से मैँ वो-वो लिखता हूँकॉपी तुम वहाँ से करोपेस्ट यहाँ से मैँ करता हूँआओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...आओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...एडसैंस मेरी तुम चटकाओतुम्हारी किस्मत मैँ ज़माता हूँटीका टिपण्णी तुम करो..नुक्ता चीनी मैँ करता हूँआओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...आओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...तुम मेल कर मेल बढाओमैँ मोबाईल से बतियाता हूँओनलाईन नहीं घर आओवाईन पकोडे मैँ मँगवाता हूँ आओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...आओ...
 
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