"क्यों लिखता हूँ मैँ"

"क्यों लिखता हूँ मैँ"***राजीव तनेजा***"हुह!..."खाने की तरफ देखते ही मैँ नाक-भों सिकोडता हुआ बोला"ऑय-हॉय आज फिर मूंग की दाल?"..."कुछ और नहीं बना सकती थी क्या?""कितनी बार कहा है कि इस घर में खाना बनेगा तो सिर्फ मेरी मर्ज़ी का"..."पर पता नहीं तुम्हारे कान पे जूँ तक क्यूँ नहीं रेंगती है?""हर रोज़ बस वही उल्टे-सीधे खाने...कभी 'करेला' तो कभी 'घिया'...कभी 'तोरई' तो कभी 'बैंगन का भुर्ता'""अरे!...गुस्सा तो इतना आता है कि अभी के अभी मार-मार के तुम्हारा ही भुर्ता बना दूँ"मैँ गुस्से से बिफरता हुआ बोला"तो फिर...

इस प्यार को क्या नाम दूँ-राजीव तनेजा

***राजीव तनेजा*** "दिल की ये आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले"... "आखिर तुम्हें आना है...ज़रा देर लगेगी"... आज ये सब गाने मुझे बेमानी से लग रहे थे क्योंकि सब कुछ धीरे-धीरे सैटल जो होता जा रहा था|आज भी पुराने दिन याद करता हूँ तो सिहर-सिहर उठता हूँ|उफ!..वो दिन भी क्या दिन थे जब मैँ दिन रात इसी सपने में खोया रहता कि... काश..सपने में ही दिख जाए वो मुझे किसी तरह|असलियत में तो नामुमकिन सी बात जो लगती थी|उसका चेहरा हमेशा मेरी आँखो के आगे छाया रहता|ज़मीन पर रह कर चाँद को पाने की चाहत थी मेरी|पहली बार बचपन...

"इंकलाब ज़िन्दाबाद"

"इंकलाब ज़िन्दाबाद"***राजीव तनेजा***"क्या मुझे जीने का कोई हक नहीं?".."क्या मेरे भी कुछ अरमाँ नहीं हो सकते?"..."क्या हर वक्त...हर घडी मेरे अरमानों का यूँ ही गला घोटा जाता रहेगा?"..."क्या सिवाय चुपचाप टुकुर-टुकुर ताकने के कुछ भी नहीं कर पाऊँगा मैँ?"..."क्या मेरे अरमानों कि चिता यूँ ही खुलेआम जलती रहेगी?"..."क्या मेरी तमाम हसरतें यूँ ही ज़िन्दा दफ्न होती रहेंगी हमेशा?"..."क्या मेरा साथ देने वाला कोई नहीं होगा इस पूरे जहाँ में?".."क्या मुझे कभी खुशी नसीब होगी?"..."होगी भी या नहीं?"..."क्या मुझे हर घडी...

"आओ खेलें हम ब्लॉगर बलॉगर"

"आओ खेलें हम ब्लागर-बलागर"***राजीव तनेजा*** सम-समायिक पे तुम लिखो हास्य में व्यंग्य मैँ लाता हूँचिट्ठे पे मेरे तुम टिपिआओतुम्हारे चिट्ठे मैँ टिपियाता हूँआओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...आओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...जतन से तुम ये-ये लिखो प्रयत्न से मैँ वो-वो लिखता हूँकॉपी तुम वहाँ से करोपेस्ट यहाँ से मैँ करता हूँआओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...आओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...एडसैंस मेरी तुम चटकाओतुम्हारी किस्मत मैँ ज़माता हूँटीका टिपण्णी तुम करो..नुक्ता चीनी मैँ करता हूँआओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...आओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...तुम मेल कर मेल बढाओमैँ मोबाईल से बतियाता हूँओनलाईन नहीं घर आओवाईन पकोडे मैँ मँगवाता हूँ आओ खेलें हम ब्लागर-बलागर...आओ...

तलाश मुझे है किसकी"

"तलाश मुझे है किसकी"***राजीव तनेजा***तलाश मुझे है किसकीक्यूँ ये मैँ नहीं जानताभूल जाऊँ कैसे उसेदिल है नहीं मानताएक झलक देखी जब सेअवचेतन मन बसी तब से काश मिल जाए वो मुझेसच जो चाहत है मेरीभूल जा कहे गर खुदा भी उडने दूं कैसे अपनी हँसी पल-पल याद करता दिल खोज लाउंगा ढूँढ लाउँगाकरूँगा हासिल ***राजीव तनेजा...

"बडा दिन"

"बडा दिन"***राजीव तनेजा***"बात पिछले साल की है....चार दिन थे अभी त्योहार आने में...मैँ मोबाईल से दनादन 'एस.एम.एस'किए जा रहा था" "क्रिसमस का त्योहार जो सिर पर था लेकिन ये 'एस.एम.एस' मैँ..अपने खुदगर्ज़ दोस्तों को या फिर मतलबी रिश्तेदारों को नहीं कर रहा था""ये तो मैँ उन रेडियो वालों को भेज रहा था जो ....गानों के बीच-बीच में अपनी टाँग अडाते हुए बार-बार ..फलाने व ढीमके नम्बर पे 'एस.एम.एस' करने की गुजारिश कर रहे थे कि...फलाने-फलाने नम्बर पे 'जैकपॉट'लिख के 'एस.एम.एस' करो तो...'साँता'आपके घर-द्वार आ सकता...

"ठण्डे-ठण्डे पानी से नहाना चाहिए"

"ठण्डे-ठण्डे पानी से नहाना चाहिए"***राजीव तनेजा***"क्या मियाँ!....?"..."अब तो दिवाली को गुज़रे हुए भी कई घंटे हो गए"..."अब तो ये आलस-शालस को मारो गोली और सीधा बाथरूम में जा घुसो"..."बाल्टी,साबुन.तेल,शैम्पू सब याद कर रहे हैँ""बाजुएँ अकड गयी हैँ उनकी तुमसे मिले बिना""और तुम हो कि....कोई फिक्र ना फ़ाका".. "याद है ना...'शानू जी'के कवि सम्मेलन में जाना है?"और... दो दिन बाद अपनी शायर फैमिली वाली'श्रधा जी'भी तो आ रही है सिंगापुर से"..."उनसे भी तो मिलने जाना है पटपडगंज""आज ही तो पता और फोन नम्बर नोट कराया...

"मेरी कहानी नवभारत टाईम्स पर"

"मेरी कहानी नवभारत टाईम्स पर"22.10.2007 को नवभारत टाईम्स में मेरी कहानी छपी है "बताएँ तुम्हे बच्चा कैसे होता है" के नाम से www.navabharattimes.com -पाठकपन्ना-कहानियाँ - बताएँ तुम्हें बच्चा कैसे होता है http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2480094.cmsजिसे एक ब्लॉगर बन्धु श्री पवन कुमार मल्ल जी ने जस का तस कॉपी-पेस्ट कर डाला है अपने ब्लॉग पे ... http://pawankumarmall.blogspot.com/उनका मैँ अत्यंत आभारी हूँ कि उन्होने कहानी के साथ मेरा नाम नहीं लिखा..जिसके लिए मैंने उन्हें कमैंट भी किया...

"मंगल-कामना"

"मंगल-कामना"***राजीव तनेजा***"दिपावली की शुभ मंगल-कामनाएँ आप सभी को...."ऊप्स!...सॉरी...'मंगल' सिर्फ लड्कियों के लिए और....'कामना' सिर्फ लडकों के लिए""बिकाझ उल्टी गंगा इझ नॉट अलाउड हीयर इन मॉय ब्लॉग""हिन्दी हैँ हम...वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा""समझा करो यार"..."वैसे भी उलटे बाँस बरेली कहाँ जाता है आजकल?""देसी है हम...विलायती नहीं"..."सुनो लडकियो!...पते की बात".."फिर न कहना कि मौका नहीं दिया और कर डाला झट से एक दो तीन""बेशक!...खुशी से सारे के सारे 'मंगल' तुम ले लो"..."जी भर ले लो"..."झोली भर-भर ले लो"..."आखिर!..भाई...

"कुछ जतन करो मेरे भाई"

"कुछ जतन करो मेरे भाई"***राजीव तनेजा***ना रहा अब दिन को चैन ना रही अब रातों की नींद सुख-चैन लुट गया है मेरा कब-कब आओगे तुम रघुवीर पढने वाले पढ-पढ रहेसमझ रहा ना कोईकुछ जतन करो मेरे भाईकुछ जतन करो मेरे भाईपहले मैने इसे पिया अब ये मुझे पीने लगी ज़िन्दगी पहले सी कहाँ बोझिल अब होने लगीकुछ जतन करो मेरे भाईकुछ जतन करो मेरे भाईखुशी-खुशी मैँ इसे पीता थाहर गम भी सह-सह जाता थाबे-स्वाद बे-असर है अबना बचा इसमें कुछ बाकी हैकुछ जतन करो मेरे भाईकुछ जतन करो मेरे भाईक्यों जान इसी में अटकी है क्यों तलवार गले पे लटकी हैसमझ रहे मुझे किस जैसामैँ नहीं रहा कभी उन जैसाकुछ जतन करो मेरे भाईकुछ जतन करो मेरे भाईसोच तुम्हारी है उल्ट-पुल्टबात...

"हाँ मैँ सरदार हूँ"

"हाँ मैँ सरदार हूँ"***राजीव तनेजा***"अब यार!...इन लडकियों को हम सरदार पसन्द क्यों नहीं आते हैँ भला?""ये बात तो आज तक अपने पल्ले नहीं पडी""आखिर!..क्या कमी है हम में?""पता नहीं उन्हें हम सरदारों के नाम से ही करैंट क्यों लगने लगता है?""अब यार!..इन कमबखत मारियों से लाख छुपाने की कोशिश की कि मैँ सरदार हूँ लेकिन कोई फायदा नहीं""पता नहीं इनको कैसे खबर हो जाती है और...वो ऐसे पागल घोडी के माफिक बिदकती हैँ कि फिर कभी ऑनलाईन होने का नाम ही नहीं लेती""यहाँ तक कि मैने भी कई बार 'आई डी' बदल-बदल के 'ट्राई' मारी लेकिन....हाल वही जस का तस""इन बावलियों को पता नहीं कहाँ से खुशबू आ जाती है कि सामने वाला सरदार है"एक दिन हिम्मत कर के एक से पूछ...
 
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