"क्यों लिखता हूँ मैँ"

"क्यों लिखता हूँ मैँ"***राजीव तनेजा***"हुह!..."खाने की तरफ देखते ही मैँ नाक-भों सिकोडता हुआ बोला"ऑय-हॉय आज फिर मूंग की दाल?"..."कुछ और नहीं बना सकती थी क्या?""कितनी बार कहा है कि इस घर में खाना बनेगा तो सिर्फ मेरी मर्ज़ी का"..."पर पता नहीं तुम्हारे कान पे जूँ तक क्यूँ नहीं रेंगती है?""हर रोज़ बस वही उल्टे-सीधे खाने...कभी 'करेला' तो कभी 'घिया'...कभी 'तोरई' तो कभी 'बैंगन का भुर्ता'""अरे!...गुस्सा तो इतना आता है कि अभी के अभी मार-मार के तुम्हारा ही भुर्ता बना दूँ"मैँ गुस्से से बिफरता हुआ बोला"तो फिर...