सुनो... तुम्हें प्रेम बुलाता है - शिखा श्रीवास्तव 'अनुराग'

आम बॉलीवुडीय फ़िल्मों को अगर दो कैटेगरीज़ में बाँटने का प्रयास करें तो मेरे ख़्याल से एक तरफ़ तमाम मसाला फ़िल्में तो दूसरी तरफ राजश्री प्रोडक्शन्स की 'मैंने प्यार किया', 'नदिया के पार' या फ़िर 'हम आपके हैं कौन सरीखी' साफ़सुथरी संस्कारी  फ़िल्में आएँगी। सिक्के के पहलुओं की तरह जीवन में भी अच्छे और बुरे, दो तरह के लोग होते हैं। जहाँ एक तरफ़ कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मौका मिलने पर डसने से नहीं चूकते तो वहीं दूसरी तरफ़ कुछ इस तरह के लोग भी होते हैं जिनके संस्कार उन्हें किसी के साथ कुछ भी बुरा...

मुंबई नाइट्स - संजीव पालीवाल

थ्रिलर, मिस्ट्री और क्राइम बेस्ड फ़िल्मों, कहानियों एवं उपन्यासों का मैं शुरू से ही दीवाना रहा। एक तरफ़ ज्वैल थीफ़, गुमनाम, विक्टोरिया नम्बर 203 या फ़िर ऑक्टोपुसी जैसी देसी एवं विदेशी फ़िल्मों ने मन को लुभाया तो दूसरी तरफ़ वेद प्रकाश शर्मा के थ्रिलर उपन्यासों के रोमांच ने मुझे कहीं किसी और दिशा में फटकने न दिया। बरसों बाद जब फ़िर से पढ़ना शुरू हुआ तो थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक की लेखनी ने इस हद तक मोहित किया कि मैं पिछले लगभग 4 सालों में उनके लिखे 225 सेज़्यादा उपन्यास पढ़ चुका...

काग़ज़ के फूल - संजीव गंगवार

ज़िंदा रहा तो मिली गालियाँमरने के बाद मिली  तालियाँदोस्तों... जाने क्या सोचकर यह टू लाइनर आज से कुछ वर्ष पहले ऐसे ही किसी धुन में लिख दिया था मगर अब अचानक यह मेरे सामने इस रूप में फ़िर सामने आ जाएगा, कभी सोचा नहीं था। तब भी शायद यही बात ज़ेहन में थी कि बहुत से लोगों के काम को उनके जीते जी वह इज़्ज़त..वह मुकाम..वह हक़ नहीं मिल पाता, जिसके वे असलियत में हक़दार होते हैं। मगर उनके इस दुनिया से रुखसत हो जाने बाद लोगों की चेतना कुछ इस तरह जागृत होती है कि उन्हें उनकी..उनके काम की अहमियत और कीमत का एहसास...

कथाओं का आँगन - पूजा मणि

आप सबने ये पुरानी कहावत सुनी तो होगी ही कि..'सहज पके सो मीठा होय' अर्थात किसी भी चीज़ को परिपक्व होने अर्थात पकने के लिए पर्याप्त समय की ज़रूरत होती है। मगर आजकल के ज़माने में सब्र कहाँ। जल्दबाज़ी के चक्कर में जहाँ एक तरफ़ कैमिकल के प्रयोग से फल कभी ज़्यादा पक कर गल जाता है तो कभी बाहर से पका और भीतर से कच्चा या फ़ीका रह जाता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ इस जल्दी से जल्दी और ज़्यादा से ज़्यादा पा लेने की  भेड़चाल से हमारा साहित्यजगत भी अछूता नहीं रह पाया है। इस हफ़ड़ा-धफड़ी (आपाधापी) के आलम में सबको इतनी जल्दी...

ये इश्क़ नहीं आसां - संजीव पालीवाल

लगभग 3 साल पहले कॉलेज के मित्रों के साथ जोधपुर और जैसलमेर घूमने के लिए जाने का प्रोग्राम बना। जहाँ अन्य दर्शनीय स्थानों के साथ-साथ जैसलमेर के शापित कहे जाने वाले गाँव कुलधरा को भो देखने का मौका मिला। लोक कथाओं एवं मान्यताओं के अनुसार जैसलमेर में कुलधरा नाम का एक पालीवाल ब्राह्मणों का गाँव था जो राजस्थान के पाली क्षेत्र से वहाँ आ कर बसे थे। उन्होंने कुलधरा समेत 84 गांवों का निर्माण किया था। कहा जाता है कि 19वीं शताब्दी में घटती पानी की आपूर्ति के कारण यह पूरा गाँव नष्ट हो गया।एक अन्य मान्यता ...

ख़्वाबगाह - सूरज प्रकाश

सृष्टि के अन्य जीवों की भांति ही इंसान भी बारिश, तूफ़ान जैसी प्राकृतिक अवस्थाओं से ख़ुद को सुरक्षित रखने के लिए कोई न कोई ऐसी पनाह..ऐसा घर..ऐसा नीड़ चाहता है जहाँ निजता के साथ रहते हुए वह अपनों का अपनापन महसूस कर सके। रिश्तों के स्थायित्व से भरा एक ऐसा घरौंदा जहाँ वह स्वतंत्रता से विचर सके..अपने मन की कह और अपनों की सुन सके। हर इंसान अपनी रुचि, ख्वाहिश एवं हैसियत के हिसाब से अपने सपनों का घर..अपनी ख़्वाबगाह का निर्माण करता है। ख़ास कर के स्त्रियाँ एक ऐसा घर..ऐसी ख़्वाबगाह चाहती हैं जिसे वे अपनी रुचि...

अम्बर परियाँ - बलजिन्दर नसराली

आमतौर पर कोई भी लेखक हर उस चीज़, वाकये या अपने आसपास के माहौल में घट रही या घट चुकी किसी न किसी ऐसी घटना से प्रेरित हो कर कुछ न कुछ ऐसा रचने का प्रयास करता है जो उसके ज़ेहन के भीतर चल रही तमाम हलचलभरी कवायद को व्यथा, उद्वेग या फ़िर भड़ास के ज़रिए बाहर निकाल उसके चित्त को शांत कर सके। इन घटनाओं से वह स्वयं भी किसी ना किसी माध्यम से जुड़ा हो सकता है अथवा उसने इन्हें घटते हुए स्वयं देखा अथवा किसी और से इनके बारे में जाना हो सकता है। उन साधारण या फ़िर असाधारण सी दिखने वाली घटनाओं को लेखक अपनी कल्पनाशक्ति,...

फ़रेब का सफ़र - अभिलेख द्विवेदी

आजकल के इस आपाधापी भरे युग में कामयाब होने की ख़ातिर सब आँखें मूंद बढ़े चले जा रहे हैं। ऐसे समय में ना किसी को नैतिक मूल्यों की परवाह है ना ही इसकी कोई ज़रूरत समझी जा रही है। भविष्य की चिंता छोड़ महज़ आज को अच्छे से जीने की बात हो रही है। भले ही इसके लिए साम, दाम, दण्ड, भेद में से कुछ भी..किसी भी हद तक अपनाना पड़े या इसके लिए बेशक़ हमें, हमारे अपनों के प्रति ही भीतरघात करना पड़े या फ़िर फ़रेब का सहारा लेना पड़े। असली मकसद बस यही है कि कैसे भी कर सफ़लता हाथ लगनी चाहिए। दोस्तों, आज मैं ऐसे ही फ़रेबी विषय...

मोमीना - गोविन्द वर्मा सिराज

भारत पर मुग़लों ने लगभग 800 वर्ष और अँग्रेज़ों ने 200 वर्षों तक हुकूमत की। मगर मुग़लों के 800 सालों में कभी ऐसा नहीं हुआ कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच आपस में दंगे भड़क उठे हों जबकि अँग्रेज़ों ने लगातार हिंदुओं और मुसलमानों के बीच आपस में फूट डाल कर उन्हें इस कदर आपस में लड़वाया कि वे एक-दूसरे को अपनी कौम का दुश्मन समझने लगे..एक-दूसरे से नफ़रत करने लगे। आज़ादी के बाद अँग्रेज़ों के ही नक़्शेकदम पर चल भारतीय राजनीतिज्ञ भी हमारी आपसी फ़ूट एवं दुश्मनी को हवा दे अपना उल्लू सीधा करते रहे। दोस्तों..आज मैं हिंदू-मुस्लिम...

नई इबारत - सुधा जुगरान

जब भी मैं किसी कहानी संकलन या उपन्यास को पढ़ने का विचार बनाता हूँ तो अमूमन सबसे पहले मेरे सामने ये दुविधा उत्पन्न हो जाती है कि मैं किस किताब से अपने नए साहित्यिक सफ़र की शुरुआत करूँ? एक तरफ़ वे किताबें होती हैं जो मुझे अन्य नए/पुराने लेखकों अथवा प्रकाशकों ने बड़े स्नेह और उम्मीद से भेजी होती हैं कि मैं उन पर अपनी पाठकीय समझ के हिसाब से कोई सारगर्भित प्रतिक्रिया अथवा सुझाव दे सकूँ। तो वहीं दूसरी तरफ़ मुझे अपनी ओर वे किताबें भी खींच रही होती हैं जिन्हें मैंने अपनी समझ के अनुसार इस आस में खरीदा होता है...
 
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