रागदरबारी- श्रीलाल शुक्ल

मेरे अब तक के जीवन का सबसे कठिन उपन्यास श्रीलाल शुक्ल जी द्वारा लिखित "रागदरबारी" रहा है जो कि व्यंग्यात्मक शैली में लिखा गया है। कठिन इसलिए नहीं कि उसकी भाषा दुरूह क्लिष्ट एवं अपठनीय थी अथवा ये बहुत ज़्यादा घालमेल वाला, लंबा एवं उबाऊ था। इस सबके विपरीत उपन्यास बहुत ही रोचक ढंग से लिखा गया है और पढ़ते वक्त मन को इतना ज़्यादा आनंदित करता है कि आप उसे और ध्यान से पढ़ने लगते हैं कि कहीं कुछ छूट ना जाए। 

इस उपन्यास को श्रीलाल शुक्ल जी द्वारा 1964 के अंत में लिखना शुरू हुआ और 1967 में लिख कर पूरा समाप्त हुआ। 1968 में पहली बार छपा और 1969 में इसे साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला। 1986 में इस पर दूरदर्शन के लिए एक धारावाहिक भी बनाया गया जो कि काफी सफल साबित हुआ। अब तक इसके दर्ज़नों संस्करण और पुनर्मुद्रण हो चुके हैं। ये समझ लीजिए कि आज से 50 साल पहले उन्होंने जिस जिस चीज़, बात , परिस्थिति या घटना का अपने इस उपन्यास में उल्लेख किया, वही सब कमोबेश आज भी हमारे समाज में किसी ना किसी रूप में घटित हो चुका है और अब भी हो रहा है। हमारे समाज, नेताओं,सरकारों, अफसरशाहों में अब भी तब के मुकाबले रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है। वही लालफीताशाही, वही भ्रष्टाचार, वही चुनावी जोड़तोड़, वही हरामखोरी की लत, वही गंदगी से घिरे शहर और गांव, वही औरतों और लड़कियों को देख लार टपकते युवा..प्रौढ़ एवं अधेड़। मिड डे मील सरीखी स्कीम का गायब होता राशन, सरकारी अस्पतालों से गायब होती दवाइयाँ, चोरी छिपे बिकते नशीले पदार्थ। 

उपन्यास ऐसा कि पढ़ते वक्त हर एक दो पेज में बरबस आपकी हँसी छूट जाए और खुद आप ये महसूस करें कि यार ..ये तो बहुत मज़ेदार बात कह दी। कहीं गहरे कटाक्ष, कहीं तीखे व्यंग्य, कहीं धारदार नुकीली..पैनी भाषा और उस पर भी धाराप्रवाह लेखनशैली।

मेरी राय में अगर इस उपन्यास का पूरा मज़ा लेना हो तो इसे थोड़ा रुक रुक कर पढ़ा जाना चाहिए। ये उपन्यास एक तरह से व्यंग्य या हास्य लेखन करने वालों के लिए एक पूरा स्कूल, एक पूरा विश्वविद्यालय है। इनको पढ़ कर अगर कुछ सीख लिया तो समझो आपका जीवन धन्य हो गया और इनको अगर नहीं पढ़ा तो समझो बहुत कुछ छूट गया।एक खास बात और कि अब तक मैं जिन व्यंग्यकारों को पढ़ चुका हूँ उनमें मुझे आज के समय में ज्ञान चतुर्वेदी जी का और व्यंग्यकार सुभाष चन्दर जी का लेखन श्रीलाल शुक्ल जी की ही शैली को और आगे बढ़ाता हुआ लगा।

कॉपीराइट से मुक्त होने के कारण ये उपन्यास आपको बहुत से प्रकाशकों के पास मिल जाएगा लेकिन मैंने इसे अमेज़न से ऑनलाइन मंगवाया जो की इसका इकतालीसवां संस्करण है। 335 पृष्ठीय इस उपन्यास के प्रकाशक हैं राजकमल पेपरबैक्स और इसका मूल्य है ₹299/-

अपने पैरों पर- भवतोष पाण्डेय

कायदे से अगर देखा जाए तो अपने नागरिकों से टैक्स लेने की एवज में देश की सरकार का यह दायित्व बन जाता है कि वह देश के नागरिकों के भले के लिए काम करते हुए उसे अच्छी कानून व्यवस्था के साथ बेसिक सुविधाएँ जैसे साफ़-सफाई, शिक्षा, इलाज, रोज़गार इत्यादि तो कम से कम मुहैया करवाए। मगर यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि अब तक देश की चुनी हुई कोई भी निर्वाचित सरकार कभी भ्रष्टाचार की वजह से तो कभी आलस भरी लालफीताशाही अथवा निजी हितों के चलते के ऐसा करने में सफ़ल नहीं हो पायी है। ऐसे में अभी तक की चुनी हुई सभी सरकारों की नाकामी के चलते, उन्हीं बेहद ज़रूरी सुविधाओं को उपलब्ध कराने का बीड़ा निजी संस्थानों ने..बेशक अपने फायदे के लिए ही मगर इस कदर उठाया कि हर चीज़ पहले से महँगी.. और महँगी होती चली गयी। 

दोस्तों..आज मैं बात करने जा रहा हूँ विस्तृत आयामों से जुड़े शिक्षा और रोज़गार जैसे आवश्यक मुद्दों की विभिन्न परतों को परत दर परत खोलते एक ऐसे  उपन्यास की जिसे भवतोष पाण्डेय ने 'अपने पैरों पर' के नाम से लिखा है।

मूल रूप से इस उपन्यास में कहानी है दसवीं के बाद ग्यारहवीं में एडमिशन लेने कोटा के कोचिंग हब पहुँचे दक्ष की। इसमें कहानी है दक्ष के भावुक पिता देवेश की। जो हैसियत ना होने के बावजूद भी अपने बेटे को पढ़ा लिखा कर इंजीनियर बनाना चाहता है। इस उपन्यास में एक तरफ़ बातें हैं दिन प्रतिदिन बढ़ती मध्यमवर्गीय लोगों की दिक्कतों एवं परेशानियों के बीच उनके द्वारा देखे जाने वाले छोटे बड़े सपनों और उन सपनों को पूरा करने को आतुर प्रयासों से भरी उनकी तमाम जद्दोजहद की।

इसमें एक तरफ़ बातें हैं बढ़ती महँगाई के बीच और अधिक महँगी होती शिक्षा के निरंतर होते व्यवसायिकरण की। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसमें बातें है कोचिंग सेंटरों के धांधली भरे  मनमाने  रवैये की। इस उपन्यास में कहीं रैगिंग से जुड़े प्रसंग नज़र आते हैं तो कहीं इसमें वैश्विक मंदी के चक्कर में नौकरियों  में आयी भारी गिरावट की बात नज़र आती है। कहीं इसमें मुन्नाभाई सरीखा एजुकेशन माफ़िया अपनी पकड़ बनाए रखने को सतत प्रयास करता दिखाई देता है।  तो कहीं इसमें कोचिंग सेंटरों की जलेबीनुमा गोलमोल बातों से भरा इस कदर झोलझाल दिखाई देता है कि कोई पाली भाषा का एक्सपर्ट भी मात्र पंद्रह दिनों की मेहनत से तीन सौ मार्क्स लाने का दावा डंके की चोट पे खुलेआम ठोंकता दिखाई देता है। 

कहीं इसमें सिविल सर्विसिज़ और इंजीनियरिंग सर्विसिज़ जैसी दो नावों पर एक साथ सवारी करते विद्यार्थी दिखाई देते हैं। तो कहीं इस उपन्यास में संघर्ष से निराश हो कर कोई अभ्यर्थी टिफ़िन सर्विस जैसे काम में भी खुद को खपाता दिखाई देता है। तो वहीं कहीं कोई अन्य अभ्यर्थी, ब्रोकर बन, अपने हिस्से की कमीशन भी काटता दिखाई देता है। इसी उपन्यास में जहाँ एक तरफ़ कहीं कोई कॉरपोरेट जगत में ताने मार दूसरों को हतोत्साहित करता दिखाई देता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ कहीं कोई अन्य औरों की बनिस्बत पहले तरक्की पा..बाकियों की जलन का शिकार होता दिखाई देता है। कहीं इसमें अथक मेहनत के बाद भी किसी की मलाई कोई और चट कर जाता दिखाई देता है। 

इस उपन्यास में कहीं सरकारी नौकरी वाले युवकों को अपना दामाद बनाने की ख़ातिर लाखों का दहेज देने को आतुर लोग भी पंक्तिबद्ध शैली में अपनी बारी का इंतज़ार करते दिखाई देते हैं। तो इसी उपन्यास में कहीं और दिखावे की जीवनशैली को ले कर मियाँ बीवी आपस में नोकझोंक करते..भिड़ते दिखाई देते हैं।

इसी उपन्यास के ज़रिए कोटा में चल रहे स्कूलों के बारे में एक अजब बात पता चली कि वहाँ क्लास अटैंड करने पर कम फीस देनी होती है जबकि गैरहाज़िर रहने पर ज़्यादा फीस देनी होती है। जबकि कायदे से अगर देखा जाए तो ऐसा होने पर उनका स्टॉफ एवं स्कूल की मेंटेनेंस का खर्चा भी बच रहा होता है मगर ग़लत काम में भागीदार बनने की एवज में यह जुर्माना भी विद्यार्थियों से ही वसूल जाता है।

बतौर पाठक मुझे इस उपन्यास में शिक्षा और स्लेबस से जुड़ी एक जैसी बातों के बार बार सामने आने की वजह से उपन्यास थोड़ा धीमा होता दिखाई दिया। जिसकी वजह से बीच बीच में थोड़ी उकताहट के साथ साथ उपन्यास एकरसता का शिकार होता भी दिखाई दिया। हालांकि राहत के छीटों के रूप में इस उपन्यास में टिया और दक्ष का अघोषित.. प्रेम भी है जो बिना पनपे ही साँप सीढ़ी के खेल की भांति पूरे उपन्यास में हाँ.. ना..ना..हाँ पर ही अटका रहा। एक जैसी बातों को हटा कर इस उपन्यास की लंबाई को आसानी से थोड़ा कम किया जा सकता था। हालांकि सभी का तजुर्बा अलग अलग होता है मगर एक जैसे ही विषय पर बहुत से उपन्यास एवं कहानियों के आ जाने से इस उपन्यास की कहानी भी पहले से पढ़ी और काफ़ी हद तक सुनी सुनाई सी लगी। 

इसके अतिरिक्त कुछ एक जगह पति-पत्नी या दोस्तों के बीच के संवाद भी ऐसे औपचारिक भाषा या शब्दों का इस्तेमाल करते दिखे मानों सरकारी दफ़्तर में कामकाज को ले कर ऑफिशियल पत्र व्यवहार चल रहा हो। प्रूफरीडिंग स्तर पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना किया जाना भी खला। 

कुछ एक ग़लत छपे शब्दों ने भी अपनी तरफ़ ध्यान खींचा मसलन..

*सहभोजिता- सहभागिता
*कुतूहल- कौतूहल
*घबड़ा- घबरा 
*द् वन्द् व- द्वंद्व
*सेसन- सैशन 
*सिड्यूल- शिड्यूल( शेड्यूल)
*दरबे- दड़बे
*रविवासरीय- रविवारीय 

**कुछ एक जगहों पर वाक्यों में सही शब्द का प्रयोग ना होने की वजह से उनकी सरंचना बिगड़ती दिखाई दी जैसे कि पेज नंबर 4 पर लिखा दिखाई दिया कि.. 

"उस पर किसी चीज़ का दबाव ना हो और अर्थ का तो बिल्कुल भी नहीं।"

यहाँ 'अर्थ' शब्द से तात्पर्य 'पैसे' याने के 'आर्थिक स्तर' से है लेकिन इसके लिए 'अर्थ' शब्द का प्रयोग बड़ा अजीब लग रहा है।

** इसी तरह पेज नम्बर 5 पर स्टॉफ के कुछ सदस्यों द्वारा कुछ संवाद बोले गए हैं। हर एक के संवाद के बाद उस किरदार का नाम लेने के बजाय उन्हें इस तरह लिखा गया स्टॉफ नम्बर.1, स्टॉफ नम्बर.2, स्टॉफ नम्बर.3, स्टॉफ नम्बर.4, स्टॉफ नम्बर.5, स्टॉफ नम्बर.6 । जो कि बहुत ही अजीब लगा। इसके बजाय उन किरदारों को काल्पनिक नाम दे कर या फिर..'एक ने कहा' या फिर 'उसकी बात सुन कर दूसरा बोल पड़ा' अथवा 'ये कह कर तीसरे ने अपनी चोंच बीच में अड़ाई' इत्यादि की तरह अगर वाक्य का अंत किया जाता तो ज़्यादा बेहतर था।

आजकल के लेखकों में देखा गया है आमतौर पर वे एकवचन/ बहुवचन एवं स्त्रीलिंग/पुल्लिंग की बहुत ग़लतियाँ करते है। इस कमी से यह उपन्यास भी बचा नहीं रह पाया है। उदाहरण के तौर पर पेज नंबर 22 पर लिखा दिखाई दिया कि..

** 'किताब पढ़ते गए और वहाँ के छात्रों के खुराफातों के किरदारों में अपने आप को पाने लगे।'

यह वाक्य सही नहीं बना। यहाँ 'छात्रों के ख़ुराफातों' के बजाय 'छात्रों की ख़ुराफातों' आएगा।

इसी पेज के अंत में लिखा दिखाई दिया कि..

** 'रामाशीष राम ने मिलाप  की जान पहचान उसकी पसंद की लड़की से करा दिया था।'

यहाँ 'उसकी पसंद की लड़की से करा दिया था' के बजाय 'उसकी पसंद की लड़की से करा दी थी' आएगा। हाँ.. अगर 'जान पहचान'के बजाय 'परिचय' शब्द होता तो फिर 'परिचय करा दिया था' या 'परिचय करवाया दिया था' ही आता।
 
इसके बाद पेज नंबर 62 पर लिखा दिखाई दिया कि..

** 'अधिकांश ने अलजेब्रा, कैलकुलस और भौतिकी की समस्याओं में ही अपना समस्या बिताया था।'

यहाँ 'अपना समस्या बिताया था' कि जगह 'अपना समय बिताया था' आएगा।

पेज नंबर 79 पर लिखा दिखाई दिया कि..

** 'कोने में पड़ी कुर्सी पर वह धब्ब से बैठ गया और सर पकड़ कर सोचने लगा।'

यहाँ 'वह धब्ब से बैठ गया' की जगह 'वह धम्म से बैठ गया' आएगा। 

पेज नंबर 117 पर लिखा दिखाई दिया कि..

** 'उसके सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर की डांट ने उसे राह दिखा दिया था।'

यहाँ 'राह दिखा दिया था' की जगह 'राह दिखा दी थी' आएगा। हाँ.. अगर 'राह' की जगह 'रास्ता' शब्द होता तो 'रास्ता दिखा दिया था' ही आता। रहा दिखाई जाती है जबकि रास्ता दिखाया जाता है। 

अंत में चलते चलते एक ज़रूरी बात और कि पेज नम्बर 41 पर माँ द्वारा बेटे को कही गयी एक स्थानीय भाषा की एक उक्ति दी गयी है लेकिन उसका हिंदी में अर्थ उसी पेज पर ना छप कर अगले पेज याने के पेज नम्बर 42 के शुरू में छप गया है। जिसे उसी पेज पर होना चाहिए था जिस पर उसकी मूल पंक्ति छपी है।

हालांकि यह उपन्यास मुझे लेखक की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला पर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि नोशन प्रैस से छपे इस 145 पृष्ठीय उपन्यास का मूल्य 185/- रुपए रखा गया है। अंत में एक रोचक त्रुटि की बात और कि उपन्यास पर प्रकाशक का नाम ग़लती से छपने से रह गया है और मुझे अमेज़न पर सर्च करने से इसके प्रकाशक का नाम पता चला। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस किताब के आने वाले संस्करणों एवं भविष्य की आने वाली कृतियों में इस तरह की कमियों से बचा जाएगा। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

देह धरे को दण्ड- सपना सिंह (संपादन)

अनछुए या फिर तथाकथित सामाजिक ताने बाने में वर्जित माने जाने वाले संबंधों से संबंधित विषयों पर जब भी कुछ लिखा गया होगा तो लेखक ने खुद को पहले अपनी आलोचना सहने के लिए मानसिक तौर पर तैयार कर लिया होगा। उसके बाद ही बेधड़क हो कर उसने उन पर अपनी कलम या फिर कीबोर्ड पर अपनी उंगलियाँ चलाई होंगी। 

इस तरह के विषय पर कहानी को लिखते समय लेखक या लेखिका किस तरह के मनोभावों से गुज़र रही होगी? या किस कदर मानसिक पीड़ा से व्यथित एवं लबरेज़ हो कर इस तरह के अनछुए विषयों को अपनी सोच के अनुसार छुआ होगा? यही सब सोचते हुए जब मैंने सपना सिंह द्वारा संपादित विभिन्न लेखकों/ लेखिकाओं द्वारा लिखित इस कहानी संग्रह "देह धरे को दण्ड" को पढ़ना शुरू किया तो खुद को एक अलग ही दुनिया में विचरता पाया। 

इस कहानी संग्रह को एक अलग स्तर का संग्रह बनाने लिए जहाँ एक तरफ सपना सिंह जी को देश विदेश के श्रेष्ठ एवं  सक्रिय रचनाकारों का सहयोग मिला है, वहीं दूसरी तरफ इसी संग्रह की पहली कहानी के रचियता स्व.सआदत हसन मंटो हैं। इस संग्रह द्वारा साबित होता है कि बिना अश्लील हुए भी दैहिक संबंधों को लेकर उच्चकोटि का साहित्य रचा जा सकता है। 

इस संकलन के रचनाकारों का लेखन मैं पहले भी पढ़ चुका हूँ और कुछ का मैंने इस संकलन के माध्यम से पहली बार पढ़ा। एक पाठक की हैसियत से इस संग्रह को पढ़ते वक्त जहाँ एक तरफ कुछ रचनाओं ने इस कदर दिल को छुआ कि उनका असर बहुत देर तक बना रहा वहीं दूसरी तरफ एक दो रचनाएँ सतही तौर पर कि बस इस विषय पर लिखना है तो लिख दी..वाली भी लगी। मेरे ख्याल से उन कहानियों पर अभी और मेहनत की जा सकती है या की जानी चाहिए। एक कहानी में तो ऐसा लगा कि जैसे उसे अधूरा ही छोड़ दिया गया या वो किसी उपन्यास का एक हिस्सा मात्र हो। एक दो कहानियों में इस संकलन के मुख्य विषय(वर्जित संबंधों की कहानियाँ) को बस नाम मात्र के लिए बस छुआ गया है और उन्हें एक या दो वाक्यों में बस निबटा भर दिया गया है जो कि थोड़ा निराश करता है। 
  
एक आध कहानी में स्थानीय भाषा के शब्दों की भरमार दिखी। ऐसे शब्दों का प्रयोग जहाँ एक तरफ कहानी को प्रभावी बनाता है, वहीं दूसरी तरफ उसे समझना थोड़ा कठिन भी बनाता है। इस तरह के शब्दों के अर्थ अगर हिंदी में भी दिए जाएँ तो ज़्यादा बढ़िया रहेगा। कुछ कहानियों ने मुझे बेहद प्रभावित किया उनके नाम इस प्रकार हैं:

क्रांतिकारी(रूपसिंह चंदेल), डेड लाइन (प्रेम प्रकाश- अनुवाद-सुभाष नीरव), गंदगी का बक्सा( तेजेंद्र शर्मा), मन मोहने का मूल्य- सुषमा मुनींद्र), ईनारदाना(प्रत्यक्षा),उस पार की रोशनी( कविता),
  कि हरदौल आते हैं(मनीष वैद्य),ऑफ व्हाइट(प्रज्ञा पांडे), फांस( मनीषा कुलश्रेष्ठ), वर्जित फल(अंजू शर्मा), लम्हों की ख़ता/,सदियों की सज़ा(नीलिमा शर्मा) इत्यादि। 
  
 उम्दा क्वालिटी के इस 232 पृष्ठीय कहानी संग्रह को प्रकाशित किया है भावना प्रकाशन ने और इसके पेपरबैक संस्करण का मूल्य ₹295/- है। सपना सिंह जी को तथा प्रकाशक को एक बढ़िया संकलन निकालने के लिए बहुत बहुत बधाई।

दर्द माँजता है- रणविजय


अमूमन जब भी हम किसी नए या पुराने लेखक का कोई कहानी संकलन पढ़ते हैं तो पाते हैं कि लेखक ने अपनी कहानियों के गुलदस्ते में लगभग एक ही तरह के मिज़ाज़..मूड..स्टाइल और टोन को अपनी कहानियों में बार बार दोहराया है जैसे कि किसी लेखक की कहानियाँ ट्रीटमेंट और विषय के हिसाब से आपको उदासी..अवसाद और निराशा से भरे मंज़र से हर पल रूबरू कराती चलेंगी। तो वहीं किसी अन्य लेखक की कहानियाँ अपने हल्के फुल्के सहज ढंग से आपका मनोरंजन कर बिगड़ी बातों को संभालती चलेंगी। किसी लेखक की कहानियों में आपको पल पल..हर पल गुदगुदाते रोमानी पल बहुतायत में मिलेंगे तो किसी की कहानियों अपने व्यंग्य की मार से सामाजिक एवं राजनैतिक ढाँचे पे सामान्य..माध्यम अथवा तीखा कटाक्ष करती दिखेंगी। लेकिन कई बार अपवाद स्वरूप कुछ ऐसे हरफनमौला लेखकों का लिखा भी पढ़ने को मिल जाता है जिनकी हर कहानी का ट्रीटमेंट और विषय पहले से हट कर होता है। 

दोस्तों..आज मैं एक ऐसे रोचक कहानी संकलन की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'दर्द माँजता है...' के नाम से पहले कहानी संग्रह के रूप में लिखा है रणविजय ने। इस संकलन की पहली कहानी 'आगे दौड़..पीछे छोड़' की तर्ज़ पर चलती हुई फ्लर्टी नेचर के बैंक अफ़सर विनीत के साथ उसकी असिस्टेंट मानसी के बीच पद..पैसे..गरिमा और यौवन के लालच में पनपे उस अफ़ेयर की बात करती है। जिसमें से मानसी तो अपना मतलब निकलने के बाद पल्ला झाड़ने में देर नहीं लगाती जबकि विनीत उसके बाद ना घर का..ना ही घाट का रह पाता है। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी भारतीय रेलवे में व्याप्त लालफीताशाही का जिक्र करती है तो वहीं दूसरी तरफ़ लेबर यूनियनों की खामख्वाह की दखलंदाज़ी की भी बात करती है। इसमें कहीं भारतीय अदालतों के ढुलमुल रवैये की बात आती है तो कहीं यह कुदरती और कागज़ी इंसाफ़ के बीच के फ़र्क की बात करती है। कहीं बहकावे में आए लोगों की कमअक्ली की बात करती है तो कहीं वक्त ज़रूरत के मौके पर लेबर यूनियनों के वंचितों से पल्ला झाड़ने की भी बात करती दिखाई देती है।

इसी संकलन की एक अन्य भावनात्मक कहानी लातूर में आयी भूकंप की भयावह आपदा और उसके बाद की उन परिस्थितियों की बात कहती है। जिनमें दिल्ली के क्षितिज की प्रेरणा से उसके साथ तीन और दोस्त मिल कर राहत कार्य के लिए मिलेट्री..प्रशासन एवं स्थानीय लोगों की मदद से घायलों..वंचितों का सहारा..संबल बनने का प्रयास करते हैं। इस सबके बीच क्षितिज का भूकंप में अपने माँ बाप गंवा चुकी वंदना से एक आत्मीय रिश्ता बन रहा है जिसके तहत क्षितिज उसे इलाज के लिए अपने साथ दिल्ली चलने के लिए कहता है। मगर क्या वंदना का एक निपट अनजान व्यक्ति पर भरोसा कर..उसके साथ अकेले दिल्ली तक चले जाना सही रहेगा जिसे वह अभी कुछ दिनों पहले तक जानती भी नहीं थी? 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी इस सत्य की तस्दीक करती नज़र आती है कि किसी अपने के अचानक चले जाने से हम दुःखी हो..लाख शोक मना सकते हैं मगर उसके साथ उसी दुख में शरीक हो..मर नहीं सकते। साथ ही ऐसे शोक के दुख भरे मौके पर भी हमारे शरीर को ज़िंदा रहने के लिए ईंधन के रूप में भोजन की आवश्यकता होती है जिसे किसी भी कीमत पर लंबे समय के लिए नकारा नहीं जा सकता।

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में बैंकिंग में PO के लिए होने वाले साक्षात्कार के दौरान इंटरव्यू लेने वाले अफ़सर की निगाह में चुने जाने वाले अभ्यर्थी को ले कर कुछ असामान्य या अनियमित सा खटकता है। शक़ होने पर वह उसके डॉक्युमेंट्स की फिर से वैरिफिकेशन के लिए आगे सिफ़ारिश कर देता है। गोपनीय जाँच से पता चलता है कि  अनजाने में ही पुलिस के हाथ एक बड़ी मछली लग गयी है।

इसी संकलन की एक कहानी बिजली ट्रांसफार्मर के फुंक जाने पर स्थानीय निवासियों के द्वारा रेलवे ट्रैक पर धरना दे..हंगामा मचाते हुए पूरे आवागमन को पंगु बना देने की बात करती है। जिसमें हड़बड़ाए अफ़सर आनन फानन में इधर का माल इधर करने की तर्ज़ पर एक जगह का ट्रांसफार्मर उखड़वा कर दूसरी जगह लगवा देते हैं। इसके बाद आरोप प्रत्यारोप की झड़ी के बीच अपने मातहतों को गरियाते हुए अफ़सर आपदा में अवसर ढूँढ नए भ्रष्टाचार की नींव रख देते हैं। 

इसी संकलन में कहीं प्रेम..प्यार..विश्वास की सीधी डगर पर चलती हुई रोमानी कहानी अचानक छल..फरेब और धोखे की फिसलन भरी रपटीली राह पर चल पड़ती है। क्या आगे चल कर उनकी ज़िन्दगी में पुनः स्नेह..मोह का समतल रास्ता आ पाएगा? 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में मजबूरीवश खेत गिरवी रख कर्ज़ लिए गए रुपए को वापिस ना चुका पाने की स्थिति में एक किसान को अपमानजनक परिस्थितियों में परिवार समेत गाँव छोड़..शहर में अपना ठोर ठिकाना बनाना पड़ता है। बाद में बच्चों के पढ़ लिख लेने और साधन संपन्न हो जाने के बाद उस घर का बेटा क्या गाँव में उनके हुए अपमान को भूल..सब कुछ जस का तस चलने देगा अथवा अपमान की आग में जलते अपने चित्त को शांत करने का जतन करेगा? यह सब जानने के लिए तो आपको इस रोचक कहानी संकलन को पढ़ना होगा।

भाषा की रवानगी के लिहाज़ से अगर देखें तो धाराप्रवाह शैली में लिखी गयी सभी कहानियाँ अंत तक अपनी पकड़ बनाए चलती हैं। मगर 'मेरे भगवान' नामक कहानी मुझे अति भावुकता की शिकार एवं 'ट्रेन..बस और लड़की' तथा 'छद्म' नामक कहानियों में कहानियों जैसी कोई बात नहीं लगी।

अब अगर प्रूफरीडिंग की कुछ कमियों की बात करें तो पेज नंबर 25 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'अब विनीत का मोबाइल एक किनारे रख उठा था और फिर उसने बार से निकलकर होटल आने तक मोबाइल उठाया ही नहीं।'

यह वाक्य सही नहीं बना क्योंकि इसके पहले हिस्से में लेखक बताना चाह रहा है कि..'बार में विनीत, फोन को एक किनारे रख चुका था।' इसके बाद के हिस्से में लेखक ने बताया कि 'बार से होटल आने(?) तक उसने फोन उठाया ही नहीं।

अब पहले तो यहाँ यही बात क्लीयर नहीं हो रही कि 'विनीत, होटल से बार आया है' या फिर 'बार से होटल आया या गया है।' पहले की परिस्थिति को अगर देखें तो विनीत अपने दोस्तों के साथ बार में बैठा हुआ है और उसने वहीं अपना फोन एक किनारे पर रखा था लेकिन इसके बाद इसी वाक्य में आगे बताया गया कि वह 'बार से होटल आया' जबकि वह असल में 'होटल से बार में आया है।' खैर..यहाँ साहूलियात से समझने के लिए हम यह मान लेते हैं कि "विनीत, बार से होटल गया।"

मगर इसके बाद दिमाग़ मथने को एक सवाल और उठ खड़ा होता है कि..फोन साइड में रखने के बाद विनीत ने बार से होटल जाने तक फोन उठाया ही नहीं। इससे तो ये मतलब निकल रहा है कि विनीत का फोन बार में ही छूट गया जबकि हक़ीक़त में ऐसा बिल्कुल नहीं था। 

ख़ैर.. इतनी माथापच्ची करने के बाद अगर क़ायदे से देखा जाए तो यहाँ इस पंक्ति के होने या ना होने से कोई बड़ा फ़र्क नहीं पड़ने वाला था।

😊

कुछ जगहों पर मुझे वर्तनी की छोटी छोटी त्रुटियों मसलन..

** सिफान- शिफॉन
** सिकन- शिकन
** मंझा- मांझा के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना किया जाना थोड़ा खला।


इसके आगे बढ़ने पर पेज नंबर 114 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'पिछले 10 सालों में दुकान की अच्छी शाख हो गयी थी और अब उसकी अच्छी आमदनी थी।'

यहाँ 'अच्छी शाख हो गयी थी' के बजाय 'अच्छी साख हो गयी थी' आएगा। 

** कुछ लेखक आमतौर पर एकवचन- बहुवचन तथा स्त्रीलिंग- पुल्लिंग के बीच के फ़र्क को सही से नहीं पकड़ पाते हैं। ऐसी ही कुछ कमियां इस संकलन में भी दिखाई दी। उदाहरण के तौर पर पेज नंबर 93 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'डी.आर.एम साहब ने सरसरी निगाह से पूरी कथा पढ़ डाला।'

यहाँ 'कथा पढ़ डाला' के बजाय 'कथा पढ़ डाली' आएगा। हाँ.. अगर कथा के बजाय यहाँ उपन्यास पढ़ने की बात होती तो यकीनन 'उपन्यास पढ़ डाला' ही आता।

** इसी तरह पेज नंबर 108 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'मालदहिया, किसूली, बहेरिया, मिट्ठू, गोलिया, जैसे विभिन्न नाम आम के पेड़ों को गाँव वालों ने दे रखा है।'

अब जब आम की किस्मों की संख्या एक से ज़्यादा है तो इसमें 'गाँव वालों ने दे रखा है' की जगह 'गाँव वालों ने दे रखे हैं' आएगा। 

**इसके बाद पेज नंबर 113 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"तुमने खेत गिरवी रखे हैं, इसलिए अब तुम्हारा उन पर कोई दावा नहीं बनता।"

इसके बाद इसी पैराग्राफ है और आगे लिखा दिखाई दिया कि..

'स्वयं से, समाज से एक बड़ी ग्लानि की बाधा तय करनी है इस सौदा को पूरा करने के लिए।'

यहाँ ' इस सौदा को पूरा करने के लिए' के बजाय 'इस सौदे को पूरा करने के लिए आएगा। 

** तथ्यात्मक ग़लती के रूप में मुझे पेज नम्बर 108 में लिखा दिखाई दिया कि.. 

'उत्तर प्रदेश के नक्शे में 'सहरसा' केवल एक बिंदु भर हो सकता है।' 

लेकिन जहाँ तक मुझे जानकारी है उसके हिसाब से 'सहरसा' उत्तर प्रदेश में नहीं बल्कि बिहार में आता है। हो सकता है कि इसी नाम का कोई और इलाका उत्तर प्रदेश में भी हो लेकिन अगर ऐसा है उसे इसी कहानी में साफ़ साफ़ मेंशन किया जाना चाहिए था।  

हालांकि यह उम्दा संकलन मुझे लेखक की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके पेपरबैक संस्करण को छापा है 'साहित्य संचय' ने और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटेंट को देखते हुए जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को शुभकामनाएं।


स्टेपल्ड पर्चियाँ- प्रगति गुप्ता

कभी अख़बारों में छपी चंद गौर करने लायक सुर्खियाँ या तमाम मीडिया चैनल्स की हैडिंग बन चुकी कुछ चुनिंदा या ख़ास ख़बरें हमारे मन मस्तिष्क में कहीं ना कहीं स्टोर हो कर अपनी जगह..अपनी पैठ बना लेती हैं और जब तक ज़रूरत ना हो..बाहर नहीं निकलती। इसी तरह हमारे आस पड़ोस में घट चुकी या घट रही कुछ काबिल ए गौर घटनाएँ अथवा कुछ अलग तरह के नोटिसेबल किरदार भी सहज ही हमारे ध्यानाकर्षण का केंद्र बन..हमारे अवचेतन मन में कहीं ना कहीं बस जाते हैं और वक्त ज़रूरत के हिसाब से तब बाहर निकलते हैं जब हम जैसे लेखकों को कुछ नया रचना होता है। 

दोस्तों..आज मैं एक ऐसे कहानी संकलन की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'स्टेपल्ड पर्चियाँ' के नाम से लिखा है प्रगति गुप्ता ने। उनकी अनेक कहानियाँ पहले से ही विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में छप चुकी हैं। आइए..अब बात करते हैं इस संकलन की कहानियों की।

इस संकलन की एक कहानी जहाँ एक तरफ़ शरीर से मुक्त हो चुकी आत्माओं के माध्यम से हमारे देश में निरंतर हो रही भ्रूण हत्याओं के पीछे की वजहों पर बात करती नज़र आती है। जिसमें विभिन्न उदाहरणों  के ज़रिए भ्रूण हत्याओं के तरीकों का इस ढंग से मार्मिक वर्णन किया गया है कि पढ़ने वालों के दिल दहशत एवं करुणा से काँप उठते हैं। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसी संकलन की एक अन्य कहानी एक सफ़ल गायनेकोलॉजिस्ट पत्नी और उसके सर्जन पति की कहानी कहती है। जिसमें सास ससुर और घर..बच्चों की जिम्मेदारी के नाम पर पत्नी से उसका अच्छा भला..चलता कैरियर छुड़वा कर उसे घर बिठा दिया जाता है और वह उन सबकी देखभाल करते करते खुद अपना सारा जीवन उन्हीं के नाम होम कर देती है। मगर क्या वह कभी अपने डॉक्टरी के सपने..अपने पैशन..अपनी काबिलियत को अपनी मर्ज़ी से राज़ी खुशी भूल पाती है? 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी जहाँ महँगी तनख्वाहों पर मल्टीनेशनल कंपनीज़ में नौकरी पर लगे उन पढ़े लिखे युवाओं की बात करती है जो एकाएक ज़्यादा पैसा देख लेने के बाद उसे ढंग से पचा नहीं पाते और अनाप शनाप खर्चों एवं पार्टीबाज़ी के चक्कर में आ..नशे की गिरफ़्त में इस कदर घिरते चले जाते हैं कि उनको ना अपने अच्छे बुरे का भान और ना ही माँ बाप की समझाइश का कोई असर हो पाता है। तो वहीं एक अन्य कहानी में एक करोड़ के सालाना पैकेज पर नौकरी करने वाले अनमोल की पत्नी नीता, जो एक बच्ची की माँ भी है, के सामने शादी के 8 साल बाद उसके पति की अजीब आदतों का राज़ खुलता है कि पुरुष होने के बावजूद उसकी आदतें और शौक एक स्त्री जैसे हैं। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी बददिमाग 'भूमि' और उसके अपेक्षाकृत शांत पति 'अंकित' के माध्यम से इस बात की तस्दीक करती नज़र आती है कि 'सब्र के पैमाने को भी कभी ना कभी तो छलकना ही होता है। जिसमें प्रेम विवाह होने के बावजूद भी पढ़ी लिखी 'भूमि' बात..बात पर.. जगह-जगह सबके सामने अपने डीसेंट..सोबर कमाऊ पति, अंकित को नीचा दिखाने..अपमानित करने से नहीं चूकती। मगर एक दिन बीच सड़क ऐसा क्या होता है कि अंकित के सब्र का पैमाना छलकने को आतुर हो उठता है? तो वहीं एक अन्य कहानी ब्रेन हेमरेज की वजह से गंभीर हालत में अस्पताल पहुँची इंदु और उसकी उन स्मृतियों की बात करती है जिन्हें उसने तीन दिन अस्पताल में रहते हुए और फिर मृत्यु के बाद तेरह दिनों तक अपने घर में आत्मा बन कर महसूस करते हुए जिया। इन स्मृतियों में एक तरफ़ अपने बच्चों के मोह से जुड़ी बातों की चिंता और दूसरी तरफ़ अपने पति के गैरज़िम्मेदाराना रवैये से जुड़ी ऐसी बातें थीं जो उसे चैन से मुक्त नहीं होने दे रही थी। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़ मानवता की सेवा के इरादे से सालों साल लगन और मेहनत से पढ़ाई कर डॉक्टर बनने वालों की हिम्मत और संबल को तोड़ती हुई दिखाई देती है। जब मरणासन्न हालात में इलाज के लिए अस्पताल पहुँचे गंभीर मरीज़ की इलाज के दौरान हुई मौत के बाद उसके उपद्रवी रिश्तेदार डॉक्टरों को ही पीट कर गंभीर रूप से घायल कर देते हैं। इसमें एक तरफ़ डॉक्टरों का मरीजों के प्रति समर्पण..सेवाभाव एवं संवेदनशील पक्ष दिखाई देता है तो वहीं दूसरी तरफ मरीज़ के साथ आए उसके हितचिंतकों का असंवेदनशील एवं गैरज़िम्मेदाराना रवैया परिलक्षित होता है।

 एक अन्य कहानी मर्दों की फ्लर्टी नेचर की बात करती है कि किस तरह प्रौढ़ता की उम्र का एक व्यक्ति एक साथ दो दो युवतियों से निकटता बढ़ा.. दोनों को ही धोखा दे रहा होता है जिसका पता उसके मरने के बाद पता चल पाता है। 

एक अन्य कहानी में रिश्तों और भावनाओं के प्रति अपने जवान बेटे के लापरवाही भरे प्रैक्टिकल रवैये से आहत अभिभावकों में से पति के मरने के बाद अस्पताल से उनकी डेडबॉडी लेने एवं मृत्यु के बाद घर में होने वाले तमाम तरह के संस्कारों.. रीति रिवाज़ों को विधिपूर्वक करने से पहले ही बेटे के बैंक और प्रॉपर्टी से जुड़े मुद्दों को हल करने वाले रवैये को देख कर आहत मन से खुद माँ भी उसके प्रति प्रैक्टिकल होने की सोच लेती है। तो वहीं एक अन्य बुद्धिजीविता से भरी कहानी इस बात को समझाने का प्रयास करती नज़र आती है कि जब किसी ना किसी दबाव के चलते मन में दबी इच्छाओं..बातों एवं भावों को व्यक्त करना संभव ना हो तो वे कहीं गुम या ग़ायब होने के बजाय मन के भीतर ही कहीं ना कहीं अपनी पैठ बना..एकत्र होती रहती हैं। ऐसी ही अधूरी..दमित इच्छाओं..बातों को जब कोई समझने वाला मिल जाता है तो यही अव्यक्त भावनाएँ तरल रूप में अश्रु बन कर खुद से आज़ाद होने लगती हैं। तो वहीं एक अन्य कहानी में उन जवान होती बच्चियों की बात नज़र आती है जो बाहर तो बाहर..खुद अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं। 

पठनीयता के लिहाज से कुछ कहानियाँ मुझे बढ़िया तो कुछ गूढ़ एवं बुद्धिजीविता से भरी लगी। कुछ एक जगहों पर वर्तनी की छोटी छोटी त्रुटियाँ जैसे..

** सौबत- सोहबत
** चिपकर- चिपक कर
** बच्चे-वच्छे- बच्चे-वच्चे इत्यादि एवं कहानियों से जायज़ जगहों पर भी नुक्ते नदारद दिखे। प्रूफ़रिडिंग के स्तर पर अगर देखें तो पेज नंबर 61 के पहले पैराग्राफ में लिखा दिखाई दिया कि..

'अपना कामों को जल्द से जल्द समेटकर सुव्यवस्थित कर देने की इंदु की हमेशा से ही आदत थी।'

यहाँ 'अपना कामों को जल्द से जल्द समेट कर'  की जगह 'अपने कामों को जल्द से जल्द समेट कर' आएगा। 

इसी तरह पेज नंबर 62 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'एक हाथ में ड्रिप और नाक से गुज़रती हुई की नलकियाँ डॉक्टर ने इलाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए लगा कर रख छोड़ी थी।'

इस वाक्य में यह स्पष्ट नहीं है कि किस चीज़ की नलकियाँ? यहाँ इसे 'ऑक्सीज़न की नलकियाँ' किया जा सकता था या फिर नलकियाँ से पहले के शब्द 'की' को ही हटा कर इसे पाठकों के दिमाग़ पर छोड़ दिया जाना चाहिए था कि वह अपने आप अंदाज़ा लगा ले कि किस चीज़ की नलकियाँ की यहाँ बात हो रही है।

इसी पेज पर आगे लिखा दिखाई दिया कि..

'नए शरीर और नई प्रविष्टि के प्रतीक्षा में अस्पताल के तीन दिन और...

यहाँ 'नई प्रविष्टि के प्रतीक्षा में' की जगह 'नई प्रविष्टि की प्रतीक्षा में' आएगा।

इसके बाद पेज नंबर 63 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'इक्यावन साल के वैवाहिक जीवन में सिर्फ खुद लिए उसने शिशिर से कुछ ही पल चाहे थे।'

यहाँ 'वैवाहिक जीवन में सिर्फ़ खुद लिए' की जगह 'वैवाहिक जीवन में सिर्फ़ खुद के लिए' आएगा।

इसके आगे पेज नंबर 72 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'फिर भी श्वास और क्षय रोग के इस विभाग में दमे व श्वास संबंधी बीमारियों से जूझते मरीज़, स्वस्थ्य इंसान को भी अंदर तक हिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे।'

इसमें 'स्वस्थ्य' शब्द की जगह 'स्वस्थ' शब्द आएगा।

इसी तरह पेज नंबर 89 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'जैसे-जैसे पल्लवी की बातें मृगया को उथले भ्रमों से निकाल थी..'

यहाँ..'उथले भ्रमों से निकाल थी' की जगह 'उथले भ्रमों से निकाल रही थी' आएगा।

इसी पेज की अंतिम पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..

'जो बार बार उसको झंझकोर कर उसकी मासूमियत पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा था कि...काश।'

यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि 'झंझकोर' कोई शब्द नहीं होता। इसकी जगह 'झंझोड़ कर' आना चाहिए। 

महिला सशक्तिकरण को ले कर लिखे गए इस बढ़िया कहानी संकलन को पढ़ते वक्त मैंने नोटिस किया कि इसकी सभी कहानियाँ कहीं ना कहीं किसी समस्या..अवसाद या निराशा की बात करती हैं। हालांकि राहत की किरण के रूप में कुछ कहानियाँ अपने अंत में सकारात्मकता की तरफ़ कदम बढ़ाती तो दिखी मगर मेरे ख्याल से इतना भर काफ़ी नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले समय में सकारात्मकता के नज़रिए से लेखिका की कलम से कुछ प्रेम..हर्ष और उल्लास बाँटती कहानियाँ भी निकलती दिखाई देंगी।

यूँ तो यह 110 पृष्ठीय बढ़िया कहानी संकलन मुझे उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है भारतीय ज्ञानपीठ ने और इसका मूल्य रखा गया है 220 रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटेंट को देखते हुए जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को शुभकामनाएं।

वर्जिन मदर- संतोष कुमार


80 दशक के अंतिम सालों जैसी एक बॉलीवुड सरीखी कहानी जिसमें रेखा, जितेंद्र, राखी, बिंदु, उत्पल दत्त, चंकी पाण्डेय, गुलशन ग्रोवर इत्यादि जैसे अनेकों जाने पहचाने बिकाऊ स्टार हों और कहानी के नाम पर एक ऐसी कहानी जिसमें प्रेम, त्याग, ईर्ष्या, जलन, ममता एवं व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा/ प्रतिद्वंदिता समेत थोड़ी मारधाड़ एवं खूब मैलोड्रामा याने के सभी बिकाऊ फॉर्मूलों का मसालेदार तड़का लगा हो। वह अब..आज के माहौल में आपको पढ़ने को मिल जाए तो यकीनन आप नॉस्टेल्जिया की राह से होते हुए उस दौर में पुनः फिर से वापिस पहुँच जाएँगे जिसे आप स्वयं देख या फिर कभी किसी से सुन चुके हैं।

दोस्तों..आज मैं हर पल रोचकता जगाते एक ऐसे ही उपन्यास की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'वर्जिन मदर' के नाम से लिखा है संतोष कुमार ने। अब उपन्यास के शीर्षक 'वर्जिन मदर' से ही सबका ध्यान इसकी तरफ़, बेशक अच्छे या बुरे संदर्भ में, जाना लाज़मी बन जाता है कि आखिर..इसमें ऐसा होगा क्या? आश्चर्यजनक रूप से अपने नाम के ठीक विपरीत इस उपन्यास में बोल्डनेस का कहीं नामोनिशान तक नहीं है बल्कि उसके बजाय इसमें एक ऐसी पारिवारिक कहानी है जिसे पढ़ते हुए हम इसी के हो कर रह जाते हैं।

इस उपन्यास में कहानी है यंग बिज़नस मैन ऑफ द ईयर के अवार्ड से नवाज़े गए बीस वर्षीय युवा 'समय' और अवार्ड ना जीत पाने वाले 'अनुज', जो कि बड़े..दिग्गज व्यवसायी कबीर का बेटा है, के बीच बढ़ती ईर्ष्या..प्रतिद्वंदिता..जलन और दुश्मनी की। मुख्य रूप से इस उपन्यास में कहानी है 'समय' के प्रति 'सुहाना' के असीमित स्नेह..प्रेम और ममता भरे लाड़ प्यार की जिसे उसने उसकी माँ ना होते हुए भी माँ से बढ़ कर प्यार दिया। इसमें बातें है उस 'सुहाना' की जिसने कभी 'कबीर' से शिद्दत से प्यार किया मगर इसे भाग्य..साजिश या फिर परिस्थितियों की मार कहिए कि वो लाख चाह कर भी कबीर की ना हो सकती।

इसमें कहानी है कबीर की पत्नी काव्या और उसकी शातिर बुआ सुचिता की। उस सुचिता की, जिसकी साजिशों के चलते कबीर, सुहाना का ना हो कर काव्या का हो गया। मगर क्या सिर्फ़ सुचिता ही इस सबके के पीछे ज़िम्मेदार थी या फिर काव्या भी अपने मन में ऐसे ही कुछ ख़तरनाक मंसूबे पाले थी? यह सब तो जानने के लिए आपको सरल भाषा में लिखे गए इस रोचक उपन्यास को पढ़ना होगा।

मुंबई की पृष्ठभूमि पर रचे बसे इस उपन्यास में कहीं वहाँ की लोकल ट्रेन का जिक्र आता है तो कहीं वहाँ के आलीशान मॉल्स का। कहीं गणपति विसर्जन के ज़रिए लालबाग के महाराजा की बात होती है तो कहीं वहाँ की ओला जैसी कैब सर्विस की। अब ये और बात है कि वहाँ की ओला कैब में एक साथ चार जने सफ़र करते दिखाई देते हैं जबकि यहाँ दिल्ली की ओला/उबर की कैब सर्विस में दो से ज़्यादा जनों को ले जाने की मनाही है। ख़ैर.. यहाँ.. इस बात में मैं मुंबई के हिसाब से शायद ग़लत भी हो सकता हूँ। 

हालांकि अपनी तरफ़ से लेखक ने इस उपन्यास में रहस्य बनाए रखने का पूरा प्रयास किया मगर मुझे इसकी कहानी एक ऐसी कहानी लगी जिसे ना जाने कितनी बार थोड़े बहुत फ़ेरबदल के साथ पहले भी बॉलीवुड/साउथ की कई फिल्मों में फ़िल्माया जा चुका है। याने के बहुत ज़्यादा प्रिडिक्टेबल लगी।

एक दूसरी ज़रूरी बात कि उपन्यास की मुख्य किरदार 'सुहाना' ही इस उपन्यास की नैरेटर है और अपने ज़रिए पूरी कहानी का, यहाँ तक कि काव्या के घर का..एक एक बात का..एक एक संवाद का..एक एक हलचल का इस तरह आँखों देखा वर्णन करती दिखाई देती है मानों उसने सभी जगह अपने सी सी टीवी कैमरे विद साउंड एण्ड मोशन सेंसर लगवा रखे हों। यहाँ कहानी के किसी किरदार को कहानी आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी देने के बजाय अगर लेखक खुद अपने ज़रिए कहानी को आगे बढ़ाता तो ज़्यादा बेहतर होता 

आमतौर पर आजकल के बहुत से लेखक चीज़ों..वाक्यों में स्त्रीलिंग एवं पुल्लिंग तथा एक वचन और बहुवचन का सही से भेद नहीं कर पाते हैं। यही कमी इस उपन्यास में भी बहुत जगह पर दिखाई दी जो अखरती है। कुछ जगहों पर वर्तनी की छोटी छोटी त्रुटियों के अतिरिक्त ज़रूरी जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना किया जाना भी खला। साथ ही कुछ जगहों पर कुछ शब्द बिना किसी ज़रूरत के रिपीट होते दिखाई दिए। मसलन पेज नम्बर 47 पर लिखा दिखाई दिया कि...

'मैं समय को लेकर को कोई रिस्क नहीं लेना चाहती हूँ।'

इस वाक्य में दूसरे वाले 'को' शब्द की ज़रूरत नहीं थी। 

प्रूफ़रिडिंग के स्तर पर भी कुछ ऐसी कमियाँ दिखाई दीं जिन्हें ठीक करना बहुत ज़रूरी लगा जैसे कि पेज नंबर 13 पर लिखा दिखाई दिया कि..

** 'काव्या कॉलेज के दिनों से ही कबीर से प्यार करती थी और उसे पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने का मादा रखती थी।'

इस वाक्य में 'माद्दा' के बजाय 'मादा' लिखा है जो कि 'मादा' याने के 'स्त्री' होता है जबकि यहाँ 'माद्दा' होना चाहिए जो कि बतौर हिम्मत के प्रयुक्त होता है। 

** इसी तरह पेज नंबर 21 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"मैं उसका दुश्मन नहीं हूँ जो उसके लिए बुरा चाहूँगा। मैंने जो कहाँ उसे तुम भी याद रखना और टाइम टाइम पर उसे याद दिलाते रहना।"

यहाँ 'मैंने जो कहाँ उसे तुम भी याद रखना' की जगह 'मैंने जो कहा उसे तुम भी याद रखना आएगा। 

** आगे बढ़ने पर पेज नंबर 35 के अंत में लिखा दिखाई दिया कि..

'निशांत और अनुज बेवजह मेरे बेटे से झगड़ा मोड़ ले रहे थे।'

यहाँ 'झगड़ा मोड़ ले रहे थे' के बजाय 'झगड़ा मोल ले रहे थे' आएगा।

** इसके बाद पेज नम्बर 58 पर एक जगह लिखा दिखाई दिया कि..

"आप कहा खोए हो?" पलक ने फिर पूछा।

यहाँ इसके बजाय "आप कहाँ खोए हो?" आना चाहिए।

** और आगे बढ़ने पर पेज नंबर 70 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'निशांत भी उसे बदला लेने के लिए उसका रहा था।'

यहाँ 'उसका रहा था' के बजाय 'उकसा रहा था' आना चाहिए।

** इसी पेज पर आगे लिखा दिखाई दिया कि..

"कभी-कभी पलक भी महक के साथ आ जाती थी और तीनों मिलकर गेम खेलते और मूवीज देखने जाते।"

यहाँ 'मूवीज़' के बजाय 'मूवी' आना चाहिए। 'मूवीज़' का मतलब तो हुआ कि एक से ज़्यादा फिल्में मगर एक दिन..एक मीटिंग..एक डेट में एक से ज़्यादा फिल्में भला कौन देखेगा और क्यों देखना पसन्द करेगा? 

** और आगे बढ़ने पर पेज नंबर 93 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'मैं जैसे ही उसकी आवाज सुनी अपने कमरे से भागते हुए उसके पास पहुँची और उसे गले से लगा कर रोने लगी।'

यहाँ 'मैं जैसे ही उसकी आवाज सुनी' की जगह 'मैंने जैसे ही उसकी आवाज़ सुनी' आएगा। 

** इसके बाद पेज नम्बर 163 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"आप क्यों जबरी कर रही हैं?"

यह वाक्य सही नहीं है। इसकी जगह "आप क्यों ज़बरदस्ती कर रही हैं?" होना चाहिए।

** इसके बाद अगले पेज नंबर 164 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'इतने सालों बाद उसे अपने करीब देखकर मेरे दिन की धड़कनें तेज हो गई थी।'

यहाँ 'दिन की धड़कनें' नहीं बल्कि 'दिल की धड़कनें' आएगा।

**(नोट: इस तरह की कमियों के अनेकों उदाहरण इस किताब में देखने को मिले।)

यूँ तो 175 पृष्ठीय यह उपन्यास मुझे लेखक की तरफ़ से उपहारस्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके पेपरबैक संस्करण को छापा है हिंद युग्म ब्लू ने और इसका दाम रखा गया है 150 रुपए। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।
 
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