मृगया- अभिषेक अवस्थी

साहित्य क्षेत्र के अनेक गुणीजन अपने अपने हिसाब से व्यंग्य की परिभाषा को निर्धारित करते हैं। कुछ के हिसाब से व्यंग्य मतलब..ऐसी तीखी बात कि जिसके बारे में बात की जा रही है, वह तिलमिला तो उठे मगर कुछ कर ना सके। वहीं दूसरी तरफ मेरे जैसे कुछ व्यंग्यकार मानते हैं कि व्यंग्य में तीखी..चुभने वाली बात तो हो मगर उसे हास्य की चाशनी में इस कदर लपेटा गया हो कि उपरोक्त गुण के अतिरिक्त सुनने तथा पढ़ने वाले सभी खिलखिला कर हँस पड़ें।

आज व्यंग्य की बात इसलिए दोस्तों कि आज मैं अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लगातार छपने वाले अभिषेक अवस्थी जी के प्रथम व्यंग्य संग्रह 'मृगया' की बात करने जा रहा हूँ। तत्कालीन अख़बारी सुर्खियों और मीडिया जगत की ख़बरों को आधार बना लिखे गए उनके व्यंग्य खासे प्रभावित करते हैं।

जहाँ एक तरफ़ कुछ नए व्यंग्यकारों को आजकल अपने विषय से भटक खामख्वाह में बात में से बात निकालते देखा जा सकता है। जिसे कुछ लोगों के द्वारा अब व्यंग्य मान एवं स्वीकार कर लिया गया है। सुखद आश्चर्य के रूप में अभिषेक अवस्थी जी की लेखनी इस सब से बची नज़र आती है। 

उनके व्यंग्यों की चपेट में जहाँ एक तरफ़ बड़े सेलिब्रिटीज़ नज़र आते हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ मीडिया भी उनके छोटे से छोटे फंक्शन को कवर करने को दीवाने आशिकों की भांति हर पल बेताब दिखाई देता है। कहीं उनके व्यंग्य में स्मार्टफोन का इस्तेमाल ना करने वालों को पिछड़ा या दोयम दर्ज़े का मान लिया गया है। तो कहीं दिलफैंक टाइप के चलते पुर्ज़े लोग अपनी फ्लर्टी नेचर की वजह से इनकी जद में आए दिखते हैं।

कहीं हर जगह..हर मौके पर नुक्ताचीनी करने मामा या फूफ़ा टाइप के लोग दिखते हैं तो कहीं हिंदी दिवस के मौके पर जगह जगह कुकुरमुत्तों की फौज की तरह उग आए मौकापरस्त हिंदी सेवकों  का जमावड़ा नज़र आता है। कहीं इसमें बिहार की परीक्षाओं में टॉप करने वालों के स्कैम की बात है तो कहीं भारतीय रेल की लेटलतीफी और टीटी वगैरह की मनमानी नज़र आती है।

कहीं इसमें शिकायतों के पुलिंदे को ओपन लैटर के माध्यम से खोलने के चलन और स्कूल की शरारतों..मार इत्यादि का मज़ेदार चित्रण है। तो कहीं देश की राजनीति में बाहुबलियों..मुजरिमों..चोर..डाकुओं के पदार्पण पर गहरा कटाक्ष करती रचना दिखाई देती है। कहीं इसमें मसालेदार खबरों के फेर में पड़े तथाकथित टाइप के कमाई खोजते..खोजी पत्रकार नज़र आते हैं। तो कहीं इसमें चुनाव से पहले नेताओं के शराफ़त का चोगा ओढ़ जनता के समक्ष आने की बात है। 

कहीं "बदनाम होंगे तो क्या नाम ना होगा?" 
वाली उपरोक्त कहावत की तस्दीक करने की तुरत फुरत चर्चा में आने के उलटे सीधे उपाय खोजते एवं आज़माते लोग नज़र आते हैं। तो कहीं कोई फेसबुक पर लाइक्स के कम आने या बहुत ज़्यादा आने से होने वाली चिंता..परेशानीसे घिरा बैठा है।
कहीं इसमें भारतीय रेल की तीनों श्रेणियों शताब्दी- राजधानी, एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनों तथा उनमें सफ़र करने वाले यात्रियों के बीच के फ़र्क को इंगित किया गया है। तो कहीं पक्ष विपक्ष की जुगलबंदी से नेताओं की चार गुणा तक बढ़ी वेतनवृद्धि को निशाना बनाया गया है। 

कहीं इसमें आलोचना सहन ना कर पाने वाले लोगों की खिसियाहट युक्त  बौखलाहट के आधार पर लिखा गया व्यंग्य नज़र आता है। तो कहीं इसमें खोखली संवेदनाएं प्रकट करते नेता दिखाई देते हैं। कहीं सदा दुखी रहने वाले लोग दिखाई देते हैं। तो कहीं राजनीति में सफलता प्राप्ति हेतु अनिवार्य रूप से किए जाने वाले मज़ेदार योगासनों का वर्णन है। कहीं इसमें सरकारी अध्यापकों को कभी मतगणना ड्यूटी..तो कभी चुनाव ड्यूटी में झोंकने के सरकारी आदेशों पर कटाक्ष किया गया है। तो कहीं इसमें ऐसे लोगों पर कटाक्ष दिखाई देता है जो एक तरफ़ बढ़ती महंगाई का रोना रोते हैं और दूसरी तरफ लाइनों में खड़े होकर ₹72000 से ले कर एक-सवा लाख तक के आईफोन बुक करवा रहे होते हैं। 

कहीं इसमें आरक्षण माँगने वालों की बढ़ती तादाद और अनियंत्रित इच्छाओं पर कटाक्ष किया गया है। तो कहीं इसमें झूठी सच्ची तारीफ करने के गुण सिखाए गए हैं। कहीं इसमें दहेज लोलुपों पर मज़ेदार ढंग से कटाक्ष किया गया है। तो कहीं इसमें होली की मस्ती अपने चरम पर दिखाई देती है। कहीं इसमें छोटी उम्र में ही बच्चों पर कोचिंग का बोझ डालते अभिभावक दिखाई देते हैं। तो कहीं पर्यावरण दिवस पर अपने ए. सी कमरों से बाहर निकल कुकुरमुत्ते की भांति यहाँ वहाँ से उभरते पर्यवरण प्रेमी दिखाई देते हैं। 

कहीं इसमें राजनीतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं की व्यथा पर प्रकाश डाला गया है कि किस प्रकार उन्हें कार्यकर्ताओं और नेताओं द्वारा की गई गंदगी को ढोना पड़ता है। तो कहीं अन्ना आंदोलन के उठने..ढहने और केजरीवाल के सरकार बनाने पर गहरा कटाक्ष किया गया है। कहीं पानी की कमी और उसे व्यर्थ बहाने वालों पर निशाना साधा गया है। तो कहीं इसमें संकट की घड़ी में कुछ ठोस कर दिखाने के बजाय महज़ उच्चस्तरीय बैठकें करने वाली सरकारों और अफ़सरों की बात है।

 कहीं इसमें मॉब लिंचिंग को उतारू उन्मादी भीड़ इसमें नज़र आती है। तो कहीं इसमें कोई राजनीतिक ग्रुप अपने चेले चपाटों को लूटपाट और भ्रष्टाचार की शिक्षा देता नजर आता है। कहीं किसी व्यंग्य में इस बात की तस्दीक होती दिखाई देती है कि जीते जी जिसकी लोग बुराई करते हैं। मरने के बाद उसी की तारीफ़ करते हैं कि.."भला आदमी था।"

विषयों की विविधता लिए इस संकलन में ज़्यादातर व्यंग्य बढ़िया लगे मगर कहीं कहीं कुछ व्यंग्य अपने विशेष से भटकते हुए भी दिखाई दिए। कुछ एक व्यंग्यों के सतही होने तथा कुछ के महज़ अख़बारी कॉलम भरने के लिए ऑन डिमांड तुरत फुरत में लिखे जाने जैसा भान हुआ। 

अंत में चलते चलते एक सुझाव कि.. अख़बारी कॉलम तक तो ठीक लेकिन अगर व्यंग्यों का संग्रह निकालना हो तो छपने से पहले थोड़े संयम और तसल्ली के साथ फाइनल एडिटिंग भी कम से कम एक मर्तबा करने की ज़रूर सोचें। इससे उन्हीं व्यंग्यों में जहाँ एक तरफ़ नए..चुटीले पंचेज़ जुड़ेंगे। वहीं दूसरी तरफ़ अवांछित मैटीरियल एवं बिना ज़रूरत शब्दों की छँटनी भी हो सकेगी। साथ ही क्वांटिटी के बजाय कंटैंट पर फोकस करते हुए कोशिश करें कि व्यंग्य की हर पंक्ति में कुछ ना कुछ खास हो। भले ही वो तीखी..चुभने वाली बात हो अथवा हास्य मिश्रित मज़ेदार तंज हो। 

बढ़िया कागज़ एवं बाइंडिंग के साथ छपे इस 152 पृष्ठीय व्यंग्य संग्रह के हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है भावना प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 400 रुपए। जो कि एक आम पाठक की जेब के हिसाब से काफ़ी ज़्यादा है। आम पाठकों तक किताब की पहुँच को बढ़ाने के लिए ज़रूरी है कि इसका पेपरबैक संस्करण जल्द से जल्द निकाला जाए। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

नक़्क़ाशीदार कैबिनेट- सुधा ओम ढींगरा

अपनी सहज मनोवृति के चलते हर लेखक चाहता है कि उसकी किताब ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों तक असरदार ढंग से पहुँचे। किताबों की बेइंतिहा भीड़ में उसे पाठकों की ज़्यादा से ज़्यादा तवज्जो..ज़्यादा से ज़्यादा आत्मिकता..ज़्यादा से ज़्यादा स्नेह मिले। अपने मुनाफ़े को देखते हुए ठीक इसी तरह की ख्वाहिश रखते हुए प्रकाशक भी चाहते हैं कि उनकी किताब दूर-दूर तक और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचे। 

इसी वजह कई बार लेखक एवं प्रकाशक अपनी किताबों को कभी समीक्षा के मकसद से तो कभी अन्य मित्रों इत्यादि को उपहार स्वरूप भेंट कर खुश हो लेते हैं कि इससे उनके भावी पाठकों/ग्राहकों की संख्या में अच्छा खासा इज़ाफ़ा होगा। मगर उसके बाद उन किताबों की गति उस पाठक(?) के पास पहुँच कर क्या होती है? इसे बस 'बन्दर के हाथ उस्तरा' वाली कहावत के आधार पर राम भरोसे छोड़ दिया जाता है कि अब उसकी मर्ज़ी चाहे इस तरह पेश आए या फिर उस तरह। 

 ऐसे में जब उसी लेखक या प्रकाशक को आने वाले समय में किसी तरीके से पता चलता है कि उसकी किताबें किसी फलाने फलाने कबाड़ी के पास तौल के भाव धक्के खा रही है। तो आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं कि उस बेचारे लेखक या प्रकाशक पर क्या बीतती होगी? ऐसा नवांगतुक लेखकों के साथ ही नहीं बल्कि प्रतिष्ठित..पुराने एवं जमे हुए स्थापित लेखकों के साथ भी होता है।

इन सब बातों का जिक्र यहाँ. इस समीक्षा में इसलिए कि लगभग तीन महीने पहले मुझे दिल्ली के दरियागंज इलाके में प्रसिद्ध लेखिका सुधा ओम ढींगरा का लगभग मिंट कंडीशन वाला उपन्यास 'नक़्क़ाशीदार कैबिनेट' महज़ 40 रुपए में मिला। जिसे लेखिका या फिर प्रकाशक ने बड़े चाव से कोलकाता की किसी लाइब्रेरी को उपहारस्वरूप भेंट किया था। 

खैर..अब बात करते हैं उपन्यास की तो इसमें कहानी है विकसित अमेरिका में अक्सर आने वाले तूफ़ानों और उनसे होने वाले जान माल के भारी नुकसान की। इसमें बात है उन तूफ़ानों से लड़ने वाले लोगों की हिम्मत भरी जिजीविषा की। इसमें बात है जाति.. धर्म और स्टेटस को भूल..आपसी भाईचारे और सोहाद्र की।

इस उपन्यास के मूल में कहानी है पंजाब के गांवों और नशे की गिरफ्त में कैद होते वहाँ के युवाओं की। इसमें बात है बेरोज़गारी के चलते प्रलोभन वश युवाओं के आतंकी बन..यहाँ वहाँ.. हर जगह क़हर बरपाने की। इसमें बात है फ़र्ज़ी शादियों के ज़रिए भोली भाली लड़कियों को विदेश ले जा..जबरन ड्रग और देहव्यापार में धकेलते माफ़िया की।

इसमें बात है लालच..लंपटता और आपसी द्वेष के बीच जूझती सोनल की। उस सोनल की, जिसका ननिहाल ही लालचवश उसके खानदान का सर्वनाश करने को तुला था। इसमें बात है अवैध कब्ज़ों की नीयत से होते कत्लों और लंपटता भरे व्यभिचार की।

इसमें बात है महलों..हवेलियों से ग़ायब हुए राजसी ख़ज़ाने और उसे हड़पने को ललचाते लोगों की। इसमें बात है अमानत में ख़यानत..लालच..द्वेष और बदले से ओतप्रोत क्रूर भावनाओं की। इसमें बात है भर्ष्टाचार में आकंठ डूबी लापरवाह भारतीय पुलिस के कोताही भरे रवैये और अविवेकपूर्ण फैसलों की। साथ ही इसमें बात है संजीदा..सजग एवं मुस्तैद अमरीकी पुलिस की कर्तव्यपरायणता की। 

इसमें बातें हैं उस पंजाब की, जिसके गांवों का आधा जीवन लड़ाई झगड़े में और आधा जीवन कोर्ट कचहरी में बीत जाता है। इसमें बात है 1970 के दशक के प्रमुख पंजाबी कवि 'पाश' की जिसका असली नाम अवतार सिंह संधू था और जिसकी 23 मार्च 1988 को खालिस्तानी चरमपंथियों ने हत्या कर दी थी।

इस बात के लिए लेखिका की तारीफ़ करनी होगी कि उन्होंने अमेरिका में आने वाले तूफ़ान और टॉरनेडो का जीवंत वर्णन इस प्रकार किया है मानों सब कुछ हमारी आँखों के सामने ही घटित हो रहा हो। साथ ही पाठकों की सुविधा के लिए उन्होंने स्थानीय भाषा के संवादों के साथ ही साथ उनका हिंदी अनुवाद भी दिया है। 

उपन्यास के शीर्षक 'नक्काशी दार कैबिनेट' से पहलेपहल भान हुआ कि ज़रूर कोई रहस्यमयी गुत्थी इस केबिनेट से जुड़ी होगी। जिसे अंत तक आते आते सुलझाया जाएगा। लेकिन इस उपन्यास का इसके शीर्षक 'नक़्क़ाशीदार केबिनेट'  से बस इतना नाता है कि उसमें से पहले एक डायरी और बाद में एक पुराना पत्र मिलता है जो कहानी को आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होता है। 

बतौर पाठक मेरा मानना है उपन्यास की हर छोटी बड़ी घटना का आपस में कोई ना कोई गहरा संबंध..जुड़ाव या अगली घटना से उसका कोई ना कोई लिंक होना बहुत ज़रूरी है। किसी भी घटना को ऐसा नहीं होना चाहिए कि वो..बस ऐसे ही घटने के लिए घट गयी। इस हिसाब से अगर देखें तो भारी तूफ़ान के बाद घर में चोरों के आने वाले दृश्य की उपन्यास में ज़रूरत ही नहीं थी। हालांकि इससे भले बुरे लोगों की मनोवृत्ति को समझने का मौका ज़रूर मिला।

साथ ही मेरे हिसाब से उपन्यास में कहानी वहीं समाप्त हो जानी चाहिए थी, जहाँ पर सोनल का चैप्टर खत्म होता है। बाद में उसी केबिनेट में माँ के नाम बेटी के एक भावनात्मक पत्र का मिलना, मुझे बस उपन्यास की तयशुदा सीमा के पृष्ठ भरने या फिलर जैसा लगा। जिन्हें आसानी से बतौर तोहफ़ा कोई एक छोटी कहानी पाठकों को दे कर आसानी से भरा जा सकता था।

धाराप्रवाह शैली में लिखा गया यह उपन्यास शुरू से ही अपनी पकड़ बना कर चलता है और पाठकों को आसानी से उसके अंत तक पहुँचा पाने में सक्षम है। 
120 पृष्ठीय इस उपन्यास के हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है शिवना प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है मात्र 150/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए बहुत ही जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

अंधेरे कोने@फेसबुक डॉट कॉम- अरविंद पथिक

जिस तरह एक सामाजिक प्राणी होने के नाते हम लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए आपस में बातचीत का सहारा लेते हैं। उसी तरह अपनी भावनाओं को व्यक्त करने एवं उनका अधिक से अधिक लोगो  तक संप्रेषण करने के लिए कवि तथा लेखक,गद्य अथवा पद्य, जिस भी शैली में वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में सहज महसूस करते हैं, को ही अपनी मूल विधा के रूप में अपनाते हैं। मगर कई बार जब अपनी मूल विधा में वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में खुद को असमर्थ पाते हैं भले ही इसकी वजह विषय का व्यापक होना हो अथवा अत्यंत संकुचित होना हो। तब अपनी मूल शैली को बदल, वे गद्य से पद्य या फिर पद्य से गद्य में अपने भावों को स्थानांतरित कर देते हैं।

ऐसे में पद्य छोड़ कर जब कोई कवि गद्य के क्षेत्र में उतरता है तो उम्मीद की जाती है कि उसकी लेखनी में भी उसकी अपनी शैली याने के पद्य की ही किसी ना किसी रूप में बानगी देखने को मिलेगी और उस पर भी अगर वह कवि, वीर रस याने के ओज का कवि होगा तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उसके गद्य लेखन में भी जोश खरोश और ओज की कोई ना कोई बात अवश्य होगी। मगर हमें आश्चर्यचकित हो तब आवाक रह जाना पड़ता है जब अपनी मूल विधा याने के पद्य का लेशमात्र भी हमें उनके गद्य में दिखाई नहीं देता।

दोस्तों...आज मैं बात कर रहा हूँ ओज के जाने माने मंचीय कवि अरविंद पथिक जी और उनके लिखे नए उपन्यास "अंधेरे कोने@फेसबुक डॉट कॉम" की। पहले उपन्यास और फिर उसके लेखक के रूप में अरविंद पथिक जी के नाम को देख एक सहज सी जिज्ञासा मन में उठी कि आखिर एक ओज के कवि को उपन्यास जैसी कठिन विधा में उतरने के लिए बाध्य क्यों होना पड़ा? दरअसल उपन्यास का कैनवास ही इतना बड़ा एवं विस्तृत होता है कि  उसमें हमें शब्दों से खेलने के लिए एक विस्तृत एवं व्यापक विषय के साथ साथ उसमें मौजूद ढेरों अन्य आयामों की आवश्यकता होती है। 

जिस तरह पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जाते हैं ठीक उसी तरह उपन्यास के शुरुआती पन्नों को पढ़ने से ही यह आभास होने लगता है लेखक इस क्षेत्र में भी लंबी रेस का घोड़ा साबित होने वाला है। भावुकता से लबरेज़ इस उपन्यास में कहानी है फेसबुक चैट/मैसेंजर से शुरू हुई एक हिंदू-मुस्लिम प्रेम कहानी की। इसमें कहानी है एक ऐसे प्रौढ़ प्रोफेसर की जो अपनी विद्वता...अपने ज्ञान, अपनी तर्कशीलता, अपनी वाकपटुता, अपने व्याख्यानों एवं अपने वक्तव्यों  की वजह से शहर के बुद्धिजीवी वर्ग में एक खासा अहम स्थान रखने के बावजूद भी अपने से बहुत छोटी एक युवती के प्रेम में गिरफ्त हो जाता है। इसमें कहानी है ज़ोया खान नाम की एक मुस्लिम युवती की जो अपने से 15 साल बड़े एक प्रोफेसर को अपना सब कुछ मान चुकी है और उसके लिए हर बंधन...हर पाबंदी से किसी भी कीमत पर निबटने को आमादा है।

इसमें कहानी है फेसबुक जैसे सोशल मीडिया की वजह से कुकुरमुत्तों के माफिक जगह जगह उपजते एवं ध्वस्त होते प्रेम संबंधों की। इसमें कहानी है उज्जवल भविष्य की चाह में बीसियों लाख की रिश्वत देने को तैयार युवक और  शिक्षा माफिया की। इसमें कहानी है सोशल मीडिया के आकर्षण और उससे मोहभंग की। इसमें कहानी है प्यार, नफरत और फिर उमड़ते  प्यार की। इसमें कहानी है ज़िम्मेदारी का एहसास होने पर अपने वादे से पीछे हट अपने प्यार को नकारने की...अपनी भूल को सुधारने और अपने प्रायश्चित की। इसमें कहानी है अलग अलग जी रहे प्रेमी युगल को जोड़ने वाली लेखक रूपी कड़ी की।

इस उपन्यास को पढ़ते वक्त एक अलग तरह का प्रयोग देखने को मिला कि  पूरी कहानी कृष्ण और मीरा के अमिट प्रेम की शक्ल अख़्तियार करते हुए लगभग ना के बराबर वर्तमान या फिर पुरानी चिट्ठियों, डायरियों अथवा फ्लैशबैक के माध्यम से आगे पीछे चलती हुई कब संपूर्ण कहानी का रूप धर लेती है...आपको पता भी नहीं चलता। 

उपन्यास की भाषा सरल एवं प्रवाहमयी है और पाठक को अपनी रौ में अपने साथ बहाए ले चलने में पूरी तरह से सक्षम है। अंत तक रोचकता बनी रहती है। हालांकि कुछ जगहों पर एक पाठक के नज़रिए से मुझे कहानी थोड़ी सी खिंची हुई सी भी लगी। उपन्यास में दिए गए प्रोफ़ेसर के व्याख्यानों को थोड़ा छोटा या फिर जड़ से ही समाप्त किया जा सकता था लेकिन उन्हें मेरे ख्याल से उपन्यास के मुख्य किरदार को डवैलप करने के लिहाज़ से रखा गया हो सकता है या फिर उपन्यास की औसत पृष्ठ संख्या को पूरा करने के हिसाब से भी शायद कहानी को बढ़ाया गया हो। 

उपन्यास में लेखक की भूमिका पर नज़र दौड़ाने से पता चलता है कि यह उपन्यास उन्होंने 2019 में लिखा और कहानी के माध्यम से हमें पता चलता है कि उसमें पिछले 15 से 20 वर्षों की कहानी को समाहित किया गया है। यहाँ पर इस हिसाब से देखा जाए तो उपन्यास में तथ्यात्मक खामी नज़र आती है कि...कहानी की शुरुआत सन 2000 के आसपास होनी चाहिए जबकि असलियत में फेसबुक की स्थापना ही सन 2004 में पहली बार हुई थी। इस खामी को अगर छोड़ भी दें तो दूसरी ग़लती यह दिखाई देती है कि फेसबुक ने पहली बार चैट की सुविधा सन 2008 में शुरू की थी और उसके मैसेंजर वाले वर्ज़न को महज़ 8 साल और दस महीने पहले ही पहली बार लांच किया गया था। जब आप आप अपनी कहानी में कहीं किसी चीज़ का प्रमाणिक ढंग से उल्लेख कर रहे होते हैं  तो आपका तथ्यात्मक रूप से भी सही होना बेहद ज़रूरी हो जाता है। इस ख़ामी को दूर करने के लिए उनके बीच की बातचीत को पहले याहू मैसेंजर, फिर गूगल टॉक और बाद में फेसबुक चैट से फेसबुक मैसेंजर की तरफ बढ़ते हुए दिखाया जा सकता है। उम्मीद है कि इस उपन्यास के आने वाले संस्करणों में इस कमी को दूर करने की तरफ लेखक तथा प्रकाशक, दोनों ध्यान देंगे।

160 पृष्ठीय इस उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है यश पब्लिकेशंस ने और इसका मूल्य ₹199/- मात्र रखा गया है जो कि उपन्यास की क्वालिटी एवं कंटेंट को देखते हुए जायज़ है।आने वाले भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री- वेद प्रकाश शर्मा

लुगदी साहित्य याने के पल्प फिक्शन का अगर आपको एक बार चस्का लग जाए तो फिर इसकी गिरफ्त से निकलना नामुमकिन तो नहीं लेकिन बड़ा मुश्किल है। आजकल की तरह हर जगह आसानी से उपलब्ध मनोरंजन के तमाम साधनों से पहले एक समय ऐसा भी था जब खाना पीना सब भूल, हम लोग लगभग एक ही सिटिंग में, आड़े तिरछे या फिर पोज़ बदल बदल कर बैठते हुए, पूरे के पूरे उपन्यास को एक तरह से चाट जाया करते थे। 

अब समयानुसार अपनी व्यस्तताओं और समय के बदलाव की वजह से बेशक़ कुछ समय के लिए इन्हें बिसरा भले ही दिया गया हो लेकिन अंतस में कहीं ना कहीं इनकी याद अब भी बनी रहती है। और ऐसे ही किसी उपन्यास के अचानक सामने आ जाने पर फिर से ज़िंदा हो..प्रस्फुटित हो जाया करती है। 

दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह दिवंगत श्री वेदप्रकाश शर्मा जी के 2014 में आए "सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री" नामक थ्रिलर उपन्यास की। इस उपन्यास में कहानी है उस राजन सरकार दंपत्ति की, जिन्हें पुलिस द्वारा गढ़ी गयी एक पुख्ता कहानी सरकमस्टेन्शियल एविडेन्स के आधार पर अदालत, उन्हीं के इकलौते बेटे और नौकरानी के कत्ल में, मुजरिम करार दे चुकी है। जबकि वे दोनों खुद को निर्दोष बता रहे हैं। 

तमाम सबूतों के उनके ख़िलाफ़ होने के बावजूद जब वे खुद को बेगुनाह कहते हैं। तो उनके बार बार आग्रह एवं अपने पिता की सिफारिश के बाद प्राइवेट जासूस विजय इस मामले की रीइंवेस्टिगेशन के लिए राज़ी हो जाता है। विजय-विकास सीरीज़ से अनजान पाठकों के लिए यहाँ यह बताना जरूरी है कि प्राइवेट जासूस विजय, दरअसल भारतीय सुरक्षा एजेंसी का चीफ़ है।

अपने भांजे, विकास और धनुषटंकार के साथ मिल कर जब विजय तफ़्तीश में जुटता है तो मामले की तहें खुलने के बजाय तब और अधिक उलझती जाती हैं जब एक के बाद एक कत्ल होने शुरू हो जाते हैं। रहस्य..रोमांच और उत्सुकता से लबरेज़ इस उपन्यास में कहीं आप गहरी साज़िश से तो कहीं धोखे से रूबरू होते हैं। कहीं इसमें कोई साजिशन हुए जानलेवा हमले से त्रस्त नज़र आता है तो कहीं कोई अमानत में ख़यानत का मंसूबा अपने मन में पाले बैठा है।

रौंगटे खड़े कर देने वाला उपन्यास शुरू से आखिर तक अपनी पकड़ बनाए रखता है और क्लाइमेक्स तक पहुँचते पहुँचते आप आश्चर्यमिश्रित चेहरे के साथ भौंचके रह जाते हैं। अगर आप थ्रिलर उपन्यासों के शौकीन हैं तो यह उपन्यास आपको कतई निराश नहीं करेगा। एक के बाद एक ट्विस्ट्स एण्ड टर्न्स से भरे इस मज़ेदार उपन्यास में विजय-विकास और धनुषटंकार की तिकड़ी क्या क्या गुल खिलाती है, यह सब तो आपको इस मज़ेदार उपन्यास को पढ़ कर ही पता चलेगा।

आमतौर पर थ्रिलर फिल्में या उपन्यास अपनी तेज़ रफ़्तार में आपको सोचने..समझने का मौका दिए बिना अपने साथ..अपनी रौ में बहाए लिए चलते हैं। मगर सुखद आश्चर्य के रूप में यह उपन्यास अपने लॉजिक..अपने तर्कों के साथ आपको दिमाग़ी कसरत करने एवं ज़हनी घोड़े दौड़ाने के अनेकों मौके देता है। 

पहली बार विजय-विकास सीरीज़ के उपन्यास को पढ़ने वाले पाठकों को शुरुआती पृष्ठों में मुख्य किरदार विजय का मज़ाकिया लहज़ा थोड़ी उकताहट पैदा कर सकता है लेकिन हर बढ़ते पेज के साथ थोड़ी ही देर में इस शैली के साथ आसानी से अपना सामंजस्य बिठा..इसे एन्जॉय किया जा सकता है। मेरे हिसाब से शीर्षक को सार्थक करते इस उपन्यास को यकीनन सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री कहलाने का पूरा पूरा हक है। 

धाराप्रवाह शैली के इस तेज़ रफ़्तार उपन्यास की बाइंडिंग कुछ जगहों पर उखड़ती हुई दिखी। प्रकाशक को चाहिए कि इस तरह की कमी को यथाशीघ्र दूर करने का प्रयास करे। संग्रहणीय क्वालिटी के 350 पृष्ठीय उम्दा उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है राजा पॉकेट बुक्स ने और इस पैसा वसूल उपन्यास का मूल्य रखा गया है 150/- रूपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए बहुत ही जायज़ है। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

अधूरा..अव्यक्त किंतु शाश्वत- पराग डिमरी


कई बार जब हमें किसी नए लेखक का लेखन पढ़ने को मिलता है तो उस लेखक की शाब्दिक एवं विषय के चुनाव को ले कर समझ के साथ साथ वाक्य सरंचना के प्रति उसकी काबिलियत पर भी बरबस ध्यान चला जाता है। ऐसे में अगर किसी लेखक का लेखन आपको उसका लिखा पढ़ने के लिए बार बार उकसाए अथवा किताब को जल्द से जल्द पढ़ कर खत्म करने के लिए उत्साहित करे तो समझिए उस लेखक का लेखन सफ़ल है। 

दोस्तों..आज मैं ऐसे ही एक लेखक पराग डिमरी के कहानी संकलन "अधूरा..अव्यक्त किंतु शाश्वत" की बात करने जा रहा हूँ। इसी संकलन की एक कहानी में सुदूर ग्रामीण इलाके में बतौर शिक्षक नियुक्त एक युवक का आभासी दुनिया के ज़रिए अपने से दो साल बड़ी विवाहित युवती से इस हद तक लगाव हो जाता है कि वह उसके साथ जीने मरने तक की सोचने लगता है। अब देखना ये है कि मन ही मन उसे चाहने वाली वह युवती क्या अपने दुखी दांपत्य जीवन से बाहर निकल उसका साथ निभा पाएगी अथवा नहीं? 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़ इस बात की तस्दीक करती दिखाई देती है कि जहाँ अपने सगे काम नहीं आते..वहाँ पराए..अपनों से भी बढ़ कर साथ निभा जाते हैं। जिसमें जहाँ एक तरफ़ रिटायर हो चुके बुज़ुर्ग की अंत्येष्टि में शामिल ना हो पाने की उसकी अपनी बेटी और बेटे की अपनी अपनी मजबूरियाँ हैं। वहीं एक चाय वाला उनका कुछ ना होते हुए भी उनके सगे बेटे की तरह उनके सब संस्कार पूरे करता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसी संकलन की एक अन्य रचना में बेहद गर्मी और उमस भरे माहौल में पैदल 15 किलोमीटर दूर नदी में कूद कर आत्महत्या करने जा रहे युवक की एक अन्य बहुत ही अजब गज़ब तरीके से मदद करता दिखाई देता है। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़ निजी कंपनी में बतौर सेक्रेटरी नियुक्त हुई एक ऐसी मध्यमवर्गीय खूबसूरत युवती, सौम्या की बात करती है जो पैसे..पद..ओहदे..रुतबे और ऐशोआराम की चाह में अपने रूपजाल में अपने बॉस मयंक को फँसा बहुत जल्द ही कम्पनी में डायरेक्टर की कुर्सी पर काबिज हो जाती है। बिना सोचे समझे अनाप शनाप पैसा उड़ाने और मयंक के नौसिखिए होने के कारण बेशुमार कर्ज़ों के साथ अब कम्पनी दिवालिया होने की कगार पर तैयार खड़ी है। इस बुरी हालत के लिए एक दूसरे को ज़िम्मेदार मानने वाले दोनों अब एक दूसरे से छुटकारा पाना चाह तो रहे हैं मगर...

तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी में भीड़ भरी मेट्रो में सफ़र के दौरान अचानक हुई मुलाक़ात उन दोनों की औपचारिक बातचीत से शुरू हो कर पहले दोस्ती और फिर लगाव की सीढ़ी चढ़ते हुए आपसी नज़दीकी तक जा पहुँचती है। दोनों के परिवार वाले भी दोनों को एक साथ देख कर खुश हैं मगर उन दोनों की किस्मत में तो ऊपरवाला कुछ और ही लिख कर बैठा है।

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में पंद्रह साल  पहले रूममेट्स रह चुकी दो सहेलियों का जब फिर से एक रेस्टोरेंट में मिलने का प्लान बनता है। तो उनमें से एक अपराधबोध से ग्रसित हो स्वीकार करती है कि उसकी चालबाज़ियों की वजह से ही उसके बॉयफ्रेंड ने उसे छोड़ उससे शादी कर ली थी। ऐसे में अब देखना ये है कि अब इस स्वीकारोक्ति के बाद भी क्या उनके रिश्ते की गरमाहट बची रह पाएगी अथवा नफ़रत की आग में सब कुछ स्वाहा हो जाएगा? इसी संकलन की एक अन्य महत्त्वपूर्ण रचना में लेखक अपनी कल्पना और  सच्चाई के मिश्रण से बॉलीवुड का वह समय फिर से रचता दिखाई देता है जिसमें प्रसिद्ध संगीत निर्देशक ओ. पी. नैय्यर और पाश्र्व गायिका आशा भोंसले में अच्छी खासी अनबन चल रही थी।

आमतौर पर देखा गया है कि आजकल बहुत से लेखक वाक्य सरंचना करते हुए स्त्रीलिंग एवं पुल्लिंग में तथा एकवचन और बहुवचन में भेद नहीं कर पाते हैं। ऐसी ही कमियाँ इस संकलन में भी दिखाई दीं। समाज में चल रहे विभिन्न मुद्दों को ले कर रची गयी इस संकलन की कहानियों में वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त प्रूफरीडिंग के स्तर पर काफ़ी कमियाँ दिखाई दीं। उदाहरण के तौर पर पेज नंबर 53 से शुरू अंतिम वाक्य में, जो कि अगले पेज पर भी गया, लिखा दिखाई दिया कि..

'उसका चौड़ा सपाट' शक्तिशाली बाहें, बालों भरा बलिष्ठ सीना, उसे बहुत ललचाती भड़काती थी।'

यह वाक्य बिल्कुल भी सही नहीं बना। सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..

'शक्तिशाली बाहों वाला उसका चौड़ा सपाट सीना उसे बहुत ललचाता एवं भड़काता था।'

यहाँ किताब के मूल वाक्य में एक और अंतर्विरोध नज़र आया कि एक तरफ़ कहा जा रहा है कि..'चौड़ा सपाट सीना' और दूसरी तरफ़ उसे बालों से भरा याने के बाल रूपी अवरोधों से भरा बताया जा रहा है। 

इसके बाद पेज नंबर 77 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'ऐसे कमेंट भी आने लगे "परफेक्ट कपल",  "एक जिस्म दो जान"

असली कहावत "एक जिस्म दो जान" नहीं है और ना ही बिना किसी कुदरती ग़लती के ऐसा हो पाना संभव है। सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..

"दो जिस्म एक जान"

इसी पेज की अंतिम पंक्ति जो कि अगले पेज पर भी गयी में भी यही "एक जिस्म दो जान" वाली ग़लती फिर से दोहराई जाती दिखाई दी।

इसके अतिरिक्त पेज नंबर 118 और पेज नंबर 119 में प्रसिद्ध संगीतकार ओपी नय्यर एवं आशा भोसले से जुड़े एक संस्मरण में लेखक बताते हैं कि निम्नलिखित प्रसिद्ध इस जोड़ी का आखिरी गीत था।

"चैन से हमको कभी,
आपने जीने ना दिया
ज़हर भी चाहा अगर, पीना 
तो पीने ना दिया"

इसके बाद दोनों में अनबन हो गयी और इस गीत को प्रसिद्ध फिल्मफेयर पुरस्कार मिलने के बावजूद भी इसे आशा भोंसले ने ग्रहण नहीं किया तो मंच पर जा कर ओ.पी नैय्यर ने इस पुरस्कार को ग्रहण किया और वहाँ से घर की तरफ़ लौटते हुए कार की खिड़की से बाहर सुनसान सड़क पर उछाल कर फेंक दिया। एक अन्य धारणा यह भी है कि उन्होंने इसे सड़क पर नहीं बल्कि समुद्र की लहरों के हवाले कर दिया था। 

खैर अब बात असली मुद्दे की तो इसके बाद लेखक लिखते हैं कि..

'वैसे भी नदी की नियति समुन्दर में जा कर मिलने की ही तो होती है।' 

अब सवाल यह उठता है कि ओ.पी नैय्यर ने या तो कार से अपने घर जाते हुए पुरस्कार को सड़क पर फेंका अथवा उसे समुन्दर में फैंका लेकिन उपरोक्त वाक्य में लेखक बेध्यानी में नदी का जिक्र अपने वाक्य में कर गए हैं। 

उम्मीद है कि इस तरह की त्रुटियों को लेखक अपनी अगली किताब एवं इसी किताब के आगमो संस्करण में दूर करने का प्रयास करेंगे। 

यूं तो यह कहानी संकलन मुझे लेखक की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूंगा कि 127 पृष्ठीय इस कहानी संकलन के पेपरबैक संस्करण को छापा है सन्मति पब्लिशर्स में और इसका मूल्य रखा गया है 140/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं। 

कारवां ग़ुलाम रूहों का- अनमोल दुबे

आज के टेंशन या अवसाद से भरे समय में भी पुरानी बातों को याद कर चेहरा खिल उठता है। अगर किसी फ़िल्म या किताब में हम आज भी कॉलेज की धमाचौकड़ी..ऊधम मचाते यारी-दोस्ती के दृश्यों को देखते हैं। या इसी पढ़ने या देखने की प्रक्रिया के दौरान हम, मासूमियत भरे झिझक..सकुचाहट से लैस उन  रोमानी पलों से गुज़रते हैं। जिनसे कभी हम खुद भी गुज़र चुके हैं। तो नॉस्टेल्जिया की राह पर चलते हुए बरबस ही हमारे चेहरे पर एक मुस्कुराहट तो आज भी तैर ही जाती है।

आज प्रेम भरी बातें इसलिए दोस्तों..कि आज मैं महज़ तीन कहानियों के एक ऐसे संग्रह की बात करने जा रहा हूँ जो आपको फिर से उन्हीं सुहाने पलों में ले जाने के लिए अपनी तरफ़ से पूरी तैयारी किए बैठे हैं। इस कहानी संग्रह का नाम 'ग़ुलाम रूहों का कारवां ' है और इसे लिखा है अनमोल दुबे ने।

सीधी..सरल शैली में लिखी गयी इन कहानियों में कहीं कैरियर की तलाश में अपने प्रेम को बिसराता युवक है तो कहीं इसमें लापरवाही भरे फैसले की कीमत किसी को अपनी जान दे कर चुकानी पड़ती है। कहीं कोई अपने एकतरफ़ा प्यार में ही मग्न हो..डायरी के साथ अपनी सारे दुःख.. सारी खुशियाँ बाँट रहा है। कहीं इस संकलन में कोई किसी के इंतज़ार में अपना जीवन होम कर देता है। तो कोई अनजाने में ही बदनाम हो उठता है।

इस संकलन की कहानियों में कहीं विरह..वेदना और इंतज़ार में तड़पती युवती दिखाई देती है तो कहीं इसमें कैरियर की चाह में विदेश जाने को आतुर युवा प्रेम..लगाव..मोह..सबको भूल अपनी ही धुन में मग्न दिखाई देता है। कहीं इसमें बनारस के मनोरम घाटों के संक्षिप्त विवरण के दौरान यह भी पता चलता है कि बनारस एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ गंगा दक्षिण से उत्तर की तरफ़ बहती है। इसमें कहीं गंगा की विश्वप्रसिद्ध आरती तो कहीं वहाँ के दशाश्वमेध घाट की बात है। कहीं इसमें बनारस में 84 घाटों के होने का पता चलता है। तो कहीं इसमें काशी विश्वनाथ मन्दिर और उसकी विश्वप्रसिद्ध आरती की बात है। कहीं इसमें 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक के वहाँ होने का पता चलता है। तो कहीं बेवजह परेशान रूहों के लिए प्रसिद्ध उस अस्सी घाट का जिक्र है जहाँ बैठ कर कभी गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना की थी। 
कहीं इसमें मोक्ष की प्राप्ति हेतु चौबीसों घंटे जलती चिताओं के लिए प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट का तो कहीं इसमें ललिता घाट के नेपाली मंदिर का जिक्र आता है। 

कहीं इसमें ओरछा के उस राम मंदिर के बारे में जानकारी मिलती है जहाँ राम को भगवान नहीं बल्कि एक राजा के रूप में पूजा जाता है। तो कहीं हरदौल के मंदिर की मान्यता के बारे में पता चलता है कि उस इलाके में होने वाली हर शादी का कार्ड वहाँ जा कर ज़रूर दिया जाता है कि हरदौल, शादी ब्याह में आने वाली तमाम रुकावटों..दिक्कतों..परेशानियों को दूर करते हुए तमाम व्यवस्था करते हैं। 

शुरुआती कुछ पन्नों में कहानी के सपाट या सतही होने सा भान हुआ मगर बाद में कहानियों से साथ पाठक थोड़ा जुड़ाव महसूस करने लगता है। अंत का पहले से भान करने वाली इस संकलन की कहानियाँ शुरुआती लेखन के हिसाब तो तो ठीक हैं लेकिन अभी और मंजाई याने के फिनिशिंग माँगती हैं। बतौर पाठक और एक लेखक के मेरा मानना है कि हम जितना अधिक पढ़ते हैं..उतना ही अधिक परिपक्व एवं समृद्ध हमारा लेखन होता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि निकट भविष्य में लेखक की कलम से बेहतरीन रचनाएँ और निकलेंगी। 

वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त इसमें संवादों के शुरू और अंत में इनवर्टेड कॉमा ("...") की कमी दिखी। पूर्णविराम,अल्पविराम,प्रश्नचिन्ह इत्यादि से ख़ासा परहेज़ नज़र आया। फ़ॉन्ट्स के बीच गैप और पेज सैटिंग में साइड मार्जिन ज़्यादा होने से लगा कि जबरन किताब की मोटाई को बढ़ाया जा रहा है। 189 पृष्ठों की इस किताब को आसानी से 160 पृष्ठों में समेटा जा सकता था। 

यूं तो यह किताब मुझे उपहारस्वरूप मिली मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके पेपरबैक संस्करण को छापा है राजमंगल प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 201/- रुपए। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

कोस कोस शब्दकोश- राकेश कायस्थ

जब भी हम समाज में कुछ अच्छा या बुरा घटते हुए देखते हैं तो उस पर..उस कार्य के हिसाब से हम अपनी अच्छी-बुरी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं या फिर करना चाहते हैं। अब अगर कभी किसी के अच्छे काम की सराहना की जाए तो जिसकी वो सराहना की जा रही है, वह व्यक्ति खुश हो जाता है। मगर इससे ठीक उलट अगर किसी के ग़लत काम की बुराई करनी हो तो या तो हम पीठ पीछे उसकी बुराई कर उससे झगड़ा मोल ले लेंगे या फिर ऐसा कुछ भी करने से गुरेज़ करेंगे कि..खामख्वाह पंगा कौन मोल ले? लेकिन जब आपका मंतव्य किसी की पीठ पीछे नहीं बल्कि उसके सामने ही उसकी बुराई करने का हो तो व्यंग्यात्मक शैली का इस्तेमाल किया जाना ही सबसे उत्तम और श्रेष्ठ रहता है। 

व्यंग्यात्मक तरीके से अपनी बात कहने से सामने वाला भी समझ जाता है कि उसे ही परोक्ष रूप से निशाना बनाया जा रहा है मगर चूंकि वह बात उसे सीधे सीधे ना कह कर हँसी मज़ाक में घुमा फिरा कर कही जा रही है तो प्रत्यक्ष में वह व्यक्ति चाहते हुए भी अपना क्षोभ नहीं जता पाता। दोस्तों..आज मैं व्यंग्य से जुड़ी बातें इसलिए कर रहा हूँ कि आज मैं राकेश कायस्त के व्यंग्य संग्रह 'कोस-कोस शब्दकोश' के बारे में बात करने जा रहा हूँ। 

अपने इस व्यंग्य संकलन के ज़रिए कहीं वे सरकारी दफ़्तरों में व्याप्त लालफीताशाही को निशाना बनाते नज़र आते हैं तो कहीं देश के अवसरवादी राजनीतिज्ञों पर अपनी कलम से प्रहार करते दिखाई देते हैं। कहीं वेन अन्ना आंदोलन से ले कर कागज़ी लोकपाल बिल तक की धज्जियाँ उड़ाते नज़र आते हैं। कहीं वे आम आदमी और जन समाज से जुड़े उल्लेखनीय मुद्दों पर बात करते नज़र आते हैं। उनके लिखे व्यंग्यों को पढ़ कर आसानी से जाना जा सकता है कि वे अपने आसपास के माहौल एवं घट रही राजनैतिक गतिविधियों इत्यादि पर ग़हरी एवं सजग नज़र रखने के साथ साथ हास्य में भी ख़ासा दख़ल रखते हैं। 

इसी संकलन में जहाँ एक तरफ़ सरकारी एवं प्राइवेट कंपनियों के बड़े अफ़सरों पर याने के बॉस पर गहरे कटाक्ष होते नज़र आते हैं। तो वहीं दूसरी तरफ़ किसी अन्य व्यंग्य रचना में ठोस कार्यों के बजाय महज़ मीटिंगों में समय..पैसा व्यर्थ करने की बन चुकी संस्कृति या फिर आदतों पर गहरा तंज कसा जाता दिखाई देता है। इसी संकलन में जहाँ एक तरफ़ मूर्खता का महिमामंडन..यशोगान होता दिखाई देता है तो वहीं दूसरी तरफ़ किसी अन्य व्यंग्य रचना में किसी भी काम को ना करने या उसके करने को ले कर टालमटोल करने के लिए ही 'विकल्प खुले हैं' नामक वाक्य की रचना होती दिखाई देती है।

इसी संकलन में कहीं हमारी संसदीय प्रणाली एवं उसकी बेहद लचर कार्यशैली पर सवाल उठता दिखाई देता है तो कहीं सांसदों के चुने जाने की प्रक्रिया से ले कर उनके उज्जड बर्ताव पर गहरा कटाक्ष होता नज़र आता है। कहीं संसद की कैंटीन के उम्दा खाने की बेहद कम कीमतों को ले कर तंज कसा जाता दिखाई देता है। तो कहीं अन्ना आंदोलन के वक्त उनकी लोकपाल की मांग के धराशायी होने को ले कर होता हुआ तंज अन्ना हज़ारे..कांग्रेस..भाजपा समेत केजरीवाल तक को अपने चपेट में लेता दिखाई देता है। 

इसी संकलन में कहीं अंतरात्मा की आवाज़ के नाम पर सभी ग़लत कामों को जायज़..पाक..साफ़ बताया जाता नज़र आता है तो कहीं अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए दंगे करवाने वालों और उनमें शामिल होने वालों के मंतव्यों को ले कर उन पर गहरा..तीखा तंज कसा जाता दिखाई देता है। इसी किताब में कहीं नौकरी और उसकी प्रकृति को ले कर बहुत ही मज़ेदार व्यंग्य पढ़ने को मिलता है तो कहीं हमारे देश में हिंदी को हो रही दुर्दशा को ले कर गहरा कटाक्ष किया जाता नज़र आता है। कहीं आम के बहाने आम आदमी की बेचारगी से होते हुए केजरीवाल समेत राज और उद्धव ठाकरे पर तंज कसा जाता दिखाई देता है। तो कहीं एक अन्य व्यंग्य रचना में कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन में हुए घपलों को ले कर गहरा ..मारक तंज कसा जाता दिखाई देता है।

इसी संकलन के किसी अन्य व्यंग्य में उधार लेने वालों और उधार देने वालों की दशा..मनोदशा के बारे में विचार किया जाता दिखाई देता है तो किसी अन्य व्यंग्य में जगह जगह खुले शराब के वैध अवैध ठेकों के औचित्य पर चिंतन होता दिखाई देता है। इसी किताब के किसी अन्य व्यंग्य में सोशल मीडिया के तगड़े औज़ार याने के फेसबुक के लाइक्स/फ़ॉलोअर्स के पीछे पागल हो रही दुनिया पर तंज कसा जाता दिखाई देता है। तो कहीं किसी अन्य व्यंग्य में जहाँ एक तरफ़ भव्य राम मंदिर निर्माण की वैतरणी  पर भाजपा की नैय्या पर लगती दिखाई देती है तो वहीं दूसरी तरफ़ सुखद बुढ़ापे की चाह में तेल पिला पिला कर मज़बूत की गयी लाठी अब अपने संभालने वाले को ही आँखें दिखाती नज़र आती है। इसी संकलन की एक अन्य रचना जहाँ एक तरफ़ हमारे देश के निरपेक्षता के सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ा..गुटनिरपेक्षता और धर्मनिरपेक्षता  को अपने लपेटे में लेती नज़र आती है तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य रचना में गठबंधन सरकार की गति..दुर्गति का मज़ेदार विवरण पढ़ने को मिलता है। 

इसी संकलन की एक अन्य रचना जहाँ एक तरफ़ बेटी और बेटे में फ़र्क ना करने की सीख देने के साथ साथ बेटे की चाह में भ्रूण जाँच और गर्भपात के ज़रिए होते बेटियों के कत्ल जैसी कुत्सित सोच एवं मानसिकता पर गहरा तंज कसती नज़र आती है। तो वहीं दूसरी एक अन्य व्यंग्य साझा न्यूनतम कार्यक्रम के तहत मिल बाँट कर खाने की हिमाकत भरी हिमायत करता नज़र आता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य व्यंग्य दाग़ी नेताओं को मंत्रिमंडल में लिए जाने के चलन पर कटाक्ष करता दिखाई देता है।

इसी संकलन के एक अन्य व्यंग्य में जहाँ एक तरफ़ भारतीय राजनीतिज्ञों की हास्यास्पद बातों से ले कर अलग अलग मौकों के हिसाब से बदलती उनकी हँसी की किस्म की बात की जाती दिखाई देती है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य मज़ेदार व्यंग्य में मानहानि का फंडा परत दर परत उधड़ता..खुलता दिखाई देता है। इसी संकलन में कहीं आसाराम बापू और भगवान के बीच मज़ेदार वार्तालाप होता नज़र आता है। तो कहीं जुर्म करने के बाद पकड़े जाने पर प्रायश्चित करने की बात कह सज़ा से बचने की बात होती नज़र आती है। 

इसी संकलन के किसी अन्य व्यंग्य में चुक चुके नेताओं का मोल रद्दी के भाव आंका जाता नज़र आता है तो किसी अन्य मज़ेदार व्यंग्य में 'किस ऑफ लव' जैसे सार्वजनिक चुंबन कार्यक्रमों के बहाने से रिचर्ड गेर- शिल्पा शेट्टी और राखी सावंत- मिक्का(मीका) के विवादों सहित कई अन्य चुंबन विवादों की बात की जाती नज़र आती है। इसी संकलन के एक अन्य रोचक व्यंग्य में लेखक पुस्तक विमोचन की पूरी प्रक्रिया की बखिया उधेड़ता नज़र आता है। तो एक अन्य व्यंग्य में लेखक परोपकार के अजब गज़ब फंडों से अपने पाठकों को रूबरू करवाता दिखाई देता है।

 इसी संकलन का एक अन्य व्यंग्य जहाँ एक तरफ़ कांग्रेस और भाजपा के चुनावी वादों, फ़ूड बिल और शौचालयों, की बात करता दिखाई देता है कि आम जनता के लिए पहले पेट भरना ज़रूरी या फिर पेट खाली करना? तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य व्यंग्य में अच्छे दिनों के चाहत में अपना वोट गंवा बैठी जनता अब प्रत्यक्षतः देख रही है कि सचमुच में अच्छे दिन तो उन्हीं के आए हैं जिन्होंने उन्हें अच्छे दिनों का झुनझुना थमाया था।

इसी संकलन के एक अन्य व्यंग्य में जहाँ एक तरफ़ सिनेमाघरों में राष्ट्रगान कंपलसरी करने के आदेश पर लेखक उस वक्त दुविधा में फँसता दिखाई देता है जब सिनेमाघर में राष्ट्रगान से पहले बोल्ड फ़िल्म का ट्रेलर और राष्ट्रगान के एकदम बाद देसी गालियों की बरसात करती एक रियलिस्टिक फ़िल्म शुरू होती है। 

आमतौर पर बहुत से व्यंग्यकारों को मैंने एक ही व्यंग्य में विषय से अलग हट कर भटकते हुए देखा है मगर राकेश कायस्थ जी इस मामले में अपवाद सिद्ध हुए हैं। वे अपने प्रत्येक व्यंग्य में शुरू से ही अपने विषय को पकड़ कर चले हैं। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। 

मज़ेदार शैली में लिखे गए इस उम्दा व्यंग्य संकलन में कुछ एक जगहों पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त प्रूफरीडिंग के स्तर पर भी कुछ ग़लतियाँ दिखी। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस किताब के आने वाले संस्करणों में इस तरह की कमियों से बचा जाएगा। 


** पेज नंबर 25 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'जनता दुखी होती है कि सांसद छप्पन भोग उड़ाते हैं और उन्हें हमें दो जून के लाले हैं।'

इस वाक्य में 'और उन्हें हमें दो जून के लाले हैं की जगह 'और हमें दो जून के लाले हैं' आएगा।

पेज नंबर 30 पर लिखा दिखाई दिया कि...

'लेकिन अंतरात्मा ना तो मेल करती है, ट्वीट ना एसएमएस।'

यहाँ 'ट्वीट ना एसएमएस' की जगह 'ना ट्वीट ना एसएमएस' आएगा। 

पेज नंबर 39 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'दरोगा जी काम डंडे खिलाने का रहा होगा।'

यहाँ 'दरोगा जी काम' की जगह 'दरोगा जी का काम' आएगा। 

पेज नम्बर 84 पर लिखा दिखाई दिया कि...

'आखिर कौन है, जो आपको डरा है?'

इस वाक्य में 'जो आपको डरा है' की जगह 'जो आपको डरा रहा है' आएगा। 

पेज नंबर 88 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'शिशु के पोपले में मुँह एक भी दांत नहीं है।'

यहाँ 'पोपले में मुँह' की जगह 'पोपले मुँह में' आएगा। 

पेज नम्बर 94 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'हे नारायण! तुम कहा हो?'

यहाँ 'तुम कहा हो' की जगह 'तुम कहाँ हो' आएगा। 


पेज नंबर 102 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'प्रधानमंत्री की कुर्सी गई तो देवेगौड़ा कर्नाटक की लोकल पॉलिटिक्स में सक्रिय गए।'

यहाँ 'पॉलिटिक्स में सक्रिय गए' की जगह 'पॉलिटिक्स में सक्रिय हो गए' आएगा। 

पेज नंबर 105 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'यह बेहद दृश्य उत्तेजक और अश्लील हैं' 

यहाँ 'यह बेहद दृश्य उत्तेजक और अश्लील हैं' की जगह 'यह दृश्य बेहद उत्तेजक और अश्लील है' आएगा। 

पेज नंबर 108 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'परंपरागत विवाह समारोह में दिखाई देने वाले लड़की की बाप की तरह जिसे पंडित से लेकर हलवाई तक सब का इंतजाम करना पड़ता है।'

इस वाक्य में 'लड़की की बाप की तरह' की जगह 'लड़की के बाप की तरह' आएगा। 


पेज नंबर 137 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'कई लोग ऐसे हैं, जो कचरा उठाने की तैयारी कर रही रहे होते हैं कि मोबाइल की बैटरी टें बोल जाती है।' 

यहाँ 'कचरा उठाने की तैयारी कर रही रहे होते हैं' की जगह 'कचरा उठाने की तैयारी कर रहे होते हैं' आएगा। 


पेज नंबर 138 पर लिखा दिखाई दिया कि...

'2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी यह कह सकता है कि'

यहाँ 'बीजेपी यह कह सकता है' की जगह 'बीजेपी यह कह सकती है' आएगा।

पेज नंबर 144 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'दिल का रास्ता पेट से हो कर जाता है, मुहावरा इंसानों ने हमारी की खातिर ही इजाद किया है।'

यहाँ 'मुहावरा इंसानों ने हमारी की खातिर ही इजाद किया है' की जगह 'मुहावरा इंसानों ने हमारी ही खातिर इज़ाद किया है' आएगा। 

*जाये- जाए
*फीलगुड़- फीलगुड
*बाटोगे- बाँटोगे
*कूड़- कूड़ा


144 पृष्ठीय इस मज़ेदार व्यंग्य संकलन को छापा है हिन्दयुग्म ने और इसका मूल्य रखा गया है मात्र 100 रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए बहुत ही कम है। किंडल अनलिमिटेड के सब्सक्राइबर्स के लिए यह फ्री में उपलब्ध है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

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ये आम रास्ता नहीं- रजनी गुप्त

आम रोज़मर्रा के जीवन से ले कर कला तक के हर क्षेत्र में हम सभी अपने मन में उमड़ते घुमड़ते विचारों को बाहर लाने के लिए अपनी रुचि एवं स्वभाव के हिसाब से कोई ना कोई तरीका अपनाते है।  भले ही कोई उन्हें चित्रकारी के ज़रिए मनमोहक  चित्र बना कर तो कोई उन्हें अपनी वाकपटुता के बल पर लच्छेदार तरीके से बोल बतिया कर व्यक्त करता है। कोई उन्हें अपने दमदार..संजीदा अभिनय के ज़रिए तो कोई अपनी लेखनी के ज़रिए अपने मनोभावों को अभिव्यक्त करता है। 

अब अगर मैं खुद अपनी बात करूँ तो मैं सामाजिक..राजनैतिक विसंगतियों के प्रति अपने मन में उमड़ रही..आक्रोश रूपी गहन भड़ास को व्यंग्यात्मक रचनाओं के ज़रिए लिख कर व्यक्त करता हूँ। 

दोस्तों..आज मैं राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति, उनके संघर्ष..उनकी सफ़लता से जुड़े उपन्यास 'ये आम रास्ता नहीं' की बात कर रहा हूँ। जो कमोबेश मेरी ही शैली याने के मन की भड़ास के शब्दों के रूप में प्रस्फुटित होने के परिणामस्वरूप वजूद में आया है। इस उपन्यास को लिखा है हमारे समय की प्रसिद्ध लेखिका रजनी गुप्त जी ने। 

राजनीति के क्षेत्र में स्त्रियों की दशा और दिशा पर केंद्रित इस उपन्यास में पिछड़े वर्ग से आने वाली उस मृदु की कहानी है जो सुन्दर..कमनीय और ईमानदार होने के साथ साथ अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत एवं सजग भी है। मगर वह पुरुषों के वर्चस्व वाले एक ऐसे रास्ते पर चल रही है या चलना चाहती है जहाँ से सफ़लता की हर सीढ़ी उसे किसी ना किसी के बिस्तर से गुज़र कर ही प्राप्त होनी है।

इस उपन्यास के मूल में कहानी है मृदु के पारिवारिक..सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन में आने वाले तमाम उतार चढ़ाव की। इसमें कहानी है उस मृदु की जिसे उसके पति ने ही, हर दिन बढ़ती अपनी इच्छाओं..महत्त्वाकांक्षाओं की बलिवेदी पर, कभी बड़े अफ़सरों के आगे तो कभी छुटभैये नेताओं के आगे चारा बना..परोसने से भी गुरेज़ नहीं किया। इस उपन्यास में कहानी है शक और कुंठा का शिकार हो चुके पति के अपनी ही औलादों को साजिशन उनकी माँ के ख़िलाफ़ भड़काने..बरगलाने की। इसमें कहानी है कामयाब स्त्री की सफ़लता से जलने..उसको ना पचा पाने वाले हताश पति समेत सभी सहयोगियों एवं  सहकर्मियों के असहयोगपूर्ण रवैये की।

कम शब्दों में अगर कहें तो इसमें कहानी है उस मृदु की जो अपने काम..अपनी योग्यता..अपनी लगन के बल पर औरों सीढ़ी बना आगे बढ़ती चली गयी और एक दिन आसमान छूने के प्रयास में औंधे मुँह धड़ाम से नीचे ज़मीन पर आ गिरी। 

प्रभावी संवादों से लैस इस उपन्यास की भाषा में ख़ासी रवानी है। शब्द सहज..सरस ढंग से बहते हुए से पाठक को अपनी रौ में बहाए ले चलते हैं। कभी यादों के सहारे तो कभी फ्लैशबैक के ज़रिए कहानी अपने दबे पत्तों को शनैः शनैः खोलते हुए आगे बढ़ती है मगर एक बड़ी कमी के रूप में उपन्यास का एक बड़ा हिस्सा पात्रों के बजाय लेखिका की ही ज़बान बोलता प्रतीत होता है। 

लगभग एकालाप शैली में पहले से तय किए गए एजेंडे..सोच एवं निर्णय के अनुसार कुछ गिनीचुनी चुनिंदा बातों के घूम फिर कर बार बार आने से उपन्यास एकरसता की परिपाटी पर चलता हुआ कुछ समय बाद थोड़ा बोझिल एवं उकताहट पैदा करने वाला लगने लगता है। विषय के हिसाब से कहानी में और अधिक ट्विस्ट्स एण्ड टर्न्स होते तो ज़्यादा बेहतर था। 

वाजिब जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग नहीं होना खला और कुछ जगहों पर वाक्य टूटते तथा कुछ जगहों पर गडमड हो..भ्रमित होते दिखाई दिए।  इसके अतिरिक्त कुछ जगहों पर वर्तनी की त्रुटियाँ दिखाई दीं जैसे...

परवा- परवाह
आदी- आदि 
खचुरता- खुरचता
फ्लश लाइट्स- फ्लैश लाइट्स
सचाई- सच्चाई
कोर्ट कचेरी- कोर्ट कचहरी 

* पेज नंबर 17 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"अनुज अपनी माँ की भोली-भाली बातों से भ्रमित हो जाता।"

जबकि यहाँ पर उसे पिता की भोली भाली बातों से भ्रमित होना है। 

*पेज नंबर 141 के शुरू में लिखा दिखाई दिया कि..

"ऊपर से कैसे-कैसे घटिया किस्म के सवाल पूछे जाते हैं उससे। देखा वह रहा कुंजू का घर।

दोनों उन कच्ची पगडंडियों को पार करती हुई इधर उधर के लोगों से पूछती पाछती उसके घर जा पहुँची।"

अब पहली पंक्ति में वह खुद इशारा कर रही हैं कि.. 'वह रहा कुंजू का घर।' उसके बाद अगली पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..

'वह इधर-उधर लोगों से पूछ पाछ के उसके घर तक जा पहुँची हैं।'

 अब जिस चीज़ का पहले से पता है उसके लिए पूछने की क्या जरूरत है?

• इसी तरह पेज नंबर 143 पर दिखा दिखाई दिया कि..

"उसके मजबूत इरादे और दबंग बोल सुनकर मृदु के चेहरे पर छाया तनाव कम हुआ। वह अन्दर से पानी भरे दो गिलास और दो प्यालियों में चाय ले आई।"

अब यहाँ सवाल यह उठता है कि मृदु उस घर में उस लड़की से मिलने आई थी जिसका बलात्कार हुआ था। ऐसे में किसी और के घर में पहली बार जाने के बाद बाहर से आने वाला व्यक्ति कैसे..किसी की रसोई में घुस कर पानी और चाय लेकर आ सकता है?

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस 152 पृष्ठीय उपन्यास के पेपरबैक संस्करण का मूल्य 150/- रुपए है। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

बाक़ी सफ़ा 5 पर- रूप सिंह- सुभाष नीरव (अनुवाद)


कई बार राजनीति में अपने लाभ..वर्चस्व इत्यादि को स्थापित करने के उद्देश्य से अपने पिट्ठू के रूप में आलाकमान अथवा अन्य राजनैतिक पार्टियों द्वारा ऐसे मोहरों को फिट कर दिया जाता है जो वक्त/बेवक्त के हिसाब से उन्हीं की गाएँ..उन्हीं की बजाएँ। मगर ऐसे ही लोग दरअसल वरद हस्त पा लेने के बाद अपनी बढ़ती महत्ता को हज़म नहीं कर पाते और मौका मिलते ही अपने आलाकमान को आँखें दिखा..रंग बदलने से भी नहीं चूकते। आँख की किरकिरी या नासूर बन चुके ऐसे लोगों को सीधा करने..उन्हें उनकी औकात दिखाने.. निबटने अथवा छुटकारा पाने के लिए बहुत से मशक्कत भरे पापड़ बेलने पड़ते हैं। 

उदाहरण के तौर पर जैसे रूस को आँखें दिखाने के लिए पहले अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को शह दी..उसे अत्याधुनिक हथियार..ट्रेनिंग और बेशुमार पैसा उपलब्ध कराया। वहीं ओसामा बिन लादेन देखते ही देखते एक दिन अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा। ठीक यही सब कुछ भारत में स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के समय में भी हुआ जब उन्होंने पंजाब पर अपनी पकड़ बनाने के लिए भिंडरावाले को शह दी..उसे सर आँखों पर बिठाया लेकिन जनता का समर्थन मिलते ही वही भिंडरावाला केन्द्र सरकार को घुड़कियाँ देने..आँखें दिखाने लगा। उसकी वजह से पंजाब के हालात इस कदर बिगड़ते चले गए कि भारतीय सेना को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में ऑपरेशन ब्लू स्टार को अंजाम दे भिंडरावाले के वजूद को ही मिटाना पड़ा। 

दोस्तों..आज अतिवादियों से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं पंजाब के उन्हीं बुरे दिनों पर केन्द्रित एक ऐसे उपन्यास की बात करने वाला हूँ जिसे 'बाकी सफ़ा 5 पर' के नाम से मूलतः पंजाबी में लिखा है लेखक रूप सिंह ने और उसका पंजाबी से हिंदी अनुवाद किया है प्रसिद्ध लेखक एवं अनुवादक सुभाष नीरव जी ने। 

मूलतः इस उपन्यास में कहानी है पाकिस्तान के साथ जंग में शहीद हो चुके फौजी की विधवा मेलो और उसके इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे जवान बेटे गुरमीत की। जिन्होंने अनजाने में भूल से अपनी भलमनसत के चक्कर में घर में जबरन घुस आए दो खाड़कूओं को कुछ घंटों के लिए शरण दे दी थी। और यही शरण..यही पनाह उनकी सब मुसीबतों की इस हद तक बायस बनी कि गुरमीत को वहशी हो चुकी पुलिस के कहर से बचने के लिए दर दर भटकना पड़ा।  कभी कंटेनर में छिप कर सफ़र करना पड़ा तो कभी अकेले शमशान में जलती लाश के साथ सो कर रात गुज़ारनी पड़ी।

इस उपन्यास में एक तरफ़ कहानी है खाड़कूओं के दमन को ले कर शुरू हुए पुलसिया/सैन्य अत्याचार और सख्ती के बीच घुन्न की तरह पिसती आम जनता के दुखों..तकलीफ़ों और संतापों की। जिसमें एक तरफ़ पंजाब के लोग आशंकित एवं डरे हुए दिखाई देते हैं कि कहीं कर्फ़्यू जैसे हालात में फौज या पुलिस उनके नौजवान बेटों को ना मार दे। तो वहीं दूसरी तरफ़ कर्फ़्यू के दौरान दफ़्तर..अस्पताल वग़ैरह के बंद होने पर इस वजह से भी कुछ लोग खुश दिखाई हैं कि उन्हें दो चार या दस दिनों की छुट्टी मिल गयी।

आतंकवाद के उन्मूलन को ले कर शुरू हुई पुलसिया एवं सैन्य कार्यवाहियों के बीच इस उपन्यास में जहाँ एक तरफ़ घरों..गाँवों से पूछताछ के नाम पर उठा किए गए नौजवान दिखाई देते हैं जो बाद में फिर ढूँढे से भी कभी नहीं मिले। उलटा नदी-नहरों..नालों में मार कर बहा दी गयी उनकी लावारिस लाशें बहती या फिर किनारे लग..सड़ती दिखाई दी। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसी उपन्यास में कहीं पुलिस घरवालों..दोस्तों..रिश्तेदारों को जबरन धमकाती..उनसे गहने-लत्तों.. नकदी या फिर दुधारू पशुओं की उगाही करती नज़र आती है। तो वहीं दूसरी तरफ़ खुद को खाड़कू कहने वाले, नौजवानों को बरगला कर उन्हें अपने साथ मिलाने का बकायादा प्रयास करते या फिर फिरौती के लिए अमीर घरों के बच्चों का अपहरण करते..उन्हें जान से मारते दिखाई देते हैं।

 इसी उपन्यास में कहीं खाड़कूओं के  द्वारा बसों से उतार कर निर्दोष मुसाफ़िरों को गोलियों से भून दिया जाता दिखाई दिया। तो कहीं अपने नौजवान बेटों की सुरक्षा को ले कर उनकी माएँ चिंतित एवं सहमी सहमी सी दिखाई दी। इसी उपन्यास में कहीं बढ़िया फसल के बीच खर पतवार के माफ़िक उग आए इन खाड़कूओं से पंजाब को मुक्त कराने की बात नज़र आती है। जिसके मद्देनज़र पुलिस, सेना और केंद्र सरकार के बीच इस बात को ले कर बिल्कुल भी अपराधबोध नहीं है कि उनकी इस मुहिम के बीच हज़ारों आम शहरी एवं ग्रामीण भी बेगुनाह होने के बावजूद मारे जाएँगे।

इसी उपन्यास में जहाँ एक तरफ़ कहीं पुलिस शक की बिनाह पर मंदिरों और गुरुद्वारों की तलाशी लेती एवं शमशान जैसी जगहों को भी अपने ज़्यादतियों भरे फ़र्ज़ी एनकाउंटरों के तहत नहीं बख्शती कि सैंकड़ों बेगुनाह नौजवानों को वहीं गोली मार.. गुमनाम चिताओं के हवाले कर हमेशा हमेशा के लिए स्वाहा कर ग़ायब कर दिया गया। तो वहीं दूसरी तरफ़ इस उपन्यास में पुलिस और खाड़कूओं की दहशत आम आदमी में इतनी ज्यादा दिखाई देती है कि एक दूसरे को देख कर भी डरने लगते एवं एक दूसरे की मदद कर..आपस में एक दूसरे पर विश्वास करने तक से कतराते दिखाई दिए। 

इस उपन्यास में एक तरफ़ कहानी है उन दोस्तों और अनजान भले लोगों की जिन्होंने कोई रिश्ता..कोई लगाव ना होते हुए भी मानवता के नाते गुरमीत को पुलिस के दिन प्रतिदिन बढ़ते कहर से बचाया..उसके छिपने..भागने..बचने में मदद की। तो वहीं दूसरी तरफ़ इस उपन्यास में कहानी है उन सगे.. नज़दीकी नाते रिश्तेदारों की जिन्होंने पुलिसिया क़हर के आगे भयभीत हो घुटने टेक गुरमीत को शरण देने से इनकार किया या फिर खुद की तरक्की के लालच में उसकी मुखबिरी तक कर बैठे। 

इसी उपन्यास में जहाँ एक तरफ़ कहीं खाड़कू अपने तुग़लकी फरमान के तहत बारात ले जा रही बस में से 11 आदमियों को छोड़ कर बाकी सभी का मुँह काला कर उन्हें धमकाते नज़र आते हैं कि उनके द्वारा जारी हुक्म के तहत बारात में 11 से ज़्यादा लोगों को ले जाने की मनाही है। तो वहीं दूसरी तरफ़ 
सड़कों..बाज़ारों..कस्बों और बसों इत्यादि में उनकी वजह से डरे सहमे हुए लोग नज़र आए। 

इसी उपन्यास में कहीं खाड़कू युवाओं को अपने रंग में रंगने का प्रयास करते दिखे तो कहीं खाड़कूओं और पुलिस के बीच फँस समूचे गांवों से नौजवान पीढ़ी ग़ायब होती दिखी। कभी पुलिस के बेरहमी भरे अत्याचारों और फर्ज़ी एनकाउंटरों की वजह से तो कभी ब्रेनवॉश के ज़रिए खाड़कूओं का मुरीद बन व्व स्वयं भी उनकी ही तरह कुत्ते की मौत मरते दिखे। 

इसी उपन्यास में कहीं अध्यापकों को खाड़कूओं द्वारा मार दिए जाने के बाद से डरी सहमी विद्यार्थियों की जमात में फेल होने का डर समाता दिखाई दिया। तो कहीं पगड़ी उतारने पर खाड़कू लोगों को मारने की धमकी देते तो कहीं पहनने पर पुलिस धमकाती नज़र आयी। इसी उपन्यास में कहीं नज़दीकी रिश्तेदार भी पुलिस के डर से अपने निकट संबंधियों को शरण देने के कतराते नज़र आए। 

अपने अंत तक पहुँचते पहुँचते यह मार्मिक उपन्यास मन में ये सवाल छोड़ जाता है कि..

इस पूरे घटनाक्रम या वाकये से आख़िर किसका फ़ायदा हुआ?

पंजाब में या तो पुलिस के हाथों आम लोग या फिर खाड़कूओं के हाथों अपह्रत होते या मारे जाते बेगुनाह लोग। इनमें से जिस किसी भी वजह से कोई मरा तो मरा तो वो पंजाबी ही।

धारा प्रवाह शैली में लिखे गए इस हर पल उत्सुकता जगाते..रौंगटे खड़े करते रोचक उपन्यास के सफ़ल हिंदी अनुवाद के लिए अनुवादक सुभाष नीरव जी भी बधाई के पात्र हैं। पूरे उपन्यास में दो चार जगह टाइपिंग एरर की ग़लतियाँ दिखाई दी। जिन्हें उम्मीद है कि अगले संस्करण में दूर कर लिया जाएगा।
 
यूँ तो यह दमदार उपन्यास मुझे लेखक की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि बढ़िया कागज़ पर छपे इस 200 पृष्ठीय दमदार उपन्यास के हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है भावना प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 425/- रुपए । अमेज़न पर फ़िलहाल यह उपन्यास 350/- रुपए प्लस 50/- डिलीवरी चार्ज के साथ मिल रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आम हिंदी पाठक की जेब को देखते प्रकाशक जल्द से जल्द इस पठनीय उपन्यास का पैपरबैक संस्करण सस्ते दामों पर निकालेंगे। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक, अनुवादक एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं। 

खिड़कियों से झाँकती आँखें- सुधा ओम ढींगरा

आमतौर पर जब हम किसी फ़िल्म को देखते हैं तो पाते हैं कि उसमें कुछ सीन तो हर तरह से बढ़िया लिखे एवं शूट किए गए हैं लेकिन कुछ माल औसत या फिर उससे भी नीचे के दर्ज़े का निकल आया है।  ऐसे बहुत कम अपवाद होते हैं कि पूरी फ़िल्म का हर सीन...हर ट्रीटमेंट...हर शॉट...हर एंगल आपको बढ़िया ही लगे। 

कमोबेश ऐसी ही स्थिति किसी किताब को पढ़ते वक्त भी हमारे सामने आती है जब हमें लगता है कि इसमें फलानी फलानी कहानी तो बहुत बढ़िया निकली लेकिन एक दो कहानियाँ... ट्रीटमेंट या फिर कथ्य इत्यादि के हिसाब से औसत दर्ज़े की भी निकल ही आयी। लेकिन खैर... अपवाद तो हर क्षेत्र में अपनी महत्त्वपूर्ण पैठ बना के रखते हैं। 

तो ऐसे ही एक अपवाद से मेरा सामना हुआ जब मैंने प्रसिद्ध कथाकार सुधा ओम ढींगरा जी का कहानी संग्रह "खिड़कियों से झाँकती आंखें" पढ़ने के लिए उठाया। कमाल का कहानी संग्रह है कि हर कहानी पर मुँह से बस यही लफ़्ज़ निकले कि..."उफ्फ...क्या ज़बरदस्त कहानी है।" 

सुधा ओम ढींगरा जी की कहानियॉं अपनी शुरुआत से ही इस तरह पकड़ बना के चलती हैं कि पढ़ते वक्त मन चाहने लगता है कि...ये कहानी कभी खत्म ही ना हो। ग़ज़ब की किस्सागोई शैली में उनका लिखा पाठकों के समक्ष इस तरह से आता है मानों वह खुद किसी निर्मल धारा पर सवार हो कर उनके साथ ही शब्दों की कश्ती में बैठ वैतरणी रूपी कहानी को पार कर रहा हो। 

चूंकि वो सुदूर अमेरिका में रहती हैं तो स्वाभाविक है कि उनकी कहानियों में वहाँ का असर...वहाँ का माहौल...वहाँ के किरदार अवश्य दिखाई देंगे लेकिन फिर उनकी कहानियों में भारतीयता की...यहाँ के दर्शन...यहाँ की संस्कृति की अमिट छाप दिखाई देती है। मेरे हिसाब से इस संग्रह में संकलित उनकी सभी कहानियाँ एक से बढ़ कर एक हैं। उनकी कहानियों के ज़रिए हमें पता चलता है कि देस या फिर परदेस...हर जगह एक जैसे ही विचारों...स्वभावों वाले लोग रहते हैं। हाँ...बेशक बाहर रहने वालों के रहन सहन में पाश्चात्य की झलक अवश्य दिखाई देती है लेकिन भीतर से हम सब लगभग एक जैसे ही होते हैं।

उनकी किसी कहानी में अकेलेपन से झूझ रहे वृद्धों की मुश्किलों को उनके नज़दीक रहने आए एक युवा डॉक्टर के बीच पैदा हो रहे लगाव के ज़रिए दिखाया है। तो कुछ कहानियॉं...इस विचार का पूरी शिद्दत के साथ समर्थन करती नज़र आती हैं कि....

"ज़रूरी नहीं कि एक ही कोख से जन्म लेने वाले सभी बच्चे एक समान गुणी भी हों। परिवारिक रिश्तों के बीच आपस में जब लालच व धोखा अपने पैर ज़माने लगता है। तो फिर रिश्तों को टूटने में देर नहीं लगती।"

 इसी  मुख्य बिंदु को आधार बना कर विभिन्न किरदारों एवं परिवेशों की कहानियाँ भी इस संग्रह में नज़र आती हैं। 

इस संग्रह में सहज हास्य उत्पन्न करने वाली कहानी नज़र आती तो रहस्य...रोमांच भी एक कहानी में ठसके के साथ अपनी अहमियत दर्ज करवाने से नहीं चूकता। किसी कहानी में भावुकता अपने चरम पर दिखाई देती है तो एक कहानी थोड़ी धीमी शुरुआत के बाद आगे बढ़ते हुए आपके रौंगटे खड़े करवा कर ही दम लेती है। 

बहुत ही उम्दा क्वालिटी के इस 132 पृष्ठीय संग्रणीय कहानी संग्रह के हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है शिवना प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है मात्र ₹150/- जो कि कंटैंट एवं क्वालिटी को देखते हुए बहुत ही कम है। कम कीमत पर इस स्तरीय किताब को लाने के लिए लेखिका तथा प्रकाशक का बहुत बहुत आभार। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

धूप के गुलमोहर- ऋता शेखर 'मधु'

आमतौर पर अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए सब एक दूसरे से बोल बतिया कर अपने मनोभावों को प्रकट करते हैं। मगर जब अपने मन की बात को अभिव्यक्त करने और उन्हें अधिक से अधिक लोगों तक संप्रेषित करने का मंतव्य हम जैसे किसी लेखक अथवा कवि का होता है तो वह उन्हें दस्तावेजी सबूत के तौर पर लिखने के लिए गद्य या फिर पद्य शैली को अपनाता है। जिसे साहित्य कहा जाता है। आज साहित्य की अन्य विधाओं से इतर बात साहित्य की ही एक लोकप्रिय विधा 'लघुकथा' की। 

लघुकथा..तात्कालिक प्रतिक्रिया के चलते किसी क्षण-विशेष में उपजे भाव, घटना अथवा विचार जिसमें कि आपके मन मस्तिष्क को झंझोड़ने की काबिलियत हो..माद्दा हो...की नपे तुले शब्दों में की गयी प्रभावी अभिव्यक्ति है। मोटे तौर पर अगर लघुकथा की बात करें तो लघुकथा से हमारा तात्पर्य एक ऐसी कहानी से होता है जिसमें सीमित मात्रा में चरित्र हों और जिसे एक बैठक में आराम से पढ़ा जा सके।

दोस्तों..आज मैं लघुकथाओं के ऐसे संकलन की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'धूप के गुलमोहर' नाम से लिखा है ऋता शेखर 'मधु' ने। इस संकलन की लघुकथाओं के लिए लेखिका ने अपने आस पड़ोस के माहौल से ही अपने किरदार एवं विषयों को चुना है। जिसे देखते हुए लेखिका की पारखी नज़र और शब्दों पर उनकी गहरी पकड़ का कायल हुए बिना रहा नहीं जाता। 

 इस संकलन की लघुकथाओं में कहीं नयी पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी को नयी तकनीक से रूबरू कराती नज़र आती है तो कहीं भूख से तड़पता कोई बालक चोरी करता हुआ दिखाई देता है। तो कोई बाल श्रम के लिए ज़िम्मेदार ना होते हुए भी ज़िम्मेदार मान लिया जाता दिखाई देता है। इसी संकलन की किसी अन्य रचना में जहाँ एक तरफ़ किसी शहीद की नवविवाहिता विधवा सेना में शामिल होने की इच्छा जताती हुई नज़र आती है तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य लघुकथा में कोई अपने दिखाए नैतिकता के पथ पर खुद चलने के बजाय उसके ठीक उलट करता दिखाई देता हैं। 

इसी संकलन की किसी रचना में जहाँ बहुत से अध्यापक काम से जी चुराते दिखाई देते हैं तो वहीं कोई बेवजह ही काम का बोझ अपने सिर ले..उसमें पिसता दिखाई देता है। कहीं किसी रचना में भूख के पलड़े पर नौकर- मालिक का भेद मिटता दिखाई देता है। तो कहीं किसी अन्य रचना में राजनीति की बिसात पर कथनी और करनी में अंतर होता साफ़ दिखाई देता है। 

इसी संकलन में कहीं किसी रचना में बरसों बाद मिली सहेलियाँ आपस में एक दूसरे से सुख-दुख बाँटती दिखाई देती हैं। तो कहीं किसी रचना में किसी के किए अच्छे कर्म बाद में फलीभूत होते दिखाई देते हैं। इसी संकलन की एक अन्य रचना में आदर्श घर कहलाने वाले घर में भी कहीं ना कहीं थोड़ा बहुत भेदभाव तो होता दिखाई दे ही जाता है। इसी संकलन की किसी अन्य रचना मरण कहीं कोई नौकरी जाने के डर से काम का नाजायज़ दबाव सहता दिखाई देता है। 

इसी संकलन की एक रचना जहाँ एक तरफ़ 'कुर्सी को या फिर चढ़ते सूरज को सलाम' कहावत को सार्थक करती नज़र आती है जिसमें सेवानिवृत्त होने से पहले जिस प्राचार्य का सब आदर करते नज़र आते थे..वही सब उनके रिटायर होने के बाद उनसे कन्नी काटते नज़र आते हैं। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य रचना कोई स्वार्थी बेटा अपने पिता को बरगला उसका सब कुछ ऐंठने क़ा पर्यास करता दिखाई देता है।

इसी संकलन की एक अन्य रचना में कोई 'चित भी मेरी..पट भी मेरी' की तर्ज़ पर अपनी ही कही बात से फिरता दिखाई देता है। तो कहीं किसी रचना में महँगे अस्पताल में, मर चुके व्यक्ति का भी पैसे के लालच में डॉक्टर इलाज करते दिखाई देते है। एक अन्य रचना में रिश्वत के पैसे से ऐश करने वाले परिवार के सदस्य भी पकड़े गए व्यक्ति की बुराई करते नज़र आते हैं कि उसकी वजह से उनकी इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी। 

इसी संकलन की एक अन्य रचना में जहाँ हार जाने के बाद भी कोई अपनी जिजीविषा के बल पर फिर से आगे बढ़ने प्रयास करता दिखाई देता है। तो वहीं कहीं किसी अन्य रचना में ढिठाई के बल पर कोई किसी की मेहनत का श्रेय खुद लेता नज़र आता है। 
इसी संकलन की एक अन्य रचना इस बात की तस्दीक करती नज़र आती है कि मतलबी लोगों की इस दुनिया में सांझी चीज़ की कोई कद्र नहीं करता। 

इसी तरह के बहुत से विषयों को अपने में समेटती इस संकलन की रचनाएँ अपनी सहज..सरल भाषा की वजह से पहली नज़र में प्रभावित तो करती हैं मगर कुछ रचनाएँ मुझे अपने अंत में बेवजह खिंचती हुई सी दिखाई दीं। मेरे हिसाब से लघुकथाओं का अंत इस प्रकार होना चाहिए कि वह पाठकों को चौंकने अथवा कुछ सोचने पर मजबूर कर दे। इस कसौटी पर भी इस संकलन की रचनाएँ अभी और परिश्रम माँगती दिखाई दी। 

आमतौर पर आजकल बहुत से लेखक स्त्रीलिंग एवं पुल्लिंग में तथा एक वचन और बहुवचन के भेद को सही से समझ नहीं पाते। ऐसी ही कुछ ग़लतियाँ इस किताब में भी दिखाई दीं। जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रूफरीडिंग एवं वर्तनी के स्तर पर भी कुछ त्रुटियाँ नज़र आयी। उदाहरण के तौर पर 

इसी संकलन की 'दर्द' नामक लघुकथा अपनी कही हुई बात को ही काटती हुई दिखी कि इसमें पेज नंबर 22 पर एक संवाद लिखा हुआ दिखाई दिया कि..

"कल मैंने एक सिनेमा देखा 'हाउसफुल-3' जिसमें लंगड़ा, गूंगा और अँधा बन कर सभी पात्रों ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया।"

यहाँ यह बात ग़ौरतलब है कि 'खूब मनोरंजन किया' अर्थात खूब मज़ा आया जबकि इसी लघुकथा के अंत की तरफ़ बढ़ते हुए वह अपने मित्र से चैट के दौरान कहती है कि..

"मैंने फेसबुक पर यह तो नहीं लिखा कि यह सिनेमा देख कर मुझे मज़ा आया।"

यहाँ वह कह कर वह अपनी ही बात को विरोधाभासी ढंग से काटती नज़र आती है कि उसे मज़ा नहीं आया।

इसी तरह पेज नम्बर 27 पर लिखी कहानी 'विकल्प' बिना किसी सार्थक मकसद के लिखी हुई प्रतीत हुई। जिसमें अध्यापिका अपनी एक छात्रा के घर इसलिए जाती है कि वह उसे कम उम्र में शादी करने के बजाय पढ़ने के लिए राज़ी कर सके मगर उसके पिता की दलीलें सुन कर वह चुपचाप वापिस चली जाती है।

इसी तरह पेज नंबर 78 की एक लघुकथा 'हो जाएगा ना' में माँ की घर से हवाई अड्डे के लिए जल्दी घर से निकलने की चेतावनी और समझाइश के बावजूद भी बेटा देरी से घर से निकलता है और कई मुश्किलों से दो चार होता हुआ अंततः ट्रैफिक जाम में फँसने की वजह से काफ़ी देर से हवाई अड्डे पर पहुँचता है। जिसकी वजह से उसे फ्लाइट में चढ़ने नहीं दिया जाता। 

सीख देती इस रचना की अंतिम पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..

'माँ खुश थी कि उसने समय की कीमत पहचान ली थी।'

मेरे ख्याल से बेटे की फ्लाइट छूट जाने पर कोई भी माँ खुश नहीं होगी। अगर इस पंक्ति को इस तरह लिखा जाता तो मेरे ख्याल से ज़्यादा सही रहता कि..

'माँ को उसकी फ्लाइट छूट जाने का दुख तो था लेकिन साथ ही साथ वह इस वजह से खुश भी थी कि इससे उसके बेटे को समय की कीमत तो कम से कम पता चल ही जाएगी।'

इसी तरह आगे बढ़ने पर एक जगह लिखा दिखाई दिया कि..

'नाच गाना से हॉल थिरक रहा था।'

यहाँ इस वाक्य से लेखिका का तात्पर्य है कि क्रिसमस की पार्टी के दौरान हॉल में मौजूद लोग नाच..गा और थिरक रहे थे। जबकि वाक्य से अंदेशा हो रहा है कि लोगों के बजाय हॉल ही थिरक रहा था जो कि संभव नहीं है। अगर इस वाक्य को सही भी मान लिया जाए तो भी यहाँ 'नाच गाना से हॉल थिरक रहा था' की जगह 'नाच गाने से हॉल थिरक रहा था' आएगा। 

यूँ तो यह लघुकथा संकलन मुझे लेखिका की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि बढ़िया कागज़ पर छपे इस 188 पृष्ठीय लघुकथा संकलन को छापा है श् वेतांश प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 340/- रुपए जो कि कंटैंट को देखते हुए मुझे ज़्यादा लगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं। 

ताश के पत्ते- सोहेल रज़ा

कहते हैं कि हर इंसान की कोई ना कोई..बेशक कम या ज़्यादा मगर कीमत होती ही है।कौन..कब..किसके..किस काम आ जाए..कह नहीं सकते। ठीक उसी तरह जिस तरह ताश की गड्ढी में मौजूद उसके हर पत्ते की वक्त ज़रूरत के हिसाब से अपनी अपनी हैसियत..अपनी अपनी कीमत होती है। जहाँ बड़े बड़े धुरंधर फेल हो जाते हैं..वहाँ एक अदना सा.. कम वैल्यू वाला पत्ता या व्यक्ति भी अपने दम पर बाज़ी जिताने की कुव्वत..हिम्मत एवं हौंसला रखता है। 

पुराने इतिहास के पन्नों को खंगालने पर पता चलता है कि आज से हज़ारों साल पहले चीनी राजवंश की राजकुमारी अपने रिश्तेदारों के साथ आपस में पेड़ के पत्तों पर चित्रित तस्वीरों से बनी ताश खेला करती थी। बाद में ताश का यही मनोरंजक खेल, चीन की सीमाओं को लांघ, पत्तों से कागज़ और कागज़ से आगे प्लास्टिक तक की यात्रा करता हुआ  यूरोप, इंग्लैंड और स्पेन समेत पूरी दुनिया में फैल गया। 

आज बातों ही बातों में ताश का जिक्र इसलिए कि आज मैं सोहेल रज़ा जी के पहले उपन्यास 'ताश के पत्ते' की बात करने जा रहा हूँ। जो अपने नाम याने की शीर्षक के अनुसार किसी क्राइम थ्रिलर जैसा भान देता है मगर असल में इसमें आदिल- समीरा की प्रेम कहानी के अलावा कहानी है उन हज़ारों लाखों अभ्यर्थियों की जो अपने..अपने घरवालों के सपनों को पूरा करने के लिए हर साल SSC CGL (स्टाफ सिलेक्शन कमीशन - कंबाइंड ग्रैजुएट लेवल) जैसी कठिन लेवल की परीक्षाओं में सलैक्ट होने के लिए अपने दिन रात एक किए रहते हैं। 

इस उपन्यास में कहानी है IAS, IPS और स्टॉफ सलैक्शन कमीशन की कठिन परीक्षाओं की तैयारी करने और करवाने के लिए कोचिंग हब में तब्दील हो चुके दिल्ली के मुखर्जी नगर और उसके आसपास के इलाके की। जहाँ ऑटो चालक से ले कर प्रॉपर्टी डीलर तक हर कोई पीजी और टिफ़िन सर्विस प्रोवाइड करने हेतु आतुर नज़र आता है। इसमें कहानी है यहाँ के छोटे छोटे सीलन..बदबू भरे तंग कमरों में बड़ी मुश्किल से गुज़ारा कर..अपने दिन रात होम करते हज़ारों अभ्यर्थियों की। साथ ही इसमें बात है लक्ष्य प्राप्ति हेतु रात रात भर जाग कर की गयी अथक मेहनत..लगन और तपस्या के बीच डूबते-चढ़ते..बनते-बिगड़ते इरादों..हौंसलों और अरमानों की। 

कनपुरिया शैली में लिखे गए इस उपन्यास में ममता..त्याग और स्नेह के बीच ज़िद है खोए हुए आत्मसम्मान को फिर से पाने की। धार्मिक सोहाद्र और भाईचारे के बीच इसमें बात है यारी..दोस्ती और मस्ती भरे संजीदा किरदारों की। 

इस उपन्यास में एक तरफ़ बात है छोटी छोटी खुशियों..आशाओं और सफलताओं को सेलिब्रेट करते अभ्यर्थियों की। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसमें बात है हताशा..निराशा और अवसाद के बीच खुदकुशी करने को मजबूर होते युवाओं की। इसमें बात है एकाग्रचित्त मन से सफ़लता हेतु अपना सर्वश्रेष्ठ देने के बावजूद लाखों सपनों के धराशायी हो टूटने..चटकने और बिखरने की। इसमें बात है एकता..अखंडता के जज़्बे और जोश से भरे अभ्यर्थियों के बीच फूट डालने को आतुर होते खुराफाती  राजनैतिक प्रयासों की।

इस उपन्यास में एक तरफ़ बात है अफसरशाही से जुड़े लापरवाही भरे फैसलों के चलते सड़कों पर धरने प्रदर्शन और अनशन को मजबूर होते देश भर के हज़ारों..लाखों युवाओं की। तो दूसरी तरफ़ इसमें बात है सरकारी नुमाइंदों के ढिलमुल रवैये.. खोखले आदर्शों और झूठे वादों से लैस गोलमोल इरादों की। इसमें बात है गैरज़िम्मेदाराना प्रशासनिक एटीट्यूड के मद्देनज़र अदालती फैसलों में निरंतर होती देरी और उससे पैदा होती निराशा और फ्रस्ट्रेशन भरे अवसाद की।

बाँधने की क्षमता से लैस इस उपन्यास में बतौर सजग पाठक मुझे कुछ कमियां भी दिखाई दी जैसे कि..

*टीचिंग के पहले  प्रयास में ही आदिल को बारह सौ रुपए हर बैच के हिसाब से रोज़ के दो बैच मिल जाना तथा उसका समीरा को चंद औपचारिक मुलाकातों के बाद पहली ही डेट में 'आई लव यू' बोल प्रपोज़ कर देना और बारिश के दौरान बिजली कड़कने से समीरा का घबरा कर आदिल के गले लग जाना थोड़ा अटपटा..चलताऊ एवं फिल्मी लगा। 

*पेज नंबर 12 पर एक जगह लिखा दिखाई दिया कि.. 
"मैं उन पैसों को ऐसे संभाल कर रख रहा था जैसे पुजारी अपनी पवित्र ग्रंथ को संभाल कर रखता है।"

यहाँ पर मेरे हिसाब से 'पुजारी' शब्द का इस्तेमाल तर्कसंगत नहीं है क्योंकि इस बात को कहने वाला 'आदिल' मुस्लिम है। इस नाते यहाँ पर पुजारी की जगह पर मौलवी या कोई और जायज़ शब्द आता तो ज्यादा बेहतर था। 

*पेज नंबर 13 पर 'यूकेलिप्टस' की लकड़ी को 'लिपटिस' कहा गया जबकि सफ़ेदे के पेड़ की लकड़ी को 'यूकेलिप्टस' कहा जाता है।

*इसी तरह पेज नंबर 52 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"विवेक भाई! तुम सरकारी व्यवस्था से क्षुब्ध क्यों हो? जब देखो तंत्र का अवगुण करते रहते हो।"

यहाँ 'तंत्र का अवगुण करना' सही वाक्य नहीं बन रहा है। इसके बजाय वाक्य इस प्रकार होना चाहिए था कि..

"जब देखो तंत्र का निरादर करते रहते हो।"

*पेज नंबर 191 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"समीरा का चेहरा आज पहले से ज़्यादा खिला हुआ था। उसके डिम्पल्स में पहले से ज़्यादा गहराई थी। गाल ज़्यादा गुलाबी हो गए थे।"

(यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि बुखार के ठीक हो जाने की वजह से समीरा का चेहरा खिला खिला था।)

जबकि अगले पैराग्राफ में लिखा दिखाई दिया कि.. 
"वह एकदम से मायूस सी हो गई थी। सैकड़ों फूल भी मुरझा से गए हो जैसे।

माना कि समीरा के उदास होने की वजह एक अभ्यर्थी द्वारा खुदकुशी कर लेना था। मगर फिर भी पढ़ने में यह थोड़ा अटपटा लगा कि एक ही पल में कैसे किसी में इतना बदलाव आ सकता है? 

अगर इस सीन को लिखा जाना बेहद ज़रूरी था तो दृश्य को इस प्रकार लिखा जाना ज़्यादा तर्कसंगत रहता कि...

"बुखार से उबर जाने के बावजूद समीरा का चेहरा  तरोताज़ा ना हो कर हल्की मायूसी लिए हुए था।"

या फिर...

"बुखार से उबर जाने के बाद समीरा का चेहरा  तरोताज़ा होने के बावजूद हल्की मायूसी लिए हुए था।"

*काफ़ी जगाहों पर एक ही बात को खींचते हुए छोटे छोटे वाक्य पढ़ने को मिले। Raw ड्राफ्ट में तो ऐसा लिखना सही है मगर फाइनल ड्राफ्ट या एडिटिंग के वक्त उनकी तारतम्यता को बरकरार रखते हुए आसानी से बड़े..प्रभावी एवं परिपक्व वाक्य में तब्दील किया जा सकता था।

*वर्तनी की कुछ छोटी छोटी त्रुटियाँ जैसे..*रगजीन- रैक्सीन, खुसकिस्मत- खुशकिस्मत, कार्गिल - कारगिल इत्यादि दिखाई दी।

• फ़ॉन्ट्स के छोटे होने और काफ़ी पेजों में प्रिंटिंग का रंग उड़ा हुआ दिखाई दिया जिससे पढ़ने में अच्छी खासी मशक्कत के बाद भी असुविधा ही हुई।

हालांकि यह उपन्यास मुझे उपहार स्वरूप मिला मगर फिर भी अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि 224 पृष्ठीय के इस उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है राजपाल एण्ड सन्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 295/- रुपए जो कि मुझे ज़्यादा लगा। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

अनुभूति- रीटा सक्सेना

जीवन की आपाधापी से दूर जब भी कभी फुरसत के चंद लम्हों..क्षणों से हम रूबरू होते हैं तो अक्सर उन पुरानी मीठी यादों में खो जाते हैं जिनका कभी ना कभी..किसी ना किसी बहाने से हमारे जीवन से गहरा नाता रहा है। साथ ही कई बार ऐसा भी मन करता है कि हम उन अनुभवों..उन मीठी यादों से औरों को भी रूबरू करवाएँ। तो ऐसे में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक अपनी बातें..अपने विचार पहुँचाने के मकसद से ये लाज़मी हो जाता है कि हम इसके लिए किसी ऐसे सटीक माध्यम का चुनाव करें जो अन्य दृश्य/श्रव्य माध्यमों के मुक़ाबले थोड़ा किफ़ायती भी हो और उसकी पहुँच भी व्यापक हो।  ऐसे में किसी संस्मरणात्मक किताब से भला और क्या बढ़िया हो सकता है?

दोस्तों..आज मैं आपका परिचय ऐसे ही संस्मरणों से सुसज्जित किताब से करवाने जा रहा हूँ जिसे 'अनुभूति (अनकही दास्ताँ) के नाम से लिखा है रीटा सक्सेना ने जो पश्चिमी दिल्ली के नांगलोई क्षेत्र में दिव्यांगजनों के लिए एक स्पैशल स्कूल चलाती हैं और उन्हें उनके द्वारा किए गए सदकार्यों के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। 

इस किताब में कहीं लेखिका ने अपने बचपन से जुड़ी बातों को लिखा है तो कहीं माँ के साथ अपने सम्बन्धों को ले कर पुरानी यादों को फिर से याद किया है। इसी किताब में कहीं वे अपने लेखक/कवि पिता की बात करती हैं तो कहीं अपनी माँ के स्नेहमयी एवं कुशल गृहणी होने की। कहीं वे किताबों के प्रति अपनी माँ के शौक की बात करती नज़र आती हैं तो कहीं जीवन मूल्यों और जीवनदर्शन से जुड़ी बातों पर भी उनकी कलम चलती दिखाई देती है। 

इस किताब के ज़रिए लेखिका ने अपनी माँ से जुड़ी हुई यादों..उनकी बातों के साथ साथ विभिन्न ऑपरेशनों के दौरान अस्पताल में उनके द्वारा झेले गए दुःखों..तकलीफ़ों की बात की है। इस किताब जहाँ एक तरफ़ लेखिका ने पीड़ा..दुःख.. दर्द..संताप से भरे उन गहन लम्हों को अपने पाठकों के समक्ष रखते हुए एक तरह से उन्हीं दुःखों और तकलीफों को स्वयं फिर से जिया है। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसी किताब में कहीं वे कोरोना काल में हुए अपने तजुर्बों के आधार पर मृत देहों और रोते बिलखते परिवारों और उनकी वेदना की बात करती नज़र आती हैं। 

इसी किताब में जहाँ एक तरफ़ वे लचर सुविधाओं वाले उन महँगे अस्पतालों पर भी गहरे कटाक्ष करती नज़र आती हैं जो मरीज़ की मजबूरी और वक्त का फ़ायदा उठा आम नागरिकों को लूटने खसोटने में दिन रात लिप्त नज़र आते थे। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसी किताब में वे कहीं विभिन्न कष्टों से जूझ रही अपनी माँ के साथ अस्पताल में बिताए दिनों को याद करती हुई नजर आती हैं कि किस तरह बेहद कष्ट में होने के बावजूद भी अंततः उन्होंने अपने दुःख.. अपनी तकलीफ़ पर काबू पा..उनके बारे में बात करना बंद कर दिया था।

इसी किताब में वे कहीं भारतीय व्यवस्था में रोगियों के अधिकारों के बारे में बताती नज़र आती हैं तो कहीं वे उपभोक्ता होने के नाते रोगियों के अधिकारों से अपने पाठकों को अवगत एवं जागरूक करती नज़र आती हैं। इसी किताब में कहीं वे आध्यात्मिकता से जुड़े अपने नज़रिए की बात करती दिखाई देती हैं। तो कहीं वे किशोरावस्था में उनके द्वारा लिखी गयी चंद रचनाओं को भी इस किताब में समेटती नज़र आती हैं। 

धाराप्रवाह लेखन शैली में लिखी गयी इस किताब में इनके लेखन कौशल की परिपक्वता एवं समझ को देखते हुए सहजता से ये विश्वास नहीं होता कि यह इनकी पहली किताब है। 

इस किताब में वर्तनी की कुछ त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना किया जाना थोड़ा खला। प्रूफरीडिंग के स्तर पर भी कुछ कमियां दिखाई दीं। उदाहरण के तौर पर पेज नम्बर
68 पर आगे लिखा दिखाई दिया कि..

'हम सब ऐसे हो गए जैसे किसी कसाई को देख लिया हो जो जानवर काटने जा रहा है।'

यहाँ इस वाक्य के संदर्भ में यह बात ग़ौरतलब है लेखिका ने अपनी सातवीं कक्षा की परीक्षा के दौरान अपनी एक सहपाठिनी को दुल्हन के वेश में परीक्षा देते हुए देखा। परीक्षा के बाद जब उसने बताया कि उसकी जबरन शादी कर दी गयी है। तो सब बच्चों को ऐसा महसूस हुआ जैसे कि उन्होंने एक जानवर को कसाई के पास कटने के लिए जाते हुए देखा। जबकि वाक्य स्वयं इससे उलट बात कह रहा है कि..

'हम सब ऐसे हो गए जैसे किसी कसाई को देख लिया हो जो जानवर काटने जा रहा है।'

इस वाक्य के हिसाब से बच्चों को ऐसा महसूस हुआ कि कोई कसाई(दूल्हा), जानवर(दुल्हन) काटने के लिए जा रहा है जबकि बच्चों को यहाँ जानवर कसाई के पास जाता दिख रहा है। अतः किताब में छपा वाक्य ग़लत है। सहो वाक्य इस प्रकार होगा कि..

'हम सब ऐसे हो गए जैसे किसी जानवर को कसाई के पास कटने के लिए जाते हुए देख लिया हो।'

यूं तो यह किताब मुझे लेखिका की तरफ से उपहार स्वरूप मिली मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि सैल्फ़ पब्लिशिंग के ज़रिए छपी इस  80 पृष्ठीय किताब के हार्ड बाउंड संस्करण का मूल्य 199/- रुपए है और इससे प्राप्त होने वाली आय का इस्तेमाल दिव्यांगजनों के लाभार्थ किया जाएगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

सपनों का शहर- सेनफ्रांसिस्को- जयश्री पुरवार

अपने रोज़मर्रा के जीवन से जब भी कभी थकान..बेचैनी..उकताहट या फिर बोरियत उत्पन्न होने लगे तो हम सब आमतौर पर अपना मूड रिफ्रेश करने के लिए बोरिया बिस्तर संभाल.. कहीं ना कहीं..किसी ना किसी जगह घूमने निकल पड़ते हैं। हाँ.. ये ज़रूर है कि मौसम के हिसाब से हर बार हमारी मंज़िल..हमारा डेस्टिनेशन बदलता रहता है। कभी इसका बायस गर्म या चिपचिपे मौसम को सहन ना कर पाना होता है तो कभी हाड़ कंपाती सर्दी से बचाव की क्रिया ही हमारी इस प्रतिक्रिया का कारण बनती है। 

वैसे तो हर शहर..हर इलाके में ऐसा कुछ ना कुछ निकल ही आता है जो बाहर से आने वाले सैलानियों के लिए खास कर के देखने..महसूस करने..अंतर्मन में संजोने लायक हो। ऐसे में अगर आपको अपने घर से दूर परदेस में बार-बार जाने का मौका मिले  तो मन करता है कि हर वो चीज़..जो देखने लायक है..कहीं छूट ना जाए। 

 ऐसे में जब आपको अमेरिका जैसे बड़े देश के कैलिफोर्निया स्थित सपनों के शहर- सैनफ्रांसिस्को में बार बार जाने का मौका मिले तो मन करता है हर लम्हे..हर पल को खुल कर जी लिया जाए।दोस्तों..आज मैं आपसे अमेरिका के शहर सैनफ्रांसिस्को के रहन सहन और दर्शनीय स्थलों से जुड़ी एक ऐसी किताब के बारे में बात करने जा रहा हूँ जिसे "सपनों का शहर -सैनफ्रांसिस्को" के नाम से लिखा है जयश्री पुरवार ने। 

इस किताब में कहीं कोलंबस द्वारा भारत के धोखे में अमेरिका को खोजे जाने का जिक्र मिलता है तो कहीं उसके ब्रिटिश उपनिवेश में तब्दील होने और सालों बाद उसके उपनिवेश से अलग हो आज़ाद हो अलग राष्ट्र बनने की बात नज़र आती है। कहीं इसमें 
विश्वयुद्ध के समय हथियार बनाने से ले कर आपूर्ति करने की मुहिम द्वारा अमेरिका के कर्ज़दार राष्ट्र से  दुनिया के सबसे अमीर देश में परिवर्तित होने की बात का पता चलता है। तो कहीं द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान के विरुद्ध परमाणु बम के इस्तेमाल के बाद अमेरिका, दुनिया के सबसे ताकतवर देश के रूप में परिवर्तित होता दिखाई देता है। 

इस किताब में कहीं लेखिका सैनफ्रांसिस्को में  उपलब्ध बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की बात करती नज़र आती हैं तो कहीं वे इसके लिए स्वास्थ्य बीमा याने के हैल्थ इंश्योरेंस की अहमियत भी समझाती दिखाई देती हैं। कहीं इस किताब में घर-घर हथियार होने की बात पता चलती है तो कहीं इसी वजह से ज़रा ज़रा सी बात पर गोलाबारी की घटनाओं को बल मिलता दिखाई देता है। 

कहीं इस किताब में वहाँ की साफ़ सुथरी सड़कों और गलियों की बात होती नज़र आती है तो कहीं वहाँ के शांति भरे हरे भरे माहौल और सुंदर व दर्शनीय पार्कों की बात होती नज़र आती है। इसी किताब में कहीं वहाँ पर कानून की अहमियत और लोगों के अनुशासनप्रिय होने की बात पता चलती है। तो कहीं इस किताब में वहाँ के बच्चों के प्रिय थीम पार्क'लेमोज़' जैसे उस अभिनव मनोरंजक पार्क की बात होती दिखाई देती है। जहाँ आप जन्मदिन मनाने से ले कर टट्टू की सवारी, बच्चों की राइड्स और पालतू चिड़ियाघर का भी आनंद ले सकते हैं। 

इसी किताब में कहीं अमेरिका में बहुलता में उपलब्ध रोज़गारों की बात होती दिखाई देती है कि अगर आप मेहनती, कर्मठ और काम के प्रति ज़ुनूनीयत का भाव रखते हैं तो आपके पास वहाँ रोजगार की कोई कमी नहीं है। तो कहीं वहाँ की परंपरानुसार तीन दिवसीय लेबर डे का उत्सव मनाया जाता दिखाई देता है। इसी किताब से पता चलता है कि सप्ताह के पाँच दिन कड़ी मेहनत करने वाले वहाँ के लोग अगले दो दिनों तक मस्ती करने को बेताब और उल्लासित नज़र आते हैं। 

इसी किताब में कहीं लेखिका वहाँ के दिन प्रतिदिन जटिल हो रहे वैवाहिक संबंधों की बात करती नज़र आती है कि वहाँ शादी और तलाक..दोनों ही फटाफट और धड़ाधड़ होते रहते हैं। जिनमें जोड़े में से कोई एक अपना पल्ला झाड़ आगे निकल जाता है तो दूसरा सिंगल पेरेंट की भूमिका निभाता नज़र आता है। इसी किताब से अमेरिका के उन अंतरप्रजातीय परिवारों के बारे में भी पता चलता है जिसमें हो सकता है कि पति मैक्सिकन और पत्नी अमेरिकन हो जबकि अलग अलग रिश्तों से जन्मर्ण उनके बच्चों में कोई गोरा, कोई गेहुआँ और कोई अश्वेत याने के नीग्रो भी हो सकता है।

इस किताब में जहाँ एक तरफ़ ललित कलाओं और सांस्कृतिक गतिविधियों के केन्द्र याने के सैनफ्रांसिस्को में लेखिका को ड्राइंग पेंटिंग से लेकर फोटोग्राफी, वीडियो, फिल्म- सिनेमा इत्यादि अनेक विधाओं में रुचि लेते लोग नजर आते हैं। जिनमें बच्चे, युवा और प्रौढ़ तक सब अपनी अपनी काबिलियत एवं रुचिनुसार भाग लेते नज़र आते हैं। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसी किताब में कहीं वहाँ के व्यस्त बाज़ारों में या सड़कों के किनारे भीख मांगने वाले भी अपना कोई ना कोई हुनर पेश कर अपना गुजर बसर करते नज़र आते हैं।

संस्मरणों से जुड़ी इस किताब में लेखिका जहाँ एक तरफ वहाँ के विभिन्न मौसमों की बात करती दिखाई देती है तो वहीं दूसरी तरफ़ भारतीय समुदाय के बीच हर्षोल्लास से बनाए जाते भारतीय त्योहारों जैसे.. दुर्गा पूजा, सिंदूर खेला, होली, करवाचौथ और दिवाली की भी बात करती दिखाई देती है। त्योहारों से जुड़े इस संस्मरण में वे वहाँ के हैलोवीन और क्रिसमस क्रिसमस जैसे बड़े स्तर पर मनाए जाने वाले त्योहारों की भी बात करती नज़र आती हैं। 

इसी किताब में कहीं भारतीय एवं पाकिस्तानी मूल के लोगों के साथ साथ विदेशी भी सिंगर कैलाश खेर के कॉन्सर्ट में मस्त हो खुशी से झूमते दिखाई देते हैं।   तो कही  ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली खान की मदभरी ग़ज़लों की मुरीद होती दुनिया नज़र आती है। कहीं म्यूज़िक बैण्ड इंडियन ओशन के द्वारा प्रस्तुत किए कार्यक्रम का लोग आनंद लेते नज़र आते हैं। 

इसी किताब में कहीं लेखिका अपने परिवार के साथ भारतीय रेस्तराओं में हमारे यहाँ के प्रसिद्ध व्यंजनों का लुत्व उठाती दिखाई देती है तो कहीं पाश्चात्य शैली के भोजन का भी आनंद लेती नज़र आती है। विभिन्न संस्मरणों से जुड़ी इस किताब में कहीं लेखिका वहाँ के विभिन्न पुस्तकालयों के ज़रिए वहाँ की की पुस्तक संस्कृति की बात करती हुई दिखाई देती है। तो कहीं वे अपने लेखन के शौक और वहाँ आयोजित की जाने वाली काव्य गोष्ठिओ में अपनी भागीदारी की बात करती नज़र आती है। 

इसी किताब में लेखिका कभी वहाँ भयानक त्रासदी के रूप में फैले स्पेनिश फ्लू की बात करती नज़र आती है तो कहीं कैलिफोर्निया के जंगलों में लगी भयानक आग और उससे पर्यावरण को हो रहे नुकसान की बात करती भी दिखाई देती है। इसी किताब में कहीं लेखिका रेसिज़म के मद्देनज़र अमेरिका में काले-गोरों के आपसी भेदभाव एवं उनमें होने वाली आपसी झड़पों की बात करती है। तो कहीं लेखिका के अनुभवानुसार वहाँ के मूल बाशिंदे याने के रेड इंडियन दरकिनार किए जाते दिखाई देते हैं। 

इसी किताब में लेखिका कहीं बताती नज़र आती है कि दुनिया का सबसे अमीर..सबसे धनी देश होने के बावजूद भी भो गरीब..बेघर लोगों की अच्छी खासी तादाद दिखाई देती है।

इसी किताब में कहीं लेखिका अपने लेखन के जादू से वहाँ के गोल्डन गेट ब्रिज और विस्टा पॉएंट के दर्शन कराती नज़र आती है। तो कहीं वहाँ के गोल्डन गेट पार्क और जापानी शैली में बने जैपनीज़ टी गार्डन के दर्शन कराती नज़र आती है। इसी किताब में कहीं पिकनिक का पर्याय बन चुके मदर्स मीडो और स्टो लेक की बात होती नज़र आती है। तो कहीं लेखिका अपनी लेखनी के ज़रिए पाठकों को कैलिफोर्निया अकादमी ऑफ साइंसेज़ के तो कहीं सैनफ्रांसिस्को के डाउन टाउन और उसके आसपास के इलाकों के दर्शन कराती नज़र आती है। 

इसी किताब में कहीं लेखिका मछुआरों के घाट का विचरण करती नज़र आती है तो कहीं वहाँ के अपराधियों को नए जीवन की प्रेरणा देते एक ऐसे रेस्टोरेंट की बात करती दिखाई देती है जहाँ वेटर, बावर्ची, प्रबंधक से ले कर मालिक तक, सभी कभी ना कभी अपने जीवन में अपराधी रह चुके हैं और अब सब आम लोगों की तरह सामान्य जीवन जी रहे हैं।

इस किताब में लेखिका कहीं वहाँ के मनोरंजन स्थलों की बात करती नज़र आती ही तो कभी वहाँ की कला और संस्कृति के मद्देनज़र वहाँ के संग्रहालयों इत्यादि की बात करती दिखाई देती है।
इसी किताब में कहीं वहाँ बने मिनी चायना जैसे इलाकों की बात पता चलती है तो कहीं वहाँ के एलजीबीटी समुदाय की निकलती परेड के बारे में पता चलता है।

किताब में कुछ जगहों वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त प्रूफरीडिंग के स्तर पर भी कुछ कमियां दिखाई दीं। उदाहरण के तौर पर पेज नंबर 39 के आखिरी पैराग्राफ में लिखा दिखाई दिया कि..

'भारत के पब्लिक स्कूलों में समृद्ध परिवार के लाडले बच्चे ही अच्छी शिक्षा प्राप्त करते हैं'

इसके बाद इसी वाक्य में आगे लिखा दिखाई दिया कि..

'जबकि अमेरिका की सघन आबादी वाले शहरों में भी पब्लिक यानी सरकारी स्कूलों में अधिकतर साधारण वर्ग की संताने जाती हैं।'

यहाँ वाक्य के पहले हिस्से में 'पब्लिक स्कूल' से तात्पर्य उन निजी स्कूलों से है जिन्हें बड़े बड़े उद्योगपतियों ने अथवा अमीर लोगों ने अपने मुनाफ़े के लिए खोल रखा है। जबकि इसी वाक्य के अगले हिस्से में लेखिका 'पब्लिक स्कूल' से सरकारी स्कूल का तात्पर्य समझा रही हैं।

यहाँ लेखिका को इस बात को और अधिक स्पष्ट तरीके से समझाना चाहिए था कि भारत के उच्च स्टैंडर्ड वाले महँगे प्राइवेट स्कूलों के जैसे ही अमेरिका के सरकारी स्कूल होते हैं। जिनमें आम आदमी के बच्चे भी आसानी से मुफ़्त या फिर बिना ज़्यादा फीस दिए शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। 

** पेज नंबर 49 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'यह निशुल्क नहीं था और इसके लिए हमें फीस भरनी पड़ी। पर बेटी के घर के पास ही होने के कारण कोई दिक्कत नहीं थी।'

कायदे से अगर देखा जाए तो यहाँ इन दोनों वाक्यों के बीच कोई संबंध नहीं होना चाहिए लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि बेटी का घर पास होने की वजह से फीस भरने में कोई दिक्कत नहीं थी। जबकि असलियत में फ़ीस भरने का बेटी के घर के पास होने से कोई नाता नहीं है बल्कि बेटी का घर वहाँ से नज़दीक होने की वजह से लेखिका को वहाँ आने जाने में कोई दिक्कत नहीं थी। इसलिए अगर पहले वाक्य को सही माना जाए तो अगला वाक्य इस प्रकार होना चाहिए कि..

'बेटी का घर पास होने की वजह से वहाँ आने जाने में कोई दिक्कत नहीं थी।'

इसके आगे पेज नंबर 51 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'सूरजमामा अब देर से आते हैं और जल्दी लौटने भी लगते हैं। पर जितनी देर रहते हैं अपनी रुआब से'

यहाँ 'सूरज मामा(सूर्य)' शब्द सही नहीं है क्योंकि क्योंकि सूरज(सूर्य) को नहीं बल्कि चंदा(चंद्रमा) को चंदामामा कहा जाता है। साथ ही यहाँ 'अपनी रुआब से' नहीं बल्कि 'अपने रुआब से' आएगा। हाँ.. अगर 'रुआब' की जगह 'अकड़' शब्द का प्रयोग किया जाता तो अवश्य ही 'अपनी अकड़ से' आता। 

आगे बढ़ने पर पेज नम्बर 63 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'अमेरिकी धरती पर भारतीय राग- रंग से रंजित इस सुरीली साँझ की याद हम आज भी मन में संजोए हुए हैं।'

यहाँ 'रंजित' शब्द का प्रयोग सही नहीं है क्योंकि 'रंजित' शब्द से पहले 'रक्त' शब्द लग कर 'रक्तरंजित' शब्द बनता है। यहाँ 'रंजित' शब्द के बजाय अगर 'रंगी' शब्द का इस्तेमाल किया जाता तो वाक्य ज़्यादा बेहतर दिखाई देता जैसे कि..

'अमेरिकी धरती पर भारतीय राग-रंग से रंगी इस सुरीली साँझ की याद हम आज भी मन में संजोए हुए हैं।'


पेज नंबर 78 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'हवा के साथ जंगल से राख की धूल भी शहरों में बरसते रहे।'

यहाँ यह वाक्य सही नहीं बना क्योंकि राख भी स्वयं में धूल ही है। इस वाक्य को इस प्रकार होना चाहिए था कि..

'हवा के साथ जंगल की राख भी शहरों पर बरसती रही।'


इसके बाद पेज नंबर 79 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'कभी-कभी मानवीय असावधानी या बिजली लाइन की लीकेज भी आग लगने के कारण बन जाती है।'

यहाँ यह गौर करने वाली बात है कि कोई भी चीज़ लीक तब होती है जब वह तरल अथवा गैसीय अवस्था में होती है और इलैक्ट्रिसिटी याने के बिजली इन दोनों में से किसी भी श्रेणी में नहीं आती। अतः यह वाक्य भी सही नहीं बना। सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..

'कभी-कभी मानवीय असावधानी या बिजली का शॉर्ट सर्किट भी आग लगने का कारण बन जाता है।'


पेज नम्बर 87 में लिखा दिखाई दिया कि..

'जहाँ झरने, झील, हरे भरे चारागाह, छायादार मैदान के अलावा अनेक ऐतिहासिक और आधुनिक इमारतें और बाग बगीचे हैं'

कोई भी मैदान 'छायादार' कैसे हो सकता है जबकि छायादार वृक्ष हुआ करते हैं। छायादार से तात्पर्य छाया देने वाला होता है और कोई भी मैदान स्वयं में छाया देने वाला नहीं हो सकता। यहाँ 'छायादार मैदान' के बजाय हरा भरा मैदान होना चाहिए था। 

पेज नंबर 90 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'छह पंखुड़ी वाले बड़े बाउल में इंद्रधनुषी भोजन- एक पंखुड़ी में लाल अनारदाने, दूसरी में सफेद पनीर के लच्छे............गुलाबी तरबूज़ के छोटे टुकड़े........बीच के गोलाकार भाग में पीला अनानास'

यहाँ यह बात गौर करने लायक है कि पनीर तो स्वयं ही सफ़ेद होता है। इसलिए सिर्फ़ 'पनीर के लच्छे' लिखने से ही काम चल जाता। सफ़ेद शब्द की ज़रूरत ही नहीं थी। यही बात क्रमशः गुलाबी तरबूज़ और पीले अनानास के साथ भी लागू होती है। अतः: इस वाक्य में फ़लों के रंगों का जिक्र करना बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं था।

 महात्मा गांधी से जुड़े चैप्टर को पढ़ने के दौरान पेज नंबर 99 की आखिरी पंक्ति में लिखा नज़र आया कि..
 
'ज़रूरी है कि हम उनके जीवन दर्शन को निकट से जाने, समझे, सीखे और उन्हें अंतरंग करें'

इस वाक्य में 'अंतरंग' की जगह 'आत्मसात' आएगा। 

इसके बाद इसी संदर्भ से जुड़े पेज नम्बर 100 की पहली पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..

'उनके जीवन दर्शन को ना उलझा कर उनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन दर्शन को सुलझाएं।'

यहाँ 'उलझा कर' की जगह 'उलझ कर' आएगा। 

पेज नंबर 106 में लिखा दिखाई दिया कि..

'आगे बढ़ती हुई कहानी में बिली अपने परिवार में अपने देश और उसकी संस्कृति का नए सिरे से अविष्कार करती है।'

यहाँ ये बात गौर करने के लायक है कि अविष्कार हमेशा विज्ञानपरक चीजों का ही होता है जबकि यहाँ परिवार के बीच अपने देश की संस्कृति को फिर से ज़िंदा करने की बात हो रही है।

इसी तरह पेज नंबर 108 में लिखा दिखाई दिया कि..

'यहाँ पर पास एक और प्राकृतिक दर्शनीय स्थल है ट्वीन पीक यूरेका और नोए दो पहाड़ियों का बेजोड़ समागम है।'

यहाँ यह गौर करने वाली बात है समागम का अर्थ लोगों का किसी खास जगह एकत्र होना होता है जैसे कि किसी आश्रम में भक्तों का समागम। लेकिन उपरोक्त वाक्य में ऐसी कोई बात नहीं है। इसलिए यहाँ 'समागम' शब्द का प्रयोग सही नहीं है।

आमतौर पर देखा गया है कि बहुत से लेखक कुछ वस्तुओं इत्यादि में वाक्य के हिसाब से स्त्रीलिंग और पुल्लिंग के भेद को सही से व्यक्त नहीं कर पाते। ऐसे ही कुछ वाक्य इस किताब में भी नज़र आए। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस किताब के आने वाले संस्करणों एवं आगामी किताबों में इस तरह की कमियों को दूर किया जाएगा।

यूं तो यह किताब मुझे लेखिका की तरफ से उपहार स्वरूप मिली मगर फिर भी अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि 136 पृष्ठीय इस किताब के पेपरबैक संस्करण को छापा है बोधि प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

Tej@ज़िंदगी यू टर्न- तेजराज गहलोत


किसी भी देश..राज्य..संस्कृति अथवा अलग अलग इलाकों में बसने वाले वहाँ के बाशिंदों का जब भी आपस में किसी ना किसी बहाने से मेल मिलाप होता है तो यकीनन एक का दूसरे पर कुछ ना कुछ असर तो अवश्य ही पड़ता है। उदाहरण के तौर पर 1980-81 से पहले विरले लोग ही भारत में नूडल्स के बारे में जानते थे लेकिन उसके बाद मैग्गी के चीन से चल कर हमारे यहाँ के बाज़ारों में आने के बाद अब हालत ये है कि हर दूसरी तीसरी गली में नूडल्स बनाने और बेचने वाले मिल जाएँगे। और नूडल्स भी एक तरह की नहीं बल्कि अनेक तरह की। कोई उसमें पनीर के साथ अन्य देसी मसालों का विलय कर उसे पंजाबी टच दे देता तो कोई किसी अन्य जगह का।

यही हालत थोड़ी कम बेसी कर के मोमोज़ की भी है। उन बेचारों को तो ये तक नहीं पता कि कब वे खौलते तेल की कढ़ाही में तल दिए गए या फिर धधकते तंदूर में तप कर फ्राइड अथवा तंदूरी मोमोज़ में बदल गए। इनकी बात तो खैर छोड़िए..अपने देसी समोसे को ही ले लीजिए। उसे तो ये तक नहीं पता कि कब उसमें से आलुओं को बेदखल कर उनमें चाऊमीन.. पास्ता या फिर कढ़ाही पनीर जैसी किसी अन्य आईटम का विलय कर उसे पूरा देसी टच दे दिया गया।

मैग्गी..मोमोज़ और समोसों की तरह का ही कुछ शौक लेखक तेजराज गहलोत भी रखते हैं। पता ही नहीं चलता कि कब वे अच्छी भली हिंदी में लिखते हुए अचानक गुगली के तौर पर उसमें अँग्रेज़ी के शब्दों का टप्पा खिला ऐसा कुछ मनमोहक रच देते हैं कि सामने वाला बस विस्मित हो देखता..मुस्कुराता रह जाता है।

दोस्तों..आज मैं हाल ही में उनकी आयी एक हिंदी..अँग्रेज़ी और राजस्थानी मिश्रित किताब 'Tej@ज़िन्दगी यू टर्न' के बारे में बात करने जा रहा हूँ जिसमें उन्होंने हलकी फुलकी फ्लर्टिंग से ले कर पति-पत्नी के बीच की आपसी नोकझोंक और तत्कालीन राजनीतिक मुद्दों पर अपनी कलम चलाई है। यहाँ तक कि इस मामले में उन्होंने बतौर लेखक/कवि के खुद को भी नहीं बख्शा है। उनके लेखन की एक बानगी के तौर पर देखिए..

**  " उसके दिल से बाहर निकलना था मुझे,
तभी Announcement हुआ..'दरवाज़े बायीं तरफ खुलेंगे'

** " कुछ लोग Outstanding होते हैं,
इसलिए हमेशा हर एक के दिल के बाहर ही खड़े मिलते हैं.... अंदर नहीं जा पाते।"

** " सैकड़ों महिलाओं की आवाज़ बनना था उसे,
फिर यूँ हुआ है एक दिन कि वह एक डबिंग आर्टिस्ट बन गई।"

** " उसने कहा तुम जो यहाँ वहाँ बहुत फिरते रहते हो/ दायरे में रहा करो/ तब से ही मैं उसकी आँखों के Dark Circle में कैद हूँ"

** " किसी ने कहा था एक दिन तुम भी पहाड़ बना सकते हो/ मैं बस उसी दिन से राई राई जोड़ रहा हूँ"

** "मन पर आहिस्ता आहिस्ता बढ़ रहे वज़न को एक ही झटके में कम करके वह इन दिनों Doubles से Single हो गयी है।"

** "उन दोनों ने एक दूसरे से अपना दिल Exchange किया और फिर कुछ दिनों में ही दोनों का हृदय परिवर्तन हो गया"

** "ज़रूरत यहाँ सब को सिर्फ़ कांधे की थी/ पर लोग दिल भी थमाने की ताक में रहे"

** "Signal नहीं मिल रहे हैं कुछ दिनों से/ लगता है तुमने अब Coverage क्षेत्र से बाहर कर रखा है मुझे"

** "देश की सारी समस्याओं को/ एक ही झटके में देशभक्ति खा गयी/ लो 15 अगस्त आ गयी"

** "सुनो...कोई कब से तुम्हें आवाज़ दे रहा है/ चलो अब बाहर निकल भी आओ तुम / उसके ख्यालों से"

** "कुछ दिन पहले तक हम दोनों में खूब प्यार भरी बातें होती थी...पर फिर चुनाव आ गए"

** "बात Eye To Eye से बेवफाई तक पहुँची और फिर उस दिन से दोनों ने काले चश्मे लगा लिए"

** 'यह वक्त सिर्फ क्रीज पर खड़े रहकर Dot Ball निकालने और जितने Extra Run मिल रहे हैं उन्हें बटोर कर खुश रहने का है.... विकेट बचा रहा तो रन बनाने का अवसर भी आएगा ही"

(संदर्भ: कोरोना काल)

** मोदी जी- ' जो जहाँ है वहीं रहे'
बस इतना कहना था कि तब से ही मैं उसके दिल में ही हूँ'

** 'Pass होने वाले के पास Option कम और Fail होने वाले के पास Option ज्यादा होते हैं चाहे जिंदगी की परीक्षा हो या प्रेम की'

** वह- 'Doctor क्या आया Reports में'
Doctor- 'ब्लॉकेज है तुम्हारे Heart में'

यह सुनते ही उसने उसी वक्त दिल से मुझे निकाला और Doctor से कहा- 'Doctor साहब आप एक बार फिर से सारी जांच दोबारा लिख दीजिए'

अंत में चलते चले एक छोटा सा सुझाव:

पेज नंबर 43 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"वह Cinemascope में Scope ढूँढ रही थी और मैं Boxoffice में Office"

यहाँ अगर 'Boxoffice में Office' की जगह 'Boxoffice में Box' लिखा जाता तो यह कोटेशन मेरे हिसाब से थोड़ा शरारती और ज़्यादा मारक बन जाता।

• Box: सिनेमा घर में फ़िल्म देखने के लिए अलग से बना हुआ केबिन।

दो चार जगहों पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर नुक्तों का प्रयोग ना किया जाना थोड़ा खला।

जगह जगह मुस्कुराने और गुदगुदाने के पल देती इस पैसा वसूल मनमोहक किताब के 120 पृष्ठीय पैपरबैक संस्करण को छापा है इंक पब्लिकेशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 160/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

खट्टर काका- हरिमोहन झा

कहते हैं कि समय से पहले और किस्मत से ज़्यादा कभी कुछ नहीं मिलता। हम कितना भी प्रयास...कितना भी उद्यम कर लें लेकिन होनी...हो कर ही रहती है। ऐसा ही इस बार मेरे साथ हुआ जब मुझे प्रसिद्ध लेखक हरिमोहन झा जी द्वारा लिखित किताब "खट्टर काका" पढ़ने को मिली। इस उपन्यास को वैसे मैंने सात आठ महीने पहले अमेज़न से मँगवा तो लिया था लेकिन जाने क्यों हर बार मैं खुद ही इसकी उपस्तिथि को एक तरह से नकारता तो नहीं लेकिन हाँ...नज़रंदाज़ ज़रूर करता रहा। बार बार ये किताब अन्य किताबों को खंगालते वक्त स्वयं मेरे हाथ में आती रही लेकिन प्रारब्ध को भला कौन टाल सका है? इस किताब को अब..इसी लॉक डाउन के समय में ही मेरे द्वारा पढ़ा जाना लिखा था। खैर...देर आए...दुरस्त आए।

दिवंगत हरिमोहन झा जी एक जाने-माने लेखक एवं आलोचक थे। एक ऐसे शख्स जिनकी लेखनी धार्मिक ढकोसलों के खिलाफ पूरे ज़ोरशोर से चलती थी। उनका लिखा ज़्यादातर मैथिली भाषा में है जिसका और भी अन्य कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। उन्होंने 'खट्टर काका' समेत बहुत सी किताबें लिखीं जो काफी प्रसिद्ध हुई। उन्हें उम्दा लेखन के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 

अपनी किताबों में हरिमोहन झा जी ने अपने हास्य व्यंग्यों एवं  कटाक्षों के ज़रिए सामाजिक तथा धार्मिक रूढ़ियों को आईना दिखाते हुए अंधविश्वास इत्यादि पर करारा प्रहार किया  है। मैथिली भाषा में आज भी हरिमोहन झा सर्वाधिक पढ़े जाने वाले लेखक हैं।

अब बात करते हैं उनकी किताब "खट्टर काका" की तो इस किताब का मुख्य किरदार 'खट्टर काका' हैं जिनको उन्होंने सर्वप्रथम मैथिली भाषा में रचा था। इस किरदार की खासियत है कि यह एक मस्तमौला टाइप का व्यक्ति है जो हरदम भांग और ठंडाई की तरंग में रहता है और अपने तर्कों-कुतर्कों एवं तथ्यों के ज़रिए इधर उधर और जाने किधर किधर की गप्प हांकते हुए खुद को सही साबित कर देता है।

इस किताब के ज़रिए उन्होंने हिंदू धर्म में चल रही ग़लत बातों को अपने हँसी ठट्ठे वाले ठेठ देहाती अंदाज़ में निशाना बनाया है। और मज़े की बात कि आप अगर तार्किक दृष्टि से उनका लिखा पढ़ो तो आपको उनकी हर बात अक्षरशः सही एवं सटीक नज़र आती है। खट्टर काका हँसी- हँसी में भी जो उलटा-सीधा बोल जाते हैं...उसे फिर अपनी चटपटी बातों के ज़रिए सबको भूल भुलैया में डालते हुए साबित कर के ही छोड़ते हैं।

रामायण, महाभारत, गीता, वेद, पुराण उनके तर्कों के आगे सभी के सभी सभी उलट जाते हैं। खट्टर काका के नज़रिए से अगर देखें तो हमें, हमारा हर हिंदू धर्मग्रंथ महज़ ढकोसला नज़र आएगा जिनमें राजे महाराजों की स्तुतियों, अवैध संबंधों एवं स्त्री को मात्र भोगिनी की नज़र से देखने के सिवा और कुछ नहीं है। ऊपर से मज़े की बात ये कि उन्होंने अपनी बातों को तर्कों, उदाहरणों एवं साक्ष्यों के द्वारा पूर्णतः सत्य प्रमाणित किया है। उन्होंने अपनी बातों को सही साबित करने के लिए  अनेक जगहों पर संबंधित श्लोकों का सरल भाषा में अनुवाद करते हुए, उन्हें उनके धार्मिक ग्रंथों के नाम सहित उल्लेखित किया है।

अगर आप जिज्ञासा के चश्मे को पहन खुली आँखों एवं खुले मन से हिंदू धर्म में चली आ रही बुराइयों एवं आडंबरों को मज़ेदार अंदाज़ में जाने के इच्छुक हैं, तो ये किताब आपके बहुत ही मतलब की है। इस किताब के 18वें पेपरबैक संस्करण को छापा है राजकमल पेपरबैक्स ने और इसका बहुत ही वाजिब मूल्य सिर्फ ₹199/- रखा गया है। उम्दा लेखन के लिए लेखक तथा कम दाम पर एक संग्रणीय किताब उपलब्ध करवाने के लिए प्रकाशक को साधुवाद।
 
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