कबूतर का कैटवॉक- समीक्षा तैलंग

आमतौर पर यादों के गलियारे से जब भी हमें कभी गुज़रने का मौका मिलता है तो अनायास ही हमें वह सब याद आने लगता है जो जीवन की तमाम दुश्वारियों एवं आपाधापी के बावजूद हमारे ज़हन में अपने होने की कोई ना कोई अमिट छाप छोड़ चुका है। इसमें यायावरी के चलते घुमंतू किस्से..पुराने स्कूल-कॉलेज या बचपन के दिन भी हो सकते हैं। एक तरफ़ जहाँ आम इनसान उन्हें याद कर बस मुस्कुरा भर लेता है तो वहीं दूसरी तरफ़ कोई हम जैसा लिखने-पढ़ने का शौक़ीन उन्हें कलमबद्ध कर हमेशा हमेशा के दस्तावेजी सबूत के रूप में एक जगह इकट्ठा कर लेता है यानी के किताब के रूप में छपवा लेता है। ऐसे ही कुछ अविस्मरणीय पलों..यात्राओं और प्रकृति प्रेम से जुड़ी बातों..यादों का पिटारा ले कर हमारे बीच लेखिका/व्यंग्यकार समीक्षा तैलंग अपने संस्मरणों के संकलन 'कबूतर का कैटवॉक'  के ज़रिए हमारे बीच आयी हैं।

उनके इस संकलन में उनके अबुधाबी के प्रवास के दौरान हर शुक्रवार याने के छुट्टी के दिनों की समुद्र किनारे उनकी बैठकी का विवरण मिलता है। जिसके ज़रिए आसानी से पता चलता है कि वे किस कदर बढ़िया पारखी नज़र की स्वामिनी हैं। इस संकलन के ज़रिए उनके प्रकृति प्रेम एवं मूक जानवरों..पक्षियों..पेड़-पौधों से उनके लगाव और उनकी विलुप्त होती जनसंख्या के प्रति चिंता झलकती है।

इस संकलन में लेखिका कहीं पेड़-पौधों..पक्षियों से इस तरह बातें करती हुई प्रतीत होती हैं मानों सालों के तजुर्बे और अपनी निश्छलता की वजह से वे उनकी भाषा..उनकी बोली समझने लगे गयी हों।
उनके संस्मरणों में कहीं अबुधाबी के साफ़ सुथरे..उजले धवल समुद्र तट नज़र आतें हैं तो कहीं अंतर्मन के ज़रिए लेखिका समुद्र के नीचे की रेत और रंग बिरंगे शैवालों से होते हुए भीतर बहुत भीतर तक की यात्रा करती नज़र आती है।

कहीं इसमें अबुधाबी के सबसे पुराने थिएटर और वहाँ होने वाले संगीत कार्यक्रमों और नाटकों का जिक्र आता है। तो कहीं इसमें वहाँ की सेहतमंद बिल्लियों की बातें दिखाई पड़ती हैं। इसी संकलन में कहीं वहाँ के कड़क कानूनों और अनुशासनप्रिय नागरिकों की बात नज़र आती है तो कहीं अबुधाबी में रहने वाले स्थानीयों एवं विदेशियों में भारतीय खाने के प्रति दीवानगी का वर्णन नज़र आता है। वैसे ये और बात है कि आमतौर पर उन्हें रोटी को प्लेट के बजाय हाथ से ही एक एक बाइट ले कर कुतरते तथा सीधे कढ़ाही से ही सब्ज़ी खाते हुए देखा जा सकता है।

 इस संकलन में कहीं वहाँ के सैण्ड ड्यूंस(रेगिस्तान) में फोर व्हीलर बाइक्स और जीप सफ़ारी होती दिखाई देती है तो कहीं शारजाह से अजमान, फ़ुजैरह के सफ़र के दौरान सड़क किनारे उम्दा ईरानी एवं टर्किश कालीनों से सजी दुकाने नज़र आती हैं। कहीं पौधों की नर्सरी पर पौधों को खरीदने को आतुर भीड़, मेले की भीड़ जैसी नज़र आती है तो कहीं किसी खास इलाके में सख्त कानून होने की वजह से मोबाइल द्वारा ली गयी फोटोज़ एवं सेल्फियों को पुलिस अफ़सरों द्वारा डिलीट करवा दिया जाता हैं। 

कहीं वहाँ के पैट्रोल स्टेशनों पर बने फ़ूड कोर्ट और शॉपिंग स्टोर्स की बात नज़र आती है जिनमें 'चाय' का आर्डर देने पर देसी चाय पेश की जाती है और 'टी' का आर्डर देने पर चाय की विभिन्न वैरायटियों मसलन..'इंग्लिश, हर्बल, 'अरेबिक टी' या किसी भी अन्य प्रकार की चाय के बारे में पूछा जाता है। 

उनके नज़रिए से समुद्री यात्रा के दौरान कहीं कुदरती अजूबे के रूप में बीच समुद्र के बीचों बीच समतल ज़मीन और पहाड़ का टुकड़ा दिखाई देता है। तो कहीं समुद्र का पानी वक्त..जगह और मौसम के हिसाब से रंग बदलता दिखाई देता है। कहीं इसमें किनारे बैठ समुद्री नज़ारों का आनंद लेते लोग दिखाई देते हैं तो कहीं हर्षित मन और उल्लास के बीच बदन झुलसाती गर्मी  में समुद्री पानी में डुबकी लगा..उधम मचाते सैलानी दिखाई देते हैं।

कहीं इसमें धाऊ(क्रूज़) की मनमोहक यात्रा के ज़रिए बेहतरीन समुद्री नज़ारों का वर्णन देखने को मिलता तो कहीं अबुधाबी घूमने गए भारतीय सैलनियों का बॉलीवुद के प्रति अगाध प्रेम दृष्टिगत होता है। कहीं  इसमें सैलानियों के, देश बदला..भेस बदला की तर्ज पर, कपड़े छोटे होते चले जाते हैं। तो कहीं इसमें अबुधाबी की कृत्रिम बारिश याने के क्लाउड सीडिंग की बात आती है। 

कहीं इसमें वहाँ की बड़ी बड़ी बिल्डिंगों की हर तीन महीनों में शैंपू सरीखे मैटीरियल से चमकाने की बात आती है तो कहीं इसमें अबुधाबी के मौसम बिगड़ने पर घर से बाहर ना निकलने की ताकीद करते हुए मोबाइल मैसेजेस और घनघना कर बजते अलार्मों का जिक्र होता दिखाई देता है।

कहीं इस संकलन में वहाँ की मक्खन जैसी मुलायम सड़कों पर फ़र्राटे भरती लग्ज़री गाड़ियाँ दौड़ती दिखाई देती हैं तो कहीं इसमें राजनीति और चुनावों जैसी बातों से कोसों दूर रह, सड़कें अपनी मौज में बनती.. संवरती नज़र आती हैं। कहीं हमारे यहाँ के प्रदूषण और शोरशराबे से आज़िज़ आ..विलुप्त हो चुकी गौरैया वहाँ..अबुधाबी में मस्ती से बेफिक्र हो..दाना चुगती नज़र आती है तो कहीं छोटे बड़े..सब के सब स्विमिंग और फिशिंग का आनंद लेते नज़र आते हैं। 

इसी संकलन में कहीं कबूतरों की मस्तानी चाल,..रूप रंग और भावभंगिमा समेत उनकी गर्दन पर अनेक खूबसूरत रंगों का मनमोहक वर्णन नज़र आता है तो कहीं पार्क में खेलते छोटे बच्चों के साथ उन्हीं के दादा नानी सब उनका ध्यान रखते नज़र आते हैं। कहीं इस संग्रह में लेखिका के भीतर का व्यंग्यकार जाग्रत हो.. दिन पर दिन बढ़ते कंक्रीट के जंगलों पर चिंता जताता दिखाई देता है तो कहीं हज़ारों लाखों कटते पेड़ों के मद्देनज़र इनसान की ज़मीन लोलुपता पर कटाक्ष होता नज़र आता। 

कहीं इसमें कौवों, कबूतरों..गौरैयाओं आदि के अलग अलग झुण्डों में इकट्ठे हो बैठने से उत्पन्न होने वाली सुगबुगाहट की तुलना सरकार गिराने और बचाने की प्रक्रिया के दौरान सत्तापक्ष और विपक्षी दलों के अलग अलग धड़ों की होने वाली आपसी खुसफुसाहट से होती नज़र आती है। तो कहीं अमीरों के महँगे शौक 'बंजी जंपिंग' और गरीब मज़दूरों के पैर बाँध कर ऊँची बिल्डिंगों से लटकते हुए पलस्तर करने की प्रक्रिया के बीच आपस में तुलना पढ़ने में आती है। 

इसी संकलन में कहीं किसी संस्मरण में लेखिका अपने घर औचक पधारे अल्प आयु के जैन मुनि और उनके कठोर अनुशासन की बात करती हैं तो अपने किसी अन्य संस्मरण में अपने घर परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिल कर त्योहार मनाने की परंपरा की बात करती हैं।

प्रकृति प्रेम और घुमक्कड़ी की बातों से भरी इस किताब में कुछ जगहों पर वर्तनी की छोटी छोटी त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना होना थोड़ा खला। इसके अतिरिक्त पेज नंबर 61 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'पिछले हफ्ते से लेकर आज सुबह तक के अखबारों में एयरपोर्ट की अटाटूट भीड़ का जिक्र था जो हमें  पूरे एयरपोर्ट पर कहीं मिली ही नहीं।'

यहाँ 'अटाटूट' के बजाय 'अटूट' आना चाहिए।

हालांकि यह किताब मुझे उपहारस्वरूप मिली लेकिन अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूंगा कि 127 पृष्ठीय इस संकलन के पेपरबैक संस्करण को छापा है भावना प्रकाशन ने और इसका मूल्य 200 रुपए रखा गया है। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को बहुत बहुत बधाई।

गांधी चौक- डॉ. आनंद कश्यप

किसी भी देश की व्यवस्था..अर्थव्यस्था एवं शासन को सुचारू रूप से चलाने में एक तरफ़ जहाँ सरकार की भूमिका बड़ी ही विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण होती है। अब ये और बात है कि वह भूमिका आमतौर पर थोड़ी विवादित एवं ज़्यादातर निंदनीय होती है। वहीं दूसरी तरफ़ सरकार की इच्छानुसार तय की गयी सही/ग़लत योजनाओं..परियोजनाओं और कानूनों का खाका बनाने..संवारने और उन्हें अमली जामा पहनाने में उच्च पदों पर आसीन नौकरशाहों का बहुत बड़ा हाथ होता है। 

इस तरह की उच्च पदों वाली महत्त्वपूर्ण सरकारी नौकरियों के प्रति देश के पढ़े लिखे नौजवानों में एक अतिरिक्त आकर्षण रहता है जो कि पद की गरिमा एवं महत्ता को देखते हुए स्वाभाविक रूप से जायज़ भी है।  साथ ही सोने पे सुहागा ये कि उन्हें गाड़ी..बंगला..सलाम ठोंकने एवं मातहती की क्षुद्धापूर्ति हेतु अनेकों नौकर चाकर भी बिना खर्चे के..बिन मांगें मुफ़्त ही मिल जाते हैं। 

अब जिस नौकरी के साथ इतने मन लुभावने आकर्षण एवं ख्वाब जुड़े होंगे तो स्वाभाविक ही है कि उस क्षेत्र में कोशिश करने वाले अभ्यर्थियों के बीच प्रतियोगिता भी उसके हिसाब से ही तगड़ी याने के अत्यधिक कठिन होगी। वजह इस सब के पीछे बस यही कि अफसरशाही से भरे इस दौर में नौकरशाहों का बोलबाला है। सब उन्हीं को..उनकी बड़ी कुर्सी को सलाम ठोंकते..उसी के आगे पीछे घूमते और उसी के आगे अपने शीश नवाते हैं। 

दोस्तों..आज सिविल परीक्षा और उससे जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं डॉ. आनंद कश्यप के द्वारा इसी विषय पर लिखे गए उनके उपन्यास 'गांधी चौक' की बात करने जा रहा हूँ। इस उपन्यास में कहानी है मध्यप्रदेश के विभाजन से बने छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर में स्थित एजुकेशन हब याने के गाँधी चौक इलाके में बने कोचिंग सेंटर्स एवं बतौर पी.जी आसपास के इलाके में दिए जाने वाले खोखेनुमा दड़बों की।

छत्तीसगढ़ राज्य की पृष्ठभूमि पर पनपती इस गाथा में कहीं कोई विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष कर शनै शनै मंथर गति से आगे बढ़ रहा है। तो कहीं कोई जंग जीतने के बावजूद भी निराशा और तनाव की वजह से अवसाद में आ..जीती हुई बाज़ी भी अनजाने में हार बैठता है। 

इस उपन्यास में एक तरफ़ कहानी है गरीबी समेत अनेक दुश्वारियों..दिक्कतों एवं परेशानियों से जूझते सैकड़ों..हज़ारों युवाओं के पनपते..फलीभूत होते सपनों की। इसमें बातें हैं तमाम तरह की मेहनत और कष्ट झेल आगे बढ़ने का प्रयास करते युवाओं के नित ध्वस्त होते सपनों एवं धराशायी होती उनकी उच्च महत्त्वाकांक्षाओं की। इसमें कहानी है हताशा से जूझने..लड़ने और हारने के बावजूद नयी राह..नयी मंज़िल तलाश खुद में नयी आभा..नयी ऊर्जा..नयी संभावनाएं खोजने एवं उन्हें तराश कर फिर से उठ खड़े होने वालों की। 

इस उपन्यास में कहीं कॉलेज की मस्तियाँ.. चुहलबाज़िययां..नोकझोंक एवं झड़प दिखाई देती है। तो कहीं कोई मूक प्रेम में तड़पता खुद को किसी के एक इशारे में बदल डालने को आतुर दिखाई देता है। इसमें कहीं कोई पद की गरिमा को भूल अहंकार में डूबा दिखाई देता तो कहीं कोई किसी के एक इशारे..एक आग्रह को ही सर्वोपरि मान खुद को न्योछावर करता दिखाई देता है।

कहीं इसमें मज़ेदार ढंग से शराबियों की विभिन्न श्रेणियों का संक्षिप्त वर्णन दिखाई देता है तो कहीं
सरकारी अस्पतालों में फैली अव्यवस्था और उनकी दुर्दशा की बात दिखाई देती है। इस उपन्यास में कहीं हल्के व्यंग्य की सुगबुगाहट चेहरे पर मुस्कान ले आती है। तो कहीं इसमें बतौर कटाक्ष, भारतीय रेलों के कम देरी से पहुँचने पर इसे एक उपलब्धि के रूप में लिया जाता दिखाई देता है। कहीं इसमें दबंगई के दम पर दूसरे की दुकान/मकान पर जबरन कब्ज़े होता दिखाई देता है। तो कहीं हल्के फुल्के अंदाज़ में पंडित जी की बढ़ी तोंद से उनकी फुल टाइम पंडिताई का अंदाज़ा लगाया जाता दिखाई देता है।

कहीं बेरोज़गारी के चलते छोटे भाई से घर के बाकी सदस्यों की बेरुखी नज़र आती है। तो कहीं मरे व्यक्ति की जेबें टटोलते..गहने उतारते नज़दीकी रिश्तेदार दिखाई देते हैं।

इस उपन्यास को पढ़ते वक्त एक जगह चाय वाले को एक चाय के पैसे ना देने पर चाय वाले समेत भीड़ का किसी को पीट देना थोड़ा नाटकीय लगा। तो वहीं पेज नंबर 106 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'अशवनी स्टेशन से चलकर अपने गाँव की ओर जाने वाली बस में बैठ गया। बस पगडंडियों से होकर गुजर रही थी।'

यहाँ यह गौरतलब बात है कि पगडंडी से पैदल गुज़रा जाता है ना कि उनसे बस।

उपन्यास में कहीं कहीं लेखक एक ही पैराग्राफ में कभी वर्तमान में तो भूतकाल में 'था' और 'है' शब्द के उपयोग से जाता दिखा। भाषा भी कहीं कहीं औपचारिक होने के नाते थोड़ी उबाऊ भी प्रतीत हुई। जिसे सरस वाक्यों एवं गंगाजमुनी भाषा के माध्यम से रोचक बनाया जा सकता था। साथ ही कहानी कभी सूत्रधार याने के लेखक के माध्यम से आगे बढ़ती दिखी तो कभी अपने पात्रों के माध्यम से। बेहतर होता कि शुरुआत में कहानी के सूत्रधार के माध्यम से शुरू करने के बाद पूरी कहानी को अगर पात्रों की ज़ुबानी ही बताया जाता। 

उपन्यास में कुछ जगहों पर छत्तीसगढ़ी भाषा में संवाद आए हैं। उनका सरल हिंदी अनुवाद भी अगर साथ में दिया जाता तो बेहतर था। कुछ जगहों पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना किया जाना..थोड़ा खला। उपन्यास में अनेक जगह ऐसे छोटे-छोटे कनेक्टिंग वाक्य दिखाई दिए जिन्हें आसानी से आपस में जोड़ कर एक प्रभावी एवं असरदार वाक्य बनाया जा सकता था। 

इस 200 पृष्ठीय उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है हिन्दयुग्म ब्लू ने और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए जो कि जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

अक्षरों की मेरी दुनिया - विपिन पवार

समाज में अपटुडेट रहने के लिए ज़रूरी है कि हमें देश दुनिया की हर अहम ख़बर या ज़रूरी बात की सही एवं सटीक जानकारी हो। मगर बहुधा यह जानकारी थोड़ी नीरस और उबाऊ प्रवृति की होती है। जिसकी वजह से वह जानकारी या अहम बात आम जनमानस पर अपना समुचित प्रभाव नहीं छोड़ पाती। मगर वही जानकारी अगर रोचक एवं आसान शब्दों में हमारी जिज्ञासा को संतुष्टि के मुकाम पर ले जाए तो हम खुद ही और अधिक जानने..समझने के लिए प्रेरित होते हैं। 

दोस्तों..आज इस तरह की जानकारी भरी बातें इसलिए कि आज मैं आपके सामने ऐसी ही रोचक एवं ज़रूरी जानकारी से लैस किताब 'अक्षरों की मेरी दुनिया' की बात कर रहा हूँ। जिसके लेखक विपिन पवार हैं। इस किताब में एक तरह से उन्होंने अपने संस्मरणों..अपने अनुभवों एवं अपनी घुमक्कड़ी के किस्सों को निबंध के रूप में एक जगह एकत्र किया है।

रेल मंत्रालय में बतौर निदेशक(राजभाषा) कार्यरत विपिन पवार जी की इस किताब के ज़रिए पता चलता है कि उन्हें अध्यन एवं पठन पाठन का काफ़ी शौक है। किताब के लिए लिखे गए लेखों के अंत में दिए गए संदर्भ स्रोतों के ज़रिए भी इस बात की तस्दीक एवं पुष्टि होती है। 

 इस किताब में बातें हैं 1865 में जन्मी उस आनंदी बाई जोशी की जिसे भारत की पहली महिला डॉक्टर होने का खिताब प्राप्त है।  जिन्हें घर..समाज और रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद उनके अनुशासनप्रिय मगर गुस्सैल पति ने पढ़ने के लिए अमेरिका भेजा। वहाँ जा कर उन्होंने डॉक्टर की डिग्री हासिल तो कर ली मगर अफ़सोसजनक बात ये है कि मानवता की सेवा करने से पहले ही 21 साल की छोटी उम्र में ही आनंदी बाई की मृत्यु हो गयी थी क्योंकि बीमार पड़ने पर भारत के डॉक्टरों ने उनका इलाज महज़ इसलिए नहीं किया कि उन्होंने परदेस जा कर पढ़ने की जुर्रत की और अंग्रेज डॉक्टरों ने इसलिए उनका इलाज नहीं किया कि उन्होंने हिंदू धर्म छोड़ ईसाई धर्म को अपनाने से इनकार कर दिया था।

इसमें बातें है बाघों के सरंक्षण के लिए मशहूर महाराष्ट्र के सबसे पुराने एवं बड़े ताडोबा नैशनल पार्क की खूबसूरती एवं विशेषताओं की। इसमें बातें हैं सरकारी दफ़्तरों में राजभाषा हिंदी के प्रचार..प्रसार एवं इस्तेमाल में आने वाली बाधाओं..समस्याओं और उनके समाधान की। 

 इस किताब में बातें हैं बुक बाइंडिंग करने एवं अखबारें बेचने वाले पुणे के 103 वर्षीय विश्वप्रसिद्ध युवा गोखले बुवा और मैराथन दौड़ सहित अनेक अन्य क्षेत्रों में उनके बनाए एक से बढ़ कर एक कीर्तिमानों की। इसमें बातें हैं पुराने किलों..सहकर्मियों..और मुक्तिबोध की कविताओं की। इस संकलन में बातें हैं छत्रपति शिवाजी महाराज के जासूस 'बहिर्जी नाइक' और उनके गुप्तचरों के सामूहिक कौशल एवं अद्वितीय प्रयासों की। जिनकी कार्य कुशलता एवं सटीकता की वजह से शिवाजी महाराज को दुश्मन से होने वाली मुठभेड़ से पहले ही उसकी सेना..युद्धकौशल..लड़ने की क्षमता एवं कमज़ोरियों की पूरी जानकारी मिल जाती थी।
 
इस किताब में बातें हैं सम्मोहक समुद्र तटों..जंगलों और खेत खलियानों की। इसमें बातें हैं पहाड़ों की ऊंचाइयों और समुद्र की गहराई में अटखेलियाँ करते पर्यटकों से भरे महाराष्ट्र के देखे..अनदेखे पर्यटनस्थलों की। इस संकलन में बातें हैं मुंबई की गगनचुंबी इमारतों और वहाँ की प्राचीन गुफाओं एवं प्राचीरों की। इसमें बातें हैं कंप्यूटर को आसान बनाते कीबोर्ड शॉर्टकटों के साथ साथ लेखक के लिखे संपादकीयों की। इसमें बातें हैं इंद्रायणी नदी और हाथरस की खासियतों की। 

कुछ जगहों पर या जहाँ कहीं भी किताब में आँकड़ों की बात आती थी तो आम पाठक के नज़रिए से मेरे ज़हन में ये अहम सवाल उठ खड़ा हुआ  कि..ये सब आँकड़े मेरे या किसी भी आम अन्य पाठक के भला किस काम के? क्या किताब को छपवाने का लेखक का तात्पर्य या मंतव्य महज़ अपने अब तक के लिखे गए लेखों के मात्र दस्तावेजीकरण ही है?

कुछ जगहों पर वर्तनी की छोटी छोटी त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना होना थोड़ा खला। इसके अतिरिक्त पेज नंबर 49 पर लिखा दिखाई दिया कि...

'मुंबई के उपनगर कल्याण में उन्होंने फ्लैट खरीदा उस समय का मनोरंजन वाक्य याद आता है।'

यहाँ 'मनोरंजन' के बजाय 'मनोरंजक' आना चाहिए था।

कंप्यूटर संबंधी जानकारी से जुड़े एक अध्याय में Shift+Delete ऑप्शन को दो अलग अलग पेज 85 और 86 में दे दिया गया है।

उम्दा कागज़ पर छपी इस 111 पृष्ठीय किताब के हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है प्रलेक प्रकाशन, मुंबई ने और इसका मूल्य रखा गया है 300/- रुपए। जो कि आम पाठकीय नज़रिए से ज़्यादा है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

#समीक्षा #राजीव_तनेजा #प्रलेक_प्रकाशन #विपिन_पवार

चोरों की बारात- सुरेन्द्र मोहन पाठक

अगर आप परदेस के किसी होटल में बंद कमरे के भीतर बेसुध हो कर रात में सो रहे हों और अचानक नींद टूटने पर आप पलंग से उठें और आपको पता चले कि आपके पैरों के नीचे समतल ज़मीन नहीं बल्कि एक लाश है। तो मेरे ख्याल से आप खुद ही समझ सकते हैं कि उस वक्त ज़हनी तौर पर आपकी दिमाग़ी हालत कैसी होगी? 

दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक के एक रौंगटे खड़े कर देने वाले तेज़ रफ़्तार उपन्यास 'चोरों की बारात' की। उपन्यास पर आगे बढ़ने से पहले सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के थ्रिलर उपन्यासों के बारे में एक ज़रूरी बात कि उनके पुराने उपन्यासों के प्रति लोगों में इतनी दीवानगी अब भी है कि लोग उन्हें, उन पर छपे मूल्य से भी कहीं अधिक दे कर खरीदने..संजोने को आतुर रहते हैं। वैसे दाव लगे की बात ये है कि इस उपन्यास को मैंने शायद दिल्ली के दरियागंज वाले पुरानी किताबों के बाज़ार से 50/- या 60/- रुपए का खरीदा था। फेसबुक और व्हाट्सएप पर पुराने उपन्यासों के कुछ ग्रुप चल रहे हैं। वहाँ से यह उम्दा उपन्यास आपको जायज़ कीमत पर भी मिल सकता है। वैसे.. जानकारी के लिए बता दूँ कि अमेज़न पर तीन अन्य उपन्यासों के साथ यह उपन्यास 3999/- रुपए में बेचा जा रहा है। 
 
इस समीक्षा के शुरुआती पैराग्राफ़ से ही आप आसानी से समझ सकते हैं कि जिस उपन्यास का आगाज़ ही ऐसा है तो उसका अंजाम कैसा सनसनीखेज.. रोमांचक.. रौंगटे खड़े कर देने वाला होगा? 

चलिए..अब ज़्यादा बातें ना करते हुए फिर से इस रोचक उपन्यास की कहानी पर आते हैं।
बंद कमरे में लाश मिलने के तुरंत बाद उस कमरे में रुके सुधीर कोहली पर जानलेवा हमला कर उसे बेहोश कर दिया जाता है। सुधीर कोहली, जो कि दरअसल भारत का एक प्राइवेट जासूस है और अपने क्लाइंट की घर से भागी नाबालिग बेटी को, थाइलैंड से बरामद कर लेने के बाद उसे, उसके पिता को सुरक्षित सौंपने के इरादे से नेपाल के उस होटल में रुका हुआ है। 

बीती रात सुधीर पर हमला करने वाला कौन था? क्या इस कत्ल और हमले के पीछे 'कृष' याने के मीरा के ज़माने की उस दुर्लभ कृष्ण मूर्ति की चोरी की घटना का हाथ था जो  कि अपनी खासियतों की वजह से दुनिया में सिर्फ़ एक इकलौती और बेशकीमती है। सिंगापुर से चोरी हुई उस बेशकीमती मूर्ति को वापिस पाने के लिए एक तरफ़ जहाँ उसका मालिक चीनी माफ़िया की मदद लेता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ मूर्ति को ढूँढने..वापिस पाने और हथियाने के चक्कर में लगातार होते खूनखराबे और साजिश से लैस इस बेहद रोमांचक उपन्यास में मूर्ति के बदले करोड़ों की रकम ऑफर करने वाला मिस्टर लोबो आख़िर कौन हैं? क्या जान के दुश्मन बन चुके चीनी माफ़िया और मिस्टर लोबो के गुर्गों से सुधीर कोहली खुद को बचा पाएगा। या तीन तीन कत्लों के जुर्म में सुधीर की पूरी ज़िंदगी बतौर मुजरिम नेपाल की जेलों में बीतेगी?

इन सब रहस्यों को जानने के लिए तो आपको कदम कदम पर चौंकाते इस बेहद ही उम्दा उपन्यास को शुरू से अंत तक..पूरा पढ़ना होगा। 286 पेज के इस 2012 में छपे बढ़िया उपन्यास को छापा है राजा पॉकेट बुक्स ने और इस पर उस समय का मूल्य 80/- रुपए अंकित है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

#समीक्षा #राजीव_तनेजा #सुरेन्द्र_मोहन_पाठक

बम बम भोले- विनोद पाण्डेय

व्यंग्य लेखन एक तरह से तेल से तरबतर सड़क पर नपे तुले अंदाज़ में संभली..संतुलित एवं सधी हुई गति से गाड़ी चलाने के समान है। ज़्यादा तेज़ हुए तो रपटे..फिसले और धड़ाम। ज़्यादा धीमे हुए तो वहीं खड़े खड़े रपटते..लटपटाते हुए फिर से धड़ाम। 

दोस्तों...आज व्यंग्य की बातें इसलिए कि आज मैं बात करने जा रहा हूँ कवि /व्यंग्यकार विनोद पाण्डेय जी के व्यंग्य संग्रह 'बम बम भोले' और उसमें छपे उनके व्यंग्यों की। इनके  व्यंग्यों को पढ़ कर हम आसानी से जान सकते हैं कि लेखक अपने आसपास के माहौल और ताज़ातरीन ख़बरों को समझने...जांचने और उनमें से अपने मतलब की माल निकाल लेने में माहिर एवं मंजे हुए खिलाड़ी हैं। उनकी व्यंग्य रचनाओं में कहीं किस्सागोई शैली की झलक मिलती है तो कहीं बतकही के रूप में इतनी सहजता से वे अपनी...अपने मन की बात कह जाते हैं कि बरबस ही पढ़ने वाले के चेहरे पर एक महीन सी मुस्कराहट तैर जाती है| 

इस संकलन के किसी व्यंग्य में रावण , बीमार पड़ने की वजह से रामलीला को एन बीच मंझधार में छोड़ ग़ैरहाज़िर होता नज़र आता है। इससे उपजी परिस्थितियों में एक तरफ़ रामलीला में मची अफरातफरी है तो दूसरी तरफ़ उसके चंदे में होने वाले घोटालों का जिक्र है। इसी संकलन के एक अन्य व्यंग्य में चेपू टाइप के साहित्यकारों पर गहरा कटाक्ष नज़र आता है कि किस तरह खुद को महान साबित करने के लिए वे क्या क्या जतन करते हैं।

इसी संकलन के किसी व्यंग्य में कहीं वैलेंटाइन की भेड़चाल में छोटा बड़ा..हर कोई फँसा नज़र आता है। तो कहीं किसी अन्य व्यंग्य में देवता समान अतिथि का आतिथ्य भूल..उसे घर के बाहर आवारा कुत्ते के संग सुलाया जा रहा है। कहीं किसी व्यंग्य में आपाधापी भरी आजकल की व्यस्त ज़िन्दगी के मद्देनज़र काम और मौज के बीच वर्क लाइफ बैलेंस के बहाने संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।

कहीं किसी व्यंग्य में टीवी और उसके टी आर पी के खेल का झोलझाल नज़र आता है तो किसी अन्य व्यंग्य में मंगल ग्रह पर पानी की उपलब्धता सुर्खियाँ बटोरती नज़र आती है। किसी अन्य व्यंग्य में आजकल के तथाकथित पत्रकारों और उनकी पत्रकारिता की बात नज़र आती है। तो कहीं कहीं किसी व्यंग्य में चुनावों के दौरान विरोधियों का सूपड़ा साफ़ करने का मंसूबा बाँधा जा रहा है। कहीं किसी रचना में लेखक फेयर एंड लवली कम्पनी के गुण गाता दिखा तो किसी अन्य व्यंग्य में सेब की महिमा का बखान करता भी दिखा।

कहीं कंजूसी और शातिरपने की पराकाष्ठा के रूप में किसी व्यंग्य में प्लेटफार्म पर समोसे तथा ट्रेन में सूप बिकता दिखा। तो कहीं सदाबहार जींस और उसके दिन प्रतिदिन फटते फैशन सेंस की बात होती दिखाई देती है। इसी संकलन में कहीं शेरों और बाघों की विलुप्त होती प्रजाति पर चिंता जताई जाती दिखाई देती है। तो किसी अन्य व्यंग्य के माध्यम से लोकतंत्र में तमाम तरह की उठापटक के माध्यम से चुनावी दंगल में विरोधियों का सूपड़ा साफ़ होता दिखता है।

इस बात की तारीफ़ करनी होगी कि अपनी तरफ़ से लेखक उस भेड़चाल से भरसक बचता दिखाई दिया जिसके अंतर्गत किसी की खिंचाई या बात में से बात निकाल..उसे शब्दों में पिरोने के हुनर को ही मात्र व्यंग्य मान पाठकों के समक्ष परोस दिया जाता है। 

लेखक विनोद पाण्डेय के शहरों..कस्बों और शहरीकृत गांवों के किरदारों को ले कर मज़ेदार..आसान भाषा में रचे गए इस संकलन के व्यंग्य गहरी चोट या टीस देने के बजाय हलकी सी गुदगुदी या मुस्कुराहट बस पाठकों को दे संतोष कर लेते हैं। कुछ व्यंग्य मंच पर हास्यात्मक भाषण या मूल रचना पाठ से पहले की..मौसम या मूड बनाने की प्रक्रिया जैसी भूमिका बनाते अधिक लगे। बतौर सजग पाठक एवं एक लेखक/व्यंग्यकार होने के नाते मुझे इस संकलन के व्यंग्य आम औसत व्यंग्य से लगभग दुगने बड़े और खिंचे हुए भी लगे। जिस पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है।

कुछ एक जगहों पर छोटी छोटी वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त कुछ एक ऐसे व्यंग्य लेख भी दिखे जिनमें बस नाम मात्र को व्यंग्य या फिर कहीं कहीं तो वह भी नदारद दिखा। साथ ही कुछ व्यंग्यों को पढ़ते वक्त महसूस हुआ कि उनमें मामूली फेर बदल कर के उनके एक के बजाय दो व्यंग्य आसानी से बन सकते थे। किसी किसी व्यंग्य में तो व्यंग्य के शीर्षक तक पहुँचने में ही एक से डेढ़ पेज तक खर्च कर दिया गया। इन्हें एक तरह से व्यंग्य कम और संस्मरण टाइप बतकही जो सुनने में बढ़िया लगती है, कहा जाए तो बेहतर होगा। 

*पेज नम्बर 71 के एक व्यंग्य में लेखक दोनों हाथों में ब्रीफकेस ले, रेलगाड़ी में चढ़ते वक्त अपनी ही बात को काटता दिखाई दिया। इसमें वे लिखते हैं कि...

'ऊपर से ठंड में पसीना ऐसे निकल रहा था जैसे अभी अभी गंगा स्नान करके निकले हैं।'

इसकी अगली ही पंक्ति के बीच में लिखा दिखाई दिया कि..

'घर से लेकर ऑफिस तक एसी में पसीना का भी कई दिन से दम घुट रहा था।'

अब अगर ठंड का मौसम है तो दफ़्तर में ए.सी नहीं चलने चाहिए या फिर ठंड के बजाय मौसम गर्मी का है।

इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि..लंबे और एकरसता से भरे व्यंग्य/लेख को पाठक गंभीरता से पढ़ने के बजाय उन पर सरसरी नज़र दौड़ाता हुआ आगे बढ़ने की सोचता है, लेखक को चाहिए कि वे अपने व्यंग्यों की लंबाई कम करने के साथ साथ उन्हें और अधिक मारक..क्रिस्प और तीखाबनाने का प्रयास करें।

आकर्षक कवर डिज़ायन और बढ़िया पेज पर छपा यह व्यंग्य संकलन हालांकि मुझे उपहार स्वरूप मिला। मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इस 108 पृष्ठीय व्यंग्य संग्रह के पेपरबैक संस्करण को छापा है सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

 
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