कबूतर का कैटवॉक- समीक्षा तैलंग

आमतौर पर यादों के गलियारे से जब भी हमें कभी गुज़रने का मौका मिलता है तो अनायास ही हमें वह सब याद आने लगता है जो जीवन की तमाम दुश्वारियों एवं आपाधापी के बावजूद हमारे ज़हन में अपने होने की कोई ना कोई अमिट छाप छोड़ चुका है। इसमें यायावरी के चलते घुमंतू किस्से..पुराने स्कूल-कॉलेज या बचपन के दिन भी हो सकते हैं। एक तरफ़ जहाँ आम इनसान उन्हें याद कर बस मुस्कुरा भर लेता है तो वहीं दूसरी तरफ़ कोई हम जैसा लिखने-पढ़ने का शौक़ीन उन्हें कलमबद्ध कर हमेशा हमेशा के दस्तावेजी सबूत के रूप में एक जगह इकट्ठा कर लेता है यानी के किताब के रूप में छपवा लेता है। ऐसे ही कुछ अविस्मरणीय पलों..यात्राओं और प्रकृति प्रेम से जुड़ी बातों..यादों का पिटारा ले कर हमारे बीच लेखिका/व्यंग्यकार समीक्षा तैलंग अपने संस्मरणों के संकलन 'कबूतर का कैटवॉक'  के ज़रिए हमारे बीच आयी हैं।

उनके इस संकलन में उनके अबुधाबी के प्रवास के दौरान हर शुक्रवार याने के छुट्टी के दिनों की समुद्र किनारे उनकी बैठकी का विवरण मिलता है। जिसके ज़रिए आसानी से पता चलता है कि वे किस कदर बढ़िया पारखी नज़र की स्वामिनी हैं। इस संकलन के ज़रिए उनके प्रकृति प्रेम एवं मूक जानवरों..पक्षियों..पेड़-पौधों से उनके लगाव और उनकी विलुप्त होती जनसंख्या के प्रति चिंता झलकती है।

इस संकलन में लेखिका कहीं पेड़-पौधों..पक्षियों से इस तरह बातें करती हुई प्रतीत होती हैं मानों सालों के तजुर्बे और अपनी निश्छलता की वजह से वे उनकी भाषा..उनकी बोली समझने लगे गयी हों।
उनके संस्मरणों में कहीं अबुधाबी के साफ़ सुथरे..उजले धवल समुद्र तट नज़र आतें हैं तो कहीं अंतर्मन के ज़रिए लेखिका समुद्र के नीचे की रेत और रंग बिरंगे शैवालों से होते हुए भीतर बहुत भीतर तक की यात्रा करती नज़र आती है।

कहीं इसमें अबुधाबी के सबसे पुराने थिएटर और वहाँ होने वाले संगीत कार्यक्रमों और नाटकों का जिक्र आता है। तो कहीं इसमें वहाँ की सेहतमंद बिल्लियों की बातें दिखाई पड़ती हैं। इसी संकलन में कहीं वहाँ के कड़क कानूनों और अनुशासनप्रिय नागरिकों की बात नज़र आती है तो कहीं अबुधाबी में रहने वाले स्थानीयों एवं विदेशियों में भारतीय खाने के प्रति दीवानगी का वर्णन नज़र आता है। वैसे ये और बात है कि आमतौर पर उन्हें रोटी को प्लेट के बजाय हाथ से ही एक एक बाइट ले कर कुतरते तथा सीधे कढ़ाही से ही सब्ज़ी खाते हुए देखा जा सकता है।

 इस संकलन में कहीं वहाँ के सैण्ड ड्यूंस(रेगिस्तान) में फोर व्हीलर बाइक्स और जीप सफ़ारी होती दिखाई देती है तो कहीं शारजाह से अजमान, फ़ुजैरह के सफ़र के दौरान सड़क किनारे उम्दा ईरानी एवं टर्किश कालीनों से सजी दुकाने नज़र आती हैं। कहीं पौधों की नर्सरी पर पौधों को खरीदने को आतुर भीड़, मेले की भीड़ जैसी नज़र आती है तो कहीं किसी खास इलाके में सख्त कानून होने की वजह से मोबाइल द्वारा ली गयी फोटोज़ एवं सेल्फियों को पुलिस अफ़सरों द्वारा डिलीट करवा दिया जाता हैं। 

कहीं वहाँ के पैट्रोल स्टेशनों पर बने फ़ूड कोर्ट और शॉपिंग स्टोर्स की बात नज़र आती है जिनमें 'चाय' का आर्डर देने पर देसी चाय पेश की जाती है और 'टी' का आर्डर देने पर चाय की विभिन्न वैरायटियों मसलन..'इंग्लिश, हर्बल, 'अरेबिक टी' या किसी भी अन्य प्रकार की चाय के बारे में पूछा जाता है। 

उनके नज़रिए से समुद्री यात्रा के दौरान कहीं कुदरती अजूबे के रूप में बीच समुद्र के बीचों बीच समतल ज़मीन और पहाड़ का टुकड़ा दिखाई देता है। तो कहीं समुद्र का पानी वक्त..जगह और मौसम के हिसाब से रंग बदलता दिखाई देता है। कहीं इसमें किनारे बैठ समुद्री नज़ारों का आनंद लेते लोग दिखाई देते हैं तो कहीं हर्षित मन और उल्लास के बीच बदन झुलसाती गर्मी  में समुद्री पानी में डुबकी लगा..उधम मचाते सैलानी दिखाई देते हैं।

कहीं इसमें धाऊ(क्रूज़) की मनमोहक यात्रा के ज़रिए बेहतरीन समुद्री नज़ारों का वर्णन देखने को मिलता तो कहीं अबुधाबी घूमने गए भारतीय सैलनियों का बॉलीवुद के प्रति अगाध प्रेम दृष्टिगत होता है। कहीं  इसमें सैलानियों के, देश बदला..भेस बदला की तर्ज पर, कपड़े छोटे होते चले जाते हैं। तो कहीं इसमें अबुधाबी की कृत्रिम बारिश याने के क्लाउड सीडिंग की बात आती है। 

कहीं इसमें वहाँ की बड़ी बड़ी बिल्डिंगों की हर तीन महीनों में शैंपू सरीखे मैटीरियल से चमकाने की बात आती है तो कहीं इसमें अबुधाबी के मौसम बिगड़ने पर घर से बाहर ना निकलने की ताकीद करते हुए मोबाइल मैसेजेस और घनघना कर बजते अलार्मों का जिक्र होता दिखाई देता है।

कहीं इस संकलन में वहाँ की मक्खन जैसी मुलायम सड़कों पर फ़र्राटे भरती लग्ज़री गाड़ियाँ दौड़ती दिखाई देती हैं तो कहीं इसमें राजनीति और चुनावों जैसी बातों से कोसों दूर रह, सड़कें अपनी मौज में बनती.. संवरती नज़र आती हैं। कहीं हमारे यहाँ के प्रदूषण और शोरशराबे से आज़िज़ आ..विलुप्त हो चुकी गौरैया वहाँ..अबुधाबी में मस्ती से बेफिक्र हो..दाना चुगती नज़र आती है तो कहीं छोटे बड़े..सब के सब स्विमिंग और फिशिंग का आनंद लेते नज़र आते हैं। 

इसी संकलन में कहीं कबूतरों की मस्तानी चाल,..रूप रंग और भावभंगिमा समेत उनकी गर्दन पर अनेक खूबसूरत रंगों का मनमोहक वर्णन नज़र आता है तो कहीं पार्क में खेलते छोटे बच्चों के साथ उन्हीं के दादा नानी सब उनका ध्यान रखते नज़र आते हैं। कहीं इस संग्रह में लेखिका के भीतर का व्यंग्यकार जाग्रत हो.. दिन पर दिन बढ़ते कंक्रीट के जंगलों पर चिंता जताता दिखाई देता है तो कहीं हज़ारों लाखों कटते पेड़ों के मद्देनज़र इनसान की ज़मीन लोलुपता पर कटाक्ष होता नज़र आता। 

कहीं इसमें कौवों, कबूतरों..गौरैयाओं आदि के अलग अलग झुण्डों में इकट्ठे हो बैठने से उत्पन्न होने वाली सुगबुगाहट की तुलना सरकार गिराने और बचाने की प्रक्रिया के दौरान सत्तापक्ष और विपक्षी दलों के अलग अलग धड़ों की होने वाली आपसी खुसफुसाहट से होती नज़र आती है। तो कहीं अमीरों के महँगे शौक 'बंजी जंपिंग' और गरीब मज़दूरों के पैर बाँध कर ऊँची बिल्डिंगों से लटकते हुए पलस्तर करने की प्रक्रिया के बीच आपस में तुलना पढ़ने में आती है। 

इसी संकलन में कहीं किसी संस्मरण में लेखिका अपने घर औचक पधारे अल्प आयु के जैन मुनि और उनके कठोर अनुशासन की बात करती हैं तो अपने किसी अन्य संस्मरण में अपने घर परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिल कर त्योहार मनाने की परंपरा की बात करती हैं।

प्रकृति प्रेम और घुमक्कड़ी की बातों से भरी इस किताब में कुछ जगहों पर वर्तनी की छोटी छोटी त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना होना थोड़ा खला। इसके अतिरिक्त पेज नंबर 61 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'पिछले हफ्ते से लेकर आज सुबह तक के अखबारों में एयरपोर्ट की अटाटूट भीड़ का जिक्र था जो हमें  पूरे एयरपोर्ट पर कहीं मिली ही नहीं।'

यहाँ 'अटाटूट' के बजाय 'अटूट' आना चाहिए।

हालांकि यह किताब मुझे उपहारस्वरूप मिली लेकिन अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूंगा कि 127 पृष्ठीय इस संकलन के पेपरबैक संस्करण को छापा है भावना प्रकाशन ने और इसका मूल्य 200 रुपए रखा गया है। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को बहुत बहुत बधाई।

गांधी चौक- डॉ. आनंद कश्यप

किसी भी देश की व्यवस्था..अर्थव्यस्था एवं शासन को सुचारू रूप से चलाने में एक तरफ़ जहाँ सरकार की भूमिका बड़ी ही विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण होती है। अब ये और बात है कि वह भूमिका आमतौर पर थोड़ी विवादित एवं ज़्यादातर निंदनीय होती है। वहीं दूसरी तरफ़ सरकार की इच्छानुसार तय की गयी सही/ग़लत योजनाओं..परियोजनाओं और कानूनों का खाका बनाने..संवारने और उन्हें अमली जामा पहनाने में उच्च पदों पर आसीन नौकरशाहों का बहुत बड़ा हाथ होता है। 

इस तरह की उच्च पदों वाली महत्त्वपूर्ण सरकारी नौकरियों के प्रति देश के पढ़े लिखे नौजवानों में एक अतिरिक्त आकर्षण रहता है जो कि पद की गरिमा एवं महत्ता को देखते हुए स्वाभाविक रूप से जायज़ भी है।  साथ ही सोने पे सुहागा ये कि उन्हें गाड़ी..बंगला..सलाम ठोंकने एवं मातहती की क्षुद्धापूर्ति हेतु अनेकों नौकर चाकर भी बिना खर्चे के..बिन मांगें मुफ़्त ही मिल जाते हैं। 

अब जिस नौकरी के साथ इतने मन लुभावने आकर्षण एवं ख्वाब जुड़े होंगे तो स्वाभाविक ही है कि उस क्षेत्र में कोशिश करने वाले अभ्यर्थियों के बीच प्रतियोगिता भी उसके हिसाब से ही तगड़ी याने के अत्यधिक कठिन होगी। वजह इस सब के पीछे बस यही कि अफसरशाही से भरे इस दौर में नौकरशाहों का बोलबाला है। सब उन्हीं को..उनकी बड़ी कुर्सी को सलाम ठोंकते..उसी के आगे पीछे घूमते और उसी के आगे अपने शीश नवाते हैं। 

दोस्तों..आज सिविल परीक्षा और उससे जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं डॉ. आनंद कश्यप के द्वारा इसी विषय पर लिखे गए उनके उपन्यास 'गांधी चौक' की बात करने जा रहा हूँ। इस उपन्यास में कहानी है मध्यप्रदेश के विभाजन से बने छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर में स्थित एजुकेशन हब याने के गाँधी चौक इलाके में बने कोचिंग सेंटर्स एवं बतौर पी.जी आसपास के इलाके में दिए जाने वाले खोखेनुमा दड़बों की।

छत्तीसगढ़ राज्य की पृष्ठभूमि पर पनपती इस गाथा में कहीं कोई विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष कर शनै शनै मंथर गति से आगे बढ़ रहा है। तो कहीं कोई जंग जीतने के बावजूद भी निराशा और तनाव की वजह से अवसाद में आ..जीती हुई बाज़ी भी अनजाने में हार बैठता है। 

इस उपन्यास में एक तरफ़ कहानी है गरीबी समेत अनेक दुश्वारियों..दिक्कतों एवं परेशानियों से जूझते सैकड़ों..हज़ारों युवाओं के पनपते..फलीभूत होते सपनों की। इसमें बातें हैं तमाम तरह की मेहनत और कष्ट झेल आगे बढ़ने का प्रयास करते युवाओं के नित ध्वस्त होते सपनों एवं धराशायी होती उनकी उच्च महत्त्वाकांक्षाओं की। इसमें कहानी है हताशा से जूझने..लड़ने और हारने के बावजूद नयी राह..नयी मंज़िल तलाश खुद में नयी आभा..नयी ऊर्जा..नयी संभावनाएं खोजने एवं उन्हें तराश कर फिर से उठ खड़े होने वालों की। 

इस उपन्यास में कहीं कॉलेज की मस्तियाँ.. चुहलबाज़िययां..नोकझोंक एवं झड़प दिखाई देती है। तो कहीं कोई मूक प्रेम में तड़पता खुद को किसी के एक इशारे में बदल डालने को आतुर दिखाई देता है। इसमें कहीं कोई पद की गरिमा को भूल अहंकार में डूबा दिखाई देता तो कहीं कोई किसी के एक इशारे..एक आग्रह को ही सर्वोपरि मान खुद को न्योछावर करता दिखाई देता है।

कहीं इसमें मज़ेदार ढंग से शराबियों की विभिन्न श्रेणियों का संक्षिप्त वर्णन दिखाई देता है तो कहीं
सरकारी अस्पतालों में फैली अव्यवस्था और उनकी दुर्दशा की बात दिखाई देती है। इस उपन्यास में कहीं हल्के व्यंग्य की सुगबुगाहट चेहरे पर मुस्कान ले आती है। तो कहीं इसमें बतौर कटाक्ष, भारतीय रेलों के कम देरी से पहुँचने पर इसे एक उपलब्धि के रूप में लिया जाता दिखाई देता है। कहीं इसमें दबंगई के दम पर दूसरे की दुकान/मकान पर जबरन कब्ज़े होता दिखाई देता है। तो कहीं हल्के फुल्के अंदाज़ में पंडित जी की बढ़ी तोंद से उनकी फुल टाइम पंडिताई का अंदाज़ा लगाया जाता दिखाई देता है।

कहीं बेरोज़गारी के चलते छोटे भाई से घर के बाकी सदस्यों की बेरुखी नज़र आती है। तो कहीं मरे व्यक्ति की जेबें टटोलते..गहने उतारते नज़दीकी रिश्तेदार दिखाई देते हैं।

इस उपन्यास को पढ़ते वक्त एक जगह चाय वाले को एक चाय के पैसे ना देने पर चाय वाले समेत भीड़ का किसी को पीट देना थोड़ा नाटकीय लगा। तो वहीं पेज नंबर 106 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'अशवनी स्टेशन से चलकर अपने गाँव की ओर जाने वाली बस में बैठ गया। बस पगडंडियों से होकर गुजर रही थी।'

यहाँ यह गौरतलब बात है कि पगडंडी से पैदल गुज़रा जाता है ना कि उनसे बस।

उपन्यास में कहीं कहीं लेखक एक ही पैराग्राफ में कभी वर्तमान में तो भूतकाल में 'था' और 'है' शब्द के उपयोग से जाता दिखा। भाषा भी कहीं कहीं औपचारिक होने के नाते थोड़ी उबाऊ भी प्रतीत हुई। जिसे सरस वाक्यों एवं गंगाजमुनी भाषा के माध्यम से रोचक बनाया जा सकता था। साथ ही कहानी कभी सूत्रधार याने के लेखक के माध्यम से आगे बढ़ती दिखी तो कभी अपने पात्रों के माध्यम से। बेहतर होता कि शुरुआत में कहानी के सूत्रधार के माध्यम से शुरू करने के बाद पूरी कहानी को अगर पात्रों की ज़ुबानी ही बताया जाता। 

उपन्यास में कुछ जगहों पर छत्तीसगढ़ी भाषा में संवाद आए हैं। उनका सरल हिंदी अनुवाद भी अगर साथ में दिया जाता तो बेहतर था। कुछ जगहों पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना किया जाना..थोड़ा खला। उपन्यास में अनेक जगह ऐसे छोटे-छोटे कनेक्टिंग वाक्य दिखाई दिए जिन्हें आसानी से आपस में जोड़ कर एक प्रभावी एवं असरदार वाक्य बनाया जा सकता था। 

इस 200 पृष्ठीय उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है हिन्दयुग्म ब्लू ने और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए जो कि जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

अक्षरों की मेरी दुनिया - विपिन पवार

समाज में अपटुडेट रहने के लिए ज़रूरी है कि हमें देश दुनिया की हर अहम ख़बर या ज़रूरी बात की सही एवं सटीक जानकारी हो। मगर बहुधा यह जानकारी थोड़ी नीरस और उबाऊ प्रवृति की होती है। जिसकी वजह से वह जानकारी या अहम बात आम जनमानस पर अपना समुचित प्रभाव नहीं छोड़ पाती। मगर वही जानकारी अगर रोचक एवं आसान शब्दों में हमारी जिज्ञासा को संतुष्टि के मुकाम पर ले जाए तो हम खुद ही और अधिक जानने..समझने के लिए प्रेरित होते हैं। 

दोस्तों..आज इस तरह की जानकारी भरी बातें इसलिए कि आज मैं आपके सामने ऐसी ही रोचक एवं ज़रूरी जानकारी से लैस किताब 'अक्षरों की मेरी दुनिया' की बात कर रहा हूँ। जिसके लेखक विपिन पवार हैं। इस किताब में एक तरह से उन्होंने अपने संस्मरणों..अपने अनुभवों एवं अपनी घुमक्कड़ी के किस्सों को निबंध के रूप में एक जगह एकत्र किया है।

रेल मंत्रालय में बतौर निदेशक(राजभाषा) कार्यरत विपिन पवार जी की इस किताब के ज़रिए पता चलता है कि उन्हें अध्यन एवं पठन पाठन का काफ़ी शौक है। किताब के लिए लिखे गए लेखों के अंत में दिए गए संदर्भ स्रोतों के ज़रिए भी इस बात की तस्दीक एवं पुष्टि होती है। 

 इस किताब में बातें हैं 1865 में जन्मी उस आनंदी बाई जोशी की जिसे भारत की पहली महिला डॉक्टर होने का खिताब प्राप्त है।  जिन्हें घर..समाज और रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद उनके अनुशासनप्रिय मगर गुस्सैल पति ने पढ़ने के लिए अमेरिका भेजा। वहाँ जा कर उन्होंने डॉक्टर की डिग्री हासिल तो कर ली मगर अफ़सोसजनक बात ये है कि मानवता की सेवा करने से पहले ही 21 साल की छोटी उम्र में ही आनंदी बाई की मृत्यु हो गयी थी क्योंकि बीमार पड़ने पर भारत के डॉक्टरों ने उनका इलाज महज़ इसलिए नहीं किया कि उन्होंने परदेस जा कर पढ़ने की जुर्रत की और अंग्रेज डॉक्टरों ने इसलिए उनका इलाज नहीं किया कि उन्होंने हिंदू धर्म छोड़ ईसाई धर्म को अपनाने से इनकार कर दिया था।

इसमें बातें है बाघों के सरंक्षण के लिए मशहूर महाराष्ट्र के सबसे पुराने एवं बड़े ताडोबा नैशनल पार्क की खूबसूरती एवं विशेषताओं की। इसमें बातें हैं सरकारी दफ़्तरों में राजभाषा हिंदी के प्रचार..प्रसार एवं इस्तेमाल में आने वाली बाधाओं..समस्याओं और उनके समाधान की। 

 इस किताब में बातें हैं बुक बाइंडिंग करने एवं अखबारें बेचने वाले पुणे के 103 वर्षीय विश्वप्रसिद्ध युवा गोखले बुवा और मैराथन दौड़ सहित अनेक अन्य क्षेत्रों में उनके बनाए एक से बढ़ कर एक कीर्तिमानों की। इसमें बातें हैं पुराने किलों..सहकर्मियों..और मुक्तिबोध की कविताओं की। इस संकलन में बातें हैं छत्रपति शिवाजी महाराज के जासूस 'बहिर्जी नाइक' और उनके गुप्तचरों के सामूहिक कौशल एवं अद्वितीय प्रयासों की। जिनकी कार्य कुशलता एवं सटीकता की वजह से शिवाजी महाराज को दुश्मन से होने वाली मुठभेड़ से पहले ही उसकी सेना..युद्धकौशल..लड़ने की क्षमता एवं कमज़ोरियों की पूरी जानकारी मिल जाती थी।
 
इस किताब में बातें हैं सम्मोहक समुद्र तटों..जंगलों और खेत खलियानों की। इसमें बातें हैं पहाड़ों की ऊंचाइयों और समुद्र की गहराई में अटखेलियाँ करते पर्यटकों से भरे महाराष्ट्र के देखे..अनदेखे पर्यटनस्थलों की। इस संकलन में बातें हैं मुंबई की गगनचुंबी इमारतों और वहाँ की प्राचीन गुफाओं एवं प्राचीरों की। इसमें बातें हैं कंप्यूटर को आसान बनाते कीबोर्ड शॉर्टकटों के साथ साथ लेखक के लिखे संपादकीयों की। इसमें बातें हैं इंद्रायणी नदी और हाथरस की खासियतों की। 

कुछ जगहों पर या जहाँ कहीं भी किताब में आँकड़ों की बात आती थी तो आम पाठक के नज़रिए से मेरे ज़हन में ये अहम सवाल उठ खड़ा हुआ  कि..ये सब आँकड़े मेरे या किसी भी आम अन्य पाठक के भला किस काम के? क्या किताब को छपवाने का लेखक का तात्पर्य या मंतव्य महज़ अपने अब तक के लिखे गए लेखों के मात्र दस्तावेजीकरण ही है?

कुछ जगहों पर वर्तनी की छोटी छोटी त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना होना थोड़ा खला। इसके अतिरिक्त पेज नंबर 49 पर लिखा दिखाई दिया कि...

'मुंबई के उपनगर कल्याण में उन्होंने फ्लैट खरीदा उस समय का मनोरंजन वाक्य याद आता है।'

यहाँ 'मनोरंजन' के बजाय 'मनोरंजक' आना चाहिए था।

कंप्यूटर संबंधी जानकारी से जुड़े एक अध्याय में Shift+Delete ऑप्शन को दो अलग अलग पेज 85 और 86 में दे दिया गया है।

उम्दा कागज़ पर छपी इस 111 पृष्ठीय किताब के हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है प्रलेक प्रकाशन, मुंबई ने और इसका मूल्य रखा गया है 300/- रुपए। जो कि आम पाठकीय नज़रिए से ज़्यादा है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

#समीक्षा #राजीव_तनेजा #प्रलेक_प्रकाशन #विपिन_पवार

चोरों की बारात- सुरेन्द्र मोहन पाठक

अगर आप परदेस के किसी होटल में बंद कमरे के भीतर बेसुध हो कर रात में सो रहे हों और अचानक नींद टूटने पर आप पलंग से उठें और आपको पता चले कि आपके पैरों के नीचे समतल ज़मीन नहीं बल्कि एक लाश है। तो मेरे ख्याल से आप खुद ही समझ सकते हैं कि उस वक्त ज़हनी तौर पर आपकी दिमाग़ी हालत कैसी होगी? 

दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक के एक रौंगटे खड़े कर देने वाले तेज़ रफ़्तार उपन्यास 'चोरों की बारात' की। उपन्यास पर आगे बढ़ने से पहले सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के थ्रिलर उपन्यासों के बारे में एक ज़रूरी बात कि उनके पुराने उपन्यासों के प्रति लोगों में इतनी दीवानगी अब भी है कि लोग उन्हें, उन पर छपे मूल्य से भी कहीं अधिक दे कर खरीदने..संजोने को आतुर रहते हैं। वैसे दाव लगे की बात ये है कि इस उपन्यास को मैंने शायद दिल्ली के दरियागंज वाले पुरानी किताबों के बाज़ार से 50/- या 60/- रुपए का खरीदा था। फेसबुक और व्हाट्सएप पर पुराने उपन्यासों के कुछ ग्रुप चल रहे हैं। वहाँ से यह उम्दा उपन्यास आपको जायज़ कीमत पर भी मिल सकता है। वैसे.. जानकारी के लिए बता दूँ कि अमेज़न पर तीन अन्य उपन्यासों के साथ यह उपन्यास 3999/- रुपए में बेचा जा रहा है। 
 
इस समीक्षा के शुरुआती पैराग्राफ़ से ही आप आसानी से समझ सकते हैं कि जिस उपन्यास का आगाज़ ही ऐसा है तो उसका अंजाम कैसा सनसनीखेज.. रोमांचक.. रौंगटे खड़े कर देने वाला होगा? 

चलिए..अब ज़्यादा बातें ना करते हुए फिर से इस रोचक उपन्यास की कहानी पर आते हैं।
बंद कमरे में लाश मिलने के तुरंत बाद उस कमरे में रुके सुधीर कोहली पर जानलेवा हमला कर उसे बेहोश कर दिया जाता है। सुधीर कोहली, जो कि दरअसल भारत का एक प्राइवेट जासूस है और अपने क्लाइंट की घर से भागी नाबालिग बेटी को, थाइलैंड से बरामद कर लेने के बाद उसे, उसके पिता को सुरक्षित सौंपने के इरादे से नेपाल के उस होटल में रुका हुआ है। 

बीती रात सुधीर पर हमला करने वाला कौन था? क्या इस कत्ल और हमले के पीछे 'कृष' याने के मीरा के ज़माने की उस दुर्लभ कृष्ण मूर्ति की चोरी की घटना का हाथ था जो  कि अपनी खासियतों की वजह से दुनिया में सिर्फ़ एक इकलौती और बेशकीमती है। सिंगापुर से चोरी हुई उस बेशकीमती मूर्ति को वापिस पाने के लिए एक तरफ़ जहाँ उसका मालिक चीनी माफ़िया की मदद लेता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ मूर्ति को ढूँढने..वापिस पाने और हथियाने के चक्कर में लगातार होते खूनखराबे और साजिश से लैस इस बेहद रोमांचक उपन्यास में मूर्ति के बदले करोड़ों की रकम ऑफर करने वाला मिस्टर लोबो आख़िर कौन हैं? क्या जान के दुश्मन बन चुके चीनी माफ़िया और मिस्टर लोबो के गुर्गों से सुधीर कोहली खुद को बचा पाएगा। या तीन तीन कत्लों के जुर्म में सुधीर की पूरी ज़िंदगी बतौर मुजरिम नेपाल की जेलों में बीतेगी?

इन सब रहस्यों को जानने के लिए तो आपको कदम कदम पर चौंकाते इस बेहद ही उम्दा उपन्यास को शुरू से अंत तक..पूरा पढ़ना होगा। 286 पेज के इस 2012 में छपे बढ़िया उपन्यास को छापा है राजा पॉकेट बुक्स ने और इस पर उस समय का मूल्य 80/- रुपए अंकित है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

#समीक्षा #राजीव_तनेजा #सुरेन्द्र_मोहन_पाठक

बम बम भोले- विनोद पाण्डेय

व्यंग्य लेखन एक तरह से तेल से तरबतर सड़क पर नपे तुले अंदाज़ में संभली..संतुलित एवं सधी हुई गति से गाड़ी चलाने के समान है। ज़्यादा तेज़ हुए तो रपटे..फिसले और धड़ाम। ज़्यादा धीमे हुए तो वहीं खड़े खड़े रपटते..लटपटाते हुए फिर से धड़ाम। 

दोस्तों...आज व्यंग्य की बातें इसलिए कि आज मैं बात करने जा रहा हूँ कवि /व्यंग्यकार विनोद पाण्डेय जी के व्यंग्य संग्रह 'बम बम भोले' और उसमें छपे उनके व्यंग्यों की। इनके  व्यंग्यों को पढ़ कर हम आसानी से जान सकते हैं कि लेखक अपने आसपास के माहौल और ताज़ातरीन ख़बरों को समझने...जांचने और उनमें से अपने मतलब की माल निकाल लेने में माहिर एवं मंजे हुए खिलाड़ी हैं। उनकी व्यंग्य रचनाओं में कहीं किस्सागोई शैली की झलक मिलती है तो कहीं बतकही के रूप में इतनी सहजता से वे अपनी...अपने मन की बात कह जाते हैं कि बरबस ही पढ़ने वाले के चेहरे पर एक महीन सी मुस्कराहट तैर जाती है| 

इस संकलन के किसी व्यंग्य में रावण , बीमार पड़ने की वजह से रामलीला को एन बीच मंझधार में छोड़ ग़ैरहाज़िर होता नज़र आता है। इससे उपजी परिस्थितियों में एक तरफ़ रामलीला में मची अफरातफरी है तो दूसरी तरफ़ उसके चंदे में होने वाले घोटालों का जिक्र है। इसी संकलन के एक अन्य व्यंग्य में चेपू टाइप के साहित्यकारों पर गहरा कटाक्ष नज़र आता है कि किस तरह खुद को महान साबित करने के लिए वे क्या क्या जतन करते हैं।

इसी संकलन के किसी व्यंग्य में कहीं वैलेंटाइन की भेड़चाल में छोटा बड़ा..हर कोई फँसा नज़र आता है। तो कहीं किसी अन्य व्यंग्य में देवता समान अतिथि का आतिथ्य भूल..उसे घर के बाहर आवारा कुत्ते के संग सुलाया जा रहा है। कहीं किसी व्यंग्य में आपाधापी भरी आजकल की व्यस्त ज़िन्दगी के मद्देनज़र काम और मौज के बीच वर्क लाइफ बैलेंस के बहाने संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।

कहीं किसी व्यंग्य में टीवी और उसके टी आर पी के खेल का झोलझाल नज़र आता है तो किसी अन्य व्यंग्य में मंगल ग्रह पर पानी की उपलब्धता सुर्खियाँ बटोरती नज़र आती है। किसी अन्य व्यंग्य में आजकल के तथाकथित पत्रकारों और उनकी पत्रकारिता की बात नज़र आती है। तो कहीं कहीं किसी व्यंग्य में चुनावों के दौरान विरोधियों का सूपड़ा साफ़ करने का मंसूबा बाँधा जा रहा है। कहीं किसी रचना में लेखक फेयर एंड लवली कम्पनी के गुण गाता दिखा तो किसी अन्य व्यंग्य में सेब की महिमा का बखान करता भी दिखा।

कहीं कंजूसी और शातिरपने की पराकाष्ठा के रूप में किसी व्यंग्य में प्लेटफार्म पर समोसे तथा ट्रेन में सूप बिकता दिखा। तो कहीं सदाबहार जींस और उसके दिन प्रतिदिन फटते फैशन सेंस की बात होती दिखाई देती है। इसी संकलन में कहीं शेरों और बाघों की विलुप्त होती प्रजाति पर चिंता जताई जाती दिखाई देती है। तो किसी अन्य व्यंग्य के माध्यम से लोकतंत्र में तमाम तरह की उठापटक के माध्यम से चुनावी दंगल में विरोधियों का सूपड़ा साफ़ होता दिखता है।

इस बात की तारीफ़ करनी होगी कि अपनी तरफ़ से लेखक उस भेड़चाल से भरसक बचता दिखाई दिया जिसके अंतर्गत किसी की खिंचाई या बात में से बात निकाल..उसे शब्दों में पिरोने के हुनर को ही मात्र व्यंग्य मान पाठकों के समक्ष परोस दिया जाता है। 

लेखक विनोद पाण्डेय के शहरों..कस्बों और शहरीकृत गांवों के किरदारों को ले कर मज़ेदार..आसान भाषा में रचे गए इस संकलन के व्यंग्य गहरी चोट या टीस देने के बजाय हलकी सी गुदगुदी या मुस्कुराहट बस पाठकों को दे संतोष कर लेते हैं। कुछ व्यंग्य मंच पर हास्यात्मक भाषण या मूल रचना पाठ से पहले की..मौसम या मूड बनाने की प्रक्रिया जैसी भूमिका बनाते अधिक लगे। बतौर सजग पाठक एवं एक लेखक/व्यंग्यकार होने के नाते मुझे इस संकलन के व्यंग्य आम औसत व्यंग्य से लगभग दुगने बड़े और खिंचे हुए भी लगे। जिस पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है।

कुछ एक जगहों पर छोटी छोटी वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त कुछ एक ऐसे व्यंग्य लेख भी दिखे जिनमें बस नाम मात्र को व्यंग्य या फिर कहीं कहीं तो वह भी नदारद दिखा। साथ ही कुछ व्यंग्यों को पढ़ते वक्त महसूस हुआ कि उनमें मामूली फेर बदल कर के उनके एक के बजाय दो व्यंग्य आसानी से बन सकते थे। किसी किसी व्यंग्य में तो व्यंग्य के शीर्षक तक पहुँचने में ही एक से डेढ़ पेज तक खर्च कर दिया गया। इन्हें एक तरह से व्यंग्य कम और संस्मरण टाइप बतकही जो सुनने में बढ़िया लगती है, कहा जाए तो बेहतर होगा। 

*पेज नम्बर 71 के एक व्यंग्य में लेखक दोनों हाथों में ब्रीफकेस ले, रेलगाड़ी में चढ़ते वक्त अपनी ही बात को काटता दिखाई दिया। इसमें वे लिखते हैं कि...

'ऊपर से ठंड में पसीना ऐसे निकल रहा था जैसे अभी अभी गंगा स्नान करके निकले हैं।'

इसकी अगली ही पंक्ति के बीच में लिखा दिखाई दिया कि..

'घर से लेकर ऑफिस तक एसी में पसीना का भी कई दिन से दम घुट रहा था।'

अब अगर ठंड का मौसम है तो दफ़्तर में ए.सी नहीं चलने चाहिए या फिर ठंड के बजाय मौसम गर्मी का है।

इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि..लंबे और एकरसता से भरे व्यंग्य/लेख को पाठक गंभीरता से पढ़ने के बजाय उन पर सरसरी नज़र दौड़ाता हुआ आगे बढ़ने की सोचता है, लेखक को चाहिए कि वे अपने व्यंग्यों की लंबाई कम करने के साथ साथ उन्हें और अधिक मारक..क्रिस्प और तीखाबनाने का प्रयास करें।

आकर्षक कवर डिज़ायन और बढ़िया पेज पर छपा यह व्यंग्य संकलन हालांकि मुझे उपहार स्वरूप मिला। मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इस 108 पृष्ठीय व्यंग्य संग्रह के पेपरबैक संस्करण को छापा है सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

फुगाटी का जूता- मनीष वैद्य

जब कभी ज़माने की विद्रूपताएं एवं विसंगतियां हमारे मन मस्तिष्क को उद्वेलित कर उसमें अपना घर बनाने लगती हैं तो हताशा और अवसाद में जीते हुए हम में से बहुत से लोग अपने मन की भड़ास को कभी आपस में बोल बतिया कर तो कभी चीख चिल्ला कर शांत कर लिया करते हैं। इसके ठीक विपरीत कोई लेखक या फिर कवि ह्रदय जब इस तरह की बातों से व्यथित होता है तो अपने मन की भावनाओं को अमली जाम पहनने के लिए वो शब्दों का...अपनी लेखनी का सहारा लेता है।


इस तरह की तमाम विसंगतियों से व्यथित हो जब कोई कलमकार अपनी बात...अपनी व्यथा...अपने मनोभावों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए अपनी कलम उठाता है तो स्वत: ही उसकी लेखनी में वही बात...वही क्रोध...वही कटुता...वही हताशा स्वतः ही परिलक्षित होने लगती है। 

दोस्तों...आज मैं बात कर रहा हूँ प्रसिद्ध कहानीकार मनीष वैद्य जी के कहानी संकलन 'फुगाटी का जूता' की। निरंतर होती तरक्की के बीच पिछड़ते चरित्रों...उनके दुखों..उनके संघर्षों को संजीदगी से ज़ुबान देती हैं मनीष वैद्य जी के इस संग्रह की कहानियाँ।

 इसको पढ़ते वक्त मुझे अपनी एक पुरानी कविता की कुछ पँक्तियाँ स्वतः ही  याद आ गयी...

"सोने नहीं देती है 
दिल की चौखट पे..
ज़मीर की ठकठक
उथल पुथल करते 
विचारों के जमघट
जब बेबस हो...
तमाशाई हो
देखता हूँ अन्याय हर कहीं"



उनके इस संकलन की किसी कहानी में आज के इस यूज़ एंड थ्रो वाले  युग में पुराने सामान की मरम्मत करने वालों का दर्द और उनकी व्यथा दिखाई देती है तो किसी कहानी में बूढ़ी हो चुकी आँखों के ज़रिए भारत-पाकिस्तान से जुड़ी पुरानी यादों को फिर से  जीते हुए ताज़ा किया गया है। इसी संग्रह की एक अन्य कहानी में बात है किसी बड़े नेता के किसी पिछड़े इलाके में होने वाले दौरे और उसकी वजह से संपूर्ण अफसरशाही और मीडिया में मची घालमेल मिश्रित अफरा तफरी की। इसमें बात है अफसरशाही के द्वारा आनन फानन में इलाके को जैसे तैसे चमकाने को ले कर होने वाली कवायद की। इसमें बात है गरीब आदमी की बात को कुचलने...उसे गंभीरता से ना लेते हुए उसका माखौल उड़ा...उसे दबाने की।

इस संग्रह में बात है फौजी अफसर और आदिवासी लड़की के प्रेम और फिर विवाह की। इसमें बात है पुरानी चिट्ठियों के ज़रिए अपनापन महसूसते बूढ़े झुर्रीदार चेहरे की। इसमें बात है चिट्ठी की बाट जोहती बूढ़ी आँखों और उसकी हताशा की। इसमें बात है फौज द्वारा शहीद घोषित किए जा चुके फौजी के इंतज़ार की।

इस संग्रह की कहानी 'फुगाटी का जूता' में बात है 'उलटे बाँस बरेली' कहावत को चरितार्थ करने और नई-पुरानी पीढ़ी की सोच में आते बदलाव की तो किसी कहानी में बात है बुंदेलखंड के ओरछा के राजा जूदेव के बेटों जुझार सिंह और हरदौल की। इसमें बात है कान के कच्चे जुझार सिंह के अपनी पत्नी चंपावती और भी हरदौल को ले कर उत्पन्न हुए शक की। इसमें बात है भाभी का मान बचाने को अपनी जान देने वाले हरदौल की। 

इस संग्रह की किसी कहानी में बात है खुद को भीड़ से अलग...ऊँचा मानने और फिर इस सबका भ्रम टूटने की। तो किसी कहानी में बात है मृत करार दिए जा चुके व्यक्ति के खुद को ज़िंदा साबित करने की जद्दोजहद और टूटते रिश्तों के ज़रिए होते विश्वास के हनन की। 

इसमें बात है मशीनीकरण और आधुनिकीकरण के ज़रिए तररकी की राह पर बढ़ रहे देश और उसमें निरंतर बेरोज़गार होते हाथ के हुनरमंद लोगों की व्यथा की। इसमें बात है चलतेपुर्ज़े लोगों के जुगाड़ के ज़रिए राजनीति में उतरने और झूठे वायदों के दम पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने की। 

इसमें बात है गरीबी हटाने के नाम पर सरकार द्वारा दलितों/भूमिहीनों में बाँटे जा रहे भूमि के पट्टों और इस खेल के सारे गोरखधंधे की। इसमें बात है तानाशाह के अत्याचारों और बग़ावती सुरों की। इसमें बात है तरक्की की राह पर समय के साथ बदलते गांवों और साथ ही बदलते लोक व्यवहार से भौंचक हुए एक निराश बूढ़े और उसकी ज़िद की। 

लेखक की भाषा प्रवाहमयी एवं किस्सागोई शैली की है। पढ़ते वक्त आप कहानी के साथ..उसकी रौ में बहते चले जाते हैं इस पूरे संग्रह की कहानियों को पढ़ते वक्त मैंने नोट किया कि ज़्यादातर कहानियों में दुःख...अवसाद और निराशा की बात है। कहानियों की विषय सामग्री और उनके ट्रीटमेंट से पता चलता है कि लेखक, ज़माने के तौर तरीके, चलन तथा व्यवस्था से खासा नाराज़ है। एक तरह से हम कह सकते हैं कि वैश्वीकरण के इस युग में सरकारी नीतियों और ज़माने भर से मोहभंग हुए लोगों का कहानी संग्रह है 'फुगाटी का जूता'। लेखक से निवेदन है कि पूरे संग्रह में निराशा और अवसाद की कहानियों के साथ अगर साकारात्मता का पुट लिए हुए भी कुछ कहानियाँ और होती तो उनका यह संग्रह और भी ज़्यादा दमदार होता।

132 पृष्ठीय बढ़िया क्वालिटी के इस उम्दा कहानी संग्रह के पेपरबैक संस्करण को छापा है बोधि प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है मात्र ₹120/- जो कि बहुत जायज़ है। कम कीमत पर एक बढ़िया कहानी संग्रह उपलब्ध कराने के लिए लेखक तथा प्रकाशक को बहुत बहुत बधाई। आने वाले सुखद भविष्य के लिए दोनों को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

बन्द दरवाज़ों का शहर- रश्मि रविजा


अंतर्जाल पर जब हिंदी में लिखना और पढ़ना संभव हुआ तो सबसे पहले लिखने की सुविधा हमें ब्लॉग के ज़रिए मिली। ब्लॉग के प्लेटफार्म पर ही मेरी और मुझ जैसे कइयों की लेखन यात्रा शुरू हुई। ब्लॉग पर एक दूसरे के लेखन को पढ़ते, सराहते, कमियां निकालते और मठाधीषी करते हम लोग एक दूसरे के संपर्क में आए। बेशक एक दूसरे से हम लोग कभी ना मिले हों लेकिन अपने लेखन के ज़रिए हम लोग एक दूसरे से उसके नाम और काम(लेखन) से अवश्य परिचित थे। ऐसे में जब पता चला कि एक पुरानी ब्लॉगर साथी और आज के समय की एक सशक्त कहानीकार रश्मि रविजा जी का नया कहानी संग्रह "बन्द दरवाज़ों का शहर" आया है तो मैं खुद को उसे खरीदने से रोक नहीं सका। 

धाराप्रवाह शैली से लैस अपनी कहानियों के लिए रश्मि रविजा जी को विषय खोजने नहीं पड़ते। उनकी पारखी नज़र अपने आसपास के माहौल से ही चुन कर अपने लिए विषय एवं किरदार खुदबखुद छाँट लेती है। दरअसल... यतार्थ के धरातल पर टिकी कहानियों को पढ़ते वक्त लगता है कि कहीं ना कहीं हम खुद उन कहानियों से...किसी ना किसी रूप में खुद जुड़े हुए हैं। इस तरह के विषय हमें सहज...दिल के करीब एवं देखे भाले से लगते हैं। इसलिए हमें उनके साथ, अपना खुद का संबंध स्थापित करने में किसी किस्म की कोई परेशानी नहीं होती। आइए!...अब बात करते हैं उनके इस कहानी संग्रह की।

इस संकलन की एक कहानी में सपनों की बातें हैं कि हर जागता.. सोता इंसान सपने देखता है मगर सपने अगर सच हो जाएँ तो फिर उन्हें सपना कौन कहेगा? अपने सपनों के पूरा ना हो पाने की स्थिति में अक्सर हम अपने ही किसी नज़दीकी के ज़रिए अपने सपने के पूरे होने की आस लगा बैठते हैं। ऐसे में अगर हमारा अपना ही...हमारा सपना तोड़ चलता बने तो दिल पर क्या बीतती है? 

बचपन की शरारतें..झगड़े,  कब बड़े होने पर हौले हौले प्रेम में बदल जाते हैं...पता ही नहीं चलता। पता तब जा के चलता है जब बाज़ी हाथ से निकल चुकी या निकल रही होती है। ऐसे में बिछुड़ते वक्त एक कसक...एक मलाल तो रह ही जाता है मन में और ज़िंदगी भर हम उम्मीद का दामन थामे..अपने प्यार की बस एक झलक देखने की आस में बरसों जिए चले जाते हैं।

इस संकलन की एक अन्य कहानी में कॉलेज के समय से एक दूसरे के प्रेम में पड़े जोड़े के सामने जब जीवन में कैरियर बनाने की बात आती है तो अचानक ही पुरुष को अपने सपनों...अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के सामने स्त्री की इच्छाएँ...उसकी भावनाएँ गौण नज़र आने लगती हैं। ऐसे में क्या स्त्री का उस पुरुष के साथ बने रहना क्या सही होगा?
इसी संकलन की एक दूसरी कहानी में नशे की गर्त में डूबे युवा की मनोस्थिति का परत दर परत विश्लेषण है कि किस तरह  घर में किसी नयी संतान के जन्म के बाद पहले वाली संतान कुदरती तौर पर माँ- बाप की उपेक्षा का शिकार होने लगती है। ऐसे में उसे बहकते देर नहीं लगती और नौबत यहाँ तक पहुँच जाती है कि स्थिति , लाख संभाले नहीं संभालती। जब तक अभिभावक चेतते हैं बात बहुत आगे तक बढ़ चुकी होती है।

इसी संकलन की किसी कहानी में स्कूल की मामूली जान पहचान बरसों बाद कॉलेज की रीयूनियन पार्टी फिर से हुई मुलाकात पर प्यार में बदलने को बेताब हो उठती है। तो किसी कहानी में मैट्रो शहरों में खड़ी ऊँची ऊंची अट्टालिकाओं के बने कंक्रीट जंगल में सब इस कदर अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं कि किसी को किसी की सुध लेने की फुरसत ही नहीं होती। ऐसे में घरों में बचे खुचे लोग अपनी ज़िंदगी में स्थाई तौर पर बस चुकी बोरियत से इतने आज़िज़ आ जाते हैं कि सुकून के कुछ पलों को खोजने के लिए किसी ना किसी का साथ चाहने लगते हैं कि जिससे वे अपने मन की बात...अपने दिल की व्यथा कह सकें मगर हमारा समाज स्त्री-पुरुष की ऐसी दोस्ती को भली नज़र से भला कब देखता है?

इस संकलन की किसी कहानी में पढ़ाई पूरी करने के तीन साल बाद भी बेरोज़गारी की मार के चलते आस पड़ोस एवं नाते रिश्तेदारों के व्यंग्यबाणों को झेल रहे युवक की कशमकश उसका बनता काम बिगाड़ देती है। तो किसी कहानी में इश्क में धोखा खा चुकने के बाद, ब्याह में भी असफल हो चुकी युवती के दरवाजे पर फिर से दस्तक देता प्यार क्या उसके मन में फिर से उमंगे जवां कर पाता है? 

इसी संकलन की एक कहानी इस बात की तस्दीक करती है कि...हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। दरअसल हम इंसानों को जो हासिल होता है, उसकी हम कद्र नहीं करते और जो हासिल नहीं होता, उसे पाने...या फिर उस जैसा बनने के लिए तड़पते रहते हैं। 

नयी बहु बेशक घर की जितनी भी लाडली हो लेकिन उसके विधवा होते ही उसको ले कर सबके रंग ढंग बदल जाते हैं और उसका दर्जा मालकिन से सीधा नौकरानी का हो उठता है। ऐसे में शारीरिक तथा मानसिक यंत्रणा झेलती उस स्त्री के जीवन में राहत के क्षण तभी आते हैं जब उसके अपने बच्चे लायक निकल आते हैं।

अच्छी नीयत के साथ देखे गए सपने ही जब बदलते वक्त के साथ नाकामयाबी में बदलने लगे और अपनों द्वारा ही जब उनकी...उनकी सपने की कद्र ना की जाए तो कितना दुख होता है। ऐसे में प्रोत्साहन की एक हलकी सी फुहार भी मन मस्तिष्क को फिर से ऊर्जावान कर उठती है।

इस कहानी संकलन में कुल 12 कहानियाँ हैं।  रश्मि रविजा जी की भाषा शैली ऐसी है कि एक बार शुरू करने पर वह खुद कहानी को पढ़वा ले जाती है। आखिर की कुछ कहानियाँ थोड़ी भागती सी लगी। उन पर थोड़ा तसल्लीबख्श ढंग से काम होना चाहिए था। काफ़ी जगहों पर अंग्रेज़ी तथा हिंदी के कुछ शब्द आपस में जुड़े हुए लगे जैसे:

जाकर, पाकर, लाकर, पीकर,भरकर, कसकर इत्यादि। मुझे लगता है कि सही शब्द में शब्द से  'कर' अलग लिखा जाना चाहिए। अब पता नहीं मैं सही हूँ या नहीं लेकिन मुझे इस तरह लिखे गए शब्द थोड़ा अखरे। कुछ जगहों पर अंग्रेज़ी शब्दों को इस तरह लिखा देखा कि उसके मायने ही बदल रहे थे जैसे..एक जगह लिखा था 'फिलिंग वेल' जिसका शाब्दिक अर्थ होता है कुएँ को भरना लेकिन असल में लेखिका कहना चाहती है 'फीलिंग वैल'-feeling well). एक जगह अंग्रेज़ी शब्द 'आयम' दिखाई दिया जिसे दरअसल 'आय एम' या फिर 'आई एम' होना चाहिए था। खैर!...ये सब छोटी छोटी कमियां हैं जिन्हें आने वाले संस्करणों तथा नयी किताबों में आराम से दूर किया जा सकता है।

180 पृष्ठों के इस कहानी संकलन के पेपरबैक संस्करण को छापा है अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली ने और इसका मूल्य रखा गया है ₹225/- जो कि किताब की क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

अभ्युदय-1- नरेंद्र कोहली(समीक्षा)

मिथकीय चरित्रों की जब भी कभी बात आती है तो सनातन धर्म में आस्था रखने वालों के बीच भगवान श्री राम, पहली पंक्ति में प्रमुखता से खड़े दिखाई देते हैं। बदलते समय के साथ अनेक लेखकों ने इस कथा पर अपने विवेक एवं श्रद्धानुसार कलम चलाई और अपनी सोच, समझ एवं समर्थता के हिसाब से उनमें कुछ ना कुछ परिवर्तन करते हुए, इसके किरदारों के फिर से चरित्र चित्रण किए। नतीजन...आज मूल कथा के एक समान होते हुए भी रामायण के कुल मिला कर लगभग तीन सौ से लेकर एक हज़ार तक विविध रूप पढ़ने को मिलते हैं। इनमें संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण सबसे प्राचीन मानी जाती है। इसके अलावा अनेक अन्य भारतीय भाषाओं में भी राम कथा लिखी गयीं। हिंदी, तमिल,तेलुगु,उड़िया के अतिरिक्त  संस्कृत,गुजराती, मलयालम, कन्नड, असमिया, नेपाली, उर्दू, अरबी, फारसी आदि भाषाएँ भी राम कथा के प्रभाव से वंचित नहीं रह पायीं।

राम कथा को इस कदर प्रसिद्धि मिली कि देश की सीमाएँ लांघ उसकी यशकीर्ति तिब्बत, पूर्वी तुर्किस्तान, इंडोनेशिया, नेपाल, जावा, बर्मा (म्यांम्मार), थाईलैंड के अलावा कई अनेक देशों तक जा पहुँची और थोड़े फेरबदल के साथ वहाँ भी नए सिरे से राम कथा को लिखा गया। कुछ विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि ग्रीस के कवि होमर का प्राचीन काव्य इलियड, रोम के कवि नोनस की कृति डायोनीशिया तथा रामायण की कथा में अद्भुत समानता है। राम कथा को आधार बना कर अमीश त्रिपाठी ने हाल फिलहाल में अंग्रेज़ी भाषा में इस पर हॉलीवुड स्टाइल का तीन भागों में एक वृहद उपन्यास रचा है तो हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार श्री नरेन्द्र कोहली भी इस अद्भुत राम कथा के मोहपाश से बच नहीं पाए हैं।

दोस्तों.... आज मैं बात करने जा रहा हूँ श्री नरेन्द्र कोहली द्वारा रचित "अभ्युदय-1" की। इस पूरी कथा को उन्होंने दो भागों में संपूर्ण किया है। इस उपन्यास में उन्होंने  देवताओं एवं राक्षसों को अलौकिक शक्तियों का स्वामी ना मानते हुए उनको आम इंसान के हिसाब से ही ट्रीट किया है। 

उनके अनुसार बिना मेहनत के जब भ्रष्टाचार, दबंगई तथा ताकत के बल पर कुछ व्यक्तियों को अकृत धन की प्राप्ति होने लगी तो उनमें नैतिक एवं सामाजिक भावनाओं का ह्रास होने के चलते लालच, घमंड, वैभव, मदिरा सेवन, वासना, लंपटता तथा दंभ इत्यादि की उत्पत्ति हुई। अत्यधिक धन तथा शस्त्र ज्ञान के बल पर अत्याचार इस हद तक बढ़े कि ताकत के मद में चूर ऐसे अधर्मी लोगों द्वारा सरेआम मारपीट तथा छीनाझपटी होने लगी। अपने वर्चस्व को साबित करने के लिए राह चलते बलात्कार एवं हत्याएं कर, उन्हीं के नर मांस को खा जाने जैसी अमानवीय एवं पैशाचिक करतूतों को करने एवं शह देने वाले लोग ही अंततः राक्षस कहलाने लगे।

शांति से अपने परिश्रम एवं ईमानदारी द्वारा जीविकोपार्जन करने के इच्छुक लोगों को ऐसी राक्षसी प्रवृति वालों के द्वारा सताया जाना आम बात हो गयी। आमजन को ऋषियों के ज्ञान एवं बौद्धिक नेतृत्व से वंचित रखने एवं शस्त्र ज्ञान प्राप्त करने से रोकने के लिए शांत एवं एकांत स्थानों पर बने गुरुकुलों एवं आश्रमों को राक्षसों द्वारा भीषण रक्तपात के बाद जला कर तहस नहस किया जाने लगा कि ज्ञान प्राप्त करने के बाद कोई उनसे, उनके ग़लत कामों के प्रति तर्क अथवा विरोध ना करने लगे।

वंचितो की स्थिति में सुधार के अनेक मुद्दों को अपने में समेटे हुए इस उपन्यास में मूल कहानी है कि अपने वनवास के दौरान अलग अलग आश्रमों तथा गांवों में राम,  किस तरह ऋषियों, आश्रम वासियों और आम जनजीवन को संगठित कर, शस्त्र शिक्षा देते हुए राक्षसों से लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। पढ़ते वक्त कई स्थानों पर मुझे लगा कि शस्त्र शिक्षा एवं संगठन जैसी ज्ञान की बातों को अलग अलग आश्रमों एवं स्थानों पर बार बार घुमा फिरा कर बताया गया है। जिससे उपन्यास के बीच का हिस्सा थोड़ा बोझिल सा हो गया है जिसे संक्षेप में बता कर उपन्यास को थोड़ा और चुस्त दुरस्त किया जा सकता था। लेकिन हाँ!...श्रुपनखा का कहानी में आगमन होते ही उपन्यास एकदम रफ्तार पकड़ लेता है।

इस उपन्यास में कहानी है राक्षसी अत्याचारों से त्रस्त ऋषि विश्वामित्र के ऐसे राक्षसों के वध के लिए  महाराजा दशरथ से उनके पुत्रों, राम एवं लक्षमण को मदद के रूप में माँगने की। इसमें कहानी है अहल्या के उद्धार से ले कर ताड़का एवं अन्य राक्षसों के वध, राम-सीता विवाह, कैकयी प्रकरण, राम वनवास, अगस्त्य ऋषि एवं  कई अन्य उपकथाओं से ले कर सीता के हरण तक की। इतनी अधिक कथाओं के एक ही उपन्यास में होने की वजह से इसकी मोटाई तथा वज़न काफी बढ़ गया है। जिसकी वजह इसे ज़्यादा देर तक हाथों में थाम कर पढ़ना थोड़ा असुविधाजनक लगता है।

700 पृष्ठों के इस बड़े उपन्यास(पहला भाग) को पढ़ते वक्त कुछ स्थानों पर ऐसा भी भान होता है कि शायद लेखक ने कुछ स्थानों पर इसे स्वयं टाइप कर लिखने के बजाए किसी और से बोल कर इसे टाइप करवाया है क्योंकि कुछ जगहों पर शब्दों के सरस हिंदी में बहते हुए प्रवाह के बीच कर भोजपुरी अथवा मैथिली भाषा का कोई शब्द अचानक फुदक कर उछलते हुए कोई ऐसे सामने आ जाता है।

धाराप्रवाह लेखन से सुसज्जित इस उपन्यास को पढ़ने के बाद लेखक की इस मामले में भी तारीफ करनी होगी कि उन्होंने इसके हर किरदार के अच्छे या बुरे होने के पीछे की वजहों का, सहज मानवीय सोच के साथ मंथन करते हुए उसे तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है।

700 पृष्ठों के इस उपन्यास के पेपरबैक संस्करण की कीमत ₹450/- रुपए है और इसके प्रकाशक हैं डायमंड बुक्स। उपन्यास का कवर बहुत पतला है। एक बार पढ़ने पर ही मुड़ कर गोल होने लगा। अंदर के कागजों की क्वालिटी ठीकठाक है।फ़ॉन्ट्स का साइज़ थोड़ा और बड़ा होना चाहिए था। इन कमियों की तरफ ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। आने वाले भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।


अमेरिका में 45 दिन- सोनरूपा विशाल


किसी भी देश, उसकी सभ्यता, उसके रहन सहन..वहाँ के जनजीवन के बारे में जब आप जानना चाहते हैं तो आपके सामने दो ऑप्शन होते हैं। पहला ऑप्शन यह कि आप खुद वहाँ जा कर रहें और अपनी आँखों से...अपने तन मन से उस देश...उस जगह की खूबसूरती...उस जगह के अपनेपन को महसूस करें। दूसरा ऑप्शन यह होता है कि आप वहाँ के बारे में किसी ऐसे व्यक्ति से जानें जो वहाँ पर कुछ वक्त बिता चुका हो। 

अब ये तो ज़रूरी नहीं कि आपकी किस्मत इतनी अच्छी हो कि आप चाहें और तुरंत ऐसा व्यक्ति  आपके सामने हाज़िर नाज़िर हो जाए और अगर हो भी जाए तो ये कतई ज़रूरी नहीं कि वह आपको...अपने अनुभव..आपकी ही सुविधानुसार..आपके द्वारा ही तय किए गए समय के मुताबिक अपने अनुभव आपको सुनाने को बेताब हो। यहाँ ये बात काबिल ए ग़ौर है कि बेताब व्यक्ति ही आपके सामने  खुले मन और खुले दिल से अपने दिल की...अपने मन की बात रख सकता है।

ऐसे में हमारे सामने ये दुविधा उत्पन्न हो जाती है कि अव्वल तो ऐसे आदमी को ढूंढें कहाँ से और चलो..अगर घणी मशक्कत के बार अगर ऐसा मानुस मिल भी गया तो क्या गारेंटी है कि वह अपने अनुभव सुनाने को हमारी ही जितनी उत्कंठा और बेताबी को महसूस कर रहा होगा? ऐसे में काम भी बन जाए और लाठी भी ना टूटे, इसके लिए बढ़िया यही होगा है कि हम किसी के लिखे यात्रा वृतांत को पढ़ें। 

अब उस यात्रा वृतांत को लिखने वाले ने खामख्वाह ही तो लिख नहीं डाला होगा। जब उसके जज़्बातों ने मन की चारदीवारी से बाहर निकल औरों को भी अपने अनुभव का साझीदार बना डालने की ठानी होगी, तभी उसने अपने कीमती समय में  से समय निकाल अपने भावों को...अपने अनुभवों को...अपने उदगारों को अपनी लेखनी के ज़रिए पहले शब्दों के रूप में और फिर उन्हीं शब्दों को किताब का रूप दिया होगा।

दोस्तों...आज मैं बात कर रहा हूँ प्रसिद्ध कवियत्री सोनरूपा विशाल जी के द्वारा लिखे गए "अमेरिका में 45 दिन" नामक यात्रा वृत्तांत की। इस किताब में 1980 में अमेरिका जा कर बस गए भारतीयों द्वारा स्थापित 'अंतराष्ट्रीय हिंदी समिति' द्वारा आयोजित उनके अमेरिका और कनाडा के अलग अलग शहरों में हुए 24 कवि सम्मेलनों और उनके चक्कर में हुए 45 दिन के प्रवास की बातें हैं। इस सफ़र में उनके साथी थे हास्य व्यंग्य के प्रसिद्ध मंचीय कवि सर्वेश अस्थाना और मुम्बई से गौरव शर्मा। मूलतः कवियत्री होने की वजह से उनके लेखन में जगह जगह पद्य की झलक भी दिखाई देती है। 

उनकी इस यात्रा संस्मरण में ज़रिए हम अमेरिका के डैलस, इंडियाना पोलीस, डेट्रॉयट, डेटन, शिकागो, टोलीडो और क्वींस लैंड आदि शहरों के बारे में जान पाते हैं कि किस तरह अमेरिका के विभिन्न शहरों में भारतीय अपने अथक परिश्रम के बल पर आज उस देश का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन बैठे हैं और वहाँ पर अपने देश की संस्कृति तथा अपने देश के रीति रिवाजों को शिद्दत के साथ संजोए बैठे हैं। 

बेशक अमेरिका में रहने वाले भारतीयों की वेशभूषा पर पाश्चात्य की झलक ने अपना थोड़ा बहुत असर दिखाया हो लेकिन अपनी मिट्टी से अपने जुड़ाव...अपने लगाव की वजह से तीज त्योहारों के मौके पर वे अपने भारतीय परिधानों को पहनना नहीं भूलते हैं। देसी व्यंजनों और उनके तड़के की महक अब भी उनकी रसोई से निकल अपने आसपास के वातावरण को महकाती है।

इस वृतांत में उन्होंने बात की अपने प्रवास के दौरान आने वाले विभिन्न शहरों और उनकी खासियतों की। उन्होंने बात की कोलंबस में बसे उर्दू पसंद करने वाले पाकिस्तानी और भारतीय श्रोताओं की। उन्होंने बात की अटलांटा के युवा वालेंटियर्स और हिंदी के प्रति उनके लगाव की। उन्होंने बात की वहाँ पढ़ाई जाने वाली हिंदी और वहाँ के स्वामी नारायण मंदिर की।उनकी इस किताब से एक और खासियत अमेरिका के मंदिरों की पता चली कि वहाँ एक ही मंदिर में साथ साथ भारत के सभी भगवानों की मूर्तियां विराजमान होती हैं भले ही वह दक्षिणी राज्यों में पूजे जाने वाले  कोई भगवान हों अथवा भारत के किसी अन्य हिस्से के। 

इस किताब में उन्होंने बात की अमेरिका और कनाडा के दोनों तरफ से बहते नियाग्रा प्रपात की। इसमें बात है नैशविल, पिट्सबर्ग, हैरिसबर्ग, फिलाडेल्फिया, फीनिक्स और न्यूयॉर्क आदि शहरों की। इसमें बात है 
बोस्टन, वाशिंगटन, रिचमंड और रालेह की। उन्हीं की किताब से जाना की ह्यूस्टन के डाउन टाउन और सिएटल की ख़ासियत वहाँ के टनल्स हैं। वहाँ गर्मी से बचने के पूरा शहर ज़मीन के ऊपर और आवाजाही के लिए टनल्स ज़मीन के नीचे बनी हुई हैं।

इस किताब के ज़रिए हमें  पता चलता है कि अमेरिका में होने वाले किसी भी शादी अथवा रिसैप्शन में खाना और ब्रंच तो मेज़बान देते हैं लेकिन  होटल और कार रेंट वगैरह का खर्चा मेहमान खुद वहन करते हैं। और बहुत महँगा देश होने की वजह से वहाँ पर घर-दफ़्तर की सफाई से ले कर अपने आसपास उग आई बेतरतीब घास काटने तक के काम खुद ही करने पड़ते हैं लेकिन इस स्वावलंबन और आत्मनिर्भर होने के चक्कर में सब वहाँ आत्मकेंद्रित से होते जा रहे हैं। 

आमतौर पर कवि सम्मेलनों में भारी भीड़ का समावेश होता है लेकिन जब एक कवि सम्मेलन के लिए श्रोताओं की भारी कमी पड़ गयी तो भी इन  कवियों की तिकड़ी की दाद देनी होगी कि इन्होनें कार्यक्रम को कैंसिल करने के बजाय आयोजक का मनोबल बढ़ाना उचित समझा और महज़ 16 श्रोताओं के लिए भी पूरे मनोयोग से कार्यक्रम किया। 

इस किताब के ज़रिए पता लगा क्लीवलैंड के नज़दीक एक आदिम प्रवृत्ति वाले गांव की जो आज भी सरकार द्वारा प्रदत्त बिजली और तमाम तरह की आधुनिक सुविधाओं से दूर है। वहाँ पर आज भी बैलों द्वारा ही खेतों को जोता जाता है तथा लैंप द्वारा घरों में रौशनी की जाती है। अब चूंकि वे सरकार द्वारा दी जाने वाली किसी भी सुविधा का उपयोग नहीं करते हैं तो टैक्स भी नहीं देते हैं। इसके ठीक विपरीत हमारे देश में बहुत सी सरकारी सुविधाओं का प्रयोग करते हुए भी बहुत से लोग डायरेक्ट टैक्स के रूप में सरकार को धेला तक नहीं थमाते हैं।

इसी किताब से हमें पता चलता है कि हमारे यहाँ लोग जबकि ठीकठाक...ज़िंदा...स्वस्थ आदमी की भी परवाह नहीं करते और बेधड़क अपनी गाड़ी उन पर चढ़ा देते हैं वहीं अमेरिका में विकलांगों और बच्चों और जानवरों तक की तरफ भी इस हद तक ध्यान दिया जाता है कि जिस कॉलोनी में ऑटिज़्म की बीमारी ग्रस्त अगर कोई बच्चा रहता है तो कॉलोनी के बाहर एक बोर्ड लगा दिया जाता है 'ऑटिज़्म चाइल्ड' के नाम से कि वहाँ चालक गाड़ी धीरे से चलाएँ।

 इस यात्रा वृतांत को पढ़ते वक्त दो बार सुखद एहसास से मैं रूबरू हुआ जब इसमें मुझे हमारे समय के दो महत्त्वपूर्ण साहित्यकारों...तेजेन्द्र शर्मा और सुधा ओम ढींगरा जी का जिक्र मिला। पहली बार तब, जब बारिश के बीच जॉन एफ कैनेडी की कब्र देखने का कार्यक्रम और वहाँ की पार्किंग में गाड़ियों की भीड़ की बात हुई कि उसमें प्रख्यात साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा जी का उनकी कहानी 'ओवर फ्लो' (जो हंस पत्रिका में छपी थी) का जिक्र आया कि उसमें भी बारिश और क्रेमेटोरियम का जिक्र है। और दूसरी बार तब जब अमेरिका में रह रही विख्यात लेखिका सुधा ओम ढींगरा जी से उनकी मुलाक़ात और उनसे हुए लेखिका के साक्षात्कार को उन्होंने अपने इस यात्रा वृतांत का हिस्सा बनाया। 

इस किताब में लेखिका ने कई स्थानों पर अपने अमेरिका प्रवास के फोटो भी लगाए हैं जो किताब के कंटैंट को विश्वसनीय तो बनाते हैं मगर उन फोटोग्राफ्स को किताब में स्थान देते वक्त प्रकाशक से चूक हो गयी है कि उसने फोटोग्राफ्स की ब्राइटनेस और क्लीयरिटी पर ध्यान नहीं दिया जिसकी वजह से ज़्यादातर फोटो एकदम काले आए  हैं जिसकी वजह से किताब की साख पर एक छोटा सा ही सही मगर बट्टा तो लगता है। उम्मीद है कि किताब के आने वाले संस्करणों को इस तरह की त्रुटियों से मुक्त रखा जाएगा।
 
अगर आप अमेरिका और वहाँ के शहरों के बारे में  जानने और उसे ले कर अपने मन में फैली हुई भ्रांतियों को दूर करने के इच्छुक है तो सरल...प्रवाहमयी भाषा में लिखी गयी यह किताब आपके मतलब की है। 120 पृष्ठीय इस यात्रा वृतांत की किताब के पेपरबैक संस्करण को छापा है हिन्दयुग्म ब्लू ने और इसका बहुत ही जायज़ मूल्य मात्र ₹100/- रखा गया है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

अक्कड़ बक्कड़- सुभाष चन्दर

आम तौर पर हमारे तथाकथित सभ्य समाज दो तरह की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। एक कामकाजी लोगों की और दूसरी निठल्लों की। हमारे यहाँ कामकाजी होने से ये तात्पर्य नहीं है कि...बंदा कोई ना कोई काम करता हो या काम के चक्कर में किसी ना किसी हिल्ले से लगा हो अर्थात व्यस्त रहता हो बल्कि हमारे यहाँ कामकाजी का मतलब सिर्फ और सिर्फ ऐसे व्यक्ति से है जो अपने काम के ज़रिए पैसा कमा रहा हो। ऐसे व्यक्ति जो किसी ना किसी काम में व्यस्त तो रहते हों  लेकिन उससे धनोपार्जन बिल्कुल भी ना होता हो तो उन्हें कामकाजी नहीं बल्कि वेल्ला या फिर निठल्ला भी कहा जाता है।

ऐसे लोगों के लिए पुराने लोगों को कई बार कहते सुना था कि खाली बैठे आदमी का दिमाग शैतान का होता है। उसे हर वक्त कोई ना कोई शरारत..कोई ना कोई खुराफ़ात ही सूझती रहती है। अब बंदा कुछ करेगा धरेगा नहीं तो भी तो उसे किसी ना किसी तरीके अपना समय तो व्यतीत करना ही है। तो ऐसे में इस तरह की प्रजाति के लोगों को कोई ना कोई शरारत...कोई ना कोई खुराफ़ात...कोई ना कोई शैतानी अवश्य सूझती है जिससे कि दूसरे को परेशान और खुद का मनोरंजन किया जा सके।

                  ऐसे लोगों पर ना शहरों का...ना कस्बों का और ना ही गांवों का एकाधिकार पाया जाता है। इस तरह के निठल्ले लोग सर्वत्र याने के हर तरफ...हर दिशा में पाए जाते हैं। ऐसे ही वेल्ले लोगों को ध्यानाकर्षण का केंद्र बना कर सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार सुभाष चन्दर जी ने अपने व्यंग्य उपन्यास "अक्कड़ बक्कड़" का पूरा ताना बाना रचा है। 

इस उपन्यास में कहानी है नंगला नाम के एक गांव की जिसे जलन वश अन्य गांवों वालों के द्वारा कंगलों का नंगला भी कहा जाता है। आतिथ्य देवो भव की तर्ज पर इस गांव के निवासी अपने गांव में आने वाले लोगों का फजीहत की शक्ल में स्वागत करने से कतई नहीं चूकते हैं। निठल्ले युवाओं में ठरकीपना, लालच, चुगली तथा मारपीट जैसी सहज सुलभ इच्छाओं एवं खासियत का स्वत: ही प्रचुर मात्रा में समावेश हो जाता है। इस गांव में हर बुराई..हर कमी को तर्कसंगत ढंग से एक उपलब्धि के तौर पर लिया जाता है और बुरे व्यक्ति का सर्वसम्मति से अपने सामर्थ्यनुसार यशोगान तथा महिमामंडन भी किया जाता है।

इस एक उपन्यास के ज़रिए उन्होंने हमारे पूरे ग्रामीण  एवं कस्बाई समाज का नक्शा हमारे सामने हूबहू उतार के रख दिया है। जहाँ एक तरफ उनके उपन्यास में मारपीट, दबंगई, हफ्ता वसूली, अक्खड़पने जैसे सहज आकर्षणों के चलते गांव देहात के युवाओं में पुलसिया नौकरी की तरफ रुझान पैदा होने की बात है तो वहीं दूसरी तरफ इसमें आदर्श ग्राम जैसी थोथी सरकारी घोषणाएं, सफाई, कीचड़..बदबू से बदबदाती कच्ची नालियाँ की पोल खोलती पंक्तियाँ भी हैं। उनकी पारखी नज़र से सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा और उनमें अध्यापकों की गैरहाज़िरी भी बच नहीं पायी है।

इसमें गांव- कस्बों की टूटी सड़कों के साथ साथ  बिजली की लगातार चलती आंखमिचौली की बात है तो इसमें अस्पतालों, डॉक्टरों और मेडिकल सुविधाओं की कमी का जिक्र भी है। इसमें गरीबी, बेरोज़गारी, लूटमार, ठगी, राहजनी इत्यादि का  वर्णन है तो उसी ठसके के साथ इसमें विकास के नाम पर धांधली और उसमें गांव के मुखियाओं का कमीशन को लालायित होना भी है। इसमें बेवजह मांग से उत्पन्न होता भ्रष्टाचार है तो भ्रष्टाचार की वजह से राजनीति में पदार्पण का सहज आकर्षण भी अपने चर्मोत्कर्ष पर है। इसमें भाइयों के आपस के झगड़े और उन झगड़ों से फ़ायदा उठा, उन्हें शातिर किस्म के कमीने और काइयां वकीलों के चंगुल में फँसा कर फायदा उठाते  बिचौलिए भी हैं। 


इसमें भारतीय रेल और उसकी एक्प्रेस ट्रेनों तथा जनरल बोगी की दुर्दशा है तो इसमें बिना टिकट यात्रियों, ठगों तथा लंपटों की वजह से छेड़खानी का शिकार होती युवतियों तथा प्रौढ़ाओं का भी विस्तार से वर्णन है। इसमें अगर चलते पुर्ज़े और मजनूँ टाइप के आवारागर्द लड़के हैं तो चालू किस्म की चुलबुलाती लड़कियाँ भी कम नहीं हैं। इसमें चुनाव और उसके ज़रिए  सरकारी पैसे से अपना..खुद का विकास करने की मंशा वाले लोग हैं तो दूसरी तरफ चुनावों में मुफ्त की दारू और साड़ी वगैरह पाने के इच्छुक भी बहुतेरे हैं। इसमें चुनावों के दौरान पनपता जातिगत संघर्ष है तो इसमें जुगाड़ू, खुराफ़ाती,ऐय्याश, दबंग लोगों को महिमामंडित किया जाना भी है। इसमें पुलिस की जबरन वसूली, उनकी दबंगई, उनकी आपसी खींचतान और पुलसिया पैंतरे भी कम नहीं हैं।

 बहुत ही रोचक अंदाज़ में लिखे गए इस धाराप्रवाह उपन्यास का हर पृष्ठ यकीन मानिए आपको हँसी के..आनंद के कुछ ना कुछ पल अवश्य दे कर जाएगा। हालांकि इस उपन्यास में एक किरदार की जोधपुर यात्रा के आने जाने का वर्णन मुझे थोड़ा लंबा और खिंचा हुआ लगा जिसे थोड़ा छोटा किया जा सकता था लेकिन इस बात के लिए भी लेखक बधाई के पात्र हैं कि उन पृष्ठों को भी उन्होंने उबाऊ नहीं होने दिया है और किसी ना किसी रूप में, उन्हीं पृष्ठों में हमारे समूचे कस्बाई भारत का एक खाका सा हमारे सामने बहुत ही सहज एवं सरल ढंग से रख दिया है। 

अपनी पंक्तियों और कथानक में "रागदरबारी" शैली की झलक दिखाते इस मज़ेदार उपन्यास को पढ़ने के बाद सहज ही विश्वास होने लगता है कि हमारे देश में भी ब्लैक ह्यूमर लिखने वाले दिग्गज अब भी मौजूद हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि उनके इस उपन्यास पर जल्द ही कोई वेब सीरीज़ या फिर सीमित श्रृंखलाओं का कोई सीरियल बनता दिखे।

160 पृष्ठीय इस मज़ेदार संग्रहणीय उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है भावना प्रकाशन ने और उसका बहुत ही जायज़ मूल्य ₹200/- मात्र रखा गया है जिसके लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत बहुत बधाई। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

कौन..किसकी..कहाँ सुनता है?


(डायनिंग टेबल पर क्रॉकरी सैट करते करते श्रीमती जी कैमरे से मुखातिब होते हुए।)

हाय फ्रैंडज़...कैसे हैं आप?
उम्मीद है कि बढ़िया ही होंगे। मैं भी एकदम फर्स्ट क्लास। और सुनाएँ..कैसे चल रहा है सब? सरकार ने भले ही लॉक डाउन खोल दिया है लेकिन अपनी चिंता तो भय्यी..हमें खुद ही करनी पड़ेगी। क्यों?...सही कहा ना मैंने?

दरअसल इस लॉक डाउन ने हमें बहुत कुछ सिखा और समझा दिया है। कई लोगों के नए यूट्यूब चैनल बन गए और कइयों के पुराने यूट्यूब चैनल फिर से रंवा हो.. एक्टिव हो गए। बहुत से लोगों ने वीडियो देख देख के बढ़िया खाना बनाने और खाने के साथ साथ यूट्यूब के ज़रिए लोगों को सिखाना भी शुरू कर दिया। मिठाई और खाना वगैरह तो छोड़ो.. हेयर कटिंग करना वगैरह भी खुद ही करना सीख लिया। यूँ समझ लीजिए कि इस लॉक डाउन में जहाँ लोगों ने बहुत कुछ अगर गंवाया है तो बहुत कुछ सीख कर कमाया भी है।

सैनीटाइज़र...मास्क और होम सैनिटाइज़ेशन जैसे नए नए धंधे सामने उभर आए हैं। अब आप ये कहेंगे कि उनमें भी अब कंपीटीशन हो गया है। जिस सैनिटाइज़र की बोतल पहले 1000-1100 में लाइन लगा के बिक रही थी वो अब छह- साढ़े छह सौ में धक्के खा रही है। तो ये सब तो भय्यी...होना ही था। शुरू शुरू में तो सभी चाँदी कूटते हैं। असली आटे दाल का भाव तो बाद में ही पता चलता है।

अब ये ले के चलो कि हमारे देश की आबादी बहुत है तो इस कारण ये तो लाज़मी ही है कि हर धंधे में कंपीटीशन ने तो खैर बढ़ना ही है लेकिन इससे आपको बिल्कुल भी घबराना नहीं है। जहाँ औरों को बिरियानी मिल रही है तो चिंता ना करें..आपको भी केसरी या फिर तवा पुलाव तो खैर...मिल ही जाएगा।

अरे!...हाँ...तवा पुलाव से याद आया कि आज तो मैं लंच में तवा पुलाव बनाने जा रही थी। कैसा लगता है आपको तवा पुलाव? ऐसे तो कल की दाल बची पड़ी है लेकिन मुझे ना...हमेशा फ्रैश ही खाने की आदत है। फ्रैश खाने की तो बात ही निराली है। पता नहीं लोग कैसे एक दो दिन पुराना..बचा हुआ खाना खा लेते हैं। और फिर मुझे तो सच्ची तवा पुलाव के साथ रायता ना बड़ा ही यम्मी लगता है और लगे भी क्यों ना? उसे आखिर बनाता ही कौन है? मैं बनाती हूँ जनाब...मैं और भला कौन बनाएगा? ये तो हमेशा किताबों में  ही घुसे रहते हैं। एक मिनट...

"हाँ!...सुनो...आज कौन सी किताब पढ़ रहे हो?"

"अरे!...बड़ा मज़ेदार नॉवेल है अपने सुभाष चन्दर जी का "अक्कड़-बक्कड़"। पढ़ने वाला हँस हँस के पागल हो जाएगा इतना मज़ेदार लिखा है।"

"लेकिन तुम तो एकदम सीरियस हो के बता रहे हो।"

"अब इसमें में क्या कर सकता हूँ? ऊपरवाले से चौखटा ही ऐसा दिया है।"

"तो?...इसका मतलब तुम्हें हँसी आती ही नहीं है?"

"आती क्यों नहीं है?..बिल्कुल आती है...रोज़ ही किसी ना किसी बात पे आ जाती है।"

"कब?...मैंने तो तुम्हें कभी हँसते हुए नहीं देखा।"

"अरे!...मैं मन में हँस लेता हूँ ना। इसलिए तुम्हें नहीं पता चलता।"

"कमाल है...चलो!...ठीक है...तुम पढ़ो अपना आराम से।"

ये बंदा भी बताओ कैसा पल्ले पड़ गया है मेरे। हँसेगा तो वो भी मन में। बताओ भला कोई ऐसे कैसे मन में हँस सकता है? खैर छोड़ो...हम बात कर रहे थे "अक्कड़ बक्कड़" की ऊप्स!....सॉरी तवा पुलाव की तो चलिए आज मैं आपको तवा पुलाव बनाना सिखाती हूँ...आप भी क्या याद करेंगे कि किसी दिलदार से पाला पड़ा था। वैसे तो खैर आपने नोट किया ही होगा कि आजकल लोग दूसरों को कुछ भी सिखाने से कतराते हैं भले ही वो मोबाइल हो, कम्प्यूटर हो या फिर लैपटॉप हो। बताओ!...ये भी कोई बात हुई?

अगर आप में कोई हुनर... कोई टैलेंट ऊपरवाले ने आपको एज़ ए गिफ्ट दे दिया है तो उसे दूसरों में भी बाँटो लेकिन नहीं...उन्होंने तो अपने ज्ञान...अपने टैलेंट को अपने साथ...अपनी छाती पे बाँध के साथ ऊपर ले जाना है। बेवकूफों को ये नहीं पता चलता कि बाँटने से ज्ञान घटता नहीं बल्कि बढ़ता है। तो फ्रैंडज़ आप भी तवा पुलाव का ए टू ज़ैड सीखना चाहेंगे ना? चलिए!...ठीक है फिर हम शुरू करते हैं।

बढ़िया खाना बनाने का सबसे पहला रूल होता है कि सब ज़रूरी चीजों और मसालों को आप पहले ही किचन के प्लैटफॉर्म पर सजा लें। आपकी किचन बिल्कुल भी मैस्सी नहीं दिखनी चाहिए। दरअसल साफ सुथरी किचन में खाना बनाने का अपना अलग ही मज़ा है। दरअसल सफाई....चलिए!...छोड़िए...
सफाई की बात किसी अन्य वीडियो में। अभी अगर सफाई पर लैक्चर देना शुरू किया ना तो मेरा तवा पुलाव बस ऐसे ही बिना बने धरा का धरा रह जाएगा। चलिए!...अब हम मुद्दे से ना भटकते हुए सीधे काम की बात याने के तवा पुलाव की बात करते हैं।

तो सबसे पहले आप बढ़िया क्वालिटी के एक ग्लास  बासमती चावल कम से कम आधा घँटा पहले भिगो के रख लें और अगर घर में बढ़िया वाले चावल ना हों तो आप टेंशन ना लें। आप नार्मल चावल भी इस्तेमाल कर सकते हैं। वैसे एक बात बताऊँ...ये बढ़िया और घटिया चावल की बात ना बस..मन का वहम है। असली स्वाद ना जीभ से ज़्यादा आपकी आँखों में होता है। अगर खाने की शक्ल अच्छी हो और आप उसे अच्छे मूड में  खाएँ तो यकीन मानिए...आपको सब कुछ अच्छा ही अच्छा लगेगा।

खैर!... जब तक आपके चावल भीग रहे हैं...तब तक आप ज़रूरी सब्ज़ियों जैसे अलग अलग रंग की शिमला मिर्च, बारीक टुकड़ों में कटे हुए आलू और पनीर के टुकड़े,नमक, मिर्च और जीरे के अलावा हल्दी, गरम मसाला, तेज पत्ता, कसूरी मेथी और हींग, छोटी बड़ी इलायची वगैरह सब अपने आसपास ही तैयार कर के रख लें।

इसके बाद सब्ज़ियों में आप लाल, पीली और हरी वाली शिमला मिर्च को बारीक बारीक टुकड़ों में काट लें। ध्यान रहे कि आपने  टुकड़े बारीक काटने हैं...उनके ये लंबे लंबे लच्छे नहीं बनाने हैं। आप तवा पुलाव बनाने जा रहे हैं ना कि चाउमीन या फिर कढ़ाही पनीर। उनकी रेसिपी किसी और दिन। आज हम सिर्फ और सिर्फ तवा पुलाव की बात करेंगे।

अब लगने को तो कई लोगों को लग सकता है कि लाल और पीली शिमला मिर्च तो बड़ी महँगी आती है। ये तो हमारा कूंडा करवाएगी या फिर भट्ठा बिठाएगी। तो फ्रैंडज़...ऐसे में आप इन दोनों रंगों की शिमला मिर्च को स्किप भी कर सकते हैं और वैसे भी इनसे स्वाद वगैरह तो कुछ खास बढ़ता नहीं है। बस दिल को ही मानसिक संतुष्टि होती है कि आप कुछ महँगी...कुछ रॉयल चीज़ खा रहे हो। आप सिर्फ सिंपल वाली हरी शिमला मिर्च भी इस्तेमाल कर सकते हैं। यकीन मानिए कि इससे स्वाद में उन्नीस बीस का भी फर्क नहीं पड़ेगा।

अब यहाँ पर कुछ लोग इस बात पर ऑब्जेक्शन उठा सकते हैं कि उन्हें शिमला मिर्च से एलर्जी है या फिर पनीर तो उन्हें जड़ से ही पसंद नहीं है और आप बात कर रही हैं उन्हें बनाने और खाने की? तो ऐसे में मैं अपने दोस्तों को ये कहना चाहूँगी कि भय्यी...अगर नहीं पसंद है तो मत खाइए। कौन सा ये एंटी रैबीज़ का इंजेक्शन है कि ठुकवान ही पड़ेगा?

उफ्फ!....हमारे यहाँ तो आज बहुत गर्मी है और ऊपर से ए.सी भी सही से काम नहीं कर रहा। इससे तो अच्छा मैं कल की पड़ी दाल के साथ दो फुल्के ही सेंक लेती। हाँ!...ये आईडिया बढ़िया है। मैं अभी फुल्के ही सेंक लेती हूँ। कौन सा मेरी बहुत बड़ी खुराक है जो मैं ये सब पंगे लेती फिरूँ? अभी पिछले साल ही तो तवा पुलाव खाया था पड़ोसियों के घर में।

तो फ्रैंडज़...जैसा कि आपने देखा...मेरा तवा पुलाव बनाने का प्रोग्राम तो फिलहाल कैंसिल हो ही चुका है तो अब आप भी आयोडेक्स मलिए और काम पर चलिए और हाँ!... अगर ज़्यादा ही मूड कर रहा हो तवा पुलाव खाने का तो आप यूट्यूब से दो चार रेसिपी देखिए और फिर अपनी मर्ज़ी से उनमें कुछ भी फेरबदल कर के बनाइए और खाइए। मैंने भी तो वहीं से देखना और फिर अपनी मर्ज़ी से कुछ घटा बढ़ा के बनाना था। वैसे भी ए टू ज़ेड आजकल भला कौन कहाँ किसकी सुनता और मानता है? 


शार्ट वीडियो का लिंक

https://youtu.be/taWDE0W9H1c



अंधेरे कोने@ फेसबुक डॉट कॉम


जिस तरह एक सामाजिक प्राणी होने के नाते हम लोग अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए आपस में बातचीत का सहारा लेते हैं। उसी तरह अपनी भावनाओं को व्यक्त करने एवं उनका अधिक से अधिक लोगो  तक संप्रेषण करने के लिए कवि तथा लेखक,गद्य अथवा पद्य, जिस भी शैली में वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में सहज महसूस करते हैं, को ही अपनी मूल विधा के रूप में अपनाते हैं। मगर कई बार जब अपनी मूल विधा में वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में खुद को असमर्थ पाते हैं भले ही इसकी वजह विषय का व्यापक होना हो अथवा अत्यंत संकुचित होना हो। तब अपनी मूल शैली को बदल, वे गद्य से पद्य या फिर पद्य से गद्य में अपने भावों को स्थानांतरित कर देते हैं।

ऐसे में पद्य छोड़ कर जब कोई कवि गद्य के क्षेत्र में उतरता है तो उम्मीद की जाती है कि उसकी लेखनी में भी उसकी अपनी शैली याने के पद्य की ही किसी ना किसी रूप में बानगी देखने को मिलेगी और उस पर भी अगर वह कवि, वीर रस याने के ओज का कवि होगा तो सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उसके गद्य लेखन में भी जोश खरोश और ओज की कोई ना कोई बात अवश्य होगी। मगर हमें आश्चर्यचकित हो तब आवाक रह जाना पड़ता है जब अपनी मूल विधा याने के पद्य का लेशमात्र भी हमें उनके गद्य में दिखाई नहीं देता।

दोस्तों...आज मैं बात कर रहा हूँ ओज के जाने माने मंचीय कवि अरविंद पथिक जी और उनके लिखे नए उपन्यास "अंधेरे कोने@फेसबुक डॉट कॉम" की। पहले उपन्यास और फिर उसके लेखक के रूप में अरविंद पथिक जी के नाम को देख एक सहज सी जिज्ञासा मन में उठी कि आखिर एक ओज के कवि को उपन्यास जैसी कठिन विधा में उतरने के लिए बाध्य क्यों होना पड़ा? दरअसल उपन्यास का कैनवास ही इतना बड़ा एवं विस्तृत होता है कि  उसमें हमें शब्दों से खेलने के लिए एक विस्तृत एवं व्यापक विषय के साथ साथ उसमें मौजूद ढेरों अन्य आयामों की आवश्यकता होती है। 

जिस तरह पूत के पाँव पालने में ही नज़र आ जाते हैं ठीक उसी तरह उपन्यास के शुरुआती पन्नों को पढ़ने से ही यह आभास होने लगता है लेखक इस क्षेत्र में भी लंबी रेस का घोड़ा साबित होने वाला है। भावुकता से लबरेज़ इस उपन्यास में कहानी है फेसबुक चैट/मैसेंजर से शुरू हुई एक हिंदू-मुस्लिम प्रेम कहानी की। इसमें कहानी है एक ऐसे प्रौढ़ प्रोफेसर की जो अपनी विद्वता...अपने ज्ञान, अपनी तर्कशीलता, अपनी वाकपटुता, अपने व्याख्यानों एवं अपने वक्तव्यों  की वजह से शहर के बुद्धिजीवी वर्ग में एक खासा अहम स्थान रखने के बावजूद भी अपने से बहुत छोटी एक युवती के प्रेम में गिरफ्त हो जाता है। इसमें कहानी है ज़ोया खान नाम की एक मुस्लिम युवती की जो अपने से 15 साल बड़े एक प्रोफेसर को अपना सब कुछ मान चुकी है और उसके लिए हर बंधन...हर पाबंदी से किसी भी कीमत पर निबटने को आमादा है।

इसमें कहानी है फेसबुक जैसे सोशल मीडिया की वजह से कुकुरमुत्तों के माफिक जगह जगह उपजते एवं ध्वस्त होते प्रेम संबंधों की। इसमें कहानी है उज्जवल भविष्य की चाह में बीसियों लाख की रिश्वत देने को तैयार युवक और  शिक्षा माफिया की। इसमें कहानी है सोशल मीडिया के आकर्षण और उससे मोहभंग की। इसमें कहानी है प्यार, नफरत और फिर उमड़ते  प्यार की। इसमें कहानी है ज़िम्मेदारी का एहसास होने पर अपने वादे से पीछे हट अपने प्यार को नकारने की...अपनी भूल को सुधारने और अपने प्रायश्चित की। इसमें कहानी है अलग अलग जी रहे प्रेमी युगल को जोड़ने वाली लेखक रूपी कड़ी की।

इस उपन्यास को पढ़ते वक्त एक अलग तरह का प्रयोग देखने को मिला कि  पूरी कहानी कृष्ण और मीरा के अमिट प्रेम की शक्ल अख़्तियार करते हुए लगभग ना के बराबर वर्तमान या फिर पुरानी चिट्ठियों, डायरियों अथवा फ्लैशबैक के माध्यम से आगे पीछे चलती हुई कब संपूर्ण कहानी का रूप धर लेती है...आपको पता भी नहीं चलता। 

उपन्यास की भाषा सरल एवं प्रवाहमयी है और पाठक को अपनी रौ में अपने साथ बहाए ले चलने में पूरी तरह से सक्षम है। अंत तक रोचकता बनी रहती है। हालांकि कुछ जगहों पर एक पाठक के नज़रिए से मुझे कहानी थोड़ी सी खिंची हुई सी भी लगी। उपन्यास में दिए गए प्रोफ़ेसर के व्याख्यानों को थोड़ा छोटा या फिर जड़ से ही समाप्त किया जा सकता था लेकिन उन्हें मेरे ख्याल से उपन्यास के मुख्य किरदार को डवैलप करने के लिहाज़ से रखा गया हो सकता है या फिर उपन्यास की औसत पृष्ठ संख्या को पूरा करने के हिसाब से भी शायद कहानी को बढ़ाया गया हो। 

उपन्यास में लेखक की भूमिका पर नज़र दौड़ाने से पता चलता है कि यह उपन्यास उन्होंने 2019 में लिखा और कहानी के माध्यम से हमें पता चलता है कि उसमें पिछले 15 से 20 वर्षों की कहानी को समाहित किया गया है। यहाँ पर इस हिसाब से देखा जाए तो उपन्यास में तथ्यात्मक खामी नज़र आती है कि...कहानी की शुरुआत सन 2000 के आसपास होनी चाहिए जबकि असलियत में फेसबुक की स्थापना ही सन 2004 में पहली बार हुई थी। इस खामी को अगर छोड़ भी दें तो दूसरी ग़लती यह दिखाई देती है कि फेसबुक ने पहली बार चैट की सुविधा सन 2008 में शुरू की थी और उसके मैसेंजर वाले वर्ज़न को महज़ 8 साल और दस महीने पहले ही पहली बार लांच किया गया था। जब आप आप अपनी कहानी में कहीं किसी चीज़ का प्रमाणिक ढंग से उल्लेख कर रहे होते हैं  तो आपका तथ्यात्मक रूप से भी सही होना बेहद ज़रूरी हो जाता है। उम्मीद है कि इस उपन्यास के आने वाले संस्करणों में इस कमी को दूर करने की तरफ लेखक तथा प्रकाशक, दोनों ध्यान देंगे।

160 पृष्ठीय इस उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है यश पब्लिकेशंस ने और इसका मूल्य ₹199/- मात्र रखा गया है जो कि उपन्यास की क्वालिटी एवं कंटेंट को देखते हुए जायज़ है।आने वाले भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।
 
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