लिखी हुई इबारत- ज्योत्सना 'कपिल'

तात्कालिक प्रतिक्रिया के चलते किसी क्षण-विशेष में उपजे भाव, घटना अथवा विचार, जिसमें कि आपके मन मस्तिष्क को झंझोड़ने की काबिलियत हो..माद्दा हो...की नपे तुले शब्दों में की गयी प्रभावी अभिव्यक्ति को लघुकथा कहते हैं। मोटे तौर पर अगर लघुकथा की बात करें तो लघुकथा से हमारा तात्पर्य एक ऐसी कहानी से है जिसमें सीमित मात्रा में चरित्र हों और जिसे एक बैठक में आराम से पढ़ा जा सके। आज लघुकथा का जिक्र इसलिए कि हाल ही में मुझे ज्योत्सना 'कपिल' जी का लघुकथा संग्रह "लिखी हुई इबारत" पढ़ने का मौका मिला। 

इस संग्रह में उनकी कुल 55 रचनाएँ हैं और इन्हें पढ़ कर आसानी से जाना जा सकता है कि ज्योत्सना जी के पास सहज मानवीय स्वभावों तथा संबंधों पर अच्छी जानकारी एवं पकड़ है। इसके अलावा वे अपने आसपास के माहौल से कहानियां एवं किरदार चुनने के मामले में पारखी नज़र रखती हैं। उनकी किसी रचना में अगर इस बात की तस्दीक होती दिखाई देती है कि प्रतियोगिता का असली मज़ा तभी आता है जब सामने खड़ा प्रतिद्वंद्वी भी उन्हीं की टक्कर का हो। तो वहीं उनकी कोई अन्य रचना बताती है कि माँ के लिए उसके बच्चे सदैव बच्चे ही रहते हैं जबकि बड़े होने पर उनके शौक एवं प्राथमिकताएं इस कदर बदल जाती हैं कि वे स्वयं बात बात पर अपने अभिभावकों का अपमान करने से भी नहीं चूकते हैं | 

इस संकलन की किसी रचना में नौकरी के दौरान शोषण, अपमान और बुरी नज़रें झेल रही पत्नी को पति द्वारा महज़ इसलिए चुप रहने के लिए कह दिया जाता है कि उसकी नौकरी की वजह से बच्चों की पढ़ाई, फ़्लैट तथा गाड़ी की किश्तें आराम से निकल रही हैं| तो कहीं किसी रचना में सरकारी अस्पतालों में हो रहे भ्रष्टाचार का जिक्र इस बात से किया गया है कि वहाँ पर नसबंदी के आपरेशन के दौरान धोखे से किसी मरीज़ की किडनी को निकाल लिया गया |

 कहीं किसी रचना में स्कूलों द्वारा बच्चों से प्रोजेक्ट के नाम पर बिना बात करवाए जाने वाले अनाप शनाप खर्चों के ऊपर गरीब माँ बाप की दुविधा एवं हताशा के हवाले से कटाक्ष किया गया है |

इस संकलन को पढ़ने के दौरान इसमें शामिल कई मुद्दों से रूबरू होना पड़ा जैसे...कहीं किसी बलत्कृत पीड़िता के विवाह को ले कर उत्पन्न होती दुविधा तो कहीं जुए में पत्नी को दांव पर लगाने की बात है। कहीं एसिड अटैक की घटना के माध्यम से इस बात की पुष्टि होती है कि कभी ना कभी घूम फिर कर हमारे गुनाह... हमारे बुरे कर्म..हमारे सामने आ ही जाते हैं। कहीं किसी रचना में विपदा के वक्त एक भाई दिग्भ्रमित तो होता है मगर जल्द ही चेत जाता है। कहीं किसी रचना में इनसान की धोखे वाली प्रवृत्ति पर जानवरों के माध्यम से कटाक्ष किया गया है। 

कहीं किसी रचना में जवान बच्चों पर अपनी मर्ज़ी थोपने से उत्पन्न होने वाले बुरे नतीजों के प्रति आगाह किया गया है तो कहीं किसी रचना में आधे अधूरे बाल श्रम उन्मूलन कानूनों के उलटे पड़ते नतीजों पर भी अपनी बात रखी गयी है। कहीं राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों में होती धांधली की बात है तो कहीं किसी रचना में देश की सुरक्षा का दुश्मन से सौदा करता पति दिखाई देता है। कहीं फूलों के माध्यम से पात्र कुपात्र की बात है तो कहीं नाम कमाने की अँधी होड़ और कीमत पर अपने घर परिवार की इज़्ज़त आबरू को तार तार हो..होम होते हुए दिखाया गया है। कहीं किसी वेश्या के त्याग से किसी संभ्रांत घर की इज़्ज़त बचाने की बात है तो कहीं इसमें स्वाभिमान के नाम पर अपने तय हो चुके रिश्ते को तोड़ती युवती की बात है। कहीं सज्जन कुसज्जन को ले कर होते मतिभ्रम का जिक्र है तो कहीं इसमें पैसा..शोहरत..नाम के मिल जाने के बाद रंग बदलने की बात है।

 कहीं इसमें सपनों के बनने और फिर टूटने की बात है तो कहीं इसमें पुरुषत्व के ज़रिए सज्जन दिखने वाले कुसज्जनों की ओछी हरकतें हैं। कहीं इसमें पैसा देख रंग और नज़रिया बदलते पति की बात है तो कहीं इसमें सही को ग़लत समझने की बात है। कहीं इसमें राखी जैसे पवित्र बन्धन में लेन देन को ले कर उपजते घाटे नफ़े की बात है तो कहीं इसमें गर्भवती हो सबकी निंदा सहती विक्षिप्त कामवाली को ले कर चुगली करने वाली को उसका अपना पति ही अकेले में..उसी विक्षिप्ता को रौंदता दिखाई देता है। 
 
कहीं अपने ब्याह का अरमान ले फौज से ड्यूटी कर लौटता युवक, घर पहुँचने पर अपनी चाहत को अपने ही विधुर पिता की पत्नी बने देखता है तो कहीं इसमें रद्दी के भाव बिकते साहित्य और साहित्यकारों की दुर्दशा के प्रति उदासीन होते समाज पर भी कटाक्ष किया गया है। कहीं किसी रचना में मज़ाक मज़ाक में किए जाने वाले मजाकों से उत्पन्न होने वाले नतीजों के प्रति भी आगाह किया गया है तो कहीं इसमें जन्नत और हूरों के मोह में मतिभ्रष्ट होते युवाओं को आईना दिखाने की भी बात है।

कहीं इसमें पैसों और सुख सुविधा के नाम पर पहले से विवाहित अमीरज़ादों के मोहपाश में जवान लड़कियाँ फँस तो जाती हैं मगर उनका भ्रम तब जा के टूटता है जब उनसे पहले वे अपने निजी परिवार को ज़्यादा तरजीह देते दिखाई देते हैं। 

यूँ तो सभी रचनाएं एक से एक महत्तवपूर्ण एवं ज्वलंत मुद्दों को समेटे हुए हैं और अपने कथाक्रम तथा रचनात्मक दृष्टि से भी उम्दा हैं मगर एक दो लघुकथाएं मुझे थोड़ा सा अनावश्यक विस्तार या फिर कोई कमी लिए हुए दिखी मसलन... एक लघुकथा ‘आइना’ शीर्षक से है जिसकी अंतिम पंक्ति का एक किरदार द्वारा कहा जाना ज़रूरी नहीं था| रचना उससे पहले ही अपना मंतव्य पूर्ण रूप से स्पष्ट कर चुकी थी| इसी तरह का एक और उदाहरण है ‘भगवान् या भूख’ नामक रचना जिसमें एक महिला किरदार अपने घर से मंदिर, भगवान को दूध पिलाने जाने के लिए निकलती है तो उसे दरवाज़े पर एक भिखारी, भिक्षा की याचना करता हुआ दिखाई देता है| जिसे वह दुत्कार कर लंबी लाइन लगे मंदिर में भगवान् के दर्शन करने चली जाती है| वहाँ भगवान् के आगे उसे अपनी ग़लती का एहसास होता है तो पछताती हुई वह मंदिर से बाहर निकलती है। बाहर निकलते ही उसे वही भिखारी, वहीं पर उसका इंतज़ार करते हुए मिलता है| अब सवाल यह उठता है कि कोई भिखारी दुत्कार दिए जाने के बावजूद घंटों तक सिर्फ एक भिक्षा के लिए कैसे किसी का और क्यों इंतज़ार करेगा? दूसरी त्रुटी इसी रचना में यह दिखाई दी कि भिखारी सिर्फ उसी से भिक्षा हेतु याचना करने के लिए उसके घर से मंदिर तक क्यों आया? या फिर तीसरी त्रुटि में यह भी हो सकता है कि उस भिखारी में साक्षात भगवान विद्यमान हों और उसकी परीक्षा ले रहे हों। अगर ऐसा है तो इस बात को स्पष्ट रूप से इंगित किया जाना जरूरी बनता है। कुछ भी कहें इस रचना में थोड़ा झोल झाल है जिसे सही से दुरस्त करने की ज़रूरत है| 

अब क़ाबिल ए गौर बात ये कि बढ़िया...धाराप्रवाह शैली में लिखी गयी इस संकलन की सभी रचनाओं में कुछ ना कुछ गौर करने लायक बात है मगर फिर भी कुछ चुनिंदा  रचनाएं मुझे बहुत बढ़िया लगी | जिनके नाम इस प्रकार हैं: 

• चुनौती
• कब तक?
• मुफ़्त शिविर
• किस और?
• वंश
• विडम्बना
• खिसियानी बिल्ली 
• खाली हाथ
• प्रेम की बंद गली 
• स्वाभिमान
• मासूम कौन 
• कृष्ण चरित
• आशा की किरण
• नज़रिया
• हिसाब 
• हरे काँच की चूड़ियाँ
• भयाक्रांत
• चार दिन की...
• अहसास
• काश, मैं रुक जाता 
• स्टिंग ऑपरेशन 

यूँ तो यह संकलन मुझे उपहारस्वरूप मिला फिर भी अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा की उम्दा क्वालिटी के इस लघुकथा संग्रह के हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है अयन प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 250/- रुपए। किताब की हर बड़े छोटे तक पहुँच और आम पाठक की जेब तथा उसके बजट को देखते हुए ये ज़रूरी हो जाता है कि हार्ड बाउंड संस्करण के अतिरिक किताबों के पेपरबैक संस्करण भी निकाले जाने चाहिए। आने वाले सुखद एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

जनता स्टोर- नवीन चौधरी

ये उस वक्त की बात है जब दसवीं पास करने के बाद कई राज्यों में ग्यारहवीं के लिए सीधे कॉलेज में एडमिशन लेना होता था। दसवीं पास करने के बाद जब गौहाटी (गुवाहाटी) के गौहाटी कॉमर्स कॉलेज में मेरा एडमिशन हुआ तो वहीं पहली बार छात्र राजनीति से दबंग स्वरूप से मेरा परिचय हुआ। एक तरफ़ कनात नुमा तंबू  में माइक पर मैरिट के हिसाब से एडमिशन पाने के इच्छुक उन बच्चों के नाम एनाउंस हो रहे थे जिनका एडमिशन होने जा रहा था। साथ ही साथ उन्हें उसी तंबू में एक तरफ़ टेबल कुर्सी लगा कर बैठे क्लर्कों के पास फीस जमा करने के लिए भेजा जा रहा था । फीस भरने के बाद साथ की ही टेबल पर, तमाम सिक्योरिटी एवं कॉलेज  स्टॉफ के होते हुए भी, दबंगई के दम पर स्टूडेंट्स यूनियन के लिए जबरन चंदा लिया जा रहा था।

खैर..छात्र राजनीति से जुड़ा यह संस्मरण यहाँ इसलिए कि आज मैं छात्र राजनीति से ओतप्रोत एक ऐसे ज़बरदस्त उपन्यास की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'जनता स्टोर' के नाम से लिखा है नवीन चौधरी ने।

राजस्थान की राजधानी जयपुर के इर्दगिर्द घूमते इस उपन्यास मे कहानी है वहाँ के राजपूतों..जाटों और ब्राह्मणों के उस तबके की जो खुद को दूसरों से ऊपर..उम्दा..बड़ा और बहादुर समझता है। इनके अलावा एक और तबका ब्राह्मणों का भी है जो इन दोनों से ही खार खाता है। 

इस उपन्यास में कॉलेज में एडमिशन के वक्त से शुरू हुई झड़प कब बढ़ कर एक बड़ी लड़ाई में तब्दील हो जाती है..पता ही नहीं चलता। इसमें कहीं मयूर, दुष्यंत, प्रताप के साथ साथ उपन्यास के सूत्रधार के बीच स्कूली नोकझोंक के शुरुआती किस्से नज़र आते हैं जो समय के साथ अब ऐसी प्रगाढ़ दोस्ती में बदल चुके हैं कि सब  एक दूसरे की खातिर मरने मारने को तैयार रहते हैं। कहीं इस उपन्यास में फ्लर्टिंग और शरारत से भरा रोमानी रोमांस दिखाई देता है। तो कहीं भीतर ही भीतर जलन के मारे बरसों पुरानी दोस्ती भी टूटने की कगार पर खड़ी दिखाई देती है। 

कहीं इस उपन्यास में नकली मार्कशीट्स और एडमिशन फॉर्म्स में हेराफेरी के बल पर एडमिशन स्कैम होता नज़र आता है। तो कहीं फ़र्ज़ी तरीके से जाली स्पोर्ट्स और जाति सर्टिफिकेट बनते दिखाई देते हैं। कहीं विरोधी गुट के हाथ पैर तोड़ने को आमादा लट्ठ लिए तैयार खड़ा दबंग छात्रों का दूसरा गुट नज़र आता है। तो कहीं इस उपन्यास में ग्लैमर का रूप धारण कर चुका अपराध अपने चरम पर परचम लहराता दिखाई देता है।

कही इस उपन्यास में संविधान से ज़्यादा ज़रूरी अपने जातिगत वोट बैंक को समझने वाले स्वार्थी राजनीतिज्ञ नज़र आते हैं। तो कहीं बिगड़ैल छात्रों और अपराधियों को अपनी छत्रछाया में पालपोस कर पोषित करती राजनैतिक पार्टियां नज़र आती हैं। 

कहीं इस उपन्यास में ज्वलंत मुद्दे को नुक्कड़ नाटक के ज़रिए कोई भुनाता दिखाई देता है। तो कहीं कोई अपनी सारी मेहनत को वोटों में बदलने को आतुर नज़र आता है। कहीं छात्रसंघ चुनावों के दौरान भावी विजेता के सामने डम्मी उम्मीदवार खड़ा कर उसके वोट काटे जाते दिखाई देतें हैं। तो कहीं कोई अपने ही साथियों के भीतरघात से त्रस्त नज़र आता है। कहीं चुनावी उठापटक के बीच मज़े लेने को आतुर छात्र दोतरफ़ा समर्थन देते दिखाई देते हैं। तो कहीं कोई दूसरे की मेहनत..प्लानिंग को धता बता सारी मलाई खुद हज़म करता नज़र आता है। 

कहीं जबरन धमका कर प्रत्याशी बिठाए जाते दिखाई देते हैं। तो कहीं इस उपन्यास में कोई राजनैतिक पार्टी अपनी ही पार्टी के गले की हड्डी बन चुके साथी से त्रस्त नज़र आती है। कहीं राजनैतिक आंदोलनों में कोई बरगला दिया गया मासूम, जोश जोश में खुद मर कर नेताओं का गिद्ध भोजन बनता दिखाई देता है। 

इस उपन्यास में कहीं राजपूतों की शान दिखाई देती है तो कहीं जाटों की अकड़। कहीं इसमें शहर का ब्राह्मण वर्ग अपनी अलग गुटबंदी करता नज़र आता है तो कहीं इसमें आपसी जंग जीतने को सब धर्म और जाति के मुद्दों पर अलग अलग खेमों में बंटे नज़र आते हैं।

कहीं इसमें राजनैतिक गलियारे में पैठ रखने वाला पत्रकार नज़र आता है तो कहीं नेताओं के इशारे में चक्करघिन्नी बन नाचती पुलिस दिखाई देती है। कहीं इसमें पुलिश की बर्बरता और टॉर्चर नज़र आता है तो कहीं उनका छात्रों के प्रति मित्रवत रवैया। कहीं पद.. कुर्सी की लालसा में कोई अति विश्वासी भी विश्वासघात कर दूसरे की पीठ में छुरा घोंपता नज़र आता है। तो कहीं इसमें अपनी महत्त्वाकांक्षा के चलते छात्र नेता साम..दाम..दण्ड.. भेद अपना अपना उल्लू सीधा करते नज़र आते हैं। कहीं घाघ मुख्यमंत्री अपना फन फैलाए डसने को तैयार दिखता है। तो कहीं शातिर गृहमंत्री अपनी गोटियाँ सेट करता दिखाई देता है। 

इस तेज़ रफ़्तार रोचक उपन्यास में हर कोई अपनी समझ के हिसाब से इस प्रकार अपनी चाल चल रहा है कि आप अंदाजा लगाते रह जाते हैं कि किसके पीछे कौन..किसके ख़िलाफ़..उसका अपना बन, कैसी चाल चल रहा है? 

कदम कदम पर चौंकाने वाले इस  बेहद रोचक और रोमांचक उपन्यास को मैंने किंडल अनलिमिटेड के सब्सक्रिप्शन से पढ़ा। इसके 207 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है राजकमल प्रकाशन ने और इसका मूल्य 199/- रुपए है जो कि कंटैंट के हिसाब से बहुत ही जायज़ है। यह उपन्यास फिलहाल अमेज़न पर 185/- रुपए में मिल रहा है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

मल्लिका- मनीषा कुलश्रेष्ठ

कुछ किताबें पहले से पढ़ी होने के बावजूद भी आपकी स्मृति से विलुप्त नहीं हो पाती। वे कहीं ना कहीं आपके अंतर्मन में अपनी पैठ..अपना वजूद बनाए रखती हैं। आज एक ऐसे ही उपन्यास का जिक्र जिसे मैंने वैसे तो कुछ साल पहले पढ़ा था लेकिन मन करता है कि इसका जिक्र बार बार होता रहे। दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के उपन्यास 'मल्लिका' की। हिंदी कथा क्षेत्र में इनका नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। यह उपन्यास पाठक को एक अलग ही दुनिया में.. एक अलग ही माहौल में अपने साथ.. अपनी ही रौ में बहाए लिए चलता है।

इस उपन्यास की कहानी में उन्होंने हिंदी सेवी भारतेन्दु हरिचंद जी तथा उनकी प्रेयसी मल्लिका की प्रेम कहानी को आधार बना तथ्यों तथा कल्पना के संगम से भरपूर एक विश्वसनीय गल्प रचा है। सारगर्भित शैली में लिखे गए  इस उपन्यास में कहीं-कहीं ऐसा भी भान होता है कि उन्होंने 'देवदास' और 'परिणीता' जैसी बड़े कैनवास की बंगाली कलेवर वाली फिल्मों के माफिक ही कहानी को अपने हुनर एवं परिश्रम से रच दिया है।

हमेशा की तरह इस बार भी उनकी लेखनी आपको विस्मृत कर अपने सम्मोहन के जाल में शनै शनै लपेट लेती है और आप उसी के होते हुए एक तरह से छटपटाते रहते है जब तक कि आप उपन्यास को पूरा पढ़ कर समाप्त नहीं कर देते। 

पश्चिम बंगाल और काशी के माहौल में रचे बसे इस उपन्यास में मल्लिका तथा भारतेंदु हरिचन्द के प्रेम तथा साहित्यिक सफर की यात्रा को बहुत ही प्रभावी ढंग से अपने पाठकों के समक्ष रखा है। इस बात में को शक नहीं कि उनकी लिखी एक एक बात में, एक एक विवरण में तथा बांग्ला उच्चारण के पीछे इस हद तक उनका शोध किया गया है कि आने वाली पीढ़ियाँ इसे ही संपूर्ण सच समझ बैठें, कोई आश्चर्य नहीं।

राजपाल एंड संस द्वारा प्रकाशित इस 160 पेज के उपन्यास के पेपरबैक संस्करण का मूल्य ₹235/-  है जो कि कंटैंट और क्वालिटी के बढ़िया होने की वजह से थोड़ा महँगा होते हुए भी अखरता नहीं है।

दिल है छोटा सा- रणविजय

जहाँ एक तरफ कुछ कहानियों को पढ़ते वक्त हम उसके किरदारों से भावनात्मक तौर पर खुद को इस तरह जोड़ लेते हैं कि उसके सुख..उसकी खुशी को अपना समझ खुद भी चैन और सुकून से भर उठते हैं। तो वहीं दूसरी तरफ कुछ कहानियॉ मन को उद्वेलित करते हुए हमें इस कदर भीतर तक छू जाती हैं कि हम किरदार की पीड़ा..उसके दुःख दर्द को अपना समझ..उसी की तरह चिंतायुक्त हो..उसी बारे में सोचने को मजबूर होने लगते हैं। 

अमूमन एक किताब में एक ही कलेवर की रचनाएँ पायी जाती हैं लेकिन कई बार एक ही पैकेज में कई कई रंग जैसी ऑफर्स भी तो मिलती ही हैं ना? ऐसा ही पैकेज मुझे इस बार मिला जब एक ही किताब में अलग अलग कलेवर की कहानियाँ पढ़ने को मिली।

दोस्तों... आज मैं बात कर रहा हूँ लेखक रणविजय जी के कहानी संग्रह "दिल है छोटा सा" की। यतार्थ के धरातल पर मज़बूती से खड़ी हुई इनकी रचनाएँ अपनी अलग पहचान दर्ज करवाने में पूरी तरह सक्षम हैं।। इस संकलन की पहली कहानी थोड़ी कॉम्प्लिकेटेड याने के जटिल प्रेम कहानी है जिसमें एक युवक, अपना विवाह तय हो जाने के बावजूद किसी और युवती के आकर्षण(प्रेम नहीं) में बँध, उसे पाना चाहता है। उधर युवती भी किसी और के साथ पहले से ही अंगेज्ड होने के बावकूद उससे प्यार करने लगती है और उससे भी प्रेम में संपूर्ण समर्पण चाहती है मगर युवक क्या ऐसा करने की हिम्मत कर पाता है? 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी है इंजीनियरिंग कर रही अमनदीप और शिशिर की दोस्ती के बीच लगातार टाँग अड़ाते दिलफेंक..लंपट प्रोफ़ेसर विक्रांत की। जिसमें एक की ज़िद और दूसरे की  हताशा ऐसी कुंठा और अवसाद को जन्म देती है कि सिवाय बदनामी के किसी के हाथ कुछ नहीं आता। नतीजन तीन ज़िंदगियाँ शहर से दरबदर हो, बरबाद हो जाती हैं।

"मजबूरी जो ना कराए..अच्छा है।" इस बात की तस्दीक करती अगली कहानी है बेरोज़गारी की मार झेलते युवा दंपत्ति रामजीत और श्यामा की। जिन पर एहसान कर उनका एक पुराना परिचित, किशन, उसे नौकरी तो दिलवा देता है मगर एहसान भी आजकल भला कहाँ निस्वार्थ भाव से किए जाते हैं?

इससे अगली कहानी है 42 वर्षीय शादीशुदा वरिष्ठ अधिकारी अरविंद और उनसे पार्क में सैर के दौरान मिली विनीता के बीच शनै शनै पनपते प्रेम और लगाव भरे सफ़र की जिसे एक खूबसूरत मोड़ पर किसी और जन्म के लिए फिलहाल अधूरा छोड़ दिया जाता है। 

इसी संकलन की अन्य कहानी है गांव में रहने वाले दो भाइयों केदारनाथ और बदरीनाथ की। बड़े भाई बदरी के लालच के चलते पक्षपातपूर्ण बंटवारा हो जाने के बावजूद भी उसे छोटे भाई की मेहनत और किस्मत से अर्जित हुई संपन्नता देख कर चैन नहीं है। जलन इस हद तक बढ़ जाती है कि हताशा के मारे कुएँ में छलांग लगा उसे आत्महत्या का प्रयास करना पड़ता है। 

अगली कहानी है जेपी एसोसिएट्स नामक हाइवे निर्माण कंपनी में बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर कार्यरत तेजस मिश्रा और नयी नयी पोस्टिंग हो कर उस इलाके में आयी एसडीएम मानसी गुप्ता की है।  जिसके पास एक ज़रूरी काम निकलवाने के तेजस का जाना बेहद ज़रूरी है। उस पढ़ाई में औसत मानसी गुप्ता के पास जो कभी उससे बेहद प्रेम करती थी मगर उसने, उसका दिल तोड़ते हुए उसे साफ़ इनकार कर दिया था। अब उसकी समृद्धि.. उसकी शान और रुआब से प्रभावित हो, वो उसे फिर से पाने..अपनाने के मंसूबे बाँधने की सोचने लगता है मगर गया वक्त क्या कभी लौट के आता है? 

अगली कहानी है गरीबी...अभाव...शोषण और बुरे हालातों में जी रहे बदलू और किसुली की। वहाँ उनके साथ ऐसा क्या होता है कि अपने उज्ज्वल भविष्य के सपने को देख उनकी आंखें खुशी से चमक उठती हैं। 

जैसा कि मैंने पहले कहा कि इस एक संकलन में आप कई कई रंगों से वाबस्ता होंगे तो कहीं इसमें प्यार की मद भरी  रोमानी बातें हैं तो कहीं दुख..ग़रीबी..कटुता एवं बेरोज़गारी की मार झेलते लोग भी। कहीं इसमें विवाहेतर संबंधों की बातें हैं तो कहीं इसमें भाइयों की आपसी फूट..जलन और लालच भी है। कहीं इसमें खुद श्रधेय तो दूसरे को हेय समझने की मानसिकता है। कहीं इसमें इस किताब में कहीं कोई ऊँचे बोल बोल, हवा हवाई बातों से अपनी हवा बनाते दिखता है तो कहीं ठग..लंपट मौका देख, अपने रंग दिखाने से नहीं चूकता है। 

एक आध जगह कुछ छोटी छोटी मात्रात्मक ग़लतियाँ दिखाई दी। इसके अलावा मुखर्जी नगर का जिक्र आने पर एक जगह "वाजीराम एकैडमी" लिखा दिखाई दिया जबकि असलियत में वह "वाजीराव अकैडमी" है। 

सच कहुँ तो रणविजय जी के लेखन को पढ़ कर अफ़सोस हुआ कि..जनाब..इतना बढ़िया हुनर ले कर अब तक आप कहाँ खोए रहे? मानवीय स्वभाव एवं अपने आसपास के माहौल को देखने..समझने और परखने का उनका ऑब्जर्वेशन बहुत बढ़िया है।

यूँ तो यह कहानी संकलन बतौर उपहार मुझे लेखक से मिला लेकिन अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि धाराप्रवाह लेखन से सुसज्जित इस 160 पृष्ठीय उम्दा कहानी संकलन के पेपरबैक संस्करण को छापा है हिन्दयुग्म ने और इसका मूल्य रखा गया है मात्र 150/- रुपए जो कि किताब की क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए बहुत ही जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

गीली पाँक- उषाकिरण खान

कई बार बड़े नाम..बड़े कैनवस वाली फिल्में भी अपने भीतर तमाम ज़रूरी..गैरज़रूरी मसालों के सही अनुपात में मौजूद होने के बावजूद भी महज़ इस वजह से बॉक्सऑफिस पर औंधे मुँह धराशायी हो ..धड़ाम गिर पड़ती हैं कि उनकी एडिटिंग..याने के संपादन सही से नहीं किया गया। मगर फ़ौरी तौर पर इसका खामियाज़ा इसे बनाने वालों या इनमें काम करने वालों के बजाय उन अतिउत्साही दर्शकों को उठाना पड़ता है जिन्होंने बड़ा नाम या बैनर देख कर अपने हज़ारों..लाखों रुपए, जो कुल मिला कर करोड़ों की गिनती में बैठते हैं, उस कमज़ोर फ़िल्म पर पूज या वार दिए। कमोबेश ऐसा ही कुछ कई बार किताबों के साथ भी होता है जिनमें लेखक के बड़े नाम के साथ साथ उनका कंटैंट भी एकदम बढ़िया होता है मगर...

हिंदी पट्टी में एक तय प्रोसीजर या रूटीन के तहत होता यह है कि लेखक अपने हिसाब से एकदम सही सही लिख कर उसे पांडुलिपि के रूप में प्रकाशक को भेज देता है। उसके बाद  प्रकाशक उसे किताब की सॉफ्टकॉपी के रूप में ढाल पुनः लेखक/लेखिका के पास प्रूफरीडिंग या फाइनल चैकिंग के लिए पीडीएफ कॉपी के रूप में भेज देता है। लेखक के एप्रूव करने के बाद किताब फाइनली छपने के लिए जाती है। ऐसे में किताब में छपने के बाद कमियां निकल आने पर सवाल उठता है कि इस कोताही या ग़लती का ठीकरा लेखक या प्रकाशक.. किसके सर? 

खैर..ये सब बातें तो फिर कभी। फिलहाल दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित लेखिका उषाकिरण खान जी के कहानी संकलन 'गीली पाँक' की। विशिष्ट भाषा शैली और कथ्य को ले कर लिखी गयी इस संकलन की कहानियाँ कभी चौंकाती हैं तो कभी विस्मित करती हैं।  इन कहानियों में कहीं पुरातत्ववेत्ता अजय विश्वास के यहाँ दैनिक मज़दूरी की एवज में खुदाई कर रहा अनपढ़..गंवार हनीफ नज़र आता है जो काम करते करते कई ऐतिहासिक तथ्यों एवं शब्दावलियों का अच्छा जानकार हो गया है। वह हनीफ, जिसे खूबसूरत.. गोरी चिट्टी जैनब से ब्याह करना है। मगर ब्याह से पहले उसे जैनब के लिए एक अदद घर और चंद गहने भी चाहिए जिनका जुगाड़ उसकी दैनिक मज़दूरी से कतई संभव नहीं। 

ऐसे में खुदाई से सही सलामत..साबुत निकलने वाली कीमती मूर्तियों को ज़्यादा पैसों के लालच में बाहर बेचने के चक्कर में वह डॉ. विश्वास से विश्वासघात तो कर बैठता है मगर...

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में चिता पर लेटी माँ को शमशान ले जाने की तैयारी में जुटे परिवार के बीच फ्लैशबैक के ज़रिए पुरानी यादों..पुरानी बातों को फिर से जिया जा रहा है। जिसमें इस घर में माँ के ब्याह कर आने से ले कर अब तक के समय को याद किया गया है।

कहीं इस कहानी में ताने मारते रिश्तेदार नज़र आते हैं तो कहीं बढ़ती उम्र के साथ भूलने की बीमारी से ग्रस्त हो रही माँ। कहीं इसमें मध्यमवर्गीय पिता की बेटियों के ब्याह को ले कर चिंता दिखाई देती है तो कहीं इसमें बेमेल रिश्ते के बाद नखरीले पति के पत्नी को त्यागने की बात नज़र आती है। कहीं इन्हीं सब बातों से व्यथित पत्नी की मनोदशा परिलक्षित होती है। 

भूत और वर्तमान के बीच डोलती गांव देहात की एक अन्य कहानी में बातें हैं उस गोरी छरहरी सगुनी की जिसने पहले पति के रूखेपन और सास के तानों के बीच पेट में ही बच्चा खो दिया था। इस बातें है उस सगुनी की, जिसका पति द्वारा त्यागने के बाद फिर से ब्याह किया तो गया मगर चालाक भाभी के चलते वो, वहाँ भी बस ना पायी।

इसमें बातें हैं स्नेहमयी माँ और प्यारे भाई भाभी के साथ घर में रह ईंट भट्ठे की नौकरी कर रही उस सगुनी की, जिसके मधुर स्मृति स्वरूप किन्हीं खूबसूरत क्षणों में अपने मालिक के शहर में रह कर वकालत की पढ़ाई कर रहे बेटे, करन से संबंध बन जाते हैं जो प्रौढ़ावस्था में भी उसकी यादों में बने रहते हैं।

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में सरकारी दफ़्तर के राजभाषा विभाग में काम कर रही 35 वर्षीया कामिनी की उसके छात्रावास से अचानक निकाल दिया जाता है तो दोस्तों की मदद से उसे कुछ ही महीनों बाद रिटायर होने वाले पिता समान भाई जी के यहाँ शरणस्थली मिलती है तो वह भी दिल से उन्हें अपना मान लेती है।

गांव देहात से जुड़ी इस संकलन की कहानियों में कहीं बाढ़ की विभीषिका के बीच मंगल बहु और देवी माँ फँस जाती हैं। तो कहीं किसी अन्य कहानी में दूरदराज के इलाके में बतौर ओवरसियर नियुक्ति पर पहली नौकरी के दौरान आया युवक बाढ़ से जलमग्न हुए गाँव से खुद पलायन करने के बजाय गाँव वालों की मदद करने का निर्णय लेता है और इस चक्कर में सबको गाँव से सुरक्षित बाहर निकलने के प्रयास में अंत में खुद गाँव की ही एक युवती अड़हुल के साथ अकेला बच जाता है। अड़हुल के साथ उस रात पनपे शारिरिक संबंध के बाद भावुक हो वह उसी के साथ जीने मरने की बातें सोचने लगता है। मगर होनी में तो कुछ और ही लिखा है।

इसी संकलन की राजनीतिक उठापटक से जूझती एक अन्य एक कहानी में चुनाव हारने के बाद हमेशा हमेशा के लिए राजनीति छोड़ वापिस जा रही नेत्री की ट्रेन के सफ़र के दौरान संयोग से जिस सहयात्री से मुलाकात होती है, वह राजनीति में उसका वरिष्ठ होने के साथ साथ उसका घुर विरोधी भी है। कहानी अपने सफ़र के दौरान अंग्रेजों के दमन चक्र से ले कर अंधे प्रेम, विश्वासघात, छल, प्रपंच इत्यादि गलियारों से होती हुई घूस, भ्र्ष्टाचार वगैरह के प्लेटफॉर्म याने के पड़ावों पर रुक कर अंततः अपने मुकाम तक पहुँचती है।

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में पंचायत के समक्ष शहर से गाँव आ कर बसे सुंदर बाबू के ग़लत चालचलन का मुक़दमा आता है। जिसमें बतौर गवाह रूकिया का नाम है। क्या रूकिया दबंगों के डर से उस सज्जन पुरुष सुंदर बाबू के ख़िलाफ़ गवाही दे देगी, जिनके उसके तथा गाँव वालों के ऊपर पहले से ही बड़े एहसान हैं? 

कुछ कहानियों में स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा के शब्दों का इस्तेमाल जहाँ एक तरफ़ कहानी को खूबसूरती प्रदान करता है तो वहीं दूसरी तरफ़ उस भाषा को ना जानने वालों को इससे दुविधा भी होती है। बेहतर यही होता कि ऐसे शब्दों या वाक्यों के हिंदी अनुवाद भी साथ में ही दिए जाते।

बहुत से शब्द टाइप करते वक्त फ्लो में गलत टाइप हो जाते हैं जिन्हें प्रूफरीडिंग के समय सुधारा जाना बेहद ज़रूरी होता है। मगर इस कहानी संकलन में इस तरह की अनेकों ग़लतियाँ दिखाई दी जिनमें छपना कुछ चाहिए था मगर छप कुछ गया। उदाहरण के तौर पर.. 

•पेज नंबर 17 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"तक तो वह नहीं पहनती है, फिर कौन सी पहनूँ?"

इसे इस तरह होना चाहिए था..

"तब तो वह नहीं पहननी है, फिर कौन सी पहनूँ?"

*इसी पेज पर आगे लिखा दिखाई दिया कि..

"अच्दा? हम छुट्टी में तो गए ही नहीं? अबूझ सी कह उठती।

यहाँ 'अच्दा?' की जगह 'अच्छा?' होना चाहिए था। मेरे हिसाब से 'अच्दा' कोई शब्द नहीं है।

*इसी तरह पेज नंबर 20 पर लिखा दिखाई दिया कि..

*"अम्मा बताती थी कि जब उन्होंने घर में कदम रखा तो इतने सारे काले लोगों को एक साथ कर हुई थी।" 

यह वाक्य अधूरा छपा है इसलिए अपनी बात को सही से ज़ाहिर नहीं कर पा रहा है। इसे इस प्रकार होना चाहिए...

"अम्मा बताती थी कि जब उन्होंने घर में कदम रखा तो इतने सारे काले लोगों को एक साथ देख कर हैरान हुई थी।"

*इसके आगे पेज नंबर 21 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"पिता 'डीच ऑफ ट्रस्ट'का केस लड़ रहे थे।"

जबकि यहाँ होना चाहिए था कि..'ब्रीच ऑफ ट्रस्ट' का केस लड़ रहे थे।' याने के विश्वासघात का केस लड़ रहे थे।

*और आगे बढ़ने पर पेज नंबर 26 पर एक जगह बिना किसी जरूरत पूरा का पूरा एक वाक्य फिर से रिपीट होता दिखा।

*इसी तरह पेज नंबर 30 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'अम्मा को खूब समझाया था "मैं तो छोटी डॉक्टर हूँ जिसने बाबूजी तुम्हें दिखवा रहे हैं वह सब मेरे टीचर रह चुके हैं।"

यहाँ 'जिसने बाबूजी तुम्हें दिखवा रहे हैं' के बजाय 'जिनसे बाबूजी तुम्हें दिखवा रहे हैं' होना चाहिए।

*इसके अतिरिक्त पेज नम्बर 40 के अंत में लिखा दिखाई दिया कि..

'शून्य आकाश में रही।'

इस वाक्य को कहानी के हिसाब से इस तरह होना चाहिए था कि..

'शून्य आकाश में तकती रही।'

*इसके अतिरिक्त पेज नंबर 90 पर लिखा दिखाई दिया कि..

" विगत दस वर्ष  बेतरह व्यस्त थी। अब कुछ दिन या फिर चाहूं तो आजीवन मुक्त निबंध हूं।"

यहाँ 'अब कुछ दिन या फिर चाहूँ तो..' की जगह 'यहाँ 'अब कुछ दिन या फिर कहूँ तो..' आना चाहिए। 

*इसी तरह पेज नंबर 93 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"नहीं दीदी, मैं सब कुछ समय गई हूं। कुछ बाकी नहीं समझना।"

यह वाक्य भी सही नहीं बना। इसे इस प्रकार होना चाहिए।

"नहीं दीदी, मैं सब कुछ समझ गयी हूँ।"

*पेज नंबर 95 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"युवा क्रांतिकारी की सारी भंगिमाएँ मुझे मोहक लगतीं। में स्थित आंखों से सोमेंद्र की ओर ताकती रहती।"

यहाँ 'स्थित आँखों से सोमेंद्र की ओर ताकती रहती ' के बजाय 'स्थिर आँखों से सोमेंद्र की ओर ताकती रहती' आएगा।'

*पेज नंबर 100 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"केतली में पानी खैलने लगा।"

यहाँ होना चाहिए कि 'केतली में पानी खौलने लगा।'

इसके आगे इसी पैराग्राफ में लिखा दिखाई दिया कि..

"क्यों ऐसे क्यों खड़ी हो चंपा, मुझ पर क्रोश है क्या?"

यह वाक्य भी सही से नहीं बना। इसे इस प्रकार होना चाहिए..

"क्यों ऐसे खड़ी हो चंपा? मुझ पर क्रोध है क्या?"


*पेज नंबर 110 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"मैं उदास हूँ अवश्य पर सोचने की क्षमा रखती हूँ।"

यह वाक्य इस प्रकार होना चाहिए था.."मैं उदास अवश्य हूँ पर सोचने की क्षमता रखती हूँ।"

*पेज नंबर 120 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"अस्पताल नाम मात्र का था। न पक्की छत, न दीवारें। कोई ऐवरेटस भी नहीं।"

यहाँ 'ऐवरेटस" का मतलब मुझे समझ में नहीं आया। हाँ.. अगर यह 'एस्बेस्टस' शब्द अर्थात सीमेंट की चद्दर है तो फिर भी वाक्य के हिसाब से इसका मतलब बन सकता है।

*पेज नंबर 123 की अंतिम पंक्ति से चल कर अगले पेज की शुरुआती पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..

"ओस की बूंद से प्याज बुझाई जा रही है।"

जबकि यहाँ वाक्य का मंतव्य प्यास बुझाने से है।

*एक आध जगह कहानी के किरदारों के साथ भाषा मैच नहीं हुई जैसे कि पेज नंबर 74 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"अब ज्यादा लेक्चर न झाड़ो। चुपचाप बैठी रहा। सुबह होने में देर नहीं है।" 

कहानी के माहौल के हिसाब से यह गांव की अनपढ़ औरतों के बीच संवाद चल रहा है। इस हिसाब से यहाँ 'लेक्चर' जैसे अंग्रेज़ी शब्द का इस्तेमाल सही नहीं है।

काफ़ी जगहों पर वर्तनी की छोटी छोटी त्रुटियाँ दिखाई दी जैसे...

*सोतची- सोचती
*पहल- पहन
*निवाज- रिवाज़
*उम्मा- अम्मा
*काई- कोई
*नाराजगी- नाराज़गी
*मुसकराता- मुस्कुराता
*बलवाया- बुलवाया
*हपने- पहने
*शक्द- शब्द
*हब- सब
*बल्कुल- बिल्कुल
*शुन्य- शून्य
*आबरसियर- ओवरसियर
*दरगा- दरगाह
*पुच- चुप
*हिफ्राक्रीट- हिपोक्रेट
*तिरस्कूता- तिरस्कृत 

उम्मीद की जानी चाहिए कि इस किताब के आगे आने वाले संस्करणों में इस तरह की कमियों को दूर कर लिया जाएगा। 136 पृष्ठीय इस कहानी संकलन के पेपरबैक संस्करण को छापा है शिवना पेपरबैक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 200/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लिखिक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

वो क्या था- गीताश्री (संपादन)

समूचे विश्व में इस बारे में तरह तरह की भ्रांतियां...विवाद एवं विश्वास विद्यमान हैं कि ईश्वर..आत्मा या रूह नाम की कोई अच्छी बुरी शक्ति इस दुनिया में असलियत में भी मौजूद है या नहीं। इस विषय को ले कर हर किसी के अपने अपने तर्क..अपने अपने विश्वास हैं जो कहीं ना कहीं..किसी ना किसी मोड़ पे दूसरे की बात को काटते हुए पुख्ता रूप से अपनी बात..अपने विश्वास/अविश्वास को सही साबित करने...मनवाने का प्रयास करते हैं।

दरअसल हमारी पृथ्वी इतने अधिक रहस्यों से भरी पड़ी है कि ये दावा करना मुमकिन और तर्कसंगत नहीं है कि..

"हमें...सब कुछ पता है।"

कई बार हम ऐसे आभासों से रूबरू होते हैं कि हमें लगने लगता है कि कोई बिना दिखे अपने अदृश्य स्वरूप के साथ हमसे बात करना चाहता है या किसी संकेत..किसी इशारे के द्वारा अपने मन की बात बताना अथवा समय रहते किसी अनजाने ख़तरे से हमें चेताना चाहता है। मेरा अपना मानना है कि ऐसी कोई ना कोई शक्ति अवश्य इस दुनिया में मौजूद है जो हवा, पानी,आग और आसमान के साथ साथ हमारे संपूर्ण जीवन को अपने हिसाब से  नियंत्रित करती है। ऐसी शक्ति का भान मुझे एक नहीं कई कई बार हुआ है जब तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हर मुश्किल से मैं किसी ना किसी तरीके सकुशल बाहर निकल आया। उनका जिक्र फिर कभी किसी अगली पोस्ट या फिर अगली किसी किताब में। 

फिलहाल मैं बात करना चाहता हूं एक ऐसी किताब..एक ऐसे संकलन की जिसे सुप्रसिद्ध लेखिका गीताश्री के संपादन में अपने निजी अनुभवों से संवारा है हमारे समय के प्रसिद्ध साहित्यकारों ने। 
इन निजी अनुभवों को पढ़ते वक्त कभी रोमांच के दौर से तो कभी डर से भी रूबरू होना पड़ा। कई जगहों पर अंधविश्वास या फिर अविश्वास जैसा भी कुछ महसूस हुआ। 

कहीं इसमें बोलने वाले भूत से जुड़ा अनुभव है तो कहीं अस्पताल में भूतों को साक्षात देखने की बात है। अब वो हैलुसिनेशन्स (भ्रम) था या एनेस्थीसिया का ओवरडोज़?...पता नहीं। इसमें कहीं पूर्वाभास के चलते होनी वाली घटना/दुर्घटना का पता चल रहा है तो कहीं इसमें एडिनबर्ग के कब्रिस्तान और वहाँ के लगभग भुलाए जा चुके भूमिगत शहर में मौजूद भूतों की बात है। कहीं इसमें साक्षात तो कहीं किसी सुगंध..खुशबू या सुवास के ज़रिए भूतों या फिर किसी अदृश्य शक्ति का भान हुआ है। 

कहीं इसमें कोई पक्षी आश्चर्यजनक रूप से मददगार साबित हुआ है तो कहीं इसमें बैंड बाजे और जोशोखरोश से भूतों की आती हुई बारात का विवरण है। कही अचानक बिना किसी जान पहचान और उम्मीद के कोई अचानक मदद करने के उपस्थित हो जाता है तो कहीं सही राह से भटकने से बचाने के लिए मरने के बाद भी कोई आ के सीख दे जाता है। कहीं सपनों में बुजुर्गों के आ..आने वाले कष्ट की चेतावनी या फिर उससे बचने की जुगत के उनके द्वारा बताने की बात है। कहीं इसमें सपनों में काले चींटों की आमद से स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी की बात है तो कहीं इसमें मर चुकी सहेली के आ कर मिलने की बात है।

कहीं इसमें ब्रिटिशकालीन बँगले में भूतों के रहने..तंग करने और हिम्मत से उनका मुकाबला करने की बात है तो कहीं इसमें आने वाले समय में होने वाली मौत का पूर्वाभास है। कहीं भविष्य में होने वाले कष्टों और उनसे बचे रहने की चेतावनी भी है। 

कुछ संस्मरण बढ़िया किस्सागोई शैली में रोचक ढंग से लिखे गए हैं तो कुछ को बस औपचारिकतावश निभा भर दिया गया है। कुछ संस्मरण असलियत के आसपास तो कुछ में कल्पना का अतिरिक्त समावेश दिखा। कुछ में रहस्य, रोमांच और अनहोनी होने का पूर्वाभास इस कदर विश्वसनीय कि पढ़ते वक्त कई जगहों पर रौंगटे तक खड़े होने को आते हैं। संपूर्ण पैकेज की दृष्टि से अगर देखें तो इस किताब में एक कमी भी खटकी कि सभी भूत या प्रेत साकारत्मकता लिए हुए थे जबकि नाकारात्मक के पक्ष भी उसी शिद्दत के साथ इस संकलन में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता दिखना चाहिए था। खैर...ये तो अपने अपने अनुभव एवं विश्वास की भी बात हो सकती है। कुछ संस्मरणों के शीर्षक लंबे और थोड़े उबाऊ भी लगे। मेरे हिसाब से शीर्षक ऐसे होने चाहिए कि मन करे...सबको छोड़ कर पहले इसे ही पढ़ा जाए। कुछ जगहों पर थोड़ी बहुत मात्रात्मक ग़लतियाँ भी दिखाई दी जिन्हें अगले संस्करण में आसानी से दूर किया जा सकता है। इस संकलन के कुछ संस्मरण मुझे बेहद रोचक और पठनीय लगे। जिनके नाम इस प्रकार हैं: 

* मायाजाल- दिव्या माथुर
* एडिनबर्ग के भूमिगत भूत- मनीषा कुलश्रेष्ठ
* तर्क से परे, सारा खेल विश्वास का है- लक्ष्मी शर्मा
* वह मेरे साथ था- पंकज सुबीर
* वह आवाज़- आशा प्रभात
* मुझे जाने दे- अनिल प्रभा कुमार
* जब एक तारा ज़मीं पर उतर आता है- शिखा वार्ष्णेय
* स्वप्न-लोक- पंकज कौरव
* इस दुनिया से परे नक्षत्र की भाषा में- योगिता यादव
* वो तुम ही तो थे- सुनीता शानू
* टेलीपैथी या सपनों का रहस्य- अंजू शर्मा
* ब्रिटिशकालीन बंगले की अलौकिक आहट- वंदना यादव
* सफ़ेद चुन्नियाँ- नीलिमा शर्मा
* वो मुझसे मिलने आई थी- गीताश्री

208 पृष्ठीय संस्मरणों के इस संकलन के पेपरबैक संस्करण को छापा है शिवना पेपरबैक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 200-/- रुपए। एक अलग तरह का संकलन उपलब्ध कराने के लिए सभी रचनाकार, संपादक एवं प्रकाशक बधाई के पात्र हैं। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए सभी सहयोग कर्ताओं को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

पांचाली प्रतिज्ञा- राहुल राजपूत

अमूमन मैं कविताओं और उनके संकलनों से थोड़ा दूर रह..उनसे बचने का प्रयास करता हूँ। ऐसा इसलिए नहीं कि कविताएँ मुझे पसंद नहीं या मुझे उनसे किसी प्रकार की कोई एलर्जी है। दरअसल मुझे ये लगता है कि कविताओं के बारे में ठोस एवं प्रभावी ढंग से कुछ कह या लिख पाने की मेरी समझ एवं क्षमता नहीं। अब इसे ऊपरवाले की मर्ज़ी..उसकी रज़ा समझ लें कि उसने मुझे इस सब की नेमत नहीं बक्शी है। ऐसे में जब कोई बड़े प्यार..मनुहार एवं स्नेह के साथ आग्रह करता है कि मैं अपनी समझ के हिसाब से उनके कविता संकलन पर कुछ सारगर्भित टिप्पणी करूँ तो मैं थोड़ा असहज होता हुआ पशोपेश में पड़ जाता हूँ कि मैं ऐसा क्या लिखूँ कि मेरी लाज के बचने के साथ साथ बात भी बनी रह जाए।   

ऐसे में जब राहुल राजपूत जी ने विनम्रतापूर्वक अपना खंडकाव्य "पांचाली प्रतिज्ञा" मुझे उपहारस्वरूप भेजा तो इसे पढ़ना तो लाज़मी बनता ही था। जैसा कि नाम से ही विदित है कि यह  खंडकाव्य पांचाली याने के महाराज द्रुपद की अत्यंत रूपवती बेटी द्रौपदी और उसकी प्रतिज्ञा के बारे में है। वो द्रौपदी, जो स्वयंवर में अर्जुन से ब्याही गयी थी और जिसने अपनी सास कुन्ती की बात का मान रखने के लिए उसके द्वारा अनजाने में कहे जाने पर भी उसके पाँचों बेटों को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था। 

वो द्रौपदी, जिसने एक बार अनायास ही कौरवों के सबसे बड़े भाई द्रुयोधन के अँधे पिता को ले उसका मज़ाक उड़ाते हुए उसे बेइज़्ज़त किया था। उसी दुर्योधन ने बाद में अपने अपमान का बदला लेने के लिए अपने मामा शकुनि से मिल कर पांडवों के साथ जुआ खेलने की साजिश रची। साजिश के फलस्वरूप जब पांडव एक एक कर के अपनी हर संपत्ति, राज सिंहासन वगैरह सब हार गए थे तो ऐसे में उन्हें उत्तेजित करते हुए कौरवों ने प्रस्ताव रखा कि...द्रौपदी को दांव पर लगा दो। अगर जीत गए तो सब का सब वापिस लौटा दिया जाएगा। शातिरों के बहकावे में आ, युद्धिष्ठिर ये दाव भी हार गए। ऐसे में द्रौपदी को भरी सभा में सबके सामने बेइज़्ज़त करने को दुर्योधन ने दरबान के हाथों संदेशा भिजवा उसे भरे दरबार में बुलवा लिया और वहाँ उसके चीरहरण का प्रयास किया। ऐसे में द्रौपदी भगवान श्री कृष्ण का आवाहन करती हैं कि वे उसे दुर्योधन का सामना करने की हिम्मत और बल प्रदान करें।

पूरे खंड काव्य को सात भागों में बाँटा गया है। 
पहले में हस्तिनापुर के महल और उसके अलौकिक सौंदर्य को विस्तृत रूप से महिमामंडित किया है जो लेखक की काव्यात्मक दक्षता को साबित करता है। अगले अध्याय में द्रौपदी के सौंदर्य..उसके साज श्रृंगार, धृतराष्ट्र के दरबार और द्यूतक्रीड़ा याने के जुए का विवरण है कि किस तरह खेल शुरू होता है। इसके साथ ही पांडवों के सब कुछ हार जाने और दुर्योधन के द्रौपदी को भरी सभा में पेश करने के हठनुमा आदेश की बात है। इसी तरह हर अध्याय में कहानी आगे बढ़ती हुई अपने अंत याने के द्रौपदी की प्रतिज्ञा तक पहुँचती है। इस बात के लिए लेखक की तारीफ करनी होगी कि एक ही खण्ड काव्य में वे सौंदर्य रस..करुण रस, भक्ति रस से ले कर रौद्र रस को सफलतापूर्वक साधने में पूर्णतया सफल रहे हैं।

कहानी का पहले से ज्ञान होने और निर्मल पानी सी बहती हुई मनमोहक भाषा शैली की वजह से मुझे इसे समझने में कोई दिक्कत नहीं हुई। लयबद्ध तरीके से लिखा गया खण्ड काव्य यकीनन पढ़ने वालों को पसंद आएगा। 

हालांकि ये खंडकाव्य मुझे उपहारस्वरूप मिला फिर भी मैं पाठकों के जानकारी के लिए बताना चाहूँगा कि उम्दा क्वालिटी के इस 84 पृष्ठीय खंडकाव्य के पेपरबैक संस्करण को छापा है ब्लू रोज़ पब्लिशर्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 189/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

वाग्दत्ता- मंजू मिश्रा

आमतौर पर जब भी कोई नया नया लिखना शुरू करता है तो उसके मन में सहज ही यह बात अपना घर बना लेती है कि उसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक इस प्रकार पहुँचना है कि सब उसकी लेखनी को जानें..समझें और उसकी प्रतिभा..उसके मुरीद होते हुए उसके लेखन कौशल को सराहें। इसी कोशिश में वह चाहता है कि जल्द से जल्द छप कर रातों रात प्रसिद्धि की नयी ऊँचाइयों.. नयी मंज़िलों..नयी कामयाबियों को प्राप्त करे। 

इसी उतावलेपन में छपने के लिए जहाँ वह 'सहज पके सो मीठा होय' के पुराने ढर्रे वाले नीरस..उबाऊ और समय खपाऊ तरीके को अपनाने के बजाय अपने सामर्थ्यनुसार सेल्फ पब्लिशिंग के तुरत फुरत वाले जुगाड़ से खुद को दस बीस हज़ार से ले कर लाख..दो लाख रुपए तक का फटका लगवा इस छपास के हवनकुण्ड में अपने हाथ जला लेता है याने के अपना पैसा और समय बरबाद कर बैठता है। 

वहीं दूसरी तरफ़ कुछ समझदार लोग समय के साथ अपने लेखन को मांजते हुए इस परिपक्व अंदाज़ में सामने आते हैं कि उनके लेखन को देख कर आश्चर्य होने लगता है कि यह इनकी चौथी पाँचवीं नहीं बल्कि महज़..पहली ही किताब है। दोस्तों..आज मैं ऐसे ही परिपक्व अंदाज़ में लिखे गए मंजू मिश्रा जी के पहले कहानी संकलन 'वाग्दत्ता' की बात करने जा रहा हूँ। इस संकलन में एक छोटी और तीन बड़ी याने के कुल मिला कर चार कहानियाँ हैं।

 इस संकलन की पहली कहानी का ताना बाना, गृहस्थी का त्याग कर स्पिरिचुअल पर्सनैलिटी बन चुके व्यक्ति के नाम उसकी पत्नी के पत्र के रूप में बुना गया है। जिसमें पति से अलग रह रही पत्नी अपने पति को बेटे के ब्याह में आमंत्रित करने के बहाने बरसों से मन में दबी भड़ास को बाहर निकाल रही है। इस पत्र में पति के ज़िद भरे लापरवाह रवैये और ज़िम्मेदारियों से कतराने की उसकी आदत को निशाना बना.. वह उसे इन सब बातों के लिए उलाहना दे रही है। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में एयरफोर्स में बतौर फ्लाइट कैप्टन कार्यरत बेटी जब एक फंक्शन के दौरान अपनी माँ को अपने अफ़सर से मिलाती है तो अचानक 30 साल पुरानी यादें..पुरानी बातें..प्यार..नफ़रत से ले कर बिछोह तक सब ज़हन में फिर से ताज़ा हो खलबली मचाने लगता है।

इस कहानी में बातें हैं कचहरी में बतौर क्लर्क काम करने वाले मध्यमवर्गीय पिता की उस बेटी की, जिसका रिश्ता तय होने के बाद भी इस वजह से टूट जाता है कि किसी और लड़की का प्रभावशाली पिता अपने प्रभुत्व और मोटे दहेज के बल पर अपनी बेटी की शादी उसी लड़के से करवाना चाहता  है। इस रिश्ते के टूटने की वजह से भावी पति के प्रेम में डूबी उस युवती का कॉलेज.. पढ़ाई और शहर तक सब छूट जाता है। मगर होनी के गर्भ में क्या लिखा है। ये भला कौन जानता है? 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में दो भाइयों और दो बहनों में सबसे छोटी बेटी के ब्याह से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद बीमार हुआ पिता चल बसता है। जिसके बाद भाई..भाभी..बहन..नाते रिश्तेदार तक सब छोटी बेटी के प्रति अपनी अपनी ज़िम्मेदारियों को नकारते हुए उससे मुँह फेर लेते हैं। मगर हाँ.. ना..हाँ.. ना के बीच पैंडुलम से डोलते भविष्य के गर्भ में क्या पल रहा था? यह तो बस उस ऊपर बैठे भाग्यविधाता को ही पता था। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में अपने प्रेम विवाह में हुई परेशानियों..दिक्कतों से आज़िज़ आयी माँ को जब पता चलता है कि उसका पति अपनी बेटी के प्रेम विवाह करने के निर्णय का समर्थन कर रहा है। तो बेटी के भविष्य से चिंतित माँ बौखला जाती है।

पत्नी की नाराज़गी को ज़ाहिर करने के लिए लेखिका ने इसमें लगभग 50-51 पेज लंबे मोनोलॉग का सहारा लिया है। जिसमें कभी उनके बचपन की शरारतें..आपसी लड़ाई झगड़े..नोकझोंक इत्यादि की बातें नज़र आती हैं। तो कभी बढ़ती उम्र के साथ उनमें प्रेम के पनपने का मीठा मीठा सा अहसास जगता दिखाई देता है। कहीं इनके प्रेम के बीच दीवार बन कर पारिवारिक कट्टरता सामने आती है। तो कहीं इसमें वे सब्र..धैर्य और शांति से काम लेते हुए चरणबद्ध तरीके से प्यार की राह में आगे बढ़ विवाह करने में कामयाब तो हो जाते हैं मगर...

धाराप्रवाह लेखन से सजी इस किताब में पत्र के माध्यम से पति को बेटे के ब्याह जैसे खुशी के मौके पर आमंत्रित करते वक्त पत्नी का अपने पति के प्रति इस तरह अपनी भड़ास निकालना थोड़ा अजीब..तर्कसंगत एवं सही भी नहीं लगा। अगर भड़ास ही निकालनी थी तो सिर्फ़ पत्र से ही काम चल जाता। ब्याह के आमंत्रण जैसी बात इस कहानी में अनावश्यक लगी। इसके बिना भी कहानी अपने मंतव्य को व्यक्त करने में पूरी तरह सक्षम थी।

लंबे वक्त के अंतराल को एक कहानी में समेटने के लिहाज़ से आजकल की कहानियों में पुरानी यादों और फ्लैशबैक का आना मानों एक चलन..एक ढर्रा सा हो गया है कि इसके बिना कहानी सही तरीके से मुकम्मल नहीं होगी। भूत और वर्तमान को एक कहानी में समेटने के हिसाब से तो खैर..यह अच्छा ही है मगर कई बार लंबे फ्लैशबैक से पाठक उकताने लगता है कि यह सब कब जा के खत्म होगा? मेरे ख्याल से लंबी यादों या फ्लैशबैक से बीच बीच में बाहर आना पाठकों को राहत देने के रूप में एक अच्छा उपाय साबित हो सकता है। 

साथ ही इस संकलन की एक कहानी में 50-51 पेज का लंबा मोनोलॉग एक तरह से पाठकों के धैर्य की परीक्षा लेता हुआ प्रतीत हुआ कि कब यह खत्म हो। वह बेचारा तो आस करता रहा गया कि कब राहत के छींटों के रूप में उसे बीच बीच में पति के संवाद..बेशक छोटे छोटे से ही सही मगर पढ़ने को मिलें।

इसके अतिरिक्त पेज नंबर 9 पर लिखा हुआ दिखाई दिया कि..

"कितने साल हो गए मुझे अपने को यूँ ही चलते हुए बिना खुशी दुःख के उन सबके ऊपर निर्लिप्त सा चलते हुए।"

मेरे ख्याल से यह वाक्य सही नहीं बना।

इसी तरह पेज नंबर 33 पर लिखा दिखाई दिया कि..

विनी बोली ' डिफेंस के काफ़ी प्रोटोकॉल आ गए हैं तुझे।'

यहाँ यह संवाद विनी के माध्यम से कहा जा रहा है जबकि इसे उसकी माँ द्वारा कहा जाना चाहिए। या फिर 'विनी बोली'... पहले वाक्य का यह बचा हुआ हिस्सा नए वाक्य के साथ जुड़ कर भ्रम पैदा करने लगा।

एक अल्पविराम के चिन्ह के बिना, कैसे किसी बात का मतलब मीठे से नमकीन में बदल जाता है। इसका उदाहरण पेज नंबर 50 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"बाद में मौसी ने रास्ते के लिए नमकीन बर्फी और खीर भी पैक कर दी और उन्हें गेट तक छोड़ने चली गई।"

यहाँ नमकीन और बर्फी के बीच में अल्पविराम का चिन्ह आना चाहिए था। 

इसी तरह एक पैराग्राफ़ की कुछ कन्फ्यूज़ करती पंक्तियाँ पेज नंबर 51 पर भी दिखाई दी जैसे कि..

"मैंने जाकर खाने की ज़िम्मेदारी ले ली। और मौसी पूजा करने चली गई। इस बीच डोर बेल बजी, मौसी जी उस समय नहा धोकर पूजा कर रहे थे। 

यहाँ 'नहा धो कर पूजा कर रहे थे।' के बजाय 'नहा धो कर पूजा कर रही थी।' होना चाहिए था क्योंकि वाक्य से पहले 'मौसा जी' नहीं बल्कि 'मौसी जी' लिखा है और वही तो पूजा करने गयी थी जबकि मौसा जी तो उस वक्त घर में नहीं थे जैसा कि अगली कुछ पंक्तियों में पता चलता है। 

कुछ जगहों पर पूर्णविराम या अल्पविराम के चिन्ह की आवश्यकता होते हुए भी वे ग़ायब दिखे। दो किरदारों के संवाद बिना गैप दिए एक साथ..एक ही पंक्ति में जुड़े हुए दिखाई दिए। जिसकी वजह से बार बार कंफ्यूज़न होता रहा कि असल में संवाद बोल कौन रहा है। वाक्यों में कुछ शब्दों की बिना ज़रूरत पुनरावृति भी कहीं कहीं खली। इस किताब की कम से कम एक बार और सही तरीके से प्रूफरीडिंग की जानी चाहिए थी।

यूँ तो धाराप्रवाह लेखन से सुसज्जित यह कहानी संकलन मुझे लेखिका से उपहार स्वरूप प्राप्त हुआ मगर फिर भी अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इस कहानी संकलन के पेपरबैक संस्करण को छापा है बुक्स क्लीनिक ने और इसका दाम रखा गया है 180/- रुपए। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

10वीं फेल- अजय राज सिंह

हर इम्तिहान में हर कोई अव्वल दर्जे से पास हो अपनी कामयाबी के झण्डे गाड़ ले...ये कोई ज़रूरी नहीं। असलियत में हमारा, ज़िन्दगी के इम्तिहान में पास होना ज़रूरी है कि हम उसमें पास होते या फिर फेल। आरंभिक शिक्षा की बात करें तो स्कूल वगैरह  की पढ़ाई हमें समाज में उठना बैठना..बोलना बतियाना सिखाती हुई उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हमारी नींव मजबूत करती है लेकिन अगर उच्च शिक्षा पाना मकसद ना हो तो ये ले के चलें कि इसमें ऐसा किताबी ज्ञान होता है जिसकी हमारे व्यवहारिक जीवन में हमें शायद ही कभी भूल भटके ज़रूरत पड़ती है। ढूँढने पर हमें ऐसे अनेक उदाहरण मिल जायेंगे जिसमें कम पढ़ाई बावजूद भी बहुत से लोगों ने असल ज़िन्दगी में अत्यधिक कामयाब हो के दिखाया। सचिन तेंदुलकर ही अगर स्कूली किताबें पढ़..उन्हीं में अपना दिमाग खपाता रहता तो क्या कभी वो विश्व का  महानतम क्रिकेट खिलाड़ी बन पाता? या बिना कॉलेज की डिग्री के बिलगेट्स इतने बड़े व्यापारिक साम्राज्य का कभी मालिक बन पाता? 

अभी हाल फिलहाल ही मुझे लेखक अजय राज सिंह जी का लिखा उपन्यास "10वीं फेल" पढ़ने का मौका मिला और इसका भी संयोग कुछ ऐसा हुआ कि इधर मैंने अपनी छठी इंद्री से वशीभूत हो अमेज़न पर इस किताब को ऑर्डर किया और उधर उसके कुछ क्षणों बाद ही इसके लेखक की मेरे पास फ्रैंड रिक्वैस्ट आ गयी। 

शीर्षक के अनुसार मूल कहानी बिना किसी लाग लपेट अथवा उतार चढ़ाव के बस इतनी है कि इसमें एक दसवीं फेल लड़का अपने दो हुड़दंगी दोस्तों के साथ मिल कर उलटे सीधे रस्ते से बिल्डर के धंधे में कामयाब हो के दिखाता है। मगर रुकिए..इसमें हाँ.. ना के दुविधा पूर्ण असमंजस के बीच डोलती हुई एक प्रेम कहानी भी साथ साथ चलती है जो आपको अपने सम्मोहन..अपने पाश में जकड़ती हुई आपको मंत्रमुग्ध करती है। 

पूरी कहानी में लेखक अपने आत्मालाप के ज़रिए कहानी को आगे बढ़ाता और अपने पाठकों से साथ ही साथ..रूबरू बात करता हुआ चलता है। बीच बीच में संवादों की गुंजाइश निकलने पर माँ...बेटे...प्रेमिका और दो दोस्तों समेत कुल पाँच मुख्य पात्र मज़ेदार संवाद बोलने में एक दूसरे होड़ करते नज़र आते हैं।

आमतौर पर कहानी के फ्लो के साथ पाठक को पता चलता जाता है कि अब क्या होगा..अब क्या होगा लेकिन यहीं पर खुराफात ये कि लेखक भी आपके मन के कहे अनुसार बात को हूबहू लिखता है लेकिन अगले ही क्षण आपकी तयशुदा सोच से अचानक से पलटी मार, वो आपको चौंकाता हुआ झट से अपनी पटरी बदल अलग ही ट्रैक पे अपनी गाड़ी फट से दौड़ा लेता है। यूँ समझ लीजिए कि हर पहला या दूसरा पेज मुस्कुराने या फिर खिलखिला कर हँसने का कोई ना कोई मौका ज़रूर दे जाता है।

सीधी...सरल...प्रवाहमयी भाषा में लिखे मज़ेदार संवादों के ज़रिए उनके लिखने का अंदाज़ ऐसा है कि शुरुआती दो चार पृष्ठों ने ही मुझे उनकी लेखनी का मुरीद बना लिया। उनकी लेखनी में कब शातिराना तरीके से कोई पंच अचानक आ के आपके सामने धप्प से छलांग लगाते हुए, खड़ा हो आपको धप्पा याने के आउट कर जाए...कोई भरोसा नहीं। 

पाठकीय नज़रिए से मुझे लगा कि बाकी मसालों के अलावा  इसकी कहानी में थोड़े ट्विस्ट एवं उतार चढ़ाव और ज़्यादा होने चाहिए थे। उम्मीद है कि लेखक अपनी आने वाली रचनाओं में इस आग...इस ऊर्जा को बनाए रखेंगे।

उम्दा क्वालिटी के इस 138 पृष्ठीय मज़ेदार उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है नोशन प्रैस. कॉम ने। हालांकि खोजने पर भी मुझे इस किताब में कहीं पर भी इसका मूल्य लिखा नहीं दिया जो शायद त्रुटिवश छपने से रह गया है या फिर हो सकता है कि इस मामले में मुझसे ही चूक हो गयी हो। अमेज़न से चैक करने पर पता चला कि इसका मूल्य रखा गया है 188/- रुपए। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

हम नहीं चंगे..बुरा ना कोय- सुरेन्द्र मोहन पाठक

टीवी...इंटरनेट और मल्टीप्लेक्स से पहले एक समय ऐसा भी था जब मनोरंजन और जानकारी के साधनों के नाम पर हमारे पास दूरदर्शन, रेडियो,अखबारें और बस किताबें होती थी। ऐसे में रेडियो और दूरदर्शन के जलवे से बच निकलने के बाद ज़्यादातर हर कोई कुछ ना कुछ पढ़ता नज़र आता था और पढ़ने की कोई ना कोई सामग्री हर किसी के हाथ में अवश्य नज़र आती थी। भले ही वो बच्चों के हाथों में कॉमिक्स के रूप में तो बड़ों के हाथों मे कोई ना कोई कहानी/कविता संकलन अथवा उपन्यास अपनी हाज़री बजा..उपस्थिति दर्ज कराता हुआ नज़र आता था। बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर स्थित बुक स्टॉल्स तरह तरह की साहित्यिक पत्रिकाओं और उपन्यासों से पटे नज़र आते थे और उनमें भी उस साहित्य की अधिकतम भरमार होती थी जिसकी तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के साहित्यकारों द्वारा हमेशा से लुगदी साहित्य कह उसकी खिल्ली उड़ाई जाती रही है। लुगदी साहित्य, वो साहित्य जिसने अपनी तमाम भर्त्सनाओं एवं आलोचनाओं के बावजूद हिंदी को घर घर पहचान दी। हमारे आज के साहित्यकारों ने भी कभी ना कभी इस साहित्य को ज़रूर पढ़ा है। 

दोस्तों...आज मैं बात करने जा रहा हूँ इसी लुगदी साहित्य के एक ऐसे नामी गिरामी लेखक की, जिसके लिखे को उसके पाठकों ने हाथों हाथ उठा, उसे सेलिब्रिटी का स्टेटस दे, सर आँखों पे बिठाया। जी!...हाँ.. आपने सही पहचाना, मैं बात कर रहा हूँ श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक जी और उनकी आत्मकथा के दूसरे भाग की जो "हम नहीं चंगे...बुरा ना कोय" के नाम से बाज़ार में आ, धूम मचा रहा है।

लुगदी साहित्य का एक ऐसा बड़ा नाम जो कभी महज़ चार पाँच सौ रुपए में अपना एक उपन्यास लिख कर प्रकाशकों को दे खुद को कृतार्थ किया करता था। फिर भी उनके लिखे उपन्यासों का ऐसा जलवा कि एक समय उनके लिखे नए उपन्यासों से ज़्यादा उनके रिप्रिंट से उनकी कमाई होती थी। ऐसा लेखक जिन पर कभी किसी लड़की ने उनकी स्क्रिप्ट की चोरी का इल्जाम लगाने की मंशा जताई थी। एक ऐसा लेखक जिन पर किसी ने दूर दराज के इलाके में महज़ इसलिए कोर्ट केस दर्ज करवा कर जज के सामने उनकी पेशी करवा दी  दी थी कि वो वकील उनसे आत्मीय मुलाकात कर सार्वजनिक रूप से उनका सम्मान करते हुए खुद को भाग्यशाली समझ सके। 

 एक ऐसा लेखक जो अब तक 300 या फिर उससे भी ज़्यादा उपन्यास लिख चुका है और उनके एक उपन्यास की तो अढ़ाई लाख तक प्रतियाँ बिकी। एक ऐसा लेखक जिसके लेखक होने की एवज में उसके घर पर पत्थर तक बरसे। एक ऐसा लेखक जिसने बातों बातों में उपहार स्वरूप अपने एक प्रशसंक को अपने चालीस दुर्लभ उपन्यास बतौर गिफ्ट दे दिए और उनका वह तथाकथित प्रशंसक उन्हें तुरंत बाज़ार में महँगे दामों पर बेच रफूचक्कर हो गया हो।

 इस आत्मकथा में बात है उनके दफ़्तरी कामकाज और टूर के बहाने होने वाली ऐश और दिक्कतों की। इसमें बात है अफसरशाही और भ्रष्टाचार की। इसमें बात है आपसी खुंदक निकालने को हरदम तैनात रहते अफसरों और मातहतों की। 
 
इसमें बात है दोगले..चालबाज़ रिश्तेदारों और उनके भुक्खपने की। इसमें बात है बतौर मेहमान घर आए लेखक को मेज़बान के परिवार द्वारा बेइज़्ज़त करने की जो कि स्वयं एक बड़ा नामी गिरामी लेखक एवं प्रकाशक था। इसमें बात है पुत्र मोह में आँखें मूंद सिर्फ अपना बेटा और उसके हित नज़र आने की। इसमें बात है प्रकाशकों द्वारा लेखकों को उनका ज़रखरीदा ग़ुलाम समझ अपनी मनमानी करने और मनवाने की।
 
इसमें बात है प्रकाशकों से लेखक के बनते बिगड़ते रिश्तों की। इसमें बात है औरों की देखादेखी नए प्रकाशकों के उभरने और फिर उनके फेल होने की। इसमें बात है कॉपीराइट को नज़रंदाज़ करने और उनसे फ़ायदा उठाने वाले लेखकों की। इसमें बात है बिना लेखक की मर्ज़ी के उसके दो भागों वाले उपन्यास को बेदर्दी से काट छाँट कर एक उपन्यास बनाने की। इसमें बात है फिल्मी पत्रिकाओं और उनके कर्ताधर्ताओं के घमंड की। इसमें बात है सफल  लेखक को ले कर प्रकाशकों में होती आपसी खींचतान की।  इसमें बात है प्रकाशक द्वारा स्क्रिप्ट हज़म कर भूल जाने की। 

इसमें बात है लेखकों द्वारा बड़ी बड़ी डींगें हांकने की। इसमें बात है लेखक से किए गए करार को तोड़ स्क्रिप्ट आगे बेच विश्वासघात करने की की। इसमें बात है लेखकों में बढ़ती शराबखोरी और अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार करने और प्रकाशकों द्वारा भ्रम पैदा करने को झूठे आंकड़ों को फैलाने की। इसमें बात है असली प्रशसंकों बनाम ठग एवं दबंग पाठकों की। 

किस्सागोई शैली में लिखी गयी इस आत्मकथा में काफी कुछ ऐसा है जो पाठकों को लुभाएगा। अगर आप सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के फैन हैं या फिर लुगदी साहित्य और उससे जुड़ी बातें जानने के इच्छुक हैं तो रोचक शैली में लिखा गया यह आत्मकथा आपके मतलब की है। 422 पृष्ठीय इस किताब के पेपरबैक संस्करण को छापा है राजकमल पेपरबैक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 299/- जो कि किताब की क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए ज़्यादा नहीं है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

आदम ग्रहण- हरकीरत कौर चहल, सुभाष नीरव (अनुवाद)

"कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता/
कहीं ज़मीं नहीं मिलती..कहीं आसमां नहीं मिलता"

ज़िन्दगी में हर चीज़ अगर हर बार परफैक्ट तरीके से..एकदम सही से..बिना किसी नुक्स..कमी या कोताही के एक्यूरेट हो..मेरे ख्याल से ऐसा मुमकिन नहीं। बड़े से बड़ा आर्किटेक्ट..शैफ या कोई नामीगिरामी कारीगर भी हर बार उम्दा तरीके से अपने काम को अंजाम दे..यह मुमकिन नहीं। 

कभी ना कभी..कहीं ना कहीं तो हर किसी से कोई ना कोई छोटी बड़ी चूक..कोताही या ग़लती हो ही सकती है। और इस बात का अपवाद तो खैर..वो ऊपर बैठा परवरदिगार भी नहीं जिसने हमारे समेत पूरी कायनात को उम्दा तरीके से सजा संवार कर बनाया..चमकाया है। उसी ऊपरवाले की एक नेमत याने के हम मनुष्यों को भी बनाने में कई बार उससे या हमसे ऐसी चूक हो जाती है कि संपूर्ण लड़का या लड़की बनने के बजाय कोई कोई तो अधूरा ही पैदा हो जाता है। 

खैर..ये सब बातें दोस्तों..आज इसलिए कि आज मैं ऐसे ही अधूरे पैदा हुए लोगों को ले कर मूल रूप से पंजाबी में लिखे गए एक उपन्यास 'आदम ग्रहण' की बात करने जा रहा हूँ जिसकी रचियता हैं 'हरकीरत कौर चहल' और उनके इस उम्दा उपन्यास का बढ़िया हिंदी अनुवाद किया है जाने माने लेखक/अनुवादक 'सुभाष नीरव' जी ने। जो अब तक 600 से ज़्यादा कहानियों एवं 60 अन्य साहित्यिक पुस्तकों का पंजाबी से हिंदी में अनुवाद कर चुके हैं। इस सब के अतिरिक्त इनकी अब तक खुद की भी कहानी/कविताओं एवं लघुकथाओं की पंद्रह से अधिक पुस्तकें आ चुकी हैं और यह सफ़र अब भी अनवरत जारी है।

धाराप्रवाह शैली में लिखे गए इस रोचक उपन्यास में कहानी है एक ग़रीब मुस्लिम कुम्हार के घर तीन भाइयों के बाद पैदा हुई एक ऐसी जान की जो ना तो पूरा लड़का है और ना ही पूरी लड़की। इस उपन्यास में कहानी है माँ बाप की ममता..लाड़ प्यार और स्नेह के बीच पलते 'अमीरा' नाम के इस जीव की। बढ़ते वक्त के साथ इसमें कहानी है उस 'अमीरा' की जिसे गांव वालों की ही तरह अपने..खुद के भाइयों से..अपने ही घर में स्नेह..मोह..ममता और दोस्ती के बदले प्रताड़ना..उपहास..अपमान..नफ़रत और उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। और इस सबके बीच पैंडुलम सी निरंतर झूलती 'अमीरा' एक दिन तंग आ कर अपने माँ बाप की इच्छा के विरुद्ध स्वेच्छा से घर छोड़ ,लैची महंत (हिजड़ों के मुखिया) के डेरे में बसने का निर्णय लेती है।

इस उपन्यास में कहानी है समाज के अलग अलग वर्गों..इलाकों..राज्यों और धर्मों के द्वारा दुत्कारे गए..तिरस्कृत किए जा चुके आधे अधूरे जीवों की। इसमें कहानी है उनके एकसाथ आपस में परस्पर भाईचारे..स्नेह और एकता के साथ रहते हुए वक्त ज़रूरत के साथ बन या पनप चुके रीति रिवाज़ों को मनाने की। गुरु शिष्य की सौहाद्रपूर्ण परंपरा के बीच इसमें बातें हैं महंतों (हिजड़ों का मुखिया) की मर्ज़ी से पैसों के बदले नए रंगरूटों के आपसी लेनदेन या अदला बदली की।

इसी उपन्यास में बातें हैं तिरस्कृत समाज के इन बाशिंदों के बीच तमाम दुःखों..तकलीफ़ों के बावजूद इन्सानियत के निरंतर उमड़ते घुमड़ते जज़्बातों की। इसमें बातें हैं समाज द्वारा ठुकराए गए शारीरिक रूप/गुणों से एकदम ठीक मगर बदकिस्मत लोगों के शरणागत की तरह आ..इनके साथ ही रहने एवं इन्हीं में घुलमिल कर एक हो जाने की। इसमें एक तरफ़ डेरे में गुपचुप परवान चढ़ते लाली और कौड़ामल के इश्क की बातें हैं। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसमें एक सामान्य..ठीकठाक अमीर युवक भी सब कुछ जानते हुए 'अमीरा', जो अब 'मीरा' बन चुकी है, के प्रेम में इस कदर डूब जाता है कि उसके साथ पूरा जीवन बिताने को तैयार हो उठता है। मगर क्या इस सब के लिए मानसिक 'मीरा' खुद को कभी तैयार कर पाती है? 

इस उपन्यास में बात है अभिभावकों द्वारा आधे अधूरे बच्चे को मोह..ममता सब भूल जन्मते ही त्याग देने की। इसके साथ ही इसमें बात है उसी त्याग दिए गए बच्चे को 'मीरा'  द्वारा स्नेह..लाड़ प्यार और मोहब्बत के साथ अपनाते हुए बढ़िया स्कूल कॉलेज में तालीम दिलवाने की। इसी उपन्यास में बातें हैं धोखे..छल और बहकावे द्वारा किसी के लगातार होते यौन शोषण और उसके मद्देनज़र एड्स जैसे गंभीर रोग के बढ़ते फैलाव की। इसमें बात है हताशा..शर्म से किसी के खुद को मिटा देने और किसी के किसी के वियोग में खुद मिट जाने की।

इस बात के लिए लेखिका की तारीफ़ करनी होगी कि किरदारों के हिसाब से उनकी भाषा एवं संवाद शैली को बहुत ही बढ़िया ढंग से वे अपने लेखन में उतार पायी हैं। इसके साथ ही उम्दा अनुवाद के सुभाष नीरव जी भी बधाई के पात्र हैं 

*पेज नम्बर 37 पर लिखा दिखाई दिया कि..

"ढोलण ने भी काला लंबा कुरता और पजामी पहनी। सिर पर महरूम रंग का दुपट्टा बाँधा,  महंत लैची भी पाकिस्तानी फैशन के कुरते और सलवार में सल्तनत का बादशाह लग रहा था।"

यहाँ 'महरूम' रंग का दुपट्टा आने के बजाय 'मेहरून(मैरून) रंग का दुपट्टा आना चाहिए था। 

142 पृष्ठीय इस बेहतरीन उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है इंडिया नेटबुक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 200/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका, अनुवादक एवं प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

ट्वेल्थ फेल- अनुराग पाठक


किसी ऐसी किताब के बारे में अगर पहले ही इतना कुछ लिखा..सुना एवं पढ़ा जा चुका हो कि उस पर लिखते वक्त सोचना पड़ जाए कि ऐसा क्या लिखा जाए जो पहले औरों ने ना लिखा हो। एक ऐसी किताब जो पहले से ही धूम मचा...पाठकों के समक्ष अपने नाम का झण्डा गाड़ चुकी हो। एक ऐसी किताब जिसका दसवाँ संस्करण आपके हाथ में हो। एक ऐसी किताब जो टीवी से ले कर अखबारों..पत्र पत्रिकाओं और यूट्यूब चैनल्स तक...हर जगह छाई हो। एक ऐसी किताब जिसकी तारीफ में सचिन तेंदुलकर, सुनील गावस्कर, राजकुमार हिरानी, विशाल भारद्वाज, आशुतोष राणा, मनोज बाजपेयी और अनुराग कश्यप समेत क्रिकेट..बॉलीवुड एवं मीडिया के बड़े बड़े दिग्गजों ने कसीदे गढ़े हों। दोस्तो...आज मैं बात कर रहा हूँ उस किताब की जिसकी टैगलाइन है...
"हारा वही जो लड़ा नहीं" याने के गिर कर उठते हैं शहसवार ही मैदान ए जंग में।

'ट्वेल्थ फेल' के नाम से जारी हुए इस उपन्यास को लिखा है अनुराग पाठक ने और इसमें कहानी है मनोज शर्मा की ज़िद...उसके जुनून और श्रद्धा से उसके बेइंतहा प्यार की। वो मनोज शर्मा जो कभी,  बस जैसे तैसे कर के नकल के दम पर बारहवीं पास कर कहीं कोई छोटी मोटी नौकरी करने का सपना देखता था। वो मनोज शर्मा, जिसे कलैक्टर की सख्ती की वजह से बारहवीं में फेल होने पर मजबूरन गांव के सवारियाँ ढोने वाले खटारा टैम्पो में  कंडक्टरी करनी पड़ी। वो मनोज शर्मा, जिसे खस्ताहाल टैम्पो को पुलिस थाने से छुड़ाने के लिए थानेदार के सामने गिड़गिड़ाना...रिरियाना पड़ा। वो मनोज शर्मा, जिसने कलैक्टर का रुआब देख, कुछ बनने..कुछ कर दिखाने की ठान ली। वो मनोज शर्मा, जिसकी कदम कदम पर अनेकों बार उसी के साथियों द्वारा ट्वेल्थ फेल होने की वजह से खिल्ली उड़ाई गयी।

उन्हीं तानों से प्रेरणा पा, जिसने पहले बारहवीं और फिर कॉलेज की परीक्षा पास कर दिखाई। वही मनोज शर्मा जिसे बेघर होने पर भिखारियों के साथ सड़क पर रात गुज़ारनी पड़ी और भूख से निबटने के लिए रेस्टोरेंट में बर्तन तक मांजने पड़े।  वही मनोज शर्मा, जिसके रहने का ठिकाना ना होने पर उसे किसी के यहाँ खाना बनाने..सफाई करने से ले कर उसके कच्छे तक धोने पड़े।  महीनों एक खंडहरनुमा लाइब्रेरी में महज़ इसलिए नौकरी करते हुए रहना पड़ा कि उसे तीन सौ रुपए महीने के साथ सर ढकने को एक अदद छत मिल सके। वही मनोज शर्मा जो बेईमानी का आरोप लगते ही लाइब्रेरी की नौकरी छोड़, आटे की चक्की में मजबूरन आटे के साथ धूल धूसिरत हो काम करने लगा।

इसमें कहानी है प्रेम में पागल उस मनोज शर्मा की जो अपने प्यार की एक झलक तक पाने को बिना कुछ सोचे विचारे ग्वालियर से अल्मोड़ा तक चला आया था। इसमें कहानी है उस मनोज शर्मा की जो अपने प्यार के चक्कर में पढ़ाई को नज़रंदाज़ कर अपने बेशकीमती दो साल गंवा बैठा। इसमें कहानी है उस मनोज शर्मा की जिसे दिल्ली में भूख और अपने सर्वाइवल के लिए कभी साथियों का खाना पड़ा तो कभी लोगों के कुत्ते तक घुमाने पड़े। 

इसमें कहानी है विवेकानंद और उनके द्वारा स्थापित आदर्शों की। इसमें कहानी है ज़िद्दी..अड़ियल मगर ईमानदार बाप की। इसमें कहानी है मूक रह कर हमेशा हिम्मत का संबल बनी एक माँ की। इसमें कहानी है ऐसे अध्यापक की जो अपनी पल्ले से पैसे निकाल कर एक विद्यार्थी को देता है कि वह अपनी कोचिंग के पैसे भर सके। इसमें कहानी है वक्त पे काम आने वाले दोस्त के एहसान को हमेशा याद रखने वाले मनोज शर्मा की। इसमें कहानी है उस श्रद्धा की जिसे भावनाओं में ना बहते हुए इश्क और कैरियर में बैलेंस बनाना बखूबी आता है। 

इसमें कहानी है उस ज़ुनूनी मनोज शर्मा की जिसने अपनी प्रेमिका की स्वीकारोक्ति के बाद एकदम से कायापलट कर दुनिया के सामने एक मिसाल कायम कर दी। इसमें कहानी है उस मनोज शर्मा की जिसने फर्श से अर्श तक पहुँचने के अपने सपने को मुकम्मल कर दिखाया।

कुल मिला कर एक ऐसी बढ़िया किताब जिसे हर उस व्यक्ति को पढ़ना चाहिए जो अपने जीवन में कुछ कर दिखाना चाहता है। इस उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है नियोलिट पब्लिकेशन ने और इसका मूल्य रखा गया है मात्र 196/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए बहुत ही जायज़ है। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखक, प्रकाशक एवं मनोज शर्मा जी को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।
 
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