उंगलियाँ - मेघ राठी

मृत्य के बाद के जीवन को लेकर विभिन्न लोगों के बीच भिन्न-भिन्न मत या भ्रांतियाँ हैं। कुछ का कहना है कि मृत्यु की प्राप्ति अगर शांतिपूर्वक ढंग से ना हुई हो या मरते वक्त कोई अथवा कुछ इच्छाएँ अधूरी रह जाएँ तो आत्मा/रूह 
को मुक्ति नहीं मिल पाती है और वो तब तक इस संसार में भटकती रहती हैं जब तक कि उनकी वे मनवांछित इच्छाएँ पूरी नहीं हो जाती। 

इन्हीं भटकती आत्माओं के डर के आगे बहुतों ने भयभीत हो घुटने टेक दिए तो इनसे निजात दिलाने के नाम पर कईयों ने तंत्र-मंत्र के ज़रिए इन आत्माओं साधने का दावा किया तो किसी ने झाड़-फूँक के ज़रिए इन पर काबू पाने के उपाय बता इस काम को अपनी कमाई का ज़रिया बना लिया तो किसी ने समाज सेवा के नाम पर इस काम को बिना किसी लालच के करना शुरू किया।

दोस्तों...आज भूत-प्रेत और आत्माओं से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं इसी विषय पर आधारित एक ऐसे उपन्यास का यहाँ जिक्र करने जा रहा हूँ जिसे "उंगलियाँ" के नाम से लिखा है मेघा राठी ने। 

इस उपन्यास की मूल में कहानी है उस कमल की जो मिहिर से अपने ब्याह के बाद उसके साथ रहने के लिए पहली बार उस शहर में आयी है जहाँ उसके पति की नौकरी है। पहली रात से ही उनके साथ कुछ ऐसी अप्रत्याशित घटनाएँ घटने लगती हैं कि वे घबरा जाते हैं। अनिष्ट की आशंका से डरे हुए दंपत्ति के घर अनुष्ठान के लिए आया पंडित घर में हो रही असामान्य घटनाओं का कारण  प्रेतबाधा बताता है। जिससे मुक्ति के सफ़र में उनकी मुलाकात एक अन्य तंत्र साधक लड़की से होती है जिसके द्वारा वे अपनी समस्या के समाधान के लिए उसके गुरूजी से मिलते हैं। जो तांत्रिक क्रियाओं के ज़रिए उनके कष्ट दूर करने का प्रयास करते हैं।

वर्तमान और भूत के बीच भटकती इस कहानी में कहीं राजे-रजवाड़ों और ज़मींदारों से जुड़ी बातें पढ़ने को मिलती हैं तो कहीं स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी बातों से पाठक दो चार होता नजर आता है। पुनर्जन्म के गलियारों के बीच विचरती इस कौतूहल भरे रोमांच से लबरेज़ कहानी में कहीं आपका सामना औघड़, डाकिनी एवं पिशाचिनी से होता है तो कहीं कहानी के बीच कोई शापित वृक्ष अपनी मौजूदगी दर्ज कराने को उतावला हो उठता है। कहीं अतृप्त प्रेम की याद में तड़पती कोई यक्षिणी बदला लेने कोई उतारू दिखाई देती है तो कहीं पाठक अचानक टपक पड़ी रहस्यमयी घटनाओं से रूबरू होता नज़र आता है। इसी उपन्यास में कहीं मरणोपरांत आत्मा की गति, पुनर्जन्म, कापालिक एवं औघड़ अनुष्ठानों से जुड़ी बातों के ज़रिए पाठकों को रहस्य एवं जिज्ञासाभरे माहौल के बीच सिहरन, रोमांच, भय और वीभत्स रस की मिश्रित अनुभूतियों से दोचार होना पड़ता है। 

उपन्यास पढ़ते वक्त वर्तनी की त्रुटियों एवं वाक्य विन्यास की कमियों के अतिरिक्त प्रूफरीडिंग की ग़लतियाँ भी दिखाई दीं। उदाहरण के तौर पर पेज नंबर 103 में लिखा दिखाई दिया कि..

'हर तरफ से आश्वस्त होने के बाद उन्होंने कमल और मिहिर को पूजा घर में बैठ कर काली माँ का गायत्री मंत्र जपने के लिए कहा'

यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि 'गायत्री मंत्र' का जाप काली माँ के लिए नहीं बल्कि वैदिक ऋचाओं की देवी, जिन्हें वेद माता के नाम से भी जाना जाता है, को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। 'वेद माता' यानी कि 'गायत्री' के तीन सिर होने की वजह से उन्हें त्रिमूर्ति की देवी भी कहा जाता है जो कि देवी सरस्वती, देवी पार्वती और देवी लक्ष्मी का ही अवतार हैं।

पेज नम्बर 135 में बाज़ार से गुजरते हुए साधना और कमल को एक दुकान में एक शॉल पसन्द आ जाती है लेकिन उस वक्त उनका उसे खरीदने का कोई इरादा नहीं होता। दुकानदार के खरीदने के लिए कहने पर भी वे इनकार कर देती हैं। तभी उन्हें दुकान के भीतर बने हुए दुकानदार के घर में एक बुढ़िया दिखाई देती है लेकिन उनके पता करने पर दुकानदार घर में किसी बुढ़िया के होने से इनकार कर देता है।

इसके बाद छठे पेज में अचानक दुकानदार के नाम 'नवीन' का जिक्र टपक पड़ता है। जो कि पहले कहीं नहीं था।

आमतौर पर होता क्या है कि लेखक अपनी कहानी का आरंभ और अंत सोच लेता है कि उसे कहाँ से शुरू करेगा और कहाँ ले जा कर ख़त्म करेगा। मगर यह उपन्यास मुझे आजकल के डिमांड एण्ड सप्लाई वाले तरीके के जैसे लगा कि कहानी को चैनल, प्रोड्यूसर या एप की डिमांड के हिसाब से लंबा खींचना है, तो लो जी आप जितना लंबा चाहो, लंबा खींच देते हैं।

इसी वजह से यह उपन्यास मुझे एक मुकम्मल कहानी के बजाय किश्तों में बँटी हुई कहानी जैसा लगा मानो एकता कपूर सरीखा कोई सीरियल चल रहा हूँ कि हर एपिसोड में कोई नयी तांत्रिक विधि या किसी अलग ही विधान का कोई नया पंगा डाल कर कहानी को जबरन आगे बढ़ाया जा रहा हो।

उपन्यास के कवर पेज के आकर्षक और छपाई के बढ़िया होने के बावजूद इस तरह की कमियाँ अखरती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि लेखिका एवं प्रकाशक इस तरह की कमियों को दूर करने का यथासंभव प्रयास करेंगे। इस 204 पृष्ठीय उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है फ्लाई ड्रीम्स पब्लिकेशंस ने और इसका मूल्य रखा गया है 249/-  रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

पाकिस्तान मेल - खुशवंत सिंह - उषा महाजन (अनुवाद)


भारत-पाकिस्तान के त्रासदी भरे विभाजन ने जहाँ एक तरफ़ लाखों करोड़ों लोगों को उनके घर से बेघर कर दिया तो वहीं दूसरी तरफ़ जाने कितने लोग अनचाही मौतों का शिकार हो वक्त से पहले ही इस फ़ानी दुनिया से कूच कर गए। हज़ारों-लाखों लोग अब तक भी अपने परिवारजनों के बिछुड़ जाने के दुख से उबर नहीं पाए हैं। सैंकड़ों की संख्या में बलात्कार हुए और अनेकों बच्चे अपने परिवारजनों से बिछुड़ कर अनाथ के रूप में जीवन जीने को मजबूर हो गए। इसी अथाह दुःख और विषाद से भरी घड़ियों को ले कर अब तक अनेकों रचनाएँ  लिखी जा चुकी हैं और आने वाले समय में भी लिखी जाती रहेंगी। 


दोस्तों आज मैं इसी भयंकर राजनैतिक भूल से उपजी दुःख और अवसादभरी परिस्थितियों को ले कर रचे गए ऐसे उपन्यास के हिंदी अनुवाद की बात करने जा रहा हूँ जिसे मूलतः अँग्रेज़ी में 'ट्रेन टू पाकिस्तान' के नाम से लिखा था प्रसिद्ध अँग्रेज़ी लेखक 'खुशवंत सिंह' ने और इसी उपन्यास का 'पाकिस्तान मेल' के नाम से हिंदी अनुवाद किया है उषा महाजन ने।


इस उपन्यास की मूल कथा में एक तरफ़ कहानी है भारत-पाकिस्तान की सीमा पर बसे एक काल्पनिक गाँव 'मनो माजरा' में रहने वाले जग्गा नाम के एक सज़ायाफ्ता मुजरिम की। जिसने अपने गांव की ही एक मुस्लिम युवती के प्यार में पड़ सभी बुरे कामों से तौबा कर ली है। इसी बात से नाराज़ उसके पुराने साथियों को उसकी ये तौबा रास नहीं आती और वे जानबूझकर उसे फँसाने के लिए उसी के गांव में डाका डाल कर एक व्यक्ति की हत्या कर देते हैं। तो वहीं दूसरी तरफ़ इस उपन्यास में कहानी है वामपंथी विचारधारा से प्रेरित एक पढ़े-लिखे सिख युवक इकबाल सिंह की, जिसे आम जनता के विचारों की टोह लेने एवं उन्हें प्रभावित करने के मकसद से 'मनो माजरा' में उसके नेताओं द्वारा भेजा गया है। 


इस उपन्यास में कहीं भारत-पाक विभाजन की त्रासदी के दौरान पनपती आपसी नफ़रत और अविश्वास की बात होती नज़र आती है तो कहीं धार्मिक सोहाद्र और इंसानियत से भरी प्रेमभाव की बातें होती नज़र आती हैं। कहीं कत्लेआम के ज़रिए दोनों पक्षों (हिंदू और मुसलमान) के निरपराध नागरिक हलाक होते नज़र आते हैं तो कहीं अफसरों के ऐशोआराम और अय्याशियों की बात होती नजर आती है। 


कहीं देश हित के नाम पर तख़्तापलट के ज़रिए सत्ता परिवर्तन के मंसूबों को हवा मिलती दिखाई देती है तो कहीं देश में बेहिसाब बढ़ती जनसंख्या की बात की जाती दिखाई देती है।

इसी उपन्यास में कहीं जबरन उलटे- सीधे आरोप लगा कर किसी को भी पुलिस अपने जाल में फँसाती नज़र आती है तो कहीं पुलिस थानों में होने वाली कागज़ी कार्यवाही में अपनी सुविधानुसार लीपापोती की जाती दिखाई देती है। कहीं जेल में कैदियों को दी जाने वाली सुविधाओं में भी कैदी-कैदी के बीच भेदभाव होता दिखाई देता है तो कहीं सरकारी महकमों में पद और योग्यता के हिसाब से ऊँच-नीच होती नज़र आती है।


इसी कहानी में कहीं हिन्दू लाशों से भर कर पाकिस्तान से ट्रेन के आने की बात के बाद सरकारी अमला अलर्ट मोड में आता दिखाई देता है तो कहीं गाँव घर से इकट्ठी की गई लकड़ी और मिट्टी के तेल की मदद से उन्हीं लाशों का सामुहिक दाहकर्म होता दिखाई देता है। कहीं लकड़ी और तेल की कमी के चलते सामूहिक रूप से लाशें दफनाई जाती नज़र आती हैं। तो कहीं  सरकार एवं पुलिस महकमा अपने उदासीन रवैये के साथ पूरी शिद्दत से मौजूद नज़र आता है। कहीं लूट-खसोट, छीनाझपटी और बलात्कार इत्यादि में विश्वास रखने वाले हावी होते नज़र आते हैं तो कहीं पुलिसिया कहर और हुक्मरानों द्वारा जबरन अपनी इच्छानुसार किसी पर भी कोई भी इल्ज़ाम थोप देने की बात होती नज़र आती है। 


इसी किताब में कहीं अंधविश्वास और सेक्स से जुड़ी बातों को लेकर भारतीय मानसिकता की बात की जाती दिखाई देती है। तो कहीं मिलजुल कर शांति और प्रेमभाव से रह रहे सिखों और मुसलमानों के बीच शक-शुबह के बीज बो नफ़रत पैदा करने के हुक्मरानी मंसूबो को हवा मिलती नज़र आती है। कहीं पाकिस्तान की तरफ़ से सतलुज नदी में कत्ल कर दिए गए बेगुनाह बच्चों, बूढ़ों और औरतों के कष्ट-विक्षत शवों के बह कर भारत की तरफ़ आने का रौंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य पढ़ने को मिलता है। तो कहीं योजना बना कर मुसलमानों से भरी पाकिस्तान जा रही ट्रेन में सामूहिक नरसंहार को अंजाम दिया जाता दिखाई देता है। जिस पर पुलिस एवं स्थानीय प्रशासन भी अपने उदासीन रवैये के ज़रिए इस सब को होने देने के लिए रज़ामंद नज़र आता है। 


इस तेज़, धाराप्रवाह, रौंगटे खड़े कर देने वाले रोचक उपन्यास 

में कुछ एक जगहों पर मुझे प्रूफरीडिंग की कमियाँ दिखाई दीं। जिन पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है। 


● पेज नंबर 100 में लिखा दिखाई दिया कि..


'आग की लाल लपटें काले आकश में लपक रही थीं'


यहाँ 'काले आकश में' की जगह 'काले आकाश में' आएगा। 


● पेज नंबर 109 में लिखा दिखाई दिया कि..


'बादलों के काले पंखों में हवा भर रही है। हवा से प्रकाश को लजा जाती है। बादलों के काले पंखों में हवा भर रही है।


यहाँ 'हवा से प्रकाश को लजा जाती है' की जगह 'हवा से प्रकाश को लज्जा आती है' या फ़िर 'हवा से प्रकाश को लज्जा आ रही है' आना चाहिए।


इसके बाद अगली पंक्ति में एक बार फ़िर से लिखा दिखाई दिया कि..


'बादलों के काले पंखों में हवा भर रही है'


यह पंक्ति ग़लती से दो बार छप गई है। 


● पेज नंबर 123 में लिखा दिखाई दिया कि..


'हफ्ते-भर तक इकबाल अपनी कोठी में अकेला ही था'


इस दृश्य में इकबाल थाने में बंद है। इसलिए यहाँ 'कोठी' नहीं 'कोठरी' आना चाहिए। 


● पेज नंबर 125 में लिखा दिखाई दिया कि..


'इनका मनो-मस्तिष्क हमेशा इससे त्रस्त रहता है'


यहाँ 'मनो-मस्तिष्क' की जगह 'मन-मस्तिष्क' आना चाहिए। 


● पेज नंबर 142 में लिखा दिखाई दिया कि..


'पुलिस ककने डकैती के सिलसिले में मल्ली को गिरफ़्तार कर दिया है'


यहाँ 'पुलिस ककने डकैती के सिलसिले में' की जगह 'पुलिस ने डकैती के सिलसिले में' आएगा। 


पेज नंबर 151 की पहली पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..

'जाते वक्त मेरे साथ ऐसी निठुर ना बन'

यहाँ 'ऐसी निठुर ना बन' की जगह 'ऐसी निष्ठुर ना बन' आएगा। 

पेज नंबर 183 में लिखा दिखाई दिया कि..

'मैं जानता हूँ कि आज मेरे से नाराज होंगे'

यहाँ 'आज मेरे से नाराज होंगे' की जगह 'आप मेरे से नाराज होंगे' आएगा। 

* जँभाई - जम्हाई

इस बेहद रोचक उपन्यास के बढ़ियाअनुवाद के लिए उषा महाजन जी बधाई की पात्र हैं। इस 208 पृष्ठीय दमदार उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है राजकमल पेपरबैक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 299/- जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट के हिसाब से जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। 

राघव - खंड - 1- विनय सक्सेना

बॉलीवुड की फ़िल्मों में आमतौर पर आपने देखा होगा कि ज़्यादातर प्रोड्यूसर एक ही ढर्रे या तयशुदा फॉर्मयुलों पर आधारित फ़िल्में बनाते हैं या बनाने का प्रयास करते हैं। एक समय था जब खोया-पाया या कुंभ के मेले में बिछुड़े भाई-बहन का मिलना हो अथवा बचपन में माँ-बाप के कत्ल का बदला नायक द्वारा जवानी में लिया जाना हो इत्यादि फॉर्मयुलों पर आधारित फिल्मों की एक तरह से बाढ़ आ गयी थी। 

इसी तरह किसी एक देशभक्ति की फ़िल्म के आने की देर होती है कि उसी तर्ज़ पर अनेक फिल्में अनेक भाषाओं में बनने लगती हैं। एक बाहुबली क्या ब्लॉग बस्टर साबित हुई कि उसके बाद ऐश्वर्या रॉय (बच्चन) और विक्रम समेत दक्षिण के बड़े-बड़े सितारे तक राजमहलों और युध्दों से संबंधित षड़यंत्रकारी फिल्मों में व्यस्त होते चले गए। 

कुछ-कुछ ऐसा ही हाल हमारे देश में साहित्य का भी है। आमतौर पर कोई भी लेखक अथवा कवि अपने सोच एवं विचारों से वशीभूत होकर किसी ऐसे विषय पर अपनी कलम चलाता है या चलाने का प्रयास करता है जो उसे उसकी सोच के हिसाब से सही लगते हैं लेकिन बहुत से लेखक ऑन डिमांड भी किसी की मॉंग के अनुसार उसके सुझाए या दिए गए विषय पर भी उतनी ही सहजता से अपनी कलम चला लेते हैं जितनी सुगमता से वे अपने मन की इच्छा एवं रुचिनुसार विषय पर अपनी सोच के घोड़ों को दौड़ाते हुए लिखते हैं। लेकिन कई बार भेड़चाल को देखते हुए हम किसी ऐसे ट्रेंडिंग विषय पर भी अपनी सोच की नैय्या खेने लगते हैं जिस पर पहले ही बहुत से लेखक लिख चुके हैं या लिखने जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर मूल कहानी के एक ही होते हुए भी तुलसीदास या बाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के ही लगभग 300 से ज़्यादा अलग-अलग वर्ज़न आ चुके हैं जो भिन्न-भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न देशों में विभिन्न लोगों द्वारा लिखे या रचे गए। इसी रामायण की प्रसिद्ध कहानी को अँग्रेज़ी लेखक अमीश त्रिपाठी द्वारा बड़े स्तर पर हॉलीवुड स्टाइल में लिखा गया जिसकी बिक्री के आँकड़े चौंकाते हैं। ख़ैर.. इस विषय में ज़्यादा बातें फ़िर कभी किसी अन्य पोस्ट में। फिलहाल मैं यहाँ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर पाँच खण्डों में लिखे गए उपन्यास 'राघव' के पहले खंड की बात करने या रहा हूँ जिसे लिखा है विनय सक्सेना ने।

इस उपन्यास में एक तरफ़ कहानी है किशनूर राज्य पर नज़रें गड़ाए उसके पड़ोसी राज्यों प्रकस्थ एवं तितार की षड़यंत्रभरी कोशिशों की। जिनके तहत एक तरफ़ किशनूर के युवाओं को रूपवती युवतियों के ज़रिए वासना के जाल में उलझा अपनी तरफ़ मिलाया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ़ उन्हें नशे की 
गिरफ्त में ले नाकारा किया जा रहा है। 

 इस उपन्यास में एक तरफ़ 'राघव' राज्य से निकाले जा चुके अपराधियों/बेगुनाहों को संगठित करने में जुटा दिखाई देता है तो वहीं दूसरी तरफ़ मंथरा सरीखी 'रूपा' की षड़यंत्रभरी चालबाज़ियों में फँस, ममतामयी राजमहिषी भी अपने पुत्र को राजा बनने के मोह में अपने सौतेले पुत्र 'राघव' के लिए महाराज से देशनिकाला माँगती नज़र आती है। 

इस उपन्यास में कहीं युवराज और राजनर्तकी के मध्य प्रेम पनपता दिखाई देता है तो कहीं अत्याचारी राजा के अमानवीय अत्याचार होते दिखाई देते हैं। कहीं खंडहर हो चुके भव्य महल  का राघव के दिशानिर्देशोंनुसार जीर्णोद्धार होता दिखाई देता है तो कहीं इस कार्य में विशालकाय पक्षी भी राघव की मदद करते नज़र आते हैं। 

इसी उपन्यास में कहीं अस्त्रों-शास्त्रों के संचालन, व्यूह रचना एवं युध्दकौशल से जुड़ी बातें नज़र आती हैं तो कहीं शतरंज की बिसात पर शह और मात के खेल के ज़रिए रणनीति की गूढ़ बातें सरल अंदाज़ में समझाई जाती दिखाई देती हैं। इसी किताब में कहीं औषधीय चिकित्सा में वन्य वनस्पतियों का महत्त्व समझाया जाता दिखाई देता है। 

◆ किसी भी गुप्तचर या दुश्मन के क्षेत्र में घुसे सैनिक का कर्तव्य होता है कि वह पकड़े जाने पर अपने देश या राज्य की कोई भी जानकारी अपने शत्रुओं को न लगने दे लेकिन इस उपन्यास में युवराज राघव के गुप्त रूप से प्रकस्थ की राजकुमारी से मिलने के प्रयास के दौरान जब वह जानबूझकर अचानक अपनी सुरक्षा में तैनात सैनिकों की दृष्टि से ओझल हो ग़ायब हो जाता है। तो उसकी खोज में जंगल में भटकते हुए जब दमन और उसके सैनिक पकड़े जाते हैं तो उनका एक ही बार में सब राज़ उगल देना बड़ा हास्यास्पद एवं अजीब लगता है कि ऐसे ढीले लोगों को राज्य की सेना में शामिल ही क्यों किया गया। 

◆ पेज नम्बर 22-23 पर दिए गए एक प्रसंग में महाराज ऊँचे लंबे कद के बलिष्ठ देव से राज्य की सुरक्षा के संदर्भ में एक दूसरे से आदरपूर्वक भाषा में विचारविमर्श कर रहे हैं। इसी प्रसंग के दौरान  महाराज देव को निर्देश देते हुए कहते हैं कि..

'कुछ भी संशयात्मक लगे तो वह तुझे और तू मुझे सूचित करेगा' 

यहाँ एक राजा के मुख से सम्मानपूर्वक भाषा के बजाय 'तुझे' और 'तू' की भाषा में देव को संबोधित करना थोड़ा अटपटा लगा। इसके बजाय अगर 'तुम्हें' और 'तुम' शब्दों का प्रयोग किया जाता तो बेहतर था।

इसी तरह की 'तू-तड़ाक' वाली भाषा का आगे भी उपन्यास में कई जगह पर प्रयोग दिखाई दिया। जिससे बचा जाना चाहिए था। 

◆ इसी किताब में सेना में नौसिखियों की भर्ती के लिए रँगरूट शब्द का उपयोग किया गया जो कि एक उर्दू शब्द है। उर्दू शब्दों जैसे 'मजलिस', 'शुबह' , 'शक', 'खैरख्वाह', 'सेहत', 'तरक्की' इत्यादि का इस्तेमाल बहुतायत में दिखा।

◆ पेज नंबर 103 की अंतिम पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..

'यहाँ की जलवायु में प्राय: गंभीर रोग नहीं होते किंतु वर्षा के समय संक्रामक रोग, हैजा, मलेरिया आदि हो जाते हैं'

कहानी के समय-काल के हिसाब से कहानी की भाषा में यथासंभव हिंदी शब्दों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए था लेकिन यहाँ इस्तेमाल किया गया 'मलेरिया' शब्द एक अँग्रेज़ी शब्द है। 

◆ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया यह काल्पनिक उपन्यास कहीं अँग्रेज़ी लेखक अमीश त्रिपाठी की लेखनी से प्रेरित लगा तो कुछ एक जगहों पर ऐसा प्रतीत हुआ जैसे रामायण, महाभारत इत्यादि पौराणिक ग्रंथों के कुछ दृश्यों को हूबहू बस नाम, स्थान और पात्र संख्या बदल कर नए सिरे से पाठकों के समक्ष परोस दिया गया हो। उदाहरण के तौर पर ऋषि विश्वामित्र द्वारा राम-लक्ष्मण को शिक्षा-दीक्षा एवं युद्ध कौशल एवं जीवन के नैतिक मूल्यों की शिक्षा प्रदान किए जाने के दृश्यों को लेखक द्वारा जस का तस वाले अन्दाज़ में पुनः लिख दिया गया। 

दरअसल हम लेखक अपने लिखे के मोह में इस कदर पड़ जाते हैं कि उसे ही ऐसा ब्रह्म वाक्य समझ लेते हैं जिसे किसी भी सूरत में काटा या छाँटा नहीं जा सकता जबकि किसी भी लेखक का स्वयं में एक अच्छा पाठक होना बेहद ज़रूरी है जो कि स्वयं अपने लिखे को ही पढ़ कर उसकी पठनीयता/अपठनीयता  की जाँच कर सके। साथ ही उसमें एक निर्दयी संपादक का गुण होना भी बहुत ज़रूरी है जो बेदर्दी से स्वयं लिखे हुए में से अनावश्यक हिस्से को काट-छाँट कर रचना को उम्दा एवं अव्वल दर्जे का बना सके। 

पाठकीय दृष्टि से अगर कहूँ तो यह उपन्यास मुझे बेहद खिंचा हुआ लगा। राघव की शिक्षा-दीक्षा से संबंधित दृश्य मुझे अनावश्यक रूप से ज़्यादा बड़े लिखे गए प्रतीत हुए जिनकी वजह से कई जगहों पर उपन्यास बोझिल एवं उबाऊ सा भी लगा। अगर कोशिश की जाती तो इस 286 पृष्ठीय उपन्यास को आसानी से 200 पेजों में समेटा जा सकता था। बतौर सजग पाठक एवं स्वयं के भी एक लेखक होने की वजह से मुझे इस तरफ़ ध्यान दिए जाने की आवश्यकता प्रतीत हुई।

यूँ तो लेखक द्वारा इस उपन्यास के पाँचों खण्ड मुझे उपहारस्वरूप प्रदान किए गए परंतु अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा की इस उपन्यास के 286 पृष्ठीय प्रथम खण्ड 'राघव - युगप्रवर्तक' के पेपरबैक संस्करण को छापा है वाची प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 300/- रुपए जो कि कंटैंट के हिसाब से मुझे ज़्यादा लगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

पूतोंवाली - शिवानी

आजकल के इस आपाधापी से भरे माहौल में हम सब जीवन के एक ऐसे फेज़ से गुज़र रहे हैं जिसमें कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा पा लेने की चाहत की वजह से निरंतर आगे बढ़ते हुए बहुत कुछ पीछे ऐसा छूट जाता है जो ज़्यादा महत्त्वपूर्ण या अच्छा होता है। उदाहरण के तौर पर टीवी पर कोई उबाऊ दृश्य या विज्ञापन आते ही हम झट से चैनल बदल देते हैं कि शायद अगले चैनल पर कुछ अच्छा या मनोरंजक देखने को मिल जाए। मगर चैनल बदलते-बदलते इस चक्कर में कभी हमारा दफ़्तर जाने का समय तो कभी हमारा सोने का समय हो जाता है और हम बिना कोई ढंग का कार्यक्रम देखे ख़ाली के ख़ाली रह जाते हैं। कुछ ऐसी ही बात किताबों के क्षेत्र में भी लागू होती है कि हम ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ने की चाह में आगे बढ़ते हुए पीछे कुछ ऐसा छोड़ जाते हैं जो ज्ञान या मनोरंजन की दृष्टि से ज़्यादा अहम..ज़्यादा फायदेमंद होता है। 


दोस्तों..आज मैं इस बात को अपने समय की प्रसिद्ध लेखिका शिवानी की रचनाओं के बारे कह रहा हूँ जिनकी रचनाओं को पढ़ने का मौका तो मुझे कई बार मिला मगर किसी न किसी वजह से मैं उनका लिखा पढ़ने से हर बार चूक गया। आज से तीन महीने पहले उनकी लिखी "पूतोंवाली" किताब को पढ़ने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ है कि मैं कितना कुछ पढ़ने से वंचित रह गया। लेकिन फ़िर कुछ ऐसा हुआ कि चाह कर भी इस बेहद रोचक किताब पर कुछ लिख नहीं पाया। अब लिखने के बारे में सोचा तो एक बार पुनः किताब पर नज़र दौड़ाने के बहाने इस किताब को फ़िर से पढ़ा गया। 


दोस्तों  हिन्द पॉकेट बुक्स के श्रद्धांजलि संस्करण 2003, में छपी इस किताब 'पूतोंवाली' में उनके लिखे दो लघु उपन्यास और तीन कहानियाँ शामिल हैं। 


'पूतोंवाली' नाम लघु उपन्यास है उस औसत कद-काठी और चेहरे मोहरे वाली 'पार्वती' की जिसे उसकी माँ की मृत्यु के बाद सौतेली माँ की चुगली की वजह से पिता के हाथों रोज़ मार खानी पड़ी। पिता के आदेश पर मोटे दहेज के लालच में सुंदर, सजीले युवक से ब्याह दी गयी। 


अपने रूपहीन चेहरे और कमज़ोर कद-काठी की वजह से पति की उपेक्षा का शिकार रही 'पार्वती' को आशीर्वाद के रूप में मिले 'दूधो नहाओ पूतों फलो' जैसे शब्द सच में ही साकार हुए जब उसने एक-एक कर के पाँच पुत्रों को जन्म तो दिया मगर..


इसी संकलन के एक बेहद रोचक लघु उपन्यास 'बदला' की कहानी पुलिस महकमे के ठसकदार अफ़सर 'त्रिभुवनदास' की नृत्य कला में निपुण बेहद खूबसूरत बेटी 'रत्ना' की बात करती है। जो अपनी मर्ज़ी के युवक से शादी करना चाहती है मगर उसका दबंग पिता उस युवक को रातों रात ग़ायब करवा उसका ब्याह किसी और युवक से करवा देता है। अब देखना यह है कि अपने प्रेमी के वियोग में तड़पती 'रत्ना' क्या उसे भूल नयी जगह पर अपने पति के साथ राज़ीखुशी घर बसा लेती है अथवा...


इसी संकलन की एक अन्य कहानी 'श्राप' में रात के वक्त सोते-सोते लेखिका अचानक किसी ऐसे सपने की वजह से हड़बड़ा कर उठ बैठती है जो उसे फ़्लैशबैक के रूप में  दस वर्ष पीछे की उस घटना की तरफ़ ले जाता है जिसमें वह अपनी मकान मालकिन के कहने पर, उसकी बहन के रहने के लिए, उसे अपने पोर्शन के दो कमरे कुछ दिनों के लिए इसलिए इस्तेमाल करने के लिए दे देती है कि उसे वर पक्ष वालों की ज़िद के चलते अपनी सुंदर, सुशील बेटी की शादी उनके शहर में आ कर करनी पड़ रही है। वधु पक्ष की तरफ़ से दिल खोल कर पैसा खर्च करने के बावजूद भी इस बेमेल शादी में कहीं ना कहीं कुछ खटास बची रह जाती है। 


विवाह के कुछ महीनों बाद लेखिका को अचानक पता चलता है कि शादी के चार महीनों बाद एक दिन ससुराल में रसोई में काम करते वक्त लापरवाही की वजह से उनकी बेटी की जलने की वजह से मौत हो गयी। 


इसी संकलन की एक अन्य कहानी में अचानक एक दिन लेखिका की मुलाक़ात बरसों बाद अपनी उस ख़ूबसूरत सहेली 'प्रिया' से रेलवे स्टेशन पर मुलाक़ात होती है, जिनकी दोस्ती कॉलेज वालों के लिए एक मिसाल बन चुकी थी। और उसकी उसी सहेली ने एक दिन बिना कोई वजह बताए अचानक से कॉलेज छोड़ दिया था। इस ट्रेन वाली मुलाक़ात में 'प्रिया' लेखिका के साथ गर्मजोशी तो काफी दिखाती है मगर अपना पता ठिकाना बताने से साफ़ इनकार कर देती है। 


इस बात के काफ़ी वर्षों के बाद एक दिन नैनीताल के किसी उजाड़ पहाड़ी रास्ते पर लेखिका की मुलाक़ात अचानक एक लंबे चौड़े..मज़बूत कद काठी के नितांत अजनबी व्यक्ति से होती है जो 'प्रिया' और लेखिका के बीच घट चुकी निजी बातों और घटनाओं का बिल्कुल सही एवं सटीक वर्णन करता है। जिससे लेखिका घबरा जाती है। अब सवाल उठता है कि आख़िर कौन था वो अजनबी जो उन दोनों के बीच घट चुकी एक-एक बात को जानता था? 


इसी संकलन की अंतिम कहानी में ट्रेन में रात का सफ़र कर रही लेखिका के कूपे में बड़ा सा चाकू लिए एक लुटेरा घुस आता है और सब कुछ लूट कर जाने ही वाला होता है कि अचानक कुछ ऐसा होता है कि लूटने के बजाय वही लुटेरा लेखिका के पास फॉरन करैंसी से भरा हुआ एक बटुआ छोड़ कर चला जाता है। 


127 पृष्ठीय इस बेहद रोचक और पठनीय किताब के हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है 'सरस्वती विहार' (हिन्द पॉकेट बुक्स का सजिल्द विभाग है) ने और इसका मूल्य रखा गया है मात्र 125/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।




मैमराज़ी - जयंती रंगनाथन

1970-80 के दशक में जहाँ एक तरफ़ मारधाड़ वाली फिल्मों का ज़माना था तो वहीं दूसरी तरफ़ आर्ट फिल्में कहलाने वाला समांतर सिनेमा भी अपनी पैठ बनाना शुरू कर चुका था। इसी बीच व्यावसायिक सिनेमा और तथाकथित आर्ट सिनेमा की बीच एक नया रास्ता निकालते हुए हलकी-फुल्की कॉमेडी फिल्मों का निर्माण भी होने लगा जिनमें फ़ारुख शेख, दीप्ति नवल और अमोल पालेकर जैसे साधारण चेहरे-मोहरे वाले कलाकारों का उदय हुआ। इसी दौर की एक मज़ेदार हास्यप्रधान कहानी 'मैमराज़ी' को उपन्यास की शक्ल में ले कर इस बार हमारे समक्ष हाज़िर हुई हैं प्रसिद्ध लेखिका जयंती रंगनाथन। 


मूलतः इस उपन्यास के मूल में कहानी है दिल्ली के उस युवा शशांक की जो दिल्ली में अपनी गर्लफ्रैंड 'सुंदरी' को छोड़ कर  भिलाई के स्टील प्लांट में बतौर ट्रेनी इंजीनियर अपनी पहली सरकारी नौकरी करने के लिए आया है। भिलाई पहुँचते ही पहली रात उसके साथ कुछ ऐसा होता है कि वो भौचंक रह जाता है। 


अगले दिन सुबह पड़ोसन के घर से नाश्ता कर के निकले शशांक के साथ कुछ ऐसा होता है कि आने वाले दिनों में वह अपने अफ़सर से ले कर कुलीग तक का इस हद तक चहेता बन बैठता है कि उनकी पत्नियाँ उसके साथ अपनी बेटी, बहन या रिश्तेदार की लड़की को ब्याहने के लिए उतावली हो उठती हैं। अब देखना ये है कि क्या शशांक ऐसे किसी मकड़जाल में फँस वहीं का हो कर रह जाएगा अथवा दिल्ली में बेसब्री से अपना इंतज़ार कर रही गर्लफ्रेंड सुंदरी के पास वापिस लौट जाएगा? उपन्यास को पढ़ते वक्त अमोल पालेकर की कॉमेडी फिल्म "दामाद" जैसा भी भान हुआ। मज़ेदार परिस्थितियों से गुज़रते इस तेज़ रफ़्तार रोचक उपन्यास में पता ही नहीं चलता कि कब वह खत्म हो गया।


इस उपन्यास के पेज नम्बर 164 में एक पंजाबी भाषा के एक संवाद में लिखा दिखाई दिया कि..


'इडियट, सुंदरी की शादी किसी और से करवाएगा तू? बैन दे टके'

जो कि पंजाबी उच्चारण के हिसाब से सही नहीं है। सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..


यहाँ 'बैन दे टके' की जगह 'भैंण दे टके' या 'भैन दे टके' 


184 पृष्ठीय इस दिलचस्प उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है हिन्द युग्म और YELLOW ROOTS India मिल कर और इसका मूल्य रखा गया है 249/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। 


आउट - नॉट आउट



"आउट - नॉट आउट"

    राजीव तनेजा

शोर-शराबे के तनाव भरे माहौल के बीच माथे पर चिंता के गहन भावों के साथ दर्शक दीर्घा में बेहद डर और उत्सुकता का मिलाजुला माहौल। हार या जीत का सारा दारोमदार मैदान में खेल रहे खिलाड़ियों के दम-खम पर। अब देखना ये है कि शातिर गेंदबाजों की तिकड़मी गेंदें हावी होती हैं या फ़िर बल्लेबाज की हिम्मत और धैर्य के साथ खेले गए शॉट।

लंबे रनअप के बाद निशाना साधे गेंदबाज़ की एक तेज़ बाउंसर बिना संभलने का मौका दिए सीधा बल्लेबाज की तरफ़ हावी होती हुई। हड़बड़ा कर बल्लेबाज ने तेज़ आक्रमण से बचने का भरपूर प्रयास किया मगर इससे पहले कि वो कामयाब हो, गेंद सीधा उसके हेलमेट से जा टकराई। बल्लेबाज ने लड़खड़ा कर गिरते हुए संभलने का प्रयास किया। पसीना पोंछते गेंदबाज के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान। 

बल्लेबाज के चेहरे पर थकान मगर सधे अंदाज़ में गेंदबाज़ पर नज़रें गड़ाए सावधानी से  अगली गेंद खेलने के लिए तैयार। लंबे रनरअप के बाद ये एक और तेज़ गति से स्विंग होती हुई गेंद। पहले से तैयार खड़े मुस्तैद बल्लेबाज ने ज़ोर से हवा में बल्ला घुमाया और इसके साथ ही गेंद हवा में उड़ती हुई बाउंड्री पार चार रनों के लिए। तालियों की गड़गड़ाहट और करतल ध्वनि के बीच तेज़ गति से दौड़ते गेंदबाज की अगली गेंद थोड़ी धीमी गति के साथ बल्लेबाज की तरफ़ लपकी। सावधानी से खड़े बल्लेबाज से बल्ला घुमाया मगर ये क्या, बल्लेबाज को छकाती हुई गेंद ने अचानक टर्न लिया और सीधा मिडल विकेट की गिल्ली उड़ाती हुई पीछे विकेटकीपर द्वारा रोक ली गयी। अंपायर का 'आउट' का इशारा और थके कदमों से बल्लेबाज वापिस पवैलियन की तरफ़। 


"लो.. इतनी जल्दी इसकी विकेट भी उड़ गयी। अब देखते हैं कि अगला कब तक टिकता है।" नर्स ने मुस्कुराते हुए पास खड़े वार्ड ब्वाय से कहा और संजीदा चेहरे के साथ अगले पेशेंट की तरफ़ बढ़ गयी।

इसके साथ ही C.C.U (क्रिटिकल केयर यूनिट) के बाहर रिश्तेदारों के रोना-बिलखना शुरू हो चुका था। 

द डार्केस्ट डेस्टिनी - डॉ. राजकुमारी


आमतौर पर जब भी कभी किसी के परिवार में कोई खुशी या पर्व का अवसर होता है, तो हम देखते हैं कि हमारे घरों में हिजड़े (किन्नर) आ कर नाचते-गाते हुए बधाइयाँ दे कर इनाम वगैरह ले जाते हैं। किन्नर या हिजड़ों से अभिप्राय उन लोगों से है, जिनके किसी ना किसी कमी की वजह से जननांग पूरी तरह विकसित न हो पाए हों अथवा पुरुष होकर भी जिनका स्वभाव स्त्री जैसा हो या जिन्हें पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों के बीच रहने में सहजता महसूस हो।


दोस्तों..आज मैं इसी महत्त्वपूर्ण मुद्दे से जुड़े एक ऐसे उपन्यास का जिक्र करने जा रहा हूँ जिसे 'द डार्केस्ट डेस्टिनी' के नाम से लिखा है डॉ. राजकुमारी ने। दलित लेखक संघ की अध्यक्ष, डॉ. राजकुमारी की रचनाएँ कई साझा संकलनों के अतिरिक्त अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं। प्रसिद्ध साहित्यकार रामदरश मिश्र जी के लेखन पर स्वतंत्र किताबों के अतिरिक्त इनका एक शायरी तथा एक कविता संग्रह भी आ चुका है। 


किन्नर विमर्श को केंद्र में रख आत्मकथ्य के रूप में लिखे गए इस उपन्यास के मूल में कहानी है लैंगिक विकृति के साथ पैदा  हुई एक आदिवासी लड़की अमृता की। उस अमृता की जिसे अपने बचपन से ले कर जवानी तक घृणा और तिरस्कार भरे जीवन से दो चार होना पड़ा। इस उपन्यास में कहीं अमृता के घर-परिवार से ले कर गाँव-समाज तक में कभी दैहिक तो कभी मानसिक रूप से प्रताड़ित..शोषित होने की बातें नज़र आती हैं तो कहीं किन्नर परंपराओं से जुड़ी बातें भी पढ़ने को मिलती हैं। 


इसी उपन्यास में कहीं शारीरिक रूप से एकदम ठीक होते हुए कुछ लड़कों के स्वेच्छा से किन्नर वेश अपना पैसे कमाने की बात होती दिखाई देती है तो कहीं किसी को जबरन किन्नर बनाए जाने की बात भी होती नज़र आती है। इसी किताब में कहीं हालात से समझौता कर घुटने टेकने की बात होती नज़र आती है तो कहीं अधिकारों के लिए संघर्ष करने की बात भी पूरे दमख़म के साथ उभर कर सामने आती दिखाई देती है।


इसी उपन्यास में भीमराव अंबेडकर जी की विचारधारा से प्रेरणा लेते किन्नर नज़र आते हैं तो कहीं किन्नरों द्वारा अरावल राक्षस की मूर्ति से पूर्ण श्रंगार कर मंगलसूत्र इत्यादि पहन सामूहिक विवाह करने की बात और उसके मरने पर मंगलसूत्र तोड़ सामूहिक रूप से विलाप करने की परंपरा की बात होती नज़र आती है। 


पूरा उपन्यास अंततः एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाता दिखाई देता है कि जब कुछ व्यक्तियों को मात्र सैक्स का आनंद उठा पाने में सक्षम ना होने की वजह से किन्नर मान लिया जाता है तो जो पुरुष या स्त्री बच्चे पैदा करने में किसी भी वजह से सक्षम नहीं हो पाते, उन्हें भी किन्नर श्रेणी में डाल, उनका किन्नरों की ही भांति बहिष्कार क्यों नहीं किया जाता? जब उन्हें सामान्य श्रेणी में डाल, समाज का ही एक अटूट हिस्सा माना जा सकता है तो किन्नरों को क्यों नहीं? 


बतौर सजग पाठक होने के नाते मुझे इस उपन्यास के शुरुआती 30 पृष्ठ खामख्वाह में उपन्यास की लंबाई बढ़ाने के लिए लिखे गए दिखाई दिए जिनके होने या ना होने से कहानी पर कोई फ़र्क नहीं पड़ना था। साथ ही इस उपन्यास में जहाँ एक तरफ़ लेखिका 'कि' और 'की' अन्तर को भी नहीं समझ पायी हैं तो वहीं दूसरी तरफ इस उपन्यास में हद से ज़्यादा वर्तनी की त्रुटियाँ दिखाई दीं। इसके अतिरिक्त प्रूफ़रीडिंग की कमियाँ भी ग़लतियों के मामले में वर्तनी की त्रुटियों से इस हद तक कड़ा मुकाबला करती दिखाई दीं कि 'किस में कितना है दम? उपन्यास को पढ़ते वक्त ऐसा प्रतीत हुआ कि लेखिका ने बिना प्रूफ़रीडिंग को चैक किए जल्दबाज़ी में किताब जस की तस छपवा ली है। 


पेज नंबर 43 में लिखा दिखाई दिया कि..


'रंगीन दीवारें बीच-बीच में पंखे और बाहरी हवा के झोंकों से झूलती हुई नन्हे बल्बों की लाइनें और सुहागसेज के इर्द-गिर्द लगी पीले गेंदे की फूलों की लड़ियाँ अठखेलियाँ कर रही थी। कमरे में बिजली के बल्बों के अलावा भी बड़ी-बड़ी खूबसूरत और भिन्न-भिन्न रंगों की मामबत्तियां जल रही थी, जो उस कमरे के वातावरण को बहुत रोमांचक बना रही थी'


इस पैराग्राफ़ में परस्पर विरोधी बातें लिखी दिखाई दीं कि कमरे में पँखे की हवा के साथ-साथ बाहरी हवा भी आ रही थी और कमरे में बड़ी-बड़ी मोमबत्तियाँ भी जल रही थी। जबकि पँखे की या बाहरी हवा के आगे जलती मोमबत्तियों के लिए अपने वजूद को बचा पाना संभव ही नहीं है। 


 साथ ही सुहागरात के इस दृश्य में लेखिका ने यहाँ 'रोमांचक' शब्द का इस्तेमाल किया है जिसे मौके के हिसाब से बिल्कुल भी सही नहीं ठहराया जा सकता। इस मौके के लिए 'रोमांचक' की जगह सही शब्द 'रोमांटिक' होगा।


इसी पेज पर एक और कमी दिखाई दी कि इस पेज का काफ़ी बड़ा हिसा पेज नंबर 179-178 में रिपीट होता दिखा। हालांकि उसी पहले वाले दृश्य की पुनरावृत्ति हो रही थी लेकिन फिर भी शब्दों में अगर थोड़ा हेरफेर किया जाता तो बेहतर था। 


पेज नंबर 88 में लिखा दिखाई दिया कि..


'सर्दियों के होली डेज़ में तो आमतौर पर यही होता था' 


यहाँ लेखिका का 'होली डेज़' यानी कि हॉलीडेज़ से तात्पर्य सर्दियों की छुट्टियों से है जबकि शब्द में 'होली-डेज़' ग़लत जगह पर विच्छेद या स्पेस आने से इस शब्द के मायना ही बदल कर 'पवित्र दिन' हो गया है।


■ पेज नंबर 144 के दूसरे पैराग्राफ में लेखिका एक तरफ उपन्यास की नायिका अमृता बन किन्नर समाज की पैरवी करते-करते अचानक बीच पैराग्राफ के ही आम समाज की पैरवी करती दिखाई दी।


उदाहरण के तौर पर इसी पैराग्राफ में पहले लिखा दिखाई दिया कि..


'इन्हें मोरी में रहने वाला कीड़ा कहते हुए हमारी जुबान जरा भी नहीं लड़खड़ाती, ना ही लज्जा आती है। उनके चरित्र पर कीचड़ उछालकर उनकी छवि बिगाड़ने में हम तगड़ी मेहनत करते हैं'


■ पेज नंबर 148 से शुरू हुए एक ट्रेन यात्रा के दौरान छेड़खानी के दृश्य में किन्नरों द्वारा एक युवक को किसी लड़की के साथ छेड़खानी करने से रोका जाता है। इस प्रसंग के दौरान गुस्से में एक किन्नर उस युवक को झापड़ जड़ देता है जिससे उस युवक का मुँह लाल हो जाता है। उसके बाद तमाशा देखने के लिए भीड़ इकट्ठी हो जाती है। 


इसी दृश्य से संबंधित पेज नम्बर 149 में लिखा दिखाई दिया कि..


'उसने उसके गाल पर एक झापड़ जड़ दिया। उसका मुँह लाल पड़ गया। सभी लोग इकट्ठे हो गए। लड़का हाथों की पकड़ ढीली होते ही मौका का भाग खड़ा हुआ। 


अब यहाँ ये सवाल उठता है कि चलती ट्रेन में किन्नरों समेत अन्य लोगों की भीड़ में फँसा युवक भाग कैसे सकता है? और मान भी लिया जाए कि किस तरह भाग गया तो आख़िर वो भाग कर भला जा कहाँ सकता है? 


■ किसी भी किरदार को जीवंत करने के लिए लेखक को परकाया में प्रवेश कर उसी किरदार की भांति सोचना, समझना एवं बोलना पड़ता है मगर उपन्यास में लेखिका साफ़ तौर पर इस मुद्दे पर पिछड़ती दिखाई देती हैं कि किरदार के बजाय वे स्वयं लेखिका के रूप में अपने किरदार पर हावी हो 

किरदार के मुख से अपनी भाषा..अपने विचार बोलती दिखाई देती हैं। 


उदाहरण के लिए पेज नंबर 150 में लिखा दिखाई दिया कि...


ऐ लड़की तुम। हाँ, तुम! कपड़े तो मॉडर्न पहन लिए थोड़ी हिम्मत भी जुटा ले। तुम इन इंसानों की खाल में लैंगिकता का दंभ भरने वाले भेड़ियों से खुद को बचाने की कोशिश ना कर के हिम्मत बढ़ाती हो।


■ बाइंडर की ग़लती से जो किताब मुझे मिली उसमें पेज नंबर 109-110 उलटे चिपके हुए अर्थात पेज नंबर 110 पहले और पेज नंबर 109 बाद में था। 

इसके बाद पुनः यही ग़लती मुझे पेज नंबर 153-154 में दिखाई दी जिसमें पेज नंबर 154 पहले और 153 बाद में था। 


बतौर पाठक, लेखक एवं एक समीक्षक होने के नाते मेरा मानना है कि आधे-अधूरे मन से लिखी गयी रचना कभी सफ़ल नहीं हो सकती। दमदार लिखने के लिए आप में सजगता के साथ संयम का होना बेहद ज़रूरी है। दरअसल होता क्या है कि ज़्यादातर लेखक अपने लिखे के मोह में पड़ उसे ऐसा ब्रह्म वाक्य समझ लेते हैं कि उसके साथ कोई छेड़छाड़ या काट-छाँट संभव ही नहीं। इसका नतीजा अंतत रचना को ही भुगतना पड़ता है जिसका भविष्य लेखक की थोड़ी सी समझदारी और धैर्य से उज्ज्वल हो सकता था मगर उसकी हठधर्मिता की वजह से जिसका बेड़ागर्क हो गया। आप मान कर चलिए कि आधे-अधूरे मन से किया गया कोई भी काम अँधों में काना राजा तो हो सकता है मगर कभी पूर्णतः सफ़ल नहीं हो सकता। एक अच्छी और सफ़ल किताब या रचना के लिए स्वयं लेखक का एक ऐसा निर्दयी संपादक का होना निहायत ही ज़रूरी है जो स्वयं ही अपनी रचना के भले के लिए उसमें धड़ल्ले से काट-छाँट कर सके। 


■ पूरा उपन्यास पढ़ने के बाद स्वाभाविक रूप से मन में एक प्रश्न उमड़ता-घुमड़ता दिखाई देता है कि क्या बिना पढ़े, साहित्यजगत की प्रसिद्ध एवं नामचीन हस्तियों द्वारा, किसी किताब की भूमिका या प्रस्तावना के लिए अपना नाम एवं शब्द देना उचित है? 


उम्मीद की जानी चाहिए कि इस किताब में हुई ग़लतियों से संज्ञान लेते हुए लेखिका एवं प्रकाशक अपनी आने वाली किताबों में इस तरह की कमियों से बचने का प्रयास करेंगे कि इससे लेखक/प्रकाशक की साख पर बट्टा तो लगता ही है। 


यूँ तो लेखिका से यह उपन्यास मुझे उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इस किताब के 192 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है देवसाक्षी पब्लिकेशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 199/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

सितारों में सूराख़ - अनिलप्रभा कुमार

अभी हाल-फिलहाल में ही एक ख़बर सुनने..पढ़ने एवं टीवी के ज़रिए जानने को मिली कि हमारे यहाँ किसी उन्मादी सिपाही ने चलती ट्रेन में अपनी सरकारी बंदूक से एक ख़ास तबके के निरपराध यात्रियों पर गोलियाँ बरसा, मानवता को तार-तार करते हुए उनकी हत्या कर दी। इसी तरह की कुछ ख़बरें भारत के पूर्वोत्तर में स्थित मणिपुर से भी लगातार आ रही हैं जहाँ, वहाँ के दो समुदायों, बहुसंख्यक मैतेई और अल्पसंख्यक कुकी के बीच हिंसक झड़पों में सैंकड़ों लोग रोज़ाना मारे जा रहे हैं। इस तरह की ख़बरों को देख या सुन कर हम सभी चौंके तो सही मगर ऐसा नहीं हुआ कि इससे एकदम से हाय तौबा मच गई हो या सत्ता के गलियारों की बुलंद इमारत और बुनियाद वगैरह हिल गयी हो। दरअसल इस तरह की ख़बरों की जानकारी होने के बावजूद भी हम सब चुप रहते हैं कि ये सब हम पर थोड़े ही ना बीत रहा है।  मगर हम सब यह नहीं जानते कि जो आग हमारे घरों के बाहर अभी फ़िलहाल जल रही है, एक न एक दिन हमारे घरों एवं परिवारों को भी अपनी चपेट में ले लेगी। कमोबेश इसी तरह की मनोस्थिति या विचारधारा को समर्थन करते लोग केवल  भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व भर में  फैले हुए हैं।

दोस्तों..आज इस तरह की त्रासदी से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं इसी गंभीर विषय से जुड़े एक प्रभावी उपन्यास 'सितारों में सूराख' की बात करने जा रहा हूँ जिसे लिखा है लेखिका अनिलप्रभा कुमार ने।

 इस उपन्यास के मूल में कहानी है अमेरिका के एक टीवी चैनल में अपनी आजीविका के लिए नौकरी कर रहे जय, उसकी पत्नी जैस्सी उर्फ़ जसलीन और उसकी नौवीं में पढ़ रही बेटी चिन्नी की। देर रात ओवर टाइम कर के घर लौट रहे जय, किसी अज्ञात नकाबपोश द्वारा बन्दूक की नोक पर लूट लिया जाने से चिंतित हो अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए अपने एक दोस्त की मदद से एक पिस्टल खरीद तो लेता है मगर...

इस उपन्यास में कहीं द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाज़ियों द्वारा गैस चैम्बर में बंद कर 60 लाख से ज़्यादा यहूदियों के संहार किए जाने की बात होती नजर आती है। तो कहीं भारत विभाजन की त्रासदी से जुड़ी बातें होती नज़र आती हैं। इस उपन्यास में कहीं किसी दृश्य की भयावहता और विभीस्तता के ज़रिए उसके बिकाऊ होना या ना होना तय किया जाता दिखाई देता है। कहीं टीवी पत्रकारिता के लिए सच को तोड़ा मरोड़ा जाता दिखाई देता है तो कहीं किसी नाईट क्लब में बेगुनाह लोगों पर सरेआम गोलियां बरसा उनका क़त्ल कर देने  की बात को भी महज़ एक सनसनीखेज ख़बर के नज़रिए  से देखा जाता दिखाई देता है। 

इसी उपन्यास में कहीं बतौर संदर्भ भारत-पाक विभाजन के दर्द से उपजी सोच की वजह से हिन्दू-मुस्लिम के बीच की संकीर्णता उभर कर मुखर होती दिखाई देती है। तो कहीं नफ़रत भूल आगे बढ़ने की बात सकारात्मक ढंग से होती दिखाई देती है। कहीं कोई  भारत-पाक़ विभाजन के 70 वर्षों बाद भी उस वक्त के भयावह मंज़र को गले लगाए बैठा नज़र आता है। तो कहीं कोई खुद ही अपनी बेटी को इस वजह से कुँए में धकेलता दिखाई देता है कि अगर उसने ऐसा नहीं किया तो उसकी मासूम बेटी दंगाइयों की भेंट चढ़ अपनी जान और आबरू दोनों ही खो बैठेगी। इसी उपन्यास में कहीं घर के दामाद के मुस्लिम होने की वजह से पूरा हिन्दू परिवार दंगाइयों के कहर से बचता दिखाई देता है कि इस घर के सभी सदस्य मुसलमान हैं।

इसी उपन्यास में कहीं सुरक्षा के मद्देनज़र तो कहीं फैशन..दिखावे या स्टेटस सिंबल के तौर पर दिन-रात पनपते गन कल्चर की बात होती दिखाई देती है। तो कहीं अपने वैलेट में हमेशा कुछ न कुछ डॉलर ले कर चलने की सलाह महज़ इस वजह से दी जाती दिखाई देती है कि किसी उठाइगीरे या लुटेरे से मुठभेड़ के दौरान नकद रकम मिलने की वजह से आप कम से कम जान से मारे नहीं जाएँगे। 

इसी उपन्यास में कहीं कोई असाध्य कैंसर से पीड़ित अपनी बेटी को असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाने के नाम पर एक-एक कर के बंदूकों का अंबार खरीदता नज़र आता है। तो कहीं व्यस्क होने के मतलब को अपने निर्णय स्वयं लेने के अधिकार और सही-ग़लत के लिए खुद ज़िम्मेदार होने की बात से परिभाषित किया जाता दिखाई देता है। कहीं हाई स्कूल प्राॉम की पार्टी के लिए बेटी की ख़ुशी और उल्लास को देख कर उसकी माँ भी मन ही मन उत्साहित नज़र आती है कि उसके अपने समय में इस सब की छूट नहीं थी। बेहद ज़रूरी मुद्दे को उठाते इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास में  कहीं भारत-पाकिस्तान के लोगों के एक जैसे खान-पान, बोली, रहन-सहन और परिधानों की बात कर इस बात पर प्रश्न मंडराता दिखाई देता है कि जब सब कुछ हम में एक जैसा है, तो फ़िर ये दुश्मनी..ये नफरत क्यों? 
 
इसी उपन्यास में कहीं पुलिस कर्मियों द्वारा सरेआम किसी अश्वेत के साथ मानवाधिकारों के हनन का स्पष्ट मामला उजागर होता दिखाई देता है। तो कहीं कोई अज्ञात बंदूकधारी आवेश में आ किसी स्कूल में इस तरह अंधाधुंध गोलियाँ बरसाता दिखाई देता है कि उसकी चपेट में आ कई मासूम बच्चे मारे जाते हैं। इसी उपन्यास में कहीं कोई पत्नी अपने घर में पति के द्वारा  हथियार रखने से आहत दिखाई देती है। 

 तो कहीं यह उपन्यास इस बात की तस्दीक करता दिखाई देता है कि दुख  ना धर्म, ना जाति, ना देश और ना ही त्वचा के रंग के हिसाब से किसी के साथ कोई भेदभाव करता दिखाई देता है। 
 
इसी उपन्यास में कहीं किसी दफ़्तर में मोटी रकम ले नौकरी छोड़ने की गरिमामयी बर्खास्तगी को बाय आउट का नाम दिया जाता दिखाई देता है। तो कहीं नयी जानकारी के रूप में पता चलता है कि अमेरिका में हथियार खरीदने की अपेक्षा कोई कुत्ता गोद लेना ज़्यादा मुश्किल काम है।

कहीं कोई स्कूल तो कहीं कोई शॉपिंग मॉल या कैसीनो अंधाधुंध गोलाबारी का शिकार होते कभी ब्राज़ील से अमेरिका में अवैध तरीके से घुस आए लोग दिखाई देते हैं तो कभी उनके अपने ही लोग इस सब से हताहत होते नज़र आते हैं। तो कहीं दिन-रात परिपक्व होती इस गन कल्चर के खिलाफ़ व्यथित हो महिलाएँ स्वयं ही  एकजुट हो इस मुहिम को आगे बढ़ाती नज़र आती हैं कि घर में हथियार होने से सबसे ज़्यादा वे सब ही घरेलू हिंसा का शिकार होती हैं। इसी उपन्यास में कहीं जगह-जगह होती इस गोलाबारी से आहट के बीच एक बेटी व्यथित हो अपने माता-पिता को अपनी वसीयत के रूप में एक पत्र लिखती दिखाई देती है कि वह उन दोनों से कितना प्यार करती है। 

इसी किताब में कहीं स्कूल-कॉलेज..सिटी एवं स्टेट काउन्सिल से ले कर सत्ता तक के गलियारों में महिलाओं का वर्चस्व बढ़ता दिखाई देता है।

कहीं कोई पुलिस वाला स्वयं ही पुलिस स्टेशन में हथियार सौंपने आए जय को अवैध तरीके से हथियार बेचने के लिए उकसाता दिखाई देता है। तो कहीं दुनिया की मात्र 4 प्रतिशत अमेरीकी आबादी के पास दुनिया के 42 प्रतिशत हथियार होने का आंकड़ा दिया जाता दिखाई देता है।

धाराप्रवाह शैली में लिखे गए इस उपन्यास में कुछ एक जगहों पर मुझे प्रूफ़रीडिंग की कमियाँ दिखाई दीं। इसके अतिरिक्त उपन्यास की कहानी के हिसाब से जय विदेश में अपनी पत्नी के साथ रह कर वहाँ के टेलिविज़न चैनल के लिए काम कर रहा है। किसी भी ख़बर के नियत समय पर होने वाले टेलीकॉस्ट को ले कर शुरू हुई गहमागहमी और आपाधापी का दर्शाता दृश्य पेज नंबर 12 के दूसरे पैराग्राफ़ में आता है। इस पैराग्राफ़ की अंतिम पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..

'यही है दूरदर्शन की दुनिया'

आम धारणा एवं मान्यता के अनुसार भारत के सरकारी टीवी चैनल का नाम 'दूरदर्शन' है जबकि जय तो विदेश में रह कर वहाँ के किसी टीवी चैनल के लिए काम कर रहा है। ऐसे में यहाँ 'दूरदर्शन' का नाम लिया जाना सही नहीं है। 

बढ़िया क्वालिटी में छपे इस दमदार उपन्यास के 152 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है भावना प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 195/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट की दृष्टि से जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

बेहटा कलां - इंदु सिंह

आज़ादी बाद के इन 76 सालों में तमाम तरह की उन्नति करने के बाद आज हम बेशक अपने सतत प्रयासों से चाँद की सतह को छू पाने तक के मुकाम पर पहुँच गए हैं मगर बुनियादी तौर पर हम आज भी वही पुराने दकियानूसी विचारों वाले पिछड़े के पिछड़े ही हैं। आज भी हमारे देश के गाँवों और अपवाद स्वरूप कुछ एक शहरों में लड़कों के मुकाबले लड़कियों के साथ जो भेदभाव बरसों पहले से होता आया है, कमोबेश वही सब अब भी किसी न किसी रूप में जारी है। 

इस तरह के भेदभाव के पीछे एक तरफ़ घरों में पितात्मक सत्ता का प्रभाव नज़र आता है तो दूसरी तरफ़ स्त्री से स्त्री की ईर्ष्या ही मुखरित हो स्पष्ट झलकती दिखाई  देती है। दोस्तों..आज महिलाओं से होते आए भेदभाव की बात इसलिए कि आज मैं इसी मुद्दे पर लिखे गए एक ऐसे उपन्यास की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'बेहटा कलां' के नाम से लिखा है इंदु सिंह। 

इस उपन्यास के मूल में एक तरफ़ कहानी है पढ़ने-लिखने में रुचि रखने वाली उस अन्नु की जो पढ़-लिख कर डॉक्टर बनना चाहती थी मगर उसकी माँ ने अपनी ज़िद के चलते, अन्नु की और उसके पिता की इच्छा को दरकिनार कर मात्र 14 वर्ष की उम्र में ही उसका ऐसी जगह ब्याह कर दिया जहाँ तमाम तरह की बंदिशों और दबावों को झेलते हुए दिन-रात घर के कामों में खट कर उसने अपना जीवन इस हद तक होम कर दिया कि अंततः वह अपना मानसिक संतुलन भी खो बैठी।  

इसी उपन्यास में कहीं कोई माँ बड़े चाव से अपनी बेटी के सुखी भावी जीवन के मद्देनज़र उसे दहेज में वे सब चीज़ें देना चाहती है जिनसे कि उसे नए परिवार में जाने पर कोई दिक्कत या परेशानी ना हो। तो कहीं वह अपनी बेटी को ससुराल में हर दुःख.. हर कष्ट सह कर भी मायके का नाम खराब न करने की सलाह देती नज़र आती है। जिसकी वजह से अन्नु बिना किसी विरोध के ससुराल में धीमे बोलने, हर समय घूँघट में रहने और रेडियो ना सुनने तक के निर्देशों का पालन करती दिखाई देती है। इसी उपन्यास में कहीं घर की स्त्रियों के ज़ोर से हँसने पर रोक लगी होने की बात होती दिखाई देती है। 

इसी उपन्यास में कहीं दस-दस कमरों के घर में आराम से रहने वाली अन्नू अपनी माँ की ज़िद के चलते जल्दी विवाह करने के बाद महज़ एक कोठरी जितने बड़े कमरे में रहने के साथ-साथ दिशा मैदान के लिए भी लौटा ले बाहर खेतों में जाने को मजबूर कर दी जाती है। जहाँ मात्र इस वजह से उसे सुबह शौच जाने से जबरन रोका जाता दिखाई देता है कि वह सो कर देर से उठी है। तो कहीं उसे सुबह का बचा खाना रात को महज इस वजह से खाने के मजबूर किया जाता दिखाई देता है कि आज उसने दाल ज़्यादा बना दी थी। 

इसी उपन्यास में कहीं अन्नू को दहेज में उसके लिए मिली साड़ियों, कपड़ों, चप्पलों इत्यादि पर बड़ी ननद अपना हक़ जमाए दिखती है तो कहीं उसके दहेज के सामान को छोटी ननद अपने ब्याह में पूरी शानोशौकत और ठसक के साथ ले जाती नज़र आती है। कहीं महीनों से घर में टिकी ननद अपनी भाभी को महज इस वजह से प्रताड़ित करती नज़र आती है कि उसे, उसकी ससुराल में उसकी ननद द्वारा तंग किया जाता रहा है। तो कहीं अन्नु को उसके मायके लिवाने के लिए आए उसके भाई या पिता को वही ननद यह कह कर इनकार कर देती है कि हमारे यहाँ बहुएँ बार-बार मायके नहीं जाती है।  

कहीं सही पढ़ाई के अभाव में गाँवों के बच्चे पान, बीड़ी और गुटखे इत्यादि की शरण में जाते दिखाई देता है तो कहीं किसी को अपने जीवन में पढ़ने के अनुकूल मौके ना पा कर मलाल होता दिखाई देता है। कहीं कानपुर में फैले चमड़ा उद्योग की वजह से वहाँ फैले प्रदूषण और गन्दगी की बात की जाती दिखाई देती है। तो कहीं लखनऊ की साफ़ सफ़ाई और तहज़ीब की बात की जाती दिखाई देती है।कहीं हड़ताल के बाद महीनों तक तनख्वाह रुकने की परेशानी झेलता परिवार घर के राशन तक को तरसता दिखाई देता है। 

कहीं अन्नू की कर्मठता और कर्तव्यपरायणता देख घर की देवरानी भी आलसी हो अपने सारे काम अन्नु को सौंप निठल्ली बैठी दिखाई देती है। 
इसी उपन्यास में कहीं कोई सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त पिता जानबूझ कर घर के  खर्चों के प्रति शुरू से अनभिज्ञ होने का दिखावा करता प्रतीत होता नज़र आता है। कहीं गाँव की नाउन सास और बहुओं में अँग्रेज़ों की तर्ज़ पर फूट डाल शासन करने यानी कि फ़ायदा उठाने के मंसूबे बाँध, दोनों हाथों से लड्डू बटोरती दिखाई देती है। 

इसी उपन्यास में कहीं पुराने तौर-तरीकों के रूप में अरहर की दाल को कल्हारने जैसी बात होती दिखाई देती है तो कहीं पुरानी हो चुकी परंपराओं के बेटियों द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होने की बात होती नज़र आती है। 

इस उपन्यास में क्षेत्रीय भाषा अथवा हिंदी के अपभ्रंश शब्द भी काफ़ी जगहों पर पढ़ने को मिले। पृष्ठ के अंत में उनके हिंदी अर्थ भी साथ में दिए जाते तो बेहतर होता। साथ ही पूरे उपन्यास में संवादों के इनवर्टेड कॉमा में ना होने की वजह से भी कई जगहों पर कंफ्यूज़न क्रिएट होता दिखा कि संवाद कौन बोल रहा है। कुछ एक जगहों पर थोड़ी-बहुत वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त प्रूफरीडिंग की भी कुछ कमियाँ दिखाई दीं। 

■ आमतौर पर किसी भी कहानी को लिखते वक्त कहानी का हल्का सा प्लॉट ज़ेहन में होता है जो कहानी में भावों का प्रवाह बढ़ने के साथ-साथ डवैलप या परिपक्व होता जाता है। ऐसे में कई शब्दों , वाक्यों या दृश्यों को पीछे जा कर जोड़ना, घटाना, बदलना अथवा पूर्णरूप से हटाना पड़ता है। इस उपन्यास में इस चीज़ की हल्की से कमी दिखाई दी ।  

उपन्यास में कुछ एक जगहों पर पुरानी बातों का इस तरह जिक्र होता नजर आया मानों वह चीज़ या बात पहले से ही होती आ रही है जैसे कि पेज नम्बर 95 मैं लिखा दिखाई दिया कि..

'राघव भी बचपन से ही कैलाश की तरह गंभीर व्यक्तित्व का स्वामी था। राघव को अच्छी नौकरी मिल जाए इसके लिए अन्नु सालों से बृहस्पतिवार का व्रत रखती आ रही थी' 

इसी तरह पेज नंबर 128 के अंतिम पैराग्राफ में लिखा दिखाई दिया कि..

'कैलाश खुद खेलकूद में बहुत अच्छे थे क्रिकेट और बैडमिंटन उनके प्रिय खेल थे। बैडमिंटन में तो पूरे जिले में कैलाश को कोई नहीं हरा सकता था। अनेक प्रतियोगिताओं में कैलाश ने भाग लिया था और हमेशा जीत उन्हीं की होती थी जबकि इन बातों का इससे पहले कहीं जिक्र होता नहीं दिखाई दिया। अगर इस तरह की कमियों से बचा जाए तो बेहतर है। 

साथ ही घर-जायदाद के बंटवारे की बात को शुरू कर अधूरा छोड़ दिया गया। 

■ पेज नम्बर 120 में राघव की बेटी यानी कि अन्नू की पोती अपनी दादी को रोबोट से संबंधित के कहानी सुना उसका अर्थ पूछती है। बच्ची की कम उम्र और समझ के हिसाब से  कहानी की भाषा मुझे कुछ ज़्यादा ही परिपक्व लगी। स्कूल की किताब के हिसाब से कहानी की भाषा सरल होती तो ज़्यादा बेहतर होता।


 ■ तथ्यात्मक ग़लती के रूप में पेज नम्बर 67 में लिखा दिखाई दिया कि..

'अन्नु की सास को हमेशा ही साँस लेने में दिक़्क़त रहती थी ख़ास कर तब जब मौसम बदल रहा हो तो उनकी तकलीफ़ बहुत बढ़ जाती थी। शहर में डॉक्टर से जाँच करवायी गयी तो पता चला कि उन्हें दमे की बीमारी थी। डॉक्टर ने उन्हें धूल और धुएँ से बचने के लिए कहा था साथ ही कुछ इनहेलर भी दिए थे कि यदि कभी अचानक ज़्यादा साँस उखड़े तो इससे आराम आ जाएगा। गाँव में तो धूल और धुएँ से बचना संभव ही नहीं है जिस कारण वह गाँव नहीं आ पा रही थी।'

आम डॉक्टरी मान्यता के अनुसार शहरों में गाँवों के अपेक्षाकृत प्रदूषण ज़्यादा होता है। इसलिए दमे इत्यादि के मरीजों को शहरों के बजाय गाँवों में जा कर रहने की सलाह दी जाती है लेकिन इस उपन्यास में इससे ठीक उलट बताया जा रहा है कि..'गाँव में तो धूल और धुएँ से बचना संभव नहीं था' जो कि सही नहीं है। 

अंत में चलते-चलते एक महत्त्वपूर्ण बात कि किसी भी कहानी, उपन्यास या किताब में रुचि जगाने के लिए उसके शीर्षक का प्रभावी..तर्कसंगत एवं दमदार होना बेहद ज़रूरी होता है। कहानी के किसी महत्त्वपूर्ण हिस्से..सारांश या मूड को आधार बना कर ही अमूमन किसी कहानी, उपन्यास या किताब का शीर्षक तय किया जाता है। इस कसौटी पर अगर कस कर देखें तो इस उपन्यास का शीर्षक 'बेहटा कलां' मुझे प्रभावी तो लगा मगर तर्क संगत नहीं क्योंकि उपन्यास की मुख्य किरदार, अन्नु बेशक 'बेहटा कलां' में पैदा हुई मगर पूरे उपन्यास की कहानी नज़दीकी गाँव 'पनई खुर्द' के इर्दगिर्द ही घूमती है जहाँ वह मात्र 14 वर्ष की उम्र में ही ब्याह कर चली गयी थी और जीवनपर्यंत वहीं रही। 

बेहद ज़रूरी मुद्दे को उठाते इस बढ़िया क्वालिटी में छपे प्रभावी उपन्यास के 136 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है इंडिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड ने और इसका मूल्य रखा गया है 250/- रुपए जो कि मुझे ज़्यादा लगा। आम हिंदी पाठक तक इस ज़रूरी उपन्यास की पहुँच एवं पकड़ बनाने के लिए ज़रूरी है कि इसके दाम आम आदमी की जेब के अनुसार रखे जाएँ। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। 

स्तुति - सौरभ कुदेशिया

ईसा पूर्व हज़ारों साल पहले कौरवों और पांडवों के मध्य हुए संघर्ष को आधार बना कर ऋषि वेद व्यास द्वारा उच्चारित एवं गणेश द्वारा लिखी गयी महाभारत अब भी हमें रोमांचित करती है। इस महागाथा में कृष्ण का चरित्र अपनी तमाम कूटनीतियों और छल-कपट के साथ अपने विराट स्वरूप में हमारे समक्ष आता है। तमाम उलट फेरों और रहस्यमयी साजिशों एवं चरित्रों से सुसज्जित इस कहानी के मोहपाश से नए पुराने रचनाकार भी बच नहीं पाए हैं। परिणामतः इस महान ग्रंथ की मूल कहानी पर आधारित कभी कोई फ़िल्म..नाटक..कहानी या उपन्यास समय समय पर हमारे सामने अपने वजूद में आता रहा है।

इसी रोमांचक कहानी के कुछ लुप्तप्राय तथ्यों को ले कर सौरभ कुदेशिया हमारे समक्ष अपना पाँच खंडों वाला थ्रिलर उपन्यास ले कर आए हैं। इस वृहद उपन्यास के प्रथम खंड 'आह्वान' की कहानी में एक रोड एक्सीडेंट में मारे गए व्यक्ति के लॉकर में रखी गयी उसकी वसीयत में एक अजीबोगरीब चित्र के अलावा और कुछ नहीं मिलता है। गूढ़ पहेली की तरह लिखी गयी वसीयत की गुत्थी सुलझाने की कोशिशों के तहत की जा रही तहकीकात के दौरान गुप्त संकेतों और अजीबोगरीब लाशों के मिलने से सिंपल मर्डर मिस्ट्री जैसी नज़र आने वाली यह कहानी हर बढ़ते पेज के साथ सुलझने के बजाय मकड़जाल की भांति तब और अधिक उलझती जाती है जब एक एक कर के और भी कई हत्याएँ तथा अनहोनी घटनाएँ सर उठा..सामने आने लगती हैं।

नए और पुराने के फ्यूज़न से रची इस हॉलीवुडीय स्टाइल की कहानी में एक तरफ़ महाभारत और गीता के गूढ़ रहस्य हैं तो दूसरी तरफ़ उन्हीं गूढ़ रहस्यों से परत दर परत निकलते गुप्त संकेतों को समझने..उन्हें डिकोड करने को दिमागी कसरत एवं कवायद करते कुछ लोग। 

दोस्तों..अब बात कल्पना और मिथक के समावेश से लिखे गए इस वृहद उपन्यास के अगले यानी कि दूसरे खंड 'स्तुति' की। अनेक दबे या छिपे रह गए रहस्यों की परतें उधेड़ते इस उपन्यास में महाभारत युद्ध से पहले की परिस्थितियों को आधार बना कर कल्पना एवं तथ्यों के मिले जुले स्वरूप से एक ऐसी दिलचस्प कहानी को गढ़ा गया है जिसमें कृष्ण की सामान्य सी दिखने वाली चाल..हरकत या हल्की सी जुम्बिश के पीछे भी कोई न कोई गहरी सोच या ठोस योजना मूर्त रूप लेती दिखाई देती है। 

इस दिलचस्प उपन्यास में एक तरफ़ कहानी है उस वीर बाल शोण की जिसने आर्य होते हुए भी विसर्पियों के दुःख.. उनकी वेदना को अपना समझ उसका निराकरण करने का अपनी तरफ़ से भरसक प्रयास किया। विसर्पी वो, जो नागों और मनुष्यों के संगम से उत्पन्न हुए और अपने मूल ठिकाने खाण्डव वन के उजड़ने के बाद से नागों की शरणस्थली में मात्र इस वजह से उनके दास बने बैठे थे कि आर्य उन्हें अपना नहीं मान दुत्कार रहे थे और नागों ने अपने लोभ की वजह से उनका दोहन करने को उन्हें जैसे-तैसे स्वीकार कर लिया था। 

दूसरी तरफ़ इस उपन्यास में कहानी है उस युवा शोण की जिसे नागलोक के निकटवर्ती राज्यों, चिरपुंज और अनंतपुर को आपसी दुश्मनी भूल कौरवों के पांडवों से होने वाले संभावित युद्ध में पांडव पक्ष का समर्थन देने के लिए मनाने के लिए कृष्ण ने अपने संदेश के साथ भेजा है। एक सीधे से दिख रहे पंथ के पीछे कृष्ण की मंशा अनेक काज निबटाने की है जिसमें नागवंश के नाश के साथ- साथ विसर्पियों की नागवंश से मुक्ति भी है। 

इस उपन्यास में एक तरफ़ कहानी है विसर्पियों के नागों के प्रति तमाम समर्पण..प्रतिबद्धता एवं एकनिष्ठा की तो वहीं दूसरी तरफ़ इस उपन्यास में बात है उनके प्रति नागों की बर्बरता एवं क्रूरता से भरे पैशाचिक अत्याचार की। इसी उपन्यास में कहीं कृष्ण की हर क्रिया-प्रक्रिया और मंशा के पीछे ढकी-छिपी गहरी कूटनीतिक सोच दिखाई देती है जो समय आने पर पांडवों और स्वयं कृष्ण के पक्ष में अपने पूरे वजूद के साथ उजागर होती नज़र आती है। 

इस बात के लिए लेखक की तारीफ़ करनी होगी कि कल्पना, गहन अध्ययन एवं गहरे शोध के बाद लिखे गए इस कदम-कदम पर चौंकाने वाले बेहद रोमांचक उपन्यास में लेखक ने अपने हुनर से रहस्य, गुप्तचरी और युद्ध कौशल का ऐसा बेहतरीन समां बाँधा है कि पाठक कहानी के साथ उसकी रौ में अंत तक बहता चला जाता है। दिलचस्प अंदाज़ में लिखे गए इस उपन्यास में लेखक ने अपनी बात को तथ्यात्मक रूप से सही एवं प्रमाणित साबित करने के लिए जगह-जगह पर विभिन्न ग्रंथों के दर्ज श्लोकों का उनकी पृष्ठ संख्या के साथ उदाहरण दिया है। 

इसी तरह की शैली और विषय को ले कर अँग्रेज़ी में लिखे गए एक प्रसिद्ध उपन्यास के हिंदी अनुवाद की लचर भाषा की बनिस्बत इस उपन्यास की भाषा समय, काल एवं वातावरण के हिसाब से एकदम सही समय लगी। साथ ही उपन्यास में एक दो जगहों पर 'गपक लिया' जैसे शब्दों का प्रयोग 'निगलने' के लिए किया गया जो कि थोड़ा अजीब लगा।

उम्मीद की जानी चाहिए कि इस वृहद उपन्यास श्रृंखला पर जल्द की कोई बड़े बजट की हॉलीवुड या राजामौली टाइप की फ़िल्म या वेब सीरीज़ देखने को मिलेगी। 

प्रूफरीडिंग की कमी के तौर पर पेज नंबर 35 के अंतिम पैराग्राफ़ में लिखा दिखाई दिया कि..

'मर्मर ध्वनियां असहमति और असहमति विवाद में बदलने लगीं'

इस वाक्य में मेरे ख्याल से 'असहमति और असहमति विवाद में बदलने लगीं'की जगह 'सहमति और असहमति के विवाद में बलने लगीं' आना चाहिए। 

रोमांचक सफ़र पर ले जाते इस दिलचस्प उपन्यास के 455 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है हिन्द युग्म ने और इसका मूल्य रखा गया 250/- जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। 

धनिका - मधु चतुर्वेदी

आज भी हमारे समाज में आम मान्यता के तहत लड़कियों की बनिस्बत लड़कों को इसलिए तरजीह दी जाती है कि लड़कियों ने तो मोटा दहेज ले शादी के बाद दूसरे घर चले जाना है जबकि लड़कों ने परिवार के साथ आर्थिक एवं सामाजिक स्तर पर साथ खड़े रह उनकी वंशबेल को और अधिक विस्तृत एवं व्यापक कर आगे बढ़ाना है। लड़की की शादी में मोटा दहेज देने जैसी कुप्रथा से तंग आ कर बहुत से परिवारों में लड़की के जन्मते ही या फिर उसके भ्रूण रूप में ही उसे खत्म कर देने का चलन चल निकला।

दोस्तों..आज इस सामाजिक मुद्दे से जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं इसी विषय से जुड़े एक ऐसे उपन्यास की यहाँ बात करने जा रहा हूँ जिसे 'धनिका' के नाम से लिखा है मधु चतुर्वेदी ने। 

इस उपन्यास के मूल में एक तरफ़ कहानी है एक ऐसी माँ की जिसे अपनी पूरी ज़िन्दगी इस बात का मलाल रहा कि उसका पूरा जीवन बच्चे पैदा करने और उनके लालन-पोषण में ही गुज़र गया। दूसरी तरफ इस उपन्यास में कहानी है घर के कामकाज में निपुण उस धनिका की जो अपने तमाम गुणों के बावजूद महज़ इस वजह से अपनी दादी की तारीफ़ को तरसती रही कि उसकी माँ ने बेटियाँ क्यों जनी हैं।  

मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि की इर्दगिर्द बने गए इस उपन्यास में कहीं कोई अपनी पत्नी के जीवित होने के बावजूद उसी घर में उसी की छोटी बहन को उसकी सौतन के रूप में ब्याह के ले आता है कि बड़ी बहन बच्चे पैदा करने में सक्षम नहीं। तो कहीं कोई नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय जीव वाजिब दामों पर मौसमी फल व सब्ज़ियाँ पा कर अथवा किसी सरकारी काम के बिना रिश्वत दिए ही पूरे हो जाने पर या बॉस के मुँह से तारीफ़ के दो बोल सुन लेने पर ही परम संतोष अनुभव करता दिखाई देता है। 

 इसी उपन्यास में कहीं कोई अपनी सास से इस वजह से नफ़रत करती दिखाई देती है कि उसने कोई बेटी नहीं बल्कि सब बेटे ही जने हैं। इसी उपन्यास में कहीं कोई किसी की बेवफ़ाई से आहत हो कर भी हर समय उसकी वापसी की बाट जोहता दिखाई देता है। 

इसी उपन्यास में कहीं चार-चार बेटियों का ग़रीब पिता अपनी बेटियों के ब्याह के लिए होने वाले समधियों के आगे गिड़गिड़ाता..चिरौरी करता नज़र आता है। तो कहीं कोई दहेज लोलुप पिता अपने पढ़े-लिखे इंजीनियर बेटे को ऊँचे दामों में बेचने का प्रयास करता दिखाई देता है। इस उपन्यास में कहीं कॉलेज लाइफ को ले कर कोई लड़की रोमानी ख्वाबों में इस हद तक डूबी दिखाई देती है कि असलियत से रु-ब-रु ही नहीं होना चाहती। तो कहीं बेटियों की शिक्षा एवं स्वायत्ता की बात होती दिखाई देती है कि उनके लिए शिक्षित हो कर आत्मनिर्भर बनना कितना जरूरी है। 

इसी किताब में कहीं शादी-ब्याह की तैयारियों और रीति-रिवाज़ों के बारीक चित्रण से पाठक दो चार होता नज़र आता है तो कहीं शादी में बारातियों और घरातियों के खाने में फ़र्क होता दिखाई देता है।

 इसी उपन्यास में कहीं बारात के खाने में बफ़े की आइटम्स में मौजूद पनीर और आइसक्रीम को ज़्यादा से ज़्यादा हड़पने का दृश्य व्यंग्यात्मक हो मज़ेदार बनता नज़र आता है। तो कहीं शादी के दौरान होने वाली अफरातफरी का सजीव चित्रण पढ़ने को मिलता है। कहीं बचपन में देखे गए मेलों का सजीव वर्णन पढ़ने को मिलता है। तो कहीं होली की रंग-गुलाल भरी मस्ती और धमाचौकड़ी में बचपन पुनः मूर्त रूप लेता दिखाई देता है। 

धाराप्रवाह शैली में लिखे गए इस दमदार उपन्यास में एक प्रेमपत्र की भाषा को चमत्कृत बनाने के चक्कर में भाषा का प्रवाह मुझे टूटता हुआ प्रतीत हुआ। साथ ही कॉलेज की पिकनिक के एक दृश्य में ठठा कर हँसने का मौका मिला। कुछ एक जगहों पर प्रूफरीडिंग की कमियों के दिखाई देने के अतिरिक्त तथ्यात्मक ग़लती के रूप में इस उपन्यास में पेज नंबर 88 की अंतिम पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..

'बाबा को लिफ़ाफ़े में रसीदी टिकट चिपकाता देख श्रद्धा भगवान से मनाती है कि कहीं भी शादी तय हो जाए।'

यहाँ ग़ौर करने वाली बात यह है कि रसीदी टिकट का इस्तेमाल विशेष तौर से लेनदेन के लिए किया जाता है। ये एक प्रकार से शासन को भुगतान किया जाने वाला टैक्स (राजस्व) है जबकि साधारण डाक को भेजने के लिए डाक टिकट का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..

'बाबा को लिफ़ाफ़े में डाक टिकट चिपकाता देख श्रद्धा भगवान से मनाती है कि कहीं भी शादी तय हो जाए।'

संग्रहणीय क्वालिटी के 159 पृष्ठीय इस दमदार उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है हिन्दयुग्म प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट की दृष्टि से बिल्कुल जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत बहुत शुभकामनाएं।

चौसर - जितेन्द्र नाथ


थ्रिलर उपन्यासों का मैं शुरू से ही दीवाना रहा हूँ। बचपन में वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यासों से इस क़दर दीवाना बनाया की उनका लिखा 250-300 पेज तक का उपन्यास एक या दो सिटिंग में ही पूरा पढ़ कर फ़िर अगले उपन्यास की खोज में लग जाया करता था। इसके बाद हिंदी से नाता इस कदर टूटा कि अगले 25-26 साल तक कुछ भी नहीं पढ़ पाया। 2015-16 या इससे कुछ पहले न्यूज़ हंट एप के ज़रिए उपन्यास का डिजिटल वर्ज़न ख़रीद कर फ़िर से वेदप्रकाश शर्मा जी का लिखा पढ़ने को मिला। उसके बाद थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के लेखन ने ऐसा दीवाना बनाया कि 2020 के बाद से मैं उनके लगभग 100 उपन्यास पढ़ चुका हूँ। इस बीच कुछ नए लेखकों के थ्रिलर उपन्यास भी पढ़ने को मिले। आज उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मैं एक ऐसे तेज़ रफ़्तार थ्रिलर उपन्यास 'चौसर' का यहाँ जिक्र करने जा रहा हूँ जिसे अपनी प्रभावी कलाम से लिखा है जितेन्द्र नाथ ने। 

इस उपन्यास के मूल में कहानी है कॉन्फ्रेंस पर मुंबई आए हुए विस्टा टेक्नोलॉजी के पंद्रह एम्प्लॉईज़ के अपने होटल में वापिस ना पहुँच एक साथ ग़ायब हो जाने की। जिसकी वजह से मुम्बई पुलिस से ले कर दिल्ली तक के राजनैतिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है। अहम बात यह कि उन पंद्रह इम्प्लाईज़ में से एक उत्तर प्रदेश के उस बाहुबली नेता का बेटा है जिसकी पार्टी के समर्थन पर केंद्र और राज्य की सरकार टिकी हुई है। इंटेलिजेंस और पुलिस की विफलता के बाद बेटे की सुरक्षित वापसी को ले कर चल रही तनातनी उस वक्त अपने चरम पर पहुँचने लगती है जब इसकी वजह से सरकार के अस्तित्व पर ख़तरा मंडराने लगता है। 

इसी उपन्यास में कहीं किसी बड़े राजनीतिज्ञ के बेटे के अपहरण की वजह से राजनीतिक गलियारों में चल रही सुगबुगाहट बड़ी हलचल में तब्दील होती नज़र आती है। तो कहीं अपहर्ताओं को पकड़ने में हो रही देरी की वजह से सरकार चौतरफ़ा घिरती नज़र आती है कि उसके वजूद पर ही संकट मंडराता मंडराने लगता है। इसी किताब में कहीं कोई संकटमोचक बन कर सरकार बचाने की कवायद करता नज़र आता है तो कहीं कोई तख्तापलट के ज़रिए सत्ता पर काबिज होने के मंसूबे बनाता दिखाई देता है।

इसी उपन्यास में कहीं देश के जांबाज़ सिपाही अपनी जान को जोख़िम में डाल देश के दुश्मनों का ख़ात्मा करते नज़र आते हैं तो कहीं कोई टीवी चैनल अपनी टी आर पी के चक्कर में पूरे मामले की बखिया उधेड़ता नज़र आता है। कहीं अपहरण का शक लोकल माफ़िया और अंडरवर्ल्ड से होता हुआ आतंकवादियों के ज़रिए पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी आई.एस.आई की तरफ़ स्थान्तरित होता दिखाई देता है। तो कहीं किसी बड़ी कंपनी को हड़पने की साजिशों के तहत किसी की शह पर कंपनी के शेयरों को गिराने के लिए मंदड़ियों हावी होते दिखाई देते हैं। राजनीति उतार चढ़ाव से भरपूर एक ऐसी घुमावदार कहानी जो अपनी तेज़ रफ़्तार और पठनीयता भरी रोचकता के चलते पाठकों को कहीं सोचने समझने का मौका नहीं देती। 

कुछ एक जगहों पर प्रूफरीडिंग की कमियों के अतिरिक्त इस उपन्यास के शुरू और अंत के पृष्ठ मुझे बाइंडिंग से उखड़े हुए दिखाई दिए। इस ओर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। 

पेज नंबर 103 में लिखा दिखाई दिया कि..

'स्वर्ण भास्कर के प्रोग्राम में नीलेश के साथ एक दर्जन से ज़्यादा कर्मचारियों के अगवा होने के साथ डेढ़ हज़ार करोड़ की फ़िरौती की बात को भी बहुत तूल दिया गया था'

जबकि इससे पहले पेज नंबर 52, 68 और 90 पर इस रक़म को एक हज़ार करोड़ बताया गया है यानी कि फ़िरौती की रक़म में सीधे-सीधे 500 करोड़ का फ़र्क आ गया है। इसी बाद इसी बात को ले कर फ़िर विरोधाभास दिखाई दिया कि पेज नंबर 116 में अपहर्ताओं का आदमी मुंबई पुलिस कमिश्नर से एक हज़ार करोड़ रुपयों की फ़िरौती माँगते हुए उन्हें एक ईमेल भेजी होने की बाबत बताता है लेकिन अगली पेज पर फिर जब उस रक़म का जिक्र ईमेल में आया तो उसे एक हज़ार करोड़ से बढ़ा कर फ़िर से एक हज़ार पाँच सौ करोड़ रुपए कर दिया गया। हालांकि इस पेज पर इस बाबत सफ़ाई भी दी गयी है कि अपहर्ताओं ने माँग की शर्तों में बदलाव कर दिया लेकिन इस तरह की बातों ने बतौर पाठक मुझे थोड़ा सा कन्फ्यूज़ किया। 

साथ ही इस तेज़ रफ़्तार रोचक उपन्यास में एक बात और ख़ली कि फ़िरौती की रक़म भारतीय रुपयों में क्यों माँगी जा रही है? पाकिस्तानियों के सीधे-सीधे तो वो काम नहीं आने वाले। बेहतर होता कि फ़िरौती की रक़म को भारतीय रुपयों के बजाय किसी अंतरराष्ट्रीय करैंसी मसलन अमेरिकन डॉलर या फ़िर यूरो में माँगा जाता । 

हालांकि 279 पृष्ठीय यह बेहद रोचक उपन्यास मुझे लेखक की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इसके पेपरबैक संस्करण को छापा है सूरज पॉकेट बुक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 225/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
 
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