पच्चीसवां प्रेम पत्र -आभा श्रीवास्तव
एक ज़माना था जब चिट्ठियों की आवाजाही या आदान प्रदान हरकारों या फ़िर कबूतरों के ज़रिए होता था। बदलते समय के साथ इनकी जगह डाकघरों ने डाकियों के ज़रिए ले ली। समय और आगे बढ़ा तो ईमेल और व्हाट्सएप जैसे दर्जनों साधनों के सुगमता से उपलब्ध हो जाने की वजह से ज़रूरत ना समझे जाने पर सड़कों के किनारे बने लाल रंग के तथाकथित लेटरबॉक्स यानी कि लाल डिब्बे भी सरकार द्वारा लोप कर दिए गए।
इन सब आड़े-तिरछे साधनों-संसाधनों के बीच गुटरगूं करते प्रेमी जोड़ों की रूमानियत भरी चिट्ठियों की बात तो होने से रह ही गई। जी हाँ... मैं बात कर रहा हूँ उन इत्र की भीनी-भीनी खुशबू में डूबी गिले-शिकवों और मनुहार-दुलार से भरी मीठी-मीठी चिट्ठियों की जिन्हें प्रेम पत्र या लव लैटर कहा जाता है।
दोस्तों...आज प्रेम में डूबे इन प्रेम पत्रों की बात इसलिए कि आज मैं जिस कहानी संग्रह की यहाँ बात करने जा रहा हूँ उसे 'पच्चीसवां प्रेम पत्र' के नाम से लिखा है प्रसिद्ध लेखिका आभा श्रीवास्तव ने।
इसी संकलन की एक कहानी में जहाँ एक तरफ़ बरसों बाद मिलीं तीन सहेलियाँ एक साथ घूमने निकलती हैं तो उनके साथ कुछ ऐसा घटता है जिससे पुराने रहस्य एक के बाद एक कर के खुलने लगते हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी में अपनी पत्नी को खो चुके नरेन की मुलाकात अपनी बच्ची की टीचर, अलका से होती है जो कभी स्वयं उसकी चाहत रह चुकी है और अब अपने माता-पिता के गुज़र जाने के बाद अकेले ही जीवन व्यतीत कर रही है।
इसी संकलन की एक अन्य कहानी में जहाँ अपनी बहन के देवर, विवेक द्वारा रिश्ते के लिए नकार दिए जाने के बरसों बाद तनुजा की मुलाक़ात एक बार फ़िर उस से होती है मगर तब तक..
तो वहीं एक अन्य कहानी में शादी के 6 महीनों बाद वंशिका के पति को दो दिनों के लिए शहर से बाहर जाना पड़ता है। तो ऐसे में वंशिका इन दो दिनों को अपनी मर्ज़ी से जीने का प्लान बना एक बुक कैफ़े में घूमने के लिए जाती है तो है मगर..
इसी संकलन की एक अन्य कहानी में मोहित ये सोच कर परेशान है कि उसकी लन्दन से आई प्रेमिका, सिल्विया को उसकी कट्टर हिन्दू माँ स्वीकार करेगी भी या नहीं। अब देखना ये है कि क्या मोहित अपनी माँ से इस बारे में बात कर भी पाता है या नहीं। एक अन्य कहानी में मधुर स्वर की स्वामिनी चैताली को उसके गहरे सांवले रंग और अनाकर्षक चेहरे मोहरे की वजह से उसका प्रेमी सुबोध उसे भोगने के बाद ठुकरा देता है।
एक अन्य कहानी में जहाँ एक तरफ़ अपने काले रंग की वजह से कई बार विवाह के लिए नकारी जा चुकी श्यामली की मुलाकात अपने से कम उम्र के रॉबिन से होती है जो विदेशी माँ और भारतीय पिता की संतान है। कुछ मुलाकातों के बाद रॉबिन, श्यामली के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखता है जिससे वह इनकार नहीं कर पाती मगर किसी को क्या पता था कि उसकी किस्मत में क्या लिखा है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी में घर वालों के विरोध के चलते कहानी की नायिका का विवाह उसके प्रेमी दिव्यांश के साथ नहीं बल्कि स्वप्निल के साथ कर, दिव्यांश के लिखे सभी प्रेम पत्रों को उसकी माँ द्वारा जला तो दिया जाता है मगर..
एक अन्य कहानी में कहानी की मुख्य किरदारा को अचानक बरसों बाद एक अनजान नम्बर से कॉल आता है तो उसकी उस 'कोयल दी' को ले कर यादें ताज़ा हो जाती हैं जिन्हें वह अपनी बहन और उसके प्रेमी, वासु को बड़ा भाई तो कहती थी मगर..
इसी संकलन की एक अन्य कहानी में जहाँ प्रेम विवाह के बावजूद भी जब उसके पति अनीश की ज़िन्दगी में सेजल आ जाती है तो टूट कर बिखर चुकी तारा अपनी सहेली कनिका की सलाह पर वह अपना शहर छोड़ देती है। नए शहर में उसकी मुलाक़ात इंडियन आर्मी में मेजर सुशांत से होती है कि तभी..
तो वहीं एक अन्य कहानी में पैंतीस वर्षों के सफ़ल वैवाहिक जीवन में बाद अब वैधव्य झेल रही कामाक्षी की बेटी मेनका, जिसका अपने पति से तलाक हो चुका है, अपनी माँ को बताती है कि वह उस तलाकशुदा राघव से विवाह करना चाहती है जिसका पहले भी दो बार विवाह हो चुका है और उसकी एक बेटी भी है। सहमत ना होने के बावजूद भी वह मेनका के साथ राघव से मिलने उसके घर जाती है। जहाँ उसकी मुलाक़ात..
इसी संकलन की एक अन्य कहानी में पढ़ाई और नौकरी के चक्कर में घर से अलग मुम्बई में सुदीप के साथ लिवइन में रहते हुए दिव्या को एक दिन उसकी बेवफाई का पता चलता है तो वो टूट जाती है। इस बीच बहन के देहांत के बाद विधुर हो चुके जीजा रितुकांत के साथ उसका ब्याह तय कर दिया जाता है मगर क्या इस विवाह से दिव्या के मन की इच्छाएँ या खुशियाँ पूरी हो पाएँगी?
इसी संकलन की एक अन्य कहानी में एक तरफ़ से खूबसूरत चेहरे और दूसरी तरफ़ से जले चेहरे वाली प्रसिद्ध लेखिका संध्या चौधरी की मुलाकात एक कार्यक्रम के दौरान अपनी एक प्रशंसिका ईवा से होती है जो वहाँ अपने पति दिवाकर के साथ आई हुई है। वहाँ संध्या उन्हें एक मनघड़ंत कहानी सुना कुटिल मुद्रा में उनसे विदा लेती है मगर तब तक..
एक अन्य कहानी में जहाँ इंडियन म्यूज़िक में मास्टर्स की डिग्री वाली साधारण चेहरे-मोहरे की जवा की शादी ऊँची डिग्री और बढ़िया नौकरी वाले श्यामल से हो तो जाती है मगर क्या वह कभी जवा की छोटी-छोटी इच्छाओं को समझ पाया? तो वहीं एक अन्य कहानी में कहानी का मुख्य किरदार नेहा को उस दीपिका के बारे में बताता है जिससे उसकी मुलाक़ात रेडियो स्टेशन पर रिकार्डिंग के दौरान हुई थी। लगातार तीन सालों तक कई मुलाक़ातों के बाद अचानक नेहा उससे मिलने बंद कर अपना मोबाइल भी स्विच ऑफ कर देती है। उसके बाद नौकरी इत्यादि के चक्कर में वह भी शहर छोड़ देता है। उसी का हालचाल पता करने के लिए वे दोनों वापिस उसके शहर जाते हैं मगर तब तक कहानी कुछ और ही रूप ले चुकी होती है।
एक अन्य कहानी में दिखावे से दूर रहने वाली 27 वर्षीय पार्वती के सीए की डिग्री हासिल करने के बाद उसकी माँ को बेटी की शादी की चिंता सताती है। जिसके बाद मेट्रीमोनियल साइट्स को खंगाला जाना शुरू होता है। वहीं पर पार्वती की मुलाक़ात रुद्र से होती है मगर वह चाहती है कि रुद्र उसे बिना मेकअप के जस का तस स्वीकार करे। तो वहीं एक अन्य कहानी में अपने घर से दूर महानगर में अकेले रह कर नौकरी कर रही मधुरा की मुलाक़ात उसी की बिल्डिंग के एक अन्य ऑफिस में नौकरी कर रहे शिव से उस वक्त होती है जब हल्की-हल्की बारिश हो रही होती है। शिव, मधुरा को भीगने से बचने के लिए अपना छाता ऑफर करता है। जिसके बाद चाय के दौरान दोनों में दोस्ती हो जाती है। फ़िर मिलने का वादा लॅ जब वह विदा लेकर बस में बैठती है तो उसके बैग में पड़े सूखे छाते को देख वह मुस्कुरा उठती है।
इसी संकलन की एक अन्य कहानी में नैनीताल में घूमते वक्त कहानी के मुख्य किरदार की मुलाक़ात टीवी चैनल में पत्रकार बन चुकी उस केतकी से होती है जिससे सगाई के बाद उसने प्रिया के चक्कर में रिश्ता तोड़ दिया। अब देखना ये है कि प्रिया से भी रिश्ता टूट जाने के बाद केतकी का उसके जीवन में आगमन क्या रंग लाता है। एक अन्य कहानी में फेशियल पक्षाघात की मार झेल रहे कहानी के मुख्य किरदार, जो कि अधेड़ उम्र का है, की ट्रेन के सफ़र के दौरान मुलाक़ात उस गौरी से होती है जिसके पिता के पैसे के बल पर वह मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था और उसने उसे भोगने के बाद उसके उसके साधारण रंग रूप की वजह से ठुकरा दिया था।
इस संकलन को पढ़ते वक्त मुझे इसमें कुछ तथ्यात्मक ग़लतियाँ भी दिखाई दीं। उदाहरण के तौर पर पेज नम्बर 92 में लिखा दिखाई दिया कि..
'लेकिन फ़िर मेघना की जोड़ी कैसे टूट गई? पता नहीं मेनका का दूसरा विवाह हो सकेगा या नहीं'
यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि कहानी के हिसाब से लड़की का नाम 'मेघना' नहीं बल्कि 'मेनका' है।
पेज नंबर 111 की अंतिम पंक्ति में और पेज नंबर 112 की शुरुआती पंक्ति में दिखा दिखाई दिया कि..
'तुम मुझे किसके लिए लेने आए हो श्यामल? माँ के लिए, घर की पुताई के लिए या फिर अपने लिए? जवा का स्वर कड़वा और कड़ा था'
' तब सुन लो कि नील और मेरे बारे में तुमने जो कुछ भी सुना है वो बिल्कुल सच है। ऐसा क्यों हुआ, शायद तुम जैसा पत्थरदिल समझ ही ना सके लेकिन मैं बताऊँगी। मेरा पहला प्यार, पहला समर्पण और पहला सम्भोग, सब कुछ तो तुम थे श्यामल लेकिन तुमने मुझे बस भोग्या समझा।'
यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि कहानी में बिना श्यामल के कोई आरोप लगाए जवा का उसे, उसके और नील के रिश्ते के बारे में सफ़ाई देने का कोई कारण नहीं बनता था। अगर यही आरोप कुछ और बहस भरे संवादों के बाद शयामल द्वारा लगाया जाता तो बेहतर होता।
पेज नंबर 113 में लिखा दिखाई दिया कि..
'"जानती हो दीपिका, आज मुझे नेहा की याद आ गई। उससे अलग हुए भी तीन बरस बीत गए," कहानी भूलकर मैं नेहा को याद करने लगा।"
" क्या तुम उससे प्रेम करते थे?" दीपिका पूछ बैठी।'
यहाँ कहानी का मुख्य किरदार दीपिका को नेहा के बारे में बताता है जबकि कुछ व्यक्तियों के बाद नेहा कहती दिख रही है कि..
'मुझे कुछ बताओ उसके बारे में। आज पहली बार तुम्हारे मुँह से ये नाम सुन रही हूँ। उसने आग्रह किया।'
ऐसा कैसे संभव हो सकता है?
इस संकलन को पढ़ते वक्त ज़रूरी जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना किया जाना थोड़ा खला। इसके अतिरिक्त कुछ एक जगहों पर प्रूफरीडिंग की कमियों के साथ-साथ वर्तनी की त्रुटियाँ भी दिखाई दीं। जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर पेज नंबर 14 की पहली पंक्ति में दिखा दिखाई दिया कि..
'रोकते रोकते भी दबे स्वर में हम दोनों सखियाँ खिलखिला उठे'
यहाँ 'खिलखिला उठे' की जगह पर 'खिलखिला उठीं' आएगा।
पेज नंबर 36 में लिखा दिखाई दिया कि..
'तुम्हारी अमानत लौटने जो भूलवश मेरे पास रह गई थी'
यहाँ 'तुम्हारी अमानत लौटने' की जगह पर 'तुम्हारी अमानत लौटाने' आएगा।
पेज नंबर 50 में लिखा दिखाई दिया कि..
'किनारे के काउच पर कुछ आराम से बैठ कर पढ़ने लगी'
यहाँ 'काउच पर कुछ आराम से बैठ कर पढ़ने लगी' की जगह 'काउच पर बैठ कर पढ़ने लगी' आए तो बेहतर।
पेज नंबर 56 में लिखा दिखाई दिया कि..
'कोई बहुत प्यारी चीज छिन जाती है तब आप शिद्दत से महसूस करते है'
यहाँ 'चीज' की जगह 'चीज़' और 'है' की जगह पर 'हैं' आएगा।
पेज नंबर 67 में लिखा दिखाई दिया कि..
'रॉबिन के फोन यदा कदा आते उसके पास रहते थे'
यहाँ 'यदा कदा आते उसके पास रहते थे' की जगह 'यदा कदा उसके पास आते रहते थे'
पेज नंबर 69 में लिखा दिखाई दिया कि..
' छोटा सा हमारा घर... जिसे मैंने बड़े जतन से रख रखा है'
यह वाक्य सही नहीं बना। सही वाक्य इस प्रकार होना चाहिए कि..
'छोटा सा हमारा घर.. जिसे मैंने बड़े जतन से सजाया संवारा है'
इसी पेज पर और आगे लिखा दिखाई दिया कि..
' मैं अपना सम्पूर्ण श्रृंगार किया है'
यहाँ ' मैं अपना सम्पूर्ण श्रृंगार किया है' की जगह पर ' मैंने अपना सम्पूर्ण श्रृंगार किया है' आएगा।
पेज नंबर 71 में लिखा दिखाई दिया कि..
'एक लगातार अपराधबोध से मन दुखने लगा था'
इस वाक्य में 'एक' शब्द की जरूरत नहीं है।
पेज नंबर 72 की अंतिम पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..
'हम दोनों के घर पास ही पास थे'
यहाँ 'पास ही पास' की जगह अगर 'पास-पास थे' आए तो बेहतर।
पेज नंबर 79 के अंतिम पैराग्राफ में लिखा दिखाई दिया कि..
'बीच वाली मंजिल के किराएदार थे हम लोग और सबसे ऊपर वाली मंजिल था बस एक कमरा और छत'
यहाँ 'ऊपर वाली मंजिल था बस एक कमरा और छत' की जगह पर 'ऊपर वाली मंज़िल पर था बस एक कमरा और छत' आएगा।
पेज नंबर 93 की अंतिम पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..
'कामाक्षी रोने रोने को हो आई'
यहाँ 'रोने रोने को हो आई' की जगह पर 'रोने को हो आई' आएगा।
पेज नंबर 101 में लिखा दिखाई दिया कि..
'संध्या की कहानियाँ काफी कुछ यथार्थ से जुड़ी होती थीं'
यहाँ 'संध्या की कहानियाँ काफी कुछ यथार्थ से जुड़ी होती थीं' की जगह पर अगर 'संध्या की कहानियाँ काफी हद तक यथार्थ से जुड़ी होती थीं' आए तो बेहतर।
पेज नंबर 106 में लिखा दिखाई दिया कि..
'सोचता हूँ वापस घर लौट लें कुछ दिनों के लिए'
यहाँ 'लौट लें कुछ दिनों के लिए' की जगह अगर 'लौट चलें कुछ दिनों के लिए' आए तो बेहतर।
पेज नंबर 116 में लिखा दिखाई दिया कि..
'सिर्फ मैं अकेला उसे बेन्च पर पर बैठ गया'
इस वाक्य में ग़लती से 'पर' शब्द दो बार छप गया है।
* बीचोबीच - बीचोंबीच
* नियमो - नियमों
* आजाद - आज़ाद
* थोडा - थोड़ा
* अन्जान - अनजान
* वहीँ - वहीं
* अंदाज - अंदाज़
* लडकियाँ - लड़कियाँ
* नजर - नज़र
* शयामल - श्यामल
* गुलजार - गुलज़ार
* धडकनें - धड़कनें
* इंतजार - इंतज़ार
* गुलमुहर - गुलमोहर
* इन्स्ताग्राम - इंस्टाग्राम
यूँ तो यह कहानी संग्रह मुझे उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इस 138 पृष्ठीय कहानी संग्रह के पेपरबैक संस्करण को छापा है न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 250/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
1931 - देश या प्रेम -- सत्य व्यास
राजेश खन्ना (एक तन्हा सितारा) - गौतम चिन्तामणि
बॉलीवुड में राजकपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद की प्रसिद्ध तिकड़ी के बाद राजेश खन्ना ऐसे पहले अभिनेता थे जिसने सही मायने में सुपर स्टार का दर्जा पाया और जो अपने उत्थान से लेकर पतन तक एक राजा की तरह जिया।
दोस्तों...आज बॉलीवुड के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना की बातें इसलिए कि आज मैं उनकी जीवनी से संबंधित एक किताब 'राजेश खन्ना - एक तन्हा सितारा' के हिंदी अनुवाद का यहाँ जिक्र करने जा रहा हूँ जिसे मूलतः अँग्रेज़ी में लिखा है गौतम चिन्तामणि ने और इसका सफ़ल हिंदी अनुवाद किया है पैमिला मानसी ने।
राजेश खन्ना के उत्थान से लेकर पतन तक की कहानी कहती इस किताब में कहीं उनके बचपन से जुड़ी बातें पढ़ने को मिलती हैं तो कहीं हम उनके संघर्ष के दिनों से अवगत होते हैं। कहीं औरों की देखादेखी राजीनीति के गलियारों में उनके पदार्पण की बातें जानने को मिलती हैं तो कहीं वे राजनीति से विमुख होते दिखाई देते हैं। कहीं उनकी अभिनय प्रतिभा और शोहरत की बातें पढ़ने को मिलती हैं तो कहीं उनका घमंड सर चढ़ कर बोलता दिखाई देता है।
इस महत्त्वपूर्ण किताब को पढ़ने के दौरान पाठकों को बहुत सी रोचक जानकारियों से रूबरू होने का मौका मिलता है जैसे कि..
इस किताब के अनुसार बचपन से नाटकों और अभिनय का शौक रखने वाले जतिन खन्ना उर्फ़ राजेश खन्ना का जन्म 1942 में रेलवे ठेकेदारों के परिवार में हुआ। वहाँ उनके माता-पिता ने उन्हें अपने छोटे भाई यानी कि उनके चाचा को गोद दे दिया। जहाँ उनका बड़े ही लाड़-प्यार से पालनपोषण हुआ। इसी लाड़ प्यार की वजह से उनका स्वभाव कुछ ज़िद्दी वाला भी बना।
राजेश खन्ना अपने विभिन्न साक्षात्कारों में जानबूझकर अपने आरंभिक जीवन के बारे में सभी को अलग-अलग बात बताते थे और प्रसिद्ध अभिनेत्री गीता बाली की वजह से राजेश खन्ना की फिल्मों में काम करने के प्रति रुचि जागृत हुई जब एक नाटक के लिए किसी बिल्डिंग में जाते वक्त उनकी गीतावली से मुलाकात हुई और उन्होंने उससे कहा कि उन्हें उनकी आने वाली फिल्म एक चादर मैली सी के लिए उसके जैसा ही एक अभिनेता चाहिए। हालांकि यह और बात है कि राजेश खन्ना को वह रोल नहीं मिल सका। बाद में खैर वह फिल्म भी गीता बाली की बेवक्त मौत की वजह से स्थगित कर दी गई। सफल होने से पहले स्ट्रगलर राजेश खन्ना खन्ना की कभी 'गुरखा' तो कभी 'नेपाली नौकर' कह कर खिल्ली भी उड़ाई गयी।
इस किताब के ज़रिए जहाँ एक तरफ़ पता चलता है कि फ़िल्म 'कटी पतंग' की शूटिंग के दौरान राजेश खन्ना अपने साथियों पर हावी होने लगे और कभी गुलशन नंदा को अपना आधा जला सिग्रेट थमाने तो कभी कलैक्टर तक के घर खाना खाने जाने से इनकार करने लगे। तो वहीं दूसरी तरफ़ अनजान लोगों के साथ मिलकर गुटबाज़ी और शराब की पार्टियाँ तक करने लगे।
■ 1969 से 1972 के बीच राजेश खन्ना ऐसे पहले हिंदी अभिनेता थे जिनकी फिल्में अहिन्दी भाषी हिंदी क्षेत्रों में भी लगातार महीनों भर तक पूरे भरे हुए सिनेमाघरों में चलतीं थीं। वह ऐसे पहले सितारे थे जिनकी फ़िल्मों की स्वर्ण जयंती मद्रास, बैंगलोर और हैदराबाद जैसे शहरों में भी मनायी जाती थी।
■ स्टार एण्ड स्टाइल पत्रिका की देवयानी चौबल जो कि आमतौर पर 'देवी' के नाम से जानी जाती थी, ने राजेश खन्ना को देखते ही एक जीतने वाले घोड़े के रूप में पहचान लिया था और उसी ने अपने आर्टिकल्स के ज़रिए राजेश खन्ना के इर्दगिर्द एक तिलिस्म सा खड़ा कर उसे 'स्टार' या 'सितारा' का नाम दिया।
■ राजेन्द्र कुमार ने भुतहा कहे जाने वाले एक बंगले को खरीदने का मन बनाया तो मनोज कुमार की सलाह पर गृहप्रवेश से पहले कई तरह की पूजा करवाई और बंगले के नाम 'डिम्पल' रखा। यही बंगला बाद में राजेश खन्ना ने ख़रीदा और 'डिम्पल' ना रखने की इजाज़त ना मिलने पर उसका नाम 'आशीर्वाद' रखा।
■ 'आशीर्वाद' में आ जाने के बाद उसके गैराज में राजेश खन्ना ने एक बहुत बड़ा बार बनवाया जहाँ वे अपना दरबार लगाते। इस प्रसिद्ध दरबार के बाहर राजेश खन्ना दसियों निर्माताओं को इंतज़ार करवाने के बाद अपने रूबरू पेश करवाते। वहाँ राजा और प्रजा के बीच के फ़र्क के लिए उनकी कुर्सी बाक़ी कुर्सियों से बड़ी और ऊँची जगह पर रखी जाती।
■ चमचों की भीड़ में फँसे राजेश खन्ना अक्सर अपनी महफिलों में किसी एक को बकरा बना बाक़ी सबके साथ मिलकर उसकी खिंचाई किया करते। और राजेश खन्ना या उसके काम की किसी भी तरह की आलोचना करने वाले को अक्सर महफ़िल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता।
■ राजेश खन्ना की प्रसिद्धि का आलम यह था कि लड़कियाँ उन्हें अपने खून से अक़्सर ख़त लिखा करती जिसके साथ डॉक्टर का सर्टीफिकेट साथ में नत्थी होता था कि यह इनसानी खून से लिखी गयी चिट्ठी है। कहीं उनकी तस्वीर के साथ लड़कियों के शादी करने की बातें उठीं तो कहीं लड़कियों द्वारा उनकी सफेद कार को लाल लिपिस्टिक से रंग दिया जाता। कहीं मर्दों ने उनकी तरह का हेयर स्टाइल रखना तो कइयों ने उनके मशहूर गुरु कुर्ता पहनने शुरू कर दिए। जिसे बनाने वाले बलदेव पाठक ने उसी के साथ के 2000 से ज़्यादा कुर्ते बेचे।
■ सलीम-जावेद की जोड़ी को पहली बार औपचारिक रूप से श्रेय दिलाने का काम राजेश खन्ना की 'हाथी मेरे साथी' फ़िल्म ने किया।
■ 1972 में जब राजेश खन्ना के बजाय मनोज कुमार को फ़िल्म 'बेईमान' के लिए श्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई तो राजेश खन्ना इस कदर जलभुन गए कि उन्होंने ठीक अवार्ड सेरेमनी के समय पर ही अपने बँगले आशीर्वाद में एक पार्टी रख दी और फिल्मजगत के तमाम दिग्गजों को उसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित कर दिया। ऐसे में अपना कार्यक्रम फ्लॉप होने के डर से फिल्मफेयर के आला अफ़सरों से वक्त रहते किसी तरह राजेश खन्ना को अपनी पार्टी रद्द करने के लिए मना लिया।
■ इसी किताब के मुताबिक सलीम-जावेद की जोड़ी ने 'हाथी मेरे साथी' के बाद जितनी भी फ़िल्में लिखी, उनमें से किसी के लिए भी उन्होंने राजेश खन्ना के बारे में नहीं सोचा कि राजेश खन्ना को गुमान था कि फिल्में उनकी वजह से हिट होती हैं ना कि किसी और की वजह से।
■ राजेश खन्ना अपनी प्रेमिका अंजू महेन्द्रू से शादी करना चाह रहे थे लेकिन अंजू बस जाने के लिए तैयार नहीं थी, जिससे उनके रिश्तों में इस हद तक खटास आ गयी थी कि उन्होंने मात्र पंद्रह साल की डिम्पल से शादी करने का फैसला किया और कहा जाता है कि उन्होंने जानबूझकर अपनी बारात को अंजू महेन्द्रू के घर के सामने से निकलवाया ताकि वे उसे तकलीफ़ पहुँचाने के साथ-साथ अख़बारों की सुर्खियों में भी छाए रह सकें।
■ इसी किताब के अनुसार अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया था कि अपनी असफलता की वजह से वे इस हद तक चिड़चिड़े और बेचैन हो गए थे कि निराशा के आलम में उन्होंने ख़ुदकुशी करने तक के बारे में भी सोच लिया था लेकिन फिर यह सोचकर उन्होंने ख़ुद को रोक लिया कि वे नहीं चाहते थे कि दुनिया उन्हें एक नाकामयाब इन्सान के रूप में देखे।
■ एक प्रचलित कहानी के अनुसार अंजू महेन्द्रू से रिश्ता बिगड़ने के बाद उन्होंने उसकी फ़िल्म 'डाकू', जिसके निर्देशक बासु चटर्जी थे, के सारे प्रिंट और नैगेटिव ख़रीद कर जला दिए थे कि वह फ़िल्म कभी रिलीज़ ना हो सके। इसी नुकसान की भरपाई के लिए उन्होंने बासु चटर्जी की फ़िल्म 'अविष्कार' में काम किया था।
■ सलीम-जावेद की जोड़ी के अमिताभ बच्चन के साथ जुड़ने से जहाँ एक तरफ़ अमिताभ बच्चन ने बहुत ऊँचा मुकाम पाया तो वहीं दूसरी तरफ़ सलीम-जावेद भी पहले ऐसे लेखक बने जिनका नाम फ़िल्मों के इश्तेहारों पर भी आने लगा और फ़िल्म के लिए सितारों को भी चुनने और नकारने की आज़ादी अथवा ताक़त प्राप्त हुई।
■ इसी किताब से पता चलता है कि परिवार की ज़िद के चलते राजकपूर को 'सत्यम शिवम सुंदरम' फ़िल्म में राजेश खन्ना के बजाय अपने छोटे भाई शशि कपूर को लेना पड़ा था।
और भी बहुत सी रोचक जानकारियों से लैस इस किताब में दो-तीन जगहों पर वर्तनी की त्रुटियाँ तथा एक-दो जगहों पर कोई-कोई शब्द बिना ज़रूरत छपा दिखाई दिया। राजेश खन्ना एवं फ़िल्मों में रुचि रखने पाठकों के लिए यह एक बढ़िया एवं संग्रह में रखी जाने वाली किताब है।
• रानीतिक - राजनीतिक
• अभनय - अभिनय
• कुतूहूल - कौतूहल
उम्दा अनुवाद एवं रोचक जानकारियों से सजी इस पुस्तक के 216 पृष्ठीय कमज़ोर कागज़ पर छपे पेपरबैक संस्करण को छापा है हार्परकॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया ने और इसका मूल्य रखा गया है 299/- जो कि कंटैंट एवं क्वालिटी को देखते हुए मुझे थोड़ा ज़्यादा लगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक, अनुवादक एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
कथा सप्तक - अनिलप्रभा कुमार
आमतौर पर हर लेखक अपने आसपास के माहौल अथवा परिवेश से प्रभावित हो कर या फिर अपने देखे भाले सच या फिर सुनी सुनाई बातों से रूबरू हो कर ही नया कुछ रचता है। जिसमें ज़रूरत के हिसाब से कम या ज़्यादा की मात्रा में कल्पना का समावेश हो सकता है। दोस्तों आज मैं यहाँ देशी विदेशी माहौल में रची बसी कहानियों के जिस संकलन की बात करने जा रहा हूँ। उसे रचा है अमेरिका में रहने वाली लेखिका अनिलप्रभा कुमार ने और उनके इस संकलन को 'कथा-सप्तक' का नाम दिया है इस संकलन के संपादक आकाश माथुर ने।
इस संकलन की मानवीय संवेदनाओं और प्रैक्टिकलवाद के बीच के फ़र्क को दर्शाती एक कहानी उस जोड़े की बात करती है, जिसकी गाड़ी हाइवे पर एक हिरण के टकरा जाने से दुर्घटनाग्रस्त हो टूट-फूट चुकी है। जहाँ एक तरफ़ पत्नी हिरण के मारे जाने से व्यथित है तो वहीं दूसरी तरफ़ उसका पति अपनी गाड़ी के हुए नुकसान से। वहीं एक अन्य कहानी में अपने घर की तंगहाली से तंग आ कर समर अपनी माँ को अकेला छोड़ कर अमेरिका में स्टूडेंट वीज़ा पर चला जाता है। वहाँ उसे एक प्रतिष्ठित अख़बार में फ्रीलांस के तौर पर एक टास्क मिलता है जिसमें उसे हैरी ग्रोअर (हैरी ग्रोवर) की उसके घर में हुई गुमनाम मौत के बारे में तथ्यात्मक जानकारी जुटाने के लिए कहा जाता है। समर अनजाने में ही अकेलेपन से जूझ कर मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैरी ग्रोअर के जीवन से भारत में अकेली रह रही अपनी माँ के एकाकीजीवन की तुलना करने लगता है।
इसी संकलन की एक अन्य कहानी में सब कुछ फ़िर से सामान्य करने की चाह में जब बच्चों की ज़िद पर उनके साथ रहने आए पिता की बरसों बाद अलग रह रही पत्नी से मुलाकात होती है। जिसके बाद कुछ ऐसा घटता है कि पिता की इच्छा का मान रखते हुए उनकी बेटी स्वयं ही उन्हें जाने के लिए कह देती है।
इसी संकलन की एक अन्य कहानी में जहाँ एक तरफ़ कैंसर की वजह से कीमो थेरिपी के कष्ट झेलती तीस वर्षीय महक की दुनिया बस घर तक ही सिमट चुकी है। भीषण बर्फ़बारी और तूफ़ान के बीच बिजली चले जाने से अँधेरे घर में फँसे उसके माँ-बाप अपनी बच्ची की सेहत को ले कर परेशान हैं कि अगर इस बीच कोई दिक्कत हो गयी तो वे अपनी बेटी को अस्पताल कैसे ले कर जाएँगे। तो वहीं एक अन्य कहानी में दूसरे शहर में अपने पति के साथ सैटल होने पर ईशा अपने कुत्ते 'पेपे' को देखभाल के लिए अपने रिटायरमेंट ले चुके पिता के पास छोड़ जाती है। अनमने मन से ही सही मगर पिता को उसे अपनाना पड़ता है। पत्नी की दूसरे शहर में नौकरी होने की वजह से वह भी अपने पति के साथ रह नहीं पाती। ऐसे में पिता के अकेलेपन के साथी के रूप में पेपे उनके दिल में अपने लिए प्रेम और जगह बना तो लेता है मगर..
इसी संकलन की एक अन्य कहानी में विवाह के बाद विदेश जा कर बस चुकी माधवी, अपने पिता की मृत्यु के बाद, पुरानी यादों को फ़िर से संजोने के लिए वापिस अपने मायके लौटती तो है मगर रिश्तों में अब पहले सा अपनापन ना पा कर वापिस लौट जाती है।
तो वहीं एक अन्य कहानी में 20 वर्षीया प्रीत का पिता उसके जन्म लेने से पहले ही यह कह कर घर से गया था कि किसी ज़रूरी काम से जा रहा है, जल्द ही लौट आएगा। प्रीत की माँ वीरो अब भी उसके आने की बाट जोह रही है। ऐसे में एक दिन..
किताब को पढ़ते वक्त मुझे प्रूफरीडिंग की कुछ कमियाँ भी दिखाई दीं। उदाहरण के तौर पर पेज नंबर
7 में लिखा दिखाई दिया कि..
'यंइ तो वह अब स्थानीय सड़क पर ही थे'
यह वाक्य सही नहीं बना। सही वाक्य इस प्रकार होगा कि..
'यूँ तो वे अब स्थानीय सड़क पर ही थे'
पेज नंबर 10 में लिखा दिखाई दिया कि..
'पता नहीं इंश्योरेंस कंपनी कितना भरपाया करती है'
यहाँ 'भरपाया' की जगह 'भरपाई' आना चाहिए।
21 में लिखा दिखाई दिया कि..
'सब जगह विज्ञापन दे रहे है'
यहाँ 'विज्ञापन दे रहे है' की जगह 'विज्ञापन दे रहे हैं' आएगा।
इसी पेज पर और आगे लिखा दिखाई दिया कि..
'समर के होंठ विद्रूप से सिकुड़े'
यहाँ 'विद्रूप से सिकुड़े' की जगह पर 'विद्रूपता से सिकुड़े' आएगा।
पेज नंबर 22 में लिखा दिखाई दिया कि..
'शायद तभी उन्हें हैरी के भारतीय मूल का होने में संदे है'
यहाँ ग़लती से 'संदेह' की जगह पर 'संदे' छप गया है।
पेज नंबर 43 में लिखा दिखाई दिया कि..
'सोहम ने फिर से सबके गिलस भर दिये'
यहाँ 'गिलस' की जगह पर 'गिलास' आएगा।
पेज नंबर 53 में लिखा दिखाई दिया कि..
'अभी इसके किमो के सैशन ख़त्म हुए हैं न'
यहाँ 'किमो के सैशन ख़त्म हुए हैं न' की जगह पर 'कीमो के सैशन ख़त्म हुए हैं न' आएगा।
पेज नंबर 62 में लिखा दिखाई दिया कि..
'उसके जन्मदिन पर एक पकेट भी भेजती'
यहाँ 'पकेट' की जगह पर 'पैकेट' आएगा।
पेज नंबर 82 में लिखा दिखाई दिया कि..
'कब आएगा वोह'
यहाँ 'वोह' की जगह पर 'वो' आएगा।
इसी पेज की अंतिम पंक्ति में लिखा दिखाई दिया कि..
'वीरो चुपचाप कोठरी में आँखें बद किए पड़ी है'
यहाँ 'आँखें बद किए पड़ी है' की जगह पर 'आँखें बंद किए पड़ी है' आएगा।
• प्रगट - प्रकट
• सान्तवना - सांत्वना
• स्वपन - स्वप्न
रोचक कहानियों के इस 84 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है शिवना पेपरबैक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
द होस्ट - आलोक सिंह खालौरी
क़यामत - हरमिंदर चहल - सुभाष नीरव (अनुवाद)
कहते हैं कि दुख, विषाद या हताशा किसी सरहद या मज़हब की ग़ुलाम नहीं होती। किसी भी देश, धर्म अथवा संप्रदाय को मानने वाली हर माँ को उसके बच्चों से बिछुड़ने का दुख हर जगह..हर माहौल में एक जैसा होता है। इसी तरह आतंकवाद से दिन-रात त्राहिमाम करती जनता अथवा उससे जूझने वाले हर फौजी..हर सिपाही के मन में भी एक जैसी ही भावनाएं उमड़ती हैं। भले ही वे भारत या ईरान-इराक-अफ़गानिस्तान अथवा किसी भी अन्य मुल्क से ताल्लुक रखते हों।
दोस्तों.. आज मैं यहाँ इसी तरह के विषय पर लिखे गए एक ऐसे उपन्यास की बात करने जा रहा हूँ जिसे 'क़यामत' के नाम से लिखा है पंजाबी लेखक हरमिंदर चहल ने और इसका हिंदी अनुवाद किया है प्रसिद्ध साहित्यकार एवं अनुवादक सुभाष नीरव ने।
मूलतः इस उपन्यास में कहानी है इराक के अल्पसंख्यक यज़ीदी समुदाय पर इस्लामिक स्टेट (ISIS) के आतंक भरे कहर की। जिसमें एक परिवार के माध्यम से वहाँ के लोगों की दशा-दुर्दशा और बुरे हालात का वर्णन किया गया है। उस आईएसआईएस (ISIS) की जो ऐसा चरमपंथी संगठन है जिसके आतंक की की शुरुआत 2013 में हुई थी। इस संगठन का पूरा नाम इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (Islamic State of Iraq and Syria) है। शुरू में, इसे अल-कायदा इत्यादि का समर्थन प्राप्त था, लेकिन बाद में अल-कायदा ने इससे दूरी बना ली। मौजूदा हालात में आईएसआईएस अब अल-कायदा से भी ज़्यादा क्रूर और खतरनाक संगठन के रूप में जाना जाता है।
इस उपन्यास में कहीं जवान युवतियों और औरतों को जबरन बंधक बनाए जाने और सीरिया में लड़ाकों की यौनिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए इन्हें भेजे जाने की बात होती दिखाई देती है तो कहीं स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा इनकी सकुशल बरामदगी सुनिश्चित करने के प्रयास होते नज़र आते हैं। कहीं ईरान-इराक के युद्ध में सद्दाम हुसैन द्वारा जबरन युवाओं को युद्ध में झोंके जाने की बात होती दिखाई देती है तो कहीं दुश्मनों के लिए बिछाई गयीं बारूदी सुरंगों की चपेट में आ बेज़ुबान जानवरों के मरने की बात भी उठती नज़र आती है।
इसी किताब में कहीं सद्दाम हुसैन द्वारा कुर्दिश इलाकों पर ज़ुल्म करने की वजह से वहाँ की जनता त्रस्त नज़र आती है तो कहीं सद्दाम हुसैन का हौसला तोड़ने के मद्देनज़र चीनी जैसी मामूली चीज़ की उपलब्धता पर भी अमेरिका द्वारा इस कदर बंदिश लगाने की बात होती दिखाई देती है कि इराक के शहरों, कस्बों और गाँवों में चीनी की मौजूदगी बमुश्किल ही दिखाई देती है। इसी उपन्यास में कहीं गद्दारी के शक में सद्दाम हुसैन के द्वारा ज़हरीली गैस के ज़रिए कुर्दिश इलाकों के गाँव के गाँव ख़त्म कर देने की बात होती नज़र आती है।
इसी उपन्यास के द्वारा हमें पता चलता है कि यज़ीदी धर्म को इस वजह से मुस्लिमों द्वारा धर्म ही नहीं माना जाता कि इनकी बाइबल या कुरान की तरह कोई धार्मिक किताब नहीं है। साथ ही यज़ीदी धर्म में धार्मिक मान्यता के अनुसार उसके अनुयायी बुधवार के दिन नहाते नहीं हैं। जिसकी वजह से उन्हें गंदा समझ जाता है।
इसी उपन्यास द्वारा हमें पता चलता है कि यज़ीदी धर्म वाले अपने धर्म का प्रचार नहीं करते क्यों बाहर का कोई भी व्यक्ति अन्य धर्मों की तरह अपना धर्म बदल कर इनके धर्म में नहीं आ सकता। साथ ही इराक के गाँवों में गाँव वालों द्वारा किसी की मौत पर बंदूकें चला-चला कर शोक मनाया जाता है। तो कहीं सुन्नी मुसलमानों द्वारा यजीदियों के जवान बच्चों का पैसे के लिए अपहरण कर लिया जाता है।
इसी उपन्यास में कहीं गाँव देहातों में ISIS के बढ़ते प्रभाव एवं अतिक्रमण की वजह से आम जन चिंतित को कहीं अपनी तथा अपने क्षेत्र की सुरक्षा के प्रति सजग रूप से प्रयासरत नज़र आते हैं। तो कहीं ISIS के हमले के बाद अपने गाँव-घर छोड़ कर भागे लोगों द्वारा पेड़ों के पत्ते खा कर जीवित रहने या फ़िर अमेरिकी के रूप में हवाई जहाजों से फैंकी जाने वाली रसद सामग्री के पैकेटों पर निर्भर रहने की बात होती नज़र आती है। इसी किताब में कहीं सिखों (सिख धर्म के अनुयायी) द्वारा सीरिया और कुर्दिस्तान की सीमा पर शरणार्थियों की सेवा के लिए राहत कैंप चलाए जाने की बात पता चलती है। तो कहीं ISIS द्वारा सामूहिक नरसंहार के रूप में पूरे गाँव के बुज़ुर्गों और अधेड़ों को गोलियों द्वारा छलनी किए जाने की बात होती दिखाई देती है।
कहीं जवान युवकों और बच्चों को आत्मघाती हमलों के लिए तैयार किए जाने की बात तो कहीं जवान युवतियों को आगे बेचने या सैक्स स्लेव के रूप में ISIS के लड़ाकों द्वारा इस्तेमाल किए जाने की बात उठती दिखाई देती है। इसी उपन्यास में कहीं ISIS द्वारा विरोध किए जाने की सज़ा के रूप में एक युवती को पहले जबरन गैंगरेप का शिकार और फ़िर सबके सामने ज़िंदा जला दिए जाने की बात होती नज़र आती है।
दरअसल किसी भी उपन्यास को एक शिफ़्ट में लिखने के बजाय कई-कई शिफ्टों में लिख कर तैयार किया जाता है। इस बीच वक्त ज़रूरत के हिसाब से बीच में काफ़ी दिनों के गैप का आ जाना भी कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसे में दिक्कत ये आती है कि पहले हम किसी चीज़ के बारे में कुछ और लिख चुके होते हैं मगर कहानी को बढ़ाते समय हम पहले लिखी बात को भूल जाते हैं जिससे कहानी की कंटीन्यूटी में फ़र्क आ जाता है। इस चीज़ का एक उदाहरण इस उपन्यास में भी नज़र आया कि पेज नंबर 105 में लिखा दिखाई दिया कि..
'वह आँखें मूंदे प्रार्थना कर रही थी। उठकर बाहर देखने का यत्न किया, पर सफलता नहीं मिली, क्योंकि खिड़कियों के शीशे कागज़ लगाकर ढके हुए थे।'
इससे अगले पैराग्राफ में दिखा दिखाई दिया कि..
'अंदाज़ा हुआ कि सवेरा हो चुका है। फिर दिन चढ़ गया और खिड़कियों के बाहर दिखने लगा।'
यहाँ एक पैराग्राफ़ पहले लेखक द्वारा बताया जा रहा है कि खिड़कियों से बाहर देख पाना मुमकिन नहीं था क्योंकि खिड़कियों के शीशों पर अख़बारी कागज़ चिपका हुआ था जबकि अगले ही पैराग्राफ़ में लिखा जा रहा है कि खिड़कियों से बाहर दिखाई दे रहा था।
इस उपन्यास को पढ़ते वक्त कुछ एक जगहों पर प्रूफरीडिंग की कमियाँ भी दिखाई दीं जैसे कि पेज नम्बर 20 के अंत में लिखा दिखाई दिया कि..
'रात उसी तरफ बीती जैसे पहली रात बीती थी'
यहाँ 'रात उसी तरफ बीती' की जगह पर 'रात उसी तरह बीती' आएगा।
पेज नम्बर 41 में लिखा दिखाई दिया कि..
'क्योंकि बाइबल या कुराना की तरह हमारी कोई धार्मिक किताब नहीं'
यहाँ 'कुराना' की जगह पर 'कुरान' या फ़िर 'कुरआन' आएगा।
पेज नम्बर 56 के अंत में लिखा दिखाई दिया कि..
'मैंने तो तैयारी की थी कि भेड़ा काटूँगा'
यहाँ 'भेड़ा काटूँगा' की जगह पर 'भेड़ काटूँगा' आना चाहिए।
पेज नम्बर 64 में लिखा नज़र आया कि..
'इस बातें से अमेरिका भी सावधान है'
कहानी के हिसाब से यहाँ 'इस बातें से अमेरिका भी सावधान है' की जगह पर 'इन बातों से अमेरिका भी सावधान है' आना चाहिए।
पेज नम्बर 71 में लिखा दिखाई दिया कि..
'उसके कहे मुताबिक जो लोग भागने में कामयाब हो गए, वे सिंजार पहाड़ों की तरह निकल गए'
यहाँ 'सिंजार पहाड़ों की तरह निकल गए' की जगह पर 'सिंजार पहाड़ों की तरफ़ निकल गए' आएगा।
पेज नम्बर 79 में लिखा नज़र आया कि..
'क़रीब एक घंट बाद आकर वह संक्षेप में बात बताने लगा'
यहाँ 'एक घंट बाद' की जगह पर 'एक घंटा बाद' आएगा।
पेज नम्बर 84 में लिखा दिखाई दिया कि..
'इस वक्त इस्लामिक स्टेट वाले आँधी की तरह हर तरफ़ चढ़े जो रहे हैं'
यहाँ 'चढ़े जो रहे हैं' की जगह पर 'चढ़े जा रहे हैं' आएगा।
पेज नम्बर 89 में लिखा दिखाई दिया कि..
'पता नहीं था कि कब तक इस्लामिक स्टेट वालों का घरा पड़ा रहेगा'
यहाँ 'घरा पड़ा रहेगा' की जगह पर 'घेरा पड़ा रहेगा' आना चाहिए।
पेज नम्बर 112 में लिखा दिखाई दिया कि..
'मैंने राते हुए कहा'
यहाँ 'मैंने राते हुए कहा' की जगह पर 'मैंने रोते हुए कहा'
पेज नम्बर 113 में लिखा दिखाई दिया कि..
'उसकी बात सुनकर फौजिया बड़ी विचलित हो गई और बाली'
यहाँ 'और बाली' की जगह पर 'और बोली' आएगा।
पेज नम्बर 119 में लिखा नज़र आया कि..
'लगा जैसे सारा मास उखाड़कर ले गया हो'
यहाँ 'मास' की जगह पर 'मांस' आएगा।
पेज नम्बर 131 के अंत में लिखा नज़र आया कि..
'पीछे घर की चारदीवारी के ऊपर से घिसरते हुए दूसरी तरफ़ जाया जा सकता था'
यहाँ 'घिसरते हुए' की जगह पर 'घिसटते हुए' आना चाहिए।
पेज नम्बर 173 में लिखा दिखाई दिया कि..
'इस्लामिक स्टेट का नासिर नाक का एक खतरनाक आतंकवादी हलाक'
यहाँ 'नासिर नाक का एक खतरनाक आतंकवादी हलाक' की जगह पर 'नासिर नाम का एक खतरनाक आतंकवादी' आएगा।
पेज नम्बर 174 में लिखा दिखाई दिया कि..
'सुरक्षा फोर्सों ने उसको वहीं ढेर कर दियाकृ'
यहाँ 'कर दिया' की जगह पर ग़लती से 'कर दियाकृ' छप गया है।
* लावारिश - लावारिस
* पड़क - पकड़
* (पूछ-तड़ताल) - (पूछ-पड़ताल)
* घिराव - घेराव
* इस्लामिद स्टेट - इस्लामिक स्टेट
* (धागा-तावीत) / (धागा-तावीज)
उपन्यास को पढ़ते वक्त इस किताब के काफ़ी पेज अपनी बाइंडिंग से उखड़े मिले। जिसकी तरफ़ ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है।
यूँ तो यह उम्दा उपन्यास मुझे लेखक की तरफ से उपहारस्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इस रोचक किताब के 175 पृष्ठीय हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है भारत पुस्तक भंडार ने और इसका मूल्य रखा गया है 450/- रुपए जो कि मुझे ज़्यादा लगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक, अनुवादक एवं प्रकाशक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
यार पापा - दिव्य प्रकाश दुबे
विहान की आहट - वंदना बाजपेयी
सुनो... तुम्हें प्रेम बुलाता है - शिखा श्रीवास्तव 'अनुराग'
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