B- 15 B फोर्थ फ्लोर- संजीव कुमार गंगवार

अमूमन अपनी जिंदगी में हम सैकड़ों हज़ारों लोगों को उनके नाम..उनके काम..उनकी पहचान से जानते हैं। मगर क्या वे सब के सब हमारे जीवन में इतना अधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं कि उन सभी का किसी कहानी या उपन्यास में असरदार तरीके से जिक्र या समावेश किया जा सके? 

मेरे ख्याल से..नहीं। ना ही ऐसा करना सही.. व्यवहारिक एवं तर्कसंगत भी होगा क्योंकि बिना ज़रूरत किसी भी कहानी में इतने अधिक किरदारों का समावेश उसे कुछ और नहीं बल्कि बस चूँ चूँ मुरब्बा ही बना देगा। मगर इसी अवधारणा को 
ग़लत साबित करने का प्रयास अपनी तरफ़ से लेखक संजीव कुमार गंगवार ने अपने उपन्यास 'B- 15 B फोर्थ फ्लोर (कहानी क्रिस्चियन कॉलोनी की' के माध्यम से किया है  अब इसमें वह कितने कामयाब या फिर असफल हुए हैं। इसके बारे में बात करने से पहले क्यों ना उपन्यास की कहानी..इसकी पृष्ठभूमि और गुण-दोषों की बात कर ली जाए?

इस उपन्यास में कहानी है दिल्ली के एजुकेशन हब माने जाने वाले इलाके मुखर्जी नगर और उसके आसपास बसे अधिकृत-अनाधिकृत इलाकों की और उनमें से भी एक खास इलाके, क्रिस्चियन कॉलोनी की जो कि दिल्ली यूनिवर्सिटी स्थित मौरिस नगर और विजय नगर के आसपास बसा है। इस उपन्यास में बातें हैं वहाँ के रहने वाले स्थानीय बाशिंदों और वहीं पर किराए पर रह कर upsc इत्यादि की तैयारी में जूझते युवा से अधेड़ होते सैंकड़ों अभ्यर्थियों की। 

 इस उपन्यास में एक तरफ़ जहाँ जगह जगह कुकुरमुत्तों के माफ़िक उगते प्रॉपर्टी डीलर नज़र आते हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ किराएदारों को ले कर मकान मालिकों के मनमाना अक्खड़ रवैया भी परिलक्षित होता है। कहीं इसमें घरेलू नौकरानियों के बढ़ते शोषण के मद्देनज़र प्लेसमेंट एजेंसीज़ के गोरखधंधे की बात दृष्टिगोचर होती दिखाई देती है। तो कहीं इसमें लार से भरे मुँह द्वारा हास्यास्पद तरीके से गुटका खाने के सही तरीके को बताने के साथ साथ  गुटखे के नामों एवं प्रकारों के आधार पर कुछ लोगों का नामकरण होता दिखाई देता है।

कहीं इसमें upsc रिज़ल्ट्स के ओपन होने के बाद की उत्सुकता.. उत्कंठा..हताशा दिखाई देती है। तो कहीं कुछ लोग डंके की चोट में स्वघोषित शैली में अग्रिम खुद के फेल होने की घोषणा करते दिखाई देते हैं। कहीं इसमें परीक्षा परिणामों के घोषित होने में निरंतर होती सालों साल की देरी युवाओं में फ्रस्ट्रेशन..असंतोष और कुंठा पैदा करती दिखाई देती है। तो कहीं गमगीन पलों को भी हँसी ठट्ठे में धुआँ उड़ाते युवा दिखाई देते हैं।

इस उपन्यास में अगर कहीं कोई क्रिकेट का इस कदर दीवाना होता दिखाई देता है कि किसी खिलाड़ी की रिटायरमेंट को ले कर आपस में शर्त तक लगाने को तैयार रहता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसी उपन्यास में कहीं कोई चोरी छुपे तो कोई खुलेआम अपनी अब तक की असफलताओं से निराश हो जगह जगह अपनी जन्मपत्री ज्योतिषी से बंचवाता फिरता है। इसी उपन्यास की कहानी में कहीं किसी को नारदमुनि बन बस इधर की उधर लगाने..याने के मुखबिरी करने में ही मज़ा आता है।

इसी उपन्यास में कहीं पीने के साफ़ पानी की किल्लत से हर कोई त्रस्त नज़र आता है। तो कहीं  कोई टिफ़िन सर्विस वालों द्वारा प्रदान किए जा रहे घटिया खाने से परेशान दिखाई देता है। कहीं इसमें मकान मालिक किराया बढ़ाने को ले कर झिकझिक करता दिखाई देता है तो कहीं इस बात को ले कर रोष उमड़ता दिखाई देता है कि किराए पर कमरा देने के मामले में मकान मालिक, नार्थ ईस्ट के अभ्यर्थियों को ज़्यादा तरजीह देते हैं।

इसी उपन्यास में कहीं बरसों तलक परीक्षाओं में असफल रहने वाले अधेड़ हो चुके युवा अपने गांव..घर और आस पड़ोस के लोगों के तानों से परेशान और व्यथित दिखाई देते है। तो कहीं वही सब एक दूसरे को सांत्वना देते..उनके संबल बनते..हिम्मत ना हारने की प्रेरणा देते दिखाई देते हैं।

कहीं इसमें दिल्ली की पहली बारिश के बहाने से जगह जगह होते जलभराव और सरकारों की अकर्मण्यता पर कटाक्ष नज़र आता है। तो कहीं इसमें पर्यावरणीय मसलों को ले कर होने वाले सम्मेलनों की सार्थकता पर सवाल उठता दिखाई देता है। कहीं इसमें देश की हर समस्या के मूल में निरंतर बढ़ती जनसंख्या पर चिंता जताई जाती है। तो कहीं इसी उपन्यास में भारत पाक संबन्धों में नई सुगबुगाहट अभ्यर्थियों में बेचैनी भरती नज़र आती है कि अब नए सिरे से उन्हें भारत पाक संबंधों से संबंधित सभी अव्ययों को भी आने वाली परीक्षाओं के मद्देनज़र पढ़ना होगा।

इसी उपन्यास में कहीं सरकारी लालफीताशाही के चलते निरंतर परीक्षाओं में होते विलंब और उससे युवाओं में उत्पन्न होती हताशा की बात की गई है। 
कहीं इस उपन्यास में UPSC में पारदर्शिता की कमी की बात की गयी है तो कहीं इसमें अचानक जोड़ दी गयी C-SAT की परीक्षा से चिंतित और बौखलाए हुए हिंदी पट्टी के अभ्यर्थी नज़र आते हैं।
कहीं इसमें पात्रों के बजाय लेखक खुद सीधे सीधे देश की व्यवस्था(?) के प्रति अपने मन की भड़ास निकालता नज़र आता है। 
 
 इसी उपन्यास में कहीं मूक जानवरों के प्रति प्रेम उमड़ता दिखाई देता है तो कहीं दिल्ली के सुप्रसिध्द निर्भया कांड में लिप्त अपराधियों के प्रति जनमानस में रोष..चिंता..हताश और आक्रोश उत्पन्न होता दिखाई देता है।

तबियत से बिखरे बेतरतीब चरित्रों से लैस इस उपन्यास में कहीं-कहीं व्यंग्य की हल्की झलक या सुगबुगाहट दिखाई देती है जो 300 पेजों के इस बड़े उपन्यास में कहीं कहीं राहत के छींटों के रूप में मुस्कुराहट के पल ले कर आती है। पढ़ते वक्त अनेकों जगह पर लगा कि पाठकों के सब्र का इम्तिहान लेते हुए लेखक उनसे अपनी यादाश्त..अपनी स्मृति का लोहा मनवाना चाहता है कि कितनी गलियां.. कितने चौराहे..कितने मोहल्ले..कितने मकान..कितनी सड़कें..कितने दुकानदार..कितने रेहड़ी पटरी वाले..कितने फ्लोर..कितने मकान मालिक..कितने पड़ोसी..कितने यार-दोस्त..कितने किराएदार इत्यादि सब का सब उसे याद है। 

 पेज नंबर 72 पर लिखा दिखाई दिया कि..

" वैसे उनका रिकॉर्ड बेहद शानदार व गौरवशाली है लेकिन अपने समदर्शी व्यक्तित्व के चलते कभी-कभी 'कचरा' (या उनके शब्दों में सुंदर लड़की) भी उठा लाते हैं।"

यहाँ किसी लड़की या महिला के लिए 'कचरा' शब्द का इस्तेमाल करना बतौर लेखक एवं पाठक मुझे सही नहीं लगा।

किसी भी उपन्यास में हर बात का..घटना का वर्णन कहानी को आगे बढ़ाने में अगर उपयुक्त साबित हो..तभी उसकी सार्थकता है। महज़ हँसी ठट्ठे के लिए पेज काले करना किसी भी परिस्थिति में तर्कसंगत या जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। 
भले ही रोचकता बढ़ाने के लिहाज़ से लेखक ने कुछ जगहों पर कुछ मनोरंजक घटनाओं को जोड़ने का अपनी तरफ़ से प्रयास किया है लेकिन कहानी की थीम या कॉन्टैक्स्ट के हिसाब से उनका अप्रासंगिक होना थोड़ी उकताहट पैदा करता है।

इस किताब में एक दो नहीं बल्कि अनेकों ऐसे उदाहरण देखने को मिले जिनका किताब में खामख्वाह के पेज भरने के अलावा और कोई मतलब नहीं था। उदाहरण के तौर पर पृष्ठ नंबर 211 पर लिखा दिखाई दिया कि..

[" मारू अपनी टेबल के सामने रखी हुई कुर्सी पर बैठा हुआ अपने अध्ययन कार्य में व्यस्त है। वह पूरी एकाग्रचित्तता के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था का अध्ययन कर रहा है। अचानक दीवार पर एक मकड़ी आ गई है। मारू उसकी तरफ देखता भर है और चुपचाप पढ़ने लगता है। मकड़ी धीरे-धीरे टेबल के पास वाले दीवार के भाग की ओर आ जाती है। मारू अपने पैन से दीवार को खटखटा देता है। मकड़ी भाग जाती है। थोड़ी देर बाद मकड़ी फिर उसी जगह पर वापस आ जाती है। वह एक बार फिर दीवार को खटखटा देता है। मकड़ी फिर भाग जाती है। थोड़ी देर बाद मकड़ी वापस उसी जगह की और आने लगती है। मारु बेचैन हो जाता है। वह फिर से मकड़ी को भगा देता है।"]

अभी गनीमत ये समझिए कि 3 पैराग्राफ़ के इस  मकड़ी प्रसंग का सिर्फ एक तिहाई हिस्सा ही मैंने यहाँ दिया है जबकि पूरा का पूरा चैप्टर ही मकड़ियों और चींटियों की बस बात कहता है। 

इसी तरह पेज नंबर 169 पर लिखा दिखाई दिया कि..

["हालात तो यह है कि संसार के सबसे युवा देश के युवाओं की स्थिति सोचनीय हो चुकी है।"]

यहाँ 'हालात' के बजाय 'हालत' आएगा और 'सोचनीय' के बजाय 'शोचनीय'। 

बेशक काल्पनिक और नाटकीय ही सही मगर पूरे उपन्यास के तंत या सार के रूप में सपने में देखा गया कोर्ट रूम ड्रामा प्रभावित करता है जिसमें एक तरह से पूरे उपन्यास की कहानी..उसका मर्म समाहित है।

अमूमन कोई भी लेखक अपने लेखन के मोह में इस कदर ग्रस्त होता है कि उसे लगने लगता है कि जो उसने लिख दिया..वही 'ब्रह्म वाक्य' हो गया..वही कालजयी हो गया लेकिन यकीन मानिए अपने लेखन पर आँखें मूंद कर यकीन करना ही हम लेखकों को सफल नहीं होने दे रहा। किसी भी सफल लेखक में लेखक से पहले एक निर्दयी संपादक का होना बेहद ज़रूरी है जो अपने ही लिखे को बार बार काट छाँट कर संपादित करने के बाद ही उसे पाठकों के समक्ष रखे। 

बतौर सजग पाठक एवं खुद के एक लेखक होने के नाते मेरा यह मानना है कि इस 300 पृष्ठीय उपन्यास का फिर से संपादन होना बेहद ज़रूरी है। अगर अनावश्यक घटनाओं..चरित्रों एवं बार बार रिपीट होने वाली बातों को अगर इस उपन्यास से हटा दिया जाए तो मूल कहानी को आराम से एक अच्छे पठनीय उपन्यास के रूप में लगभग 150-170 पृष्ठों में आसानी से समेटा जा सकता है।

उम्मीद है कि मेरी बात को अन्यथा ना लेते हुए लेखक दिए गए सुझावों को उपन्यास के आगामी संस्करणों तथा आने वाली नयी किताबों की रचना प्रक्रिया के दौरान अम्ल में लाएँगे। 

हालांकि यह उपन्यास मुझे लेखक की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि 300 पृष्ठीय इस उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है साहित्य संचय ने और इसका मूल्य रखा गया है 330/- रुपए जो कि कंटैंट को देखते हुए मुझे ज़्यादा लगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

अटकन चटकन- वंदना अवस्थी दुबे

क़ुदरती तौर पर कुछ चीज़ें..कुछ बातें...कुछ रिश्ते केवल और केवल ऊपरवाले की मर्ज़ी से ही संतुलित एवं नियंत्रित होते हैं। उनमें चाह कर भी अपनी मर्ज़ी से हम कुछ भी फेरबदल नहीं कर सकते जैसे...जन्म के साथ ही किसी भी परिवार के सभी सदस्यों के बीच, आपस का रिश्ता। हम चाह कर भी अपने माता-पिता या भाई बहनों को बदल नहीं सकते कि...

"हे!...मेरे परवरदिगार...है!...मेरे मौला, ये पिता या माँ अथवा भाई या बहन हमें पसंद नहीं। इन्हें बदल कर आप हमें दूसरे अभिभावक या भाई-बहन दे दीजिए।"

साथ ही हर व्यक्ति की पैदाइश के साथ ही ऊपरवाले द्वारा उसका स्वभाव...उसकी आदतें वगैरह भी सब तयशुदा मंज़िल की तरफ बढ़ने के लिए भेज दी जाती हैं कि वह मीठा...मिलनसार..दूसरों की मदद को तत्पर रहने वाला निकल कर सबका जीवन खुशमय करेगा अथवा कड़वा...कसैला...शंकालु एवं झगड़ालू बन के सबका जीवन नर्क बनाता हुआ हराम करेगा। इस बार ऐसे ही अटकते चटकते रिश्ते और एकदम विपरीत स्वभाव की दो बहनों की दास्तान पढ़ने को मिली मुझे प्रसिद्ध साहित्यकार वंदना अवस्थी जी के उपन्यास "अटकन चटकन" में।

जी!...हाँ...आपने सही सुना "अटकन चटकन"। अभी हाल फिलहाल ही एक फ़िल्म आयी है इसी...याने के "अटकन चकटन" के ही नाम से जिसे बनाया है प्रसिद्ध संगीत निर्देशक ए आर रहमान ने। वो कहते हैं ना कि...दुनिया गोल है। क्या ग़ज़ब का संयोग बनाया है ऊपरवाले ने? और मज़े की बात ये देखिए कि फ़िल्म की शुरुआत में ही एक किताब दिखाई देती है जिसका नाम भी हमारी वाली किताब की ही भांति "अटकन चटकन" है। यकीन मानिए कि बस नाम के अलावा कुछ भी समान नहीं है...सब का सब अलग है।

चलिए!...अब बात करते हैं इसकी कहानी की तो कहानी कुछ यूँ है कि एक ही परिवार में जन्मी दो बहनों की शक्ल सूरत और स्वभाव एक दूसरे से एकदम भिन्न है। एक को जहाँ ऊपरवाले ने दुनियां जहां की खूबसूरती की नेमत बक्शी है तो वहीं दूसरी तरफ दूसरी बहन शक्ल औ सूरत क्या...सीरत के मामले में भी उससे एकदम भिन्न। 

ऐसे में तो भय्यी...आप कुछ भी कह लो...थोड़ी बहुत ईर्ष्या..जलन तो बनती ही है...इसमें कोई शक नहीं लेकिन हद दर्ज़े की नफरत? ना बाबा ना...इसे तो भय्यी हम किसी भी कीमत पर जायज़ नहीं ठहरा सकते।

चलो!...माना कि बचपन बड़ा भोला होता है। गुस्से के मारे हो जाता है कि एक ने शरारत की और दूसरे की उसी वक्त...उसी के सामने...ढंके की चोट पर धड़ाधड़ बोलते हुए चुगली कर शिकायत लगा दी कि...इस बाबत मैनें तो जो करना था..कर दिया। अब तू देख तमाशा। तमाशे तो भय्यी उस छुटकी ने इतने किए...इतने किए कि बस पूछो मत। आए दिन घर के कभी बड़ों से तो कभी स्कूल में अध्यापकों से खामख्वाह में कानाफूसी करते इधर उधर की इतनी चुगलियाँ कि बड़की बेचारी कभी इहां डाँट खाएं तो कभी उहां आँसू बहा..रो..रो आँख सुजाए।

आँखें सुजाने में तो चुटकी का भी भय्यी बस पूछो मत। क्या ग़ज़ब रो रो के अपनी आँखें सुजाती कि सब उसको सच्चा और बड़की को झूठा मान..बड़की को ही गरियाते रहते और बड़की बेचारी..ना चूं...ना चां...ना हूँ हाँ, बस छुप छुप के अकेले में सुबक सुबक रोती रहती।

कहते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ सब में समझ आ जाती है। अब अगर सच में आ जाती तो क्या बात थी। छुटकी का अब भी वही रोना धोना...वही नौटंकी..वही लटके झटके। हद तो इस बात की कि बड़की के उसके प्रति किए गए हर अच्छे काम में उसको कोई ना कोई साजिश नज़र..कोई ना कोई खोट नज़र आता। अब कोई उससे साजिश कर साफ़ बच के निकल जाए, ऐसा भला कैसे हो सकता था? बदले में वो अपनी कुंठाओं के चलते साजिशों..चालों का अंबार लगा देती। 

पढ़ते वक्त सोचा कि चलो...ब्याह के जब दोनों अपने अपने घर चली जाएँगी तो उनके साथ साथ हमें भी चैन आ जाएगा। मगर चैन कहाँ भला अपनी किस्मत में लिखा था? बड़की की मति फिर गयी जो उसी को अपनी जेठानी बना अपनी ही ससुराल में..अपनी ही छाती पे मूंग ढलने को ला बैठी कि... चलो!...बचपन तो इसका जैसे तैसे बीता...बाकी की जून ही कम से कम सुधर जाए। उसका कुछ सुधर या संवर जाए? वो भी बड़की के हाथों? ये भला छुटकी को कैसे मंज़ूर होता? हो गया नए सिरे से शुरू फिर वही नौटंकी..वही साजिशों का दौर।

कहानी...यूँ समझ लो कि शुरू से अंत तक बस मज़ेदार ही मज़ेदार है। अब सारी किस्सागोई अगर मैनें यहीं कर दी तो भय्यी इतनी बढ़िया किताब फिर पढ़ेगा कौन? शिक्षा...रोजगार और महिला सशक्तिकरण जैसे कई मुद्दों को अपने में समेटे इस लघु उपन्यास में बस इतना समझ लो कि एकदम से समय और पैसे..दोनों की फुल्ल बटा फुल्ल वसूली है। 

अब आप कहेंगे कि डायबिटीज़ के ज़माने में यहाँ तो सब मीठा ही मीठा हो गया। बैलेंस के लिए कम से कम थोड़ा बहुत नमकीन तो हो। अब वैसे तो कुछ खास नमकीन है नहीं मेरे झोले में मगर अब जब इतने प्यार से आप ज़िद कर ही रहे हैं तो वह भी लीजिए।

पूरे उपन्यास में स्थानीयता के पुट के चलते बुंदेलखंडी भाषा का खूब धड़ल्ले से इस्तेमाल हुआ है और यही इस्तेमाल शुरू में थोड़ा मेरी दुविधा का कारण भी बना। ये तो शुक्र मनाओ मेरे स्टाफ और बॉलीवुड की उन तमाम फिल्मों का जिनमें बुंदेलखंडी या फिर उससे मिलती जुलती भाषाओं का प्रयोग किया गया। मेरा तो चलो..जैसे तैसे गुज़ारा करते हुए काम चल गया मगर ये सोचो कि बुंदेलखंडी या ऐसी ही अन्य किसी भाषा को बिल्कुल भी ना जानने वाले हिंदी किताबों के शौकीन पाठकों का क्या होगा? कैसे वो किसी कहानी या उपन्यास के असली मर्म याने के भीतरी तहों तक पहुँच पाएँगे?

वैसे..एक सुझाव है तो सही कि या तो ऐसे संवादों को हिंदी मिश्रित स्थानीय भाषा में लिखा जाए। या फिर दो किरदारों में से कम से कम एक किरदार स्थानीय भाषा के बजाए हिंदी में बात करे। एक अन्य  तरीका यह भी हो सकता है कि स्थानीय भाषा के सभी संवादों के हिंदी अनुवाद भी साथ साथ दिए जाएँ।

संग्रहणीय क्वालिटी के इस 88 पृष्ठीय लघु उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है शिवना पेपरबैक्स ने और इसका मूल्य महज़ ₹125/- रखा गया है जो कि किताब की क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए बहुत ही कम है। आने वाले सुखद भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

छाप तिलक सब छीनी- सुनीता सिंह

कहते हैं कि हर तरह की शराब में अलग अलग नशा होता है। किसी को पीते ही एकदम तेज़ नशा सोडे की माफ़िक फटाक से सर चढ़ता है जो उतनी ही तेज़ी से उतर भी जाता है। तो किसी को पीने के बाद इनसान धीरे धीरे सुरूर में आता है और देर तक याने के लंबे समय तक उसी में खोया रहता है। कुछ इसी तरह की बात किताबों को ले कर भी कही जा सकती है। कुछ किताबें शुरुआती दो चार पृष्ठों में ही पाठक को अपने रंग में रंग लेती हैं और किताब के समाप्त होने तक उसके ध्यान..उसकी एकाग्रता..उसकी तवज्जो को उससे दूर नहीं होने देती लेकिन बाद में उस किताब का हमारी स्मृति में कहीं कोई अता पता नहीं होता । वहीं दूसरी तरफ़ कुछ ऐसी भी किताबें होती हैं जो पहली बार में बेशक उतना व्यापक असर नहीं छोड़ पाती लेकिन उन्हें दूसरी या तीसरी बार याने के बार बार पढ़ने का मन करता है और हर बार अलग आनंद..अलग तजुर्बा..अलग नशा उनसे हासिल होता है। 

दोस्तों..आज मैं एक ऐसी ही याने के एक टिकाऊ किताब, जो कि एक कहानी संकलन है, 'छाप तिलक सब छीनी' का जिक्र करने जा रहा हूँ जिसे बहुत ही कम अंतराल में मैंने कम से कम दो बार पढ़ा है। इस कहानी संकलन की रचियता सुनीता सिंह हैं। 

आइए..अब बात करते हैं इस संकलन की कहानियों की तो इसकी शीर्षक कहानी आजकल के ज़माने में लिव इन के ज़रिए रिश्ता जुड़ने से पहले ही ब्रेकअप की संभावनाएं तलाशने वाली तथाकथित सोच से हट कर, उस समय की बात करती है जब किसी के दुनिया छोड़ कर चले जाने के बाद भी उसकी यादों को और उस रिश्ते की गरिमा को ताउम्र बरकरार रखा जाता था।

इसी संकलन की एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़ बताती है कि अपने बच्चों के लिए माँ की ममता सदा एक सी ही रहती है चाहे वो माँ, कोई मूक जानवर वो या फिर खुद को सभ्य मानने वाले हम मनुष्यों में से कोई एक। तो वहीं दूसरी तरफ़ किसी अन्य कहानी में कोई अपने जवानी के दिनों में किसी के द्वारा ठुकरा दिया जाता है मगर होनी के गर्भ में क्या छिपा है? यह कोई नहीं जानता। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में दहेज के लिए पैसा ना होने की वजह से एक बेहद खूबसूरत और गुणवती युवती की शादी एक एबी लड़के से कर दी जाती है। जिसकी परिणति अंततः उस युवती की आत्महत्या के साथ होती है। जो इस बात की तस्दीक करती है कि अपनों का अहित होते देख कर भी प्रत्यक्षत: दख़ल देने के बजाय तटस्थ या मूक रह कर भी हम उनका अहित ही करते हैं। तो वहीं एक अन्य कहानी में घर की इकलौती कमाऊ लड़की, घर परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझ, पूरी तरह से उनका निर्वाह कर रही है। इसी वजह से उम्र बीत जाने के बावजूद वह अपना विवाह तक नहीं करती। मगर जब उसे महज़ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझ लिया जाता है तो अंततः वह विद्रोह कर अपने सपनों को पूरा करने के लिए निकल पड़ती है। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में ब्याह की प्रथम रात्रि ही एक बहु अपने ससुर को किसी अन्य स्त्री के साथ रात के घने अंधेरे में निवस्त्र गुत्थमगुत्था होते हुए देखती है तो उसका मन वितृष्णा से भर उठता है। मगर यह देख कर वह और भी हैरान रह जाती है कि उसकी सास ने यह सब जानते..देखते..समझते और महसूस करते हुए भी मौन साधा रखा है। 

 इसी संकलन की एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़ स्त्रियों की उस छठी इंद्री की बात करती है जिसके ज़रिए उन्हें बिना किसी के कहे ही सामने वाले की मंशा..बुरी नज़र का समय से पहले ही भान हो जाता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी में 
अपने अजन्मे शिशु और नवब्याहता पत्नी को अकेला छोड़ विदेश जा बसा व्यक्ति वहीं अपना घर बसा लेता है। बरसों तलक बिना किसी संपर्क के रहने के बाद वह व्यक्ति अपनी जवान हो चुकी बेटी की शादी में वापिस लौटता है और अपनी पहली पत्नी के सामने अपने साथ विदेश चल कर साथ रहने का प्रस्ताव रखता है। मगर क्या अब पत्नी सब कुछ भुला उसके साथ चली जाएगी अथवा जाने से इनकार कर देगी?

एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़  सच का..सही का साथ देने की बात करती है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी में तीन तीन प्रतिभाशाली बेटों के होते हुए भी एकाकीपन का दंश झेलते माता पिता में से पिता एक दिन बीमारी से मर जाता है और असाध्य बीमारी से ग्रस्त माँ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर झेलते हुए बिस्तर पकड़ लेती है।

एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़ एक साथ दो विरोधी बातों को ले कर चलती है कि कहीं कोई अपने जीवनसाथी के असमय बिछुड़ने से दुखी है तो कोई अपने जीवनसाथी के साथ होने से। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी एक ऐसे मृदभाषी.. सौम्य.. केयरिंग युवक की कहानी कहती है जो दरअसल में एक सेक्सुअली परवर्ट व्यक्ति है जो अपनी पत्नी पर अमानवीय अत्याचार  कर हमेशा उसे प्रताड़ित..अपमानित करता रहता है। 

इस संकलन की कुछ कहानियाँ मुझे बढ़िया लगी जिनके नाम इस प्रकार हैं..

*अहा! ज़िन्दगी 
*एक प्रेमपत्र
*ब्याहता
*विजया
*वैलेंटाइन्स डे
*साथी! हाथ बढ़ाना
*सवाल
*टयूलिप
*कीड़े
*प्रेम ना बाड़ी उपजै

मनमोहक शैली में लिखी गयी इस संकलन की कहानियों में कहीं कहीं क्षेत्रीय भाषा के शब्दों का इस्तेमाल भी दिखा। कहानी के साथ ही अगर उनका सरल हिंदी अनुवाद भी दिया जाता तो बेहतर था। पहली कहानी कहीं कहीं थोड़ा भाषण सा देती हुई प्रतीत हुई। तो कहीं किसी कहानी में बिना किसी खास कॉनसेप्ट..लिंक..मकसद या हिंट अथवा आवश्यकता के दो छोटी कहानियाँ अपने में विपरीत मुद्दों के समाए होने के बावजूद भी आपस जुड़ी हुई दिखाई दी। 

हालांकि यह बढ़िया कहानी संग्रह मुझे प्रकाशक की तरफ़ से उपहारस्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूंगा इस बढ़िया कहानी संग्रह के 123 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है साहित्य विमर्श प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 149/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए बहुत ही जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

धोखा- सुरेन्द्र मोहन पाठक

अगर आपको कभी लगे कि जो कुछ भी आप अपनी खुली आँखों से एकदम चकाचक देख रहे हैं..कानों से साफ़ साफ़ सुन रहे हैं..उसे शिद्दत के साथ महसूस भी कर रहे है, उसी चीज़.. बात या उसी आपकी आँखों देखी घटना को हर कोई आपके मुँह पर ही सिरे से नकार रहा है..आपके  दिमाग़ का खलल कह कर सिरे से ख़ारिज़ कर रहा है..उसके वजूद से ही इनकार कर रहा है। तो सोचिए कि उस वक्त आप के दिल..आपके दिमाग ..आपके ज़हन पर क्या बीतेगी?

 क्या आपके सामने इसके सिवा और कोई चारा नहीं होगा कि आप सीधे सीधे उन्हें पागल करार दे दें? मगर सोचिए कि तब क्या होगा जब यही इल्ज़ाम..यही तोहमत लगा कर वो सब भी आपको पागल करार कर दें और दिमाग़ी संतुलन को सही करने के इरादे से किसी मनोचिकित्सक के पास जाने या सीधे एवं साफ़ तौर पर खरे खरे आपको किसी सैनिटोरियम अर्थात पागलखाने में भर्ती होने की सलाह दे डालें। 
 
दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक के 'विवेक अगाशे' सीरीज़ के एक रोचक उपन्यास 'धोखा' की। जिसे मैंने दिल्ली के दरियागंज इलाके में लगने वाले पुरानी किताबों के साप्ताहिक बाज़ार या फिर फेसबुक एवं व्हाट्सएप पर चल रहे पुरानी किताबों के किसी ग्रुप से अंदाज़न 40/- रुपए में प्राप्त किया था। 

विवेक अगाशे सीरीज़ का यह मेरे द्वारा पढ़ा गया पहला उपन्यास है। विवेक अगाशे, फौज का रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल है जो कि अब एक प्राइवेट डिटेक्टिव है और दिल्ली में ही 'क्राइम क्लब' नाम की की एक संस्था चलाता है। 

इस उपन्यास में कहानी है रोहित सूरी नाम के एक ऐसे नौकरीपेशा युवक की जो स्टॉक्स में डील करने वाली एक फर्म में बतौर असिस्टेंट कार्यरत है। एक दिन फर्म के एक महत्त्वपूर्ण बुज़ुर्ग क्लाइंट की उनके दफ़्तर के सामने ही उस वक्त बस के नीचे आ.. कुचले जाने से मौत हो जाती है जब वो दफ़्तर से फर्म के इंचार्ज के साथ बाहर घर जाने के लिए निकला था। इस घटना के बाद रोहित सूरी के साथ कुछ ऐसी घटनाएँ घटने लगती हैं कि जैसे कोई युवती दारुण हालत में उसे मदद के लिए पुकार रहा है। कभी उसे खून से लथपथ कोई लाश दिखाई देती है या फिर बुरी तरह से  घायल कोई युवती उससे मदद की गुहार लगाती दिखाई देती है। मगर हैरानी की बात यह कि पुलसिया तफ़्तीश में ना कभी कोई लाश मिलती है और ना ही कोई घायलावस्था में तड़पती युवती। यहाँ तक कि पुलसिया जाँच  में भी ऐसी किसी वारदात के होने का कोई संकेत तक नहीं मिलता। 

क्या यह सब उसके मन का वहम या महज़ ख्याली पुलाव भर था? या फिर इन सारी घटनाओं के पीछे खुद उसी की कोई गहरी साजिश? क्या एक के बाद एक कंफ्यूज़न क्रिएट करती इन तमाम गुत्थियों को विवेक अगाशे सुलझा पाएगा? या फिर वह भी पुलिस की ही तरह इनमें उलझ कर रह जाएगा? यह सब जानने के लिए तो आपको इस तेज़ रफ़्तार उपन्यास को पूरा पढ़ना पड़ेगा।

हालांकि लेखक की प्रतिष्ठानुसार उपन्यास में ज़्यादा पेंचों से भरी कहानी के ना होने की वजह से मन थोड़ा मायूस हुआ लेकिन बेहतरीन क्लाइमैक्स ने इस कमी की तरफ़ ज़्यादा ध्यान नहीं जाने दिया। 

348 ओरिष्ठीय इस तेज़ रफ़्तार बढ़िया उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को राजा पॉकेट बुक्स ने 2009 में छापा था और तब इसका मूल्य 60/- रुपए रखा गया था। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।


कबूतर का कैटवॉक- समीक्षा तैलंग

आमतौर पर यादों के गलियारे से जब भी हमें कभी गुज़रने का मौका मिलता है तो अनायास ही हमें वह सब याद आने लगता है जो जीवन की तमाम दुश्वारियों एवं आपाधापी के बावजूद हमारे ज़हन में अपने होने की कोई ना कोई अमिट छाप छोड़ चुका है। इसमें यायावरी के चलते घुमंतू किस्से..पुराने स्कूल-कॉलेज या बचपन के दिन भी हो सकते हैं। एक तरफ़ जहाँ आम इनसान उन्हें याद कर बस मुस्कुरा भर लेता है तो वहीं दूसरी तरफ़ कोई हम जैसा लिखने-पढ़ने का शौक़ीन उन्हें कलमबद्ध कर हमेशा हमेशा के दस्तावेजी सबूत के रूप में एक जगह इकट्ठा कर लेता है यानी के किताब के रूप में छपवा लेता है। ऐसे ही कुछ अविस्मरणीय पलों..यात्राओं और प्रकृति प्रेम से जुड़ी बातों..यादों का पिटारा ले कर हमारे बीच लेखिका/व्यंग्यकार समीक्षा तैलंग अपने संस्मरणों के संकलन 'कबूतर का कैटवॉक'  के ज़रिए हमारे बीच आयी हैं।

उनके इस संकलन में उनके अबुधाबी के प्रवास के दौरान हर शुक्रवार याने के छुट्टी के दिनों की समुद्र किनारे उनकी बैठकी का विवरण मिलता है। जिसके ज़रिए आसानी से पता चलता है कि वे किस कदर बढ़िया पारखी नज़र की स्वामिनी हैं। इस संकलन के ज़रिए उनके प्रकृति प्रेम एवं मूक जानवरों..पक्षियों..पेड़-पौधों से उनके लगाव और उनकी विलुप्त होती जनसंख्या के प्रति चिंता झलकती है।

इस संकलन में लेखिका कहीं पेड़-पौधों..पक्षियों से इस तरह बातें करती हुई प्रतीत होती हैं मानों सालों के तजुर्बे और अपनी निश्छलता की वजह से वे उनकी भाषा..उनकी बोली समझने लगे गयी हों।
उनके संस्मरणों में कहीं अबुधाबी के साफ़ सुथरे..उजले धवल समुद्र तट नज़र आतें हैं तो कहीं अंतर्मन के ज़रिए लेखिका समुद्र के नीचे की रेत और रंग बिरंगे शैवालों से होते हुए भीतर बहुत भीतर तक की यात्रा करती नज़र आती है।

कहीं इसमें अबुधाबी के सबसे पुराने थिएटर और वहाँ होने वाले संगीत कार्यक्रमों और नाटकों का जिक्र आता है। तो कहीं इसमें वहाँ की सेहतमंद बिल्लियों की बातें दिखाई पड़ती हैं। इसी संकलन में कहीं वहाँ के कड़क कानूनों और अनुशासनप्रिय नागरिकों की बात नज़र आती है तो कहीं अबुधाबी में रहने वाले स्थानीयों एवं विदेशियों में भारतीय खाने के प्रति दीवानगी का वर्णन नज़र आता है। वैसे ये और बात है कि आमतौर पर उन्हें रोटी को प्लेट के बजाय हाथ से ही एक एक बाइट ले कर कुतरते तथा सीधे कढ़ाही से ही सब्ज़ी खाते हुए देखा जा सकता है।

 इस संकलन में कहीं वहाँ के सैण्ड ड्यूंस(रेगिस्तान) में फोर व्हीलर बाइक्स और जीप सफ़ारी होती दिखाई देती है तो कहीं शारजाह से अजमान, फ़ुजैरह के सफ़र के दौरान सड़क किनारे उम्दा ईरानी एवं टर्किश कालीनों से सजी दुकाने नज़र आती हैं। कहीं पौधों की नर्सरी पर पौधों को खरीदने को आतुर भीड़, मेले की भीड़ जैसी नज़र आती है तो कहीं किसी खास इलाके में सख्त कानून होने की वजह से मोबाइल द्वारा ली गयी फोटोज़ एवं सेल्फियों को पुलिस अफ़सरों द्वारा डिलीट करवा दिया जाता हैं। 

कहीं वहाँ के पैट्रोल स्टेशनों पर बने फ़ूड कोर्ट और शॉपिंग स्टोर्स की बात नज़र आती है जिनमें 'चाय' का आर्डर देने पर देसी चाय पेश की जाती है और 'टी' का आर्डर देने पर चाय की विभिन्न वैरायटियों मसलन..'इंग्लिश, हर्बल, 'अरेबिक टी' या किसी भी अन्य प्रकार की चाय के बारे में पूछा जाता है। 

उनके नज़रिए से समुद्री यात्रा के दौरान कहीं कुदरती अजूबे के रूप में बीच समुद्र के बीचों बीच समतल ज़मीन और पहाड़ का टुकड़ा दिखाई देता है। तो कहीं समुद्र का पानी वक्त..जगह और मौसम के हिसाब से रंग बदलता दिखाई देता है। कहीं इसमें किनारे बैठ समुद्री नज़ारों का आनंद लेते लोग दिखाई देते हैं तो कहीं हर्षित मन और उल्लास के बीच बदन झुलसाती गर्मी  में समुद्री पानी में डुबकी लगा..उधम मचाते सैलानी दिखाई देते हैं।

कहीं इसमें धाऊ(क्रूज़) की मनमोहक यात्रा के ज़रिए बेहतरीन समुद्री नज़ारों का वर्णन देखने को मिलता तो कहीं अबुधाबी घूमने गए भारतीय सैलनियों का बॉलीवुद के प्रति अगाध प्रेम दृष्टिगत होता है। कहीं  इसमें सैलानियों के, देश बदला..भेस बदला की तर्ज पर, कपड़े छोटे होते चले जाते हैं। तो कहीं इसमें अबुधाबी की कृत्रिम बारिश याने के क्लाउड सीडिंग की बात आती है। 

कहीं इसमें वहाँ की बड़ी बड़ी बिल्डिंगों की हर तीन महीनों में शैंपू सरीखे मैटीरियल से चमकाने की बात आती है तो कहीं इसमें अबुधाबी के मौसम बिगड़ने पर घर से बाहर ना निकलने की ताकीद करते हुए मोबाइल मैसेजेस और घनघना कर बजते अलार्मों का जिक्र होता दिखाई देता है।

कहीं इस संकलन में वहाँ की मक्खन जैसी मुलायम सड़कों पर फ़र्राटे भरती लग्ज़री गाड़ियाँ दौड़ती दिखाई देती हैं तो कहीं इसमें राजनीति और चुनावों जैसी बातों से कोसों दूर रह, सड़कें अपनी मौज में बनती.. संवरती नज़र आती हैं। कहीं हमारे यहाँ के प्रदूषण और शोरशराबे से आज़िज़ आ..विलुप्त हो चुकी गौरैया वहाँ..अबुधाबी में मस्ती से बेफिक्र हो..दाना चुगती नज़र आती है तो कहीं छोटे बड़े..सब के सब स्विमिंग और फिशिंग का आनंद लेते नज़र आते हैं। 

इसी संकलन में कहीं कबूतरों की मस्तानी चाल,..रूप रंग और भावभंगिमा समेत उनकी गर्दन पर अनेक खूबसूरत रंगों का मनमोहक वर्णन नज़र आता है तो कहीं पार्क में खेलते छोटे बच्चों के साथ उन्हीं के दादा नानी सब उनका ध्यान रखते नज़र आते हैं। कहीं इस संग्रह में लेखिका के भीतर का व्यंग्यकार जाग्रत हो.. दिन पर दिन बढ़ते कंक्रीट के जंगलों पर चिंता जताता दिखाई देता है तो कहीं हज़ारों लाखों कटते पेड़ों के मद्देनज़र इनसान की ज़मीन लोलुपता पर कटाक्ष होता नज़र आता। 

कहीं इसमें कौवों, कबूतरों..गौरैयाओं आदि के अलग अलग झुण्डों में इकट्ठे हो बैठने से उत्पन्न होने वाली सुगबुगाहट की तुलना सरकार गिराने और बचाने की प्रक्रिया के दौरान सत्तापक्ष और विपक्षी दलों के अलग अलग धड़ों की होने वाली आपसी खुसफुसाहट से होती नज़र आती है। तो कहीं अमीरों के महँगे शौक 'बंजी जंपिंग' और गरीब मज़दूरों के पैर बाँध कर ऊँची बिल्डिंगों से लटकते हुए पलस्तर करने की प्रक्रिया के बीच आपस में तुलना पढ़ने में आती है। 

इसी संकलन में कहीं किसी संस्मरण में लेखिका अपने घर औचक पधारे अल्प आयु के जैन मुनि और उनके कठोर अनुशासन की बात करती हैं तो अपने किसी अन्य संस्मरण में अपने घर परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिल कर त्योहार मनाने की परंपरा की बात करती हैं।

प्रकृति प्रेम और घुमक्कड़ी की बातों से भरी इस किताब में कुछ जगहों पर वर्तनी की छोटी छोटी त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना होना थोड़ा खला। इसके अतिरिक्त पेज नंबर 61 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'पिछले हफ्ते से लेकर आज सुबह तक के अखबारों में एयरपोर्ट की अटाटूट भीड़ का जिक्र था जो हमें  पूरे एयरपोर्ट पर कहीं मिली ही नहीं।'

यहाँ 'अटाटूट' के बजाय 'अटूट' आना चाहिए।

हालांकि यह किताब मुझे उपहारस्वरूप मिली लेकिन अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूंगा कि 127 पृष्ठीय इस संकलन के पेपरबैक संस्करण को छापा है भावना प्रकाशन ने और इसका मूल्य 200 रुपए रखा गया है। आने वाले उज्जवल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को बहुत बहुत बधाई।

गांधी चौक- डॉ. आनंद कश्यप

किसी भी देश की व्यवस्था..अर्थव्यस्था एवं शासन को सुचारू रूप से चलाने में एक तरफ़ जहाँ सरकार की भूमिका बड़ी ही विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण होती है। अब ये और बात है कि वह भूमिका आमतौर पर थोड़ी विवादित एवं ज़्यादातर निंदनीय होती है। वहीं दूसरी तरफ़ सरकार की इच्छानुसार तय की गयी सही/ग़लत योजनाओं..परियोजनाओं और कानूनों का खाका बनाने..संवारने और उन्हें अमली जामा पहनाने में उच्च पदों पर आसीन नौकरशाहों का बहुत बड़ा हाथ होता है। 

इस तरह की उच्च पदों वाली महत्त्वपूर्ण सरकारी नौकरियों के प्रति देश के पढ़े लिखे नौजवानों में एक अतिरिक्त आकर्षण रहता है जो कि पद की गरिमा एवं महत्ता को देखते हुए स्वाभाविक रूप से जायज़ भी है।  साथ ही सोने पे सुहागा ये कि उन्हें गाड़ी..बंगला..सलाम ठोंकने एवं मातहती की क्षुद्धापूर्ति हेतु अनेकों नौकर चाकर भी बिना खर्चे के..बिन मांगें मुफ़्त ही मिल जाते हैं। 

अब जिस नौकरी के साथ इतने मन लुभावने आकर्षण एवं ख्वाब जुड़े होंगे तो स्वाभाविक ही है कि उस क्षेत्र में कोशिश करने वाले अभ्यर्थियों के बीच प्रतियोगिता भी उसके हिसाब से ही तगड़ी याने के अत्यधिक कठिन होगी। वजह इस सब के पीछे बस यही कि अफसरशाही से भरे इस दौर में नौकरशाहों का बोलबाला है। सब उन्हीं को..उनकी बड़ी कुर्सी को सलाम ठोंकते..उसी के आगे पीछे घूमते और उसी के आगे अपने शीश नवाते हैं। 

दोस्तों..आज सिविल परीक्षा और उससे जुड़ी बातें इसलिए कि आज मैं डॉ. आनंद कश्यप के द्वारा इसी विषय पर लिखे गए उनके उपन्यास 'गांधी चौक' की बात करने जा रहा हूँ। इस उपन्यास में कहानी है मध्यप्रदेश के विभाजन से बने छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर में स्थित एजुकेशन हब याने के गाँधी चौक इलाके में बने कोचिंग सेंटर्स एवं बतौर पी.जी आसपास के इलाके में दिए जाने वाले खोखेनुमा दड़बों की।

छत्तीसगढ़ राज्य की पृष्ठभूमि पर पनपती इस गाथा में कहीं कोई विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष कर शनै शनै मंथर गति से आगे बढ़ रहा है। तो कहीं कोई जंग जीतने के बावजूद भी निराशा और तनाव की वजह से अवसाद में आ..जीती हुई बाज़ी भी अनजाने में हार बैठता है। 

इस उपन्यास में एक तरफ़ कहानी है गरीबी समेत अनेक दुश्वारियों..दिक्कतों एवं परेशानियों से जूझते सैकड़ों..हज़ारों युवाओं के पनपते..फलीभूत होते सपनों की। इसमें बातें हैं तमाम तरह की मेहनत और कष्ट झेल आगे बढ़ने का प्रयास करते युवाओं के नित ध्वस्त होते सपनों एवं धराशायी होती उनकी उच्च महत्त्वाकांक्षाओं की। इसमें कहानी है हताशा से जूझने..लड़ने और हारने के बावजूद नयी राह..नयी मंज़िल तलाश खुद में नयी आभा..नयी ऊर्जा..नयी संभावनाएं खोजने एवं उन्हें तराश कर फिर से उठ खड़े होने वालों की। 

इस उपन्यास में कहीं कॉलेज की मस्तियाँ.. चुहलबाज़िययां..नोकझोंक एवं झड़प दिखाई देती है। तो कहीं कोई मूक प्रेम में तड़पता खुद को किसी के एक इशारे में बदल डालने को आतुर दिखाई देता है। इसमें कहीं कोई पद की गरिमा को भूल अहंकार में डूबा दिखाई देता तो कहीं कोई किसी के एक इशारे..एक आग्रह को ही सर्वोपरि मान खुद को न्योछावर करता दिखाई देता है।

कहीं इसमें मज़ेदार ढंग से शराबियों की विभिन्न श्रेणियों का संक्षिप्त वर्णन दिखाई देता है तो कहीं
सरकारी अस्पतालों में फैली अव्यवस्था और उनकी दुर्दशा की बात दिखाई देती है। इस उपन्यास में कहीं हल्के व्यंग्य की सुगबुगाहट चेहरे पर मुस्कान ले आती है। तो कहीं इसमें बतौर कटाक्ष, भारतीय रेलों के कम देरी से पहुँचने पर इसे एक उपलब्धि के रूप में लिया जाता दिखाई देता है। कहीं इसमें दबंगई के दम पर दूसरे की दुकान/मकान पर जबरन कब्ज़े होता दिखाई देता है। तो कहीं हल्के फुल्के अंदाज़ में पंडित जी की बढ़ी तोंद से उनकी फुल टाइम पंडिताई का अंदाज़ा लगाया जाता दिखाई देता है।

कहीं बेरोज़गारी के चलते छोटे भाई से घर के बाकी सदस्यों की बेरुखी नज़र आती है। तो कहीं मरे व्यक्ति की जेबें टटोलते..गहने उतारते नज़दीकी रिश्तेदार दिखाई देते हैं।

इस उपन्यास को पढ़ते वक्त एक जगह चाय वाले को एक चाय के पैसे ना देने पर चाय वाले समेत भीड़ का किसी को पीट देना थोड़ा नाटकीय लगा। तो वहीं पेज नंबर 106 पर लिखा दिखाई दिया कि..

'अशवनी स्टेशन से चलकर अपने गाँव की ओर जाने वाली बस में बैठ गया। बस पगडंडियों से होकर गुजर रही थी।'

यहाँ यह गौरतलब बात है कि पगडंडी से पैदल गुज़रा जाता है ना कि उनसे बस।

उपन्यास में कहीं कहीं लेखक एक ही पैराग्राफ में कभी वर्तमान में तो भूतकाल में 'था' और 'है' शब्द के उपयोग से जाता दिखा। भाषा भी कहीं कहीं औपचारिक होने के नाते थोड़ी उबाऊ भी प्रतीत हुई। जिसे सरस वाक्यों एवं गंगाजमुनी भाषा के माध्यम से रोचक बनाया जा सकता था। साथ ही कहानी कभी सूत्रधार याने के लेखक के माध्यम से आगे बढ़ती दिखी तो कभी अपने पात्रों के माध्यम से। बेहतर होता कि शुरुआत में कहानी के सूत्रधार के माध्यम से शुरू करने के बाद पूरी कहानी को अगर पात्रों की ज़ुबानी ही बताया जाता। 

उपन्यास में कुछ जगहों पर छत्तीसगढ़ी भाषा में संवाद आए हैं। उनका सरल हिंदी अनुवाद भी अगर साथ में दिया जाता तो बेहतर था। कुछ जगहों पर वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना किया जाना..थोड़ा खला। उपन्यास में अनेक जगह ऐसे छोटे-छोटे कनेक्टिंग वाक्य दिखाई दिए जिन्हें आसानी से आपस में जोड़ कर एक प्रभावी एवं असरदार वाक्य बनाया जा सकता था। 

इस 200 पृष्ठीय उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है हिन्दयुग्म ब्लू ने और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए जो कि जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

अक्षरों की मेरी दुनिया - विपिन पवार

समाज में अपटुडेट रहने के लिए ज़रूरी है कि हमें देश दुनिया की हर अहम ख़बर या ज़रूरी बात की सही एवं सटीक जानकारी हो। मगर बहुधा यह जानकारी थोड़ी नीरस और उबाऊ प्रवृति की होती है। जिसकी वजह से वह जानकारी या अहम बात आम जनमानस पर अपना समुचित प्रभाव नहीं छोड़ पाती। मगर वही जानकारी अगर रोचक एवं आसान शब्दों में हमारी जिज्ञासा को संतुष्टि के मुकाम पर ले जाए तो हम खुद ही और अधिक जानने..समझने के लिए प्रेरित होते हैं। 

दोस्तों..आज इस तरह की जानकारी भरी बातें इसलिए कि आज मैं आपके सामने ऐसी ही रोचक एवं ज़रूरी जानकारी से लैस किताब 'अक्षरों की मेरी दुनिया' की बात कर रहा हूँ। जिसके लेखक विपिन पवार हैं। इस किताब में एक तरह से उन्होंने अपने संस्मरणों..अपने अनुभवों एवं अपनी घुमक्कड़ी के किस्सों को निबंध के रूप में एक जगह एकत्र किया है।

रेल मंत्रालय में बतौर निदेशक(राजभाषा) कार्यरत विपिन पवार जी की इस किताब के ज़रिए पता चलता है कि उन्हें अध्यन एवं पठन पाठन का काफ़ी शौक है। किताब के लिए लिखे गए लेखों के अंत में दिए गए संदर्भ स्रोतों के ज़रिए भी इस बात की तस्दीक एवं पुष्टि होती है। 

 इस किताब में बातें हैं 1865 में जन्मी उस आनंदी बाई जोशी की जिसे भारत की पहली महिला डॉक्टर होने का खिताब प्राप्त है।  जिन्हें घर..समाज और रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद उनके अनुशासनप्रिय मगर गुस्सैल पति ने पढ़ने के लिए अमेरिका भेजा। वहाँ जा कर उन्होंने डॉक्टर की डिग्री हासिल तो कर ली मगर अफ़सोसजनक बात ये है कि मानवता की सेवा करने से पहले ही 21 साल की छोटी उम्र में ही आनंदी बाई की मृत्यु हो गयी थी क्योंकि बीमार पड़ने पर भारत के डॉक्टरों ने उनका इलाज महज़ इसलिए नहीं किया कि उन्होंने परदेस जा कर पढ़ने की जुर्रत की और अंग्रेज डॉक्टरों ने इसलिए उनका इलाज नहीं किया कि उन्होंने हिंदू धर्म छोड़ ईसाई धर्म को अपनाने से इनकार कर दिया था।

इसमें बातें है बाघों के सरंक्षण के लिए मशहूर महाराष्ट्र के सबसे पुराने एवं बड़े ताडोबा नैशनल पार्क की खूबसूरती एवं विशेषताओं की। इसमें बातें हैं सरकारी दफ़्तरों में राजभाषा हिंदी के प्रचार..प्रसार एवं इस्तेमाल में आने वाली बाधाओं..समस्याओं और उनके समाधान की। 

 इस किताब में बातें हैं बुक बाइंडिंग करने एवं अखबारें बेचने वाले पुणे के 103 वर्षीय विश्वप्रसिद्ध युवा गोखले बुवा और मैराथन दौड़ सहित अनेक अन्य क्षेत्रों में उनके बनाए एक से बढ़ कर एक कीर्तिमानों की। इसमें बातें हैं पुराने किलों..सहकर्मियों..और मुक्तिबोध की कविताओं की। इस संकलन में बातें हैं छत्रपति शिवाजी महाराज के जासूस 'बहिर्जी नाइक' और उनके गुप्तचरों के सामूहिक कौशल एवं अद्वितीय प्रयासों की। जिनकी कार्य कुशलता एवं सटीकता की वजह से शिवाजी महाराज को दुश्मन से होने वाली मुठभेड़ से पहले ही उसकी सेना..युद्धकौशल..लड़ने की क्षमता एवं कमज़ोरियों की पूरी जानकारी मिल जाती थी।
 
इस किताब में बातें हैं सम्मोहक समुद्र तटों..जंगलों और खेत खलियानों की। इसमें बातें हैं पहाड़ों की ऊंचाइयों और समुद्र की गहराई में अटखेलियाँ करते पर्यटकों से भरे महाराष्ट्र के देखे..अनदेखे पर्यटनस्थलों की। इस संकलन में बातें हैं मुंबई की गगनचुंबी इमारतों और वहाँ की प्राचीन गुफाओं एवं प्राचीरों की। इसमें बातें हैं कंप्यूटर को आसान बनाते कीबोर्ड शॉर्टकटों के साथ साथ लेखक के लिखे संपादकीयों की। इसमें बातें हैं इंद्रायणी नदी और हाथरस की खासियतों की। 

कुछ जगहों पर या जहाँ कहीं भी किताब में आँकड़ों की बात आती थी तो आम पाठक के नज़रिए से मेरे ज़हन में ये अहम सवाल उठ खड़ा हुआ  कि..ये सब आँकड़े मेरे या किसी भी आम अन्य पाठक के भला किस काम के? क्या किताब को छपवाने का लेखक का तात्पर्य या मंतव्य महज़ अपने अब तक के लिखे गए लेखों के मात्र दस्तावेजीकरण ही है?

कुछ जगहों पर वर्तनी की छोटी छोटी त्रुटियों के अतिरिक्त जायज़ जगहों पर भी नुक्तों का प्रयोग ना होना थोड़ा खला। इसके अतिरिक्त पेज नंबर 49 पर लिखा दिखाई दिया कि...

'मुंबई के उपनगर कल्याण में उन्होंने फ्लैट खरीदा उस समय का मनोरंजन वाक्य याद आता है।'

यहाँ 'मनोरंजन' के बजाय 'मनोरंजक' आना चाहिए था।

कंप्यूटर संबंधी जानकारी से जुड़े एक अध्याय में Shift+Delete ऑप्शन को दो अलग अलग पेज 85 और 86 में दे दिया गया है।

उम्दा कागज़ पर छपी इस 111 पृष्ठीय किताब के हार्ड बाउंड संस्करण को छापा है प्रलेक प्रकाशन, मुंबई ने और इसका मूल्य रखा गया है 300/- रुपए। जो कि आम पाठकीय नज़रिए से ज़्यादा है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

#समीक्षा #राजीव_तनेजा #प्रलेक_प्रकाशन #विपिन_पवार

चोरों की बारात- सुरेन्द्र मोहन पाठक

अगर आप परदेस के किसी होटल में बंद कमरे के भीतर बेसुध हो कर रात में सो रहे हों और अचानक नींद टूटने पर आप पलंग से उठें और आपको पता चले कि आपके पैरों के नीचे समतल ज़मीन नहीं बल्कि एक लाश है। तो मेरे ख्याल से आप खुद ही समझ सकते हैं कि उस वक्त ज़हनी तौर पर आपकी दिमाग़ी हालत कैसी होगी? 

दोस्तों..आज मैं बात कर रहा हूँ थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक के एक रौंगटे खड़े कर देने वाले तेज़ रफ़्तार उपन्यास 'चोरों की बारात' की। उपन्यास पर आगे बढ़ने से पहले सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के थ्रिलर उपन्यासों के बारे में एक ज़रूरी बात कि उनके पुराने उपन्यासों के प्रति लोगों में इतनी दीवानगी अब भी है कि लोग उन्हें, उन पर छपे मूल्य से भी कहीं अधिक दे कर खरीदने..संजोने को आतुर रहते हैं। वैसे दाव लगे की बात ये है कि इस उपन्यास को मैंने शायद दिल्ली के दरियागंज वाले पुरानी किताबों के बाज़ार से 50/- या 60/- रुपए का खरीदा था। फेसबुक और व्हाट्सएप पर पुराने उपन्यासों के कुछ ग्रुप चल रहे हैं। वहाँ से यह उम्दा उपन्यास आपको जायज़ कीमत पर भी मिल सकता है। वैसे.. जानकारी के लिए बता दूँ कि अमेज़न पर तीन अन्य उपन्यासों के साथ यह उपन्यास 3999/- रुपए में बेचा जा रहा है। 
 
इस समीक्षा के शुरुआती पैराग्राफ़ से ही आप आसानी से समझ सकते हैं कि जिस उपन्यास का आगाज़ ही ऐसा है तो उसका अंजाम कैसा सनसनीखेज.. रोमांचक.. रौंगटे खड़े कर देने वाला होगा? 

चलिए..अब ज़्यादा बातें ना करते हुए फिर से इस रोचक उपन्यास की कहानी पर आते हैं।
बंद कमरे में लाश मिलने के तुरंत बाद उस कमरे में रुके सुधीर कोहली पर जानलेवा हमला कर उसे बेहोश कर दिया जाता है। सुधीर कोहली, जो कि दरअसल भारत का एक प्राइवेट जासूस है और अपने क्लाइंट की घर से भागी नाबालिग बेटी को, थाइलैंड से बरामद कर लेने के बाद उसे, उसके पिता को सुरक्षित सौंपने के इरादे से नेपाल के उस होटल में रुका हुआ है। 

बीती रात सुधीर पर हमला करने वाला कौन था? क्या इस कत्ल और हमले के पीछे 'कृष' याने के मीरा के ज़माने की उस दुर्लभ कृष्ण मूर्ति की चोरी की घटना का हाथ था जो  कि अपनी खासियतों की वजह से दुनिया में सिर्फ़ एक इकलौती और बेशकीमती है। सिंगापुर से चोरी हुई उस बेशकीमती मूर्ति को वापिस पाने के लिए एक तरफ़ जहाँ उसका मालिक चीनी माफ़िया की मदद लेता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ मूर्ति को ढूँढने..वापिस पाने और हथियाने के चक्कर में लगातार होते खूनखराबे और साजिश से लैस इस बेहद रोमांचक उपन्यास में मूर्ति के बदले करोड़ों की रकम ऑफर करने वाला मिस्टर लोबो आख़िर कौन हैं? क्या जान के दुश्मन बन चुके चीनी माफ़िया और मिस्टर लोबो के गुर्गों से सुधीर कोहली खुद को बचा पाएगा। या तीन तीन कत्लों के जुर्म में सुधीर की पूरी ज़िंदगी बतौर मुजरिम नेपाल की जेलों में बीतेगी?

इन सब रहस्यों को जानने के लिए तो आपको कदम कदम पर चौंकाते इस बेहद ही उम्दा उपन्यास को शुरू से अंत तक..पूरा पढ़ना होगा। 286 पेज के इस 2012 में छपे बढ़िया उपन्यास को छापा है राजा पॉकेट बुक्स ने और इस पर उस समय का मूल्य 80/- रुपए अंकित है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

#समीक्षा #राजीव_तनेजा #सुरेन्द्र_मोहन_पाठक

बम बम भोले- विनोद पाण्डेय

व्यंग्य लेखन एक तरह से तेल से तरबतर सड़क पर नपे तुले अंदाज़ में संभली..संतुलित एवं सधी हुई गति से गाड़ी चलाने के समान है। ज़्यादा तेज़ हुए तो रपटे..फिसले और धड़ाम। ज़्यादा धीमे हुए तो वहीं खड़े खड़े रपटते..लटपटाते हुए फिर से धड़ाम। 

दोस्तों...आज व्यंग्य की बातें इसलिए कि आज मैं बात करने जा रहा हूँ कवि /व्यंग्यकार विनोद पाण्डेय जी के व्यंग्य संग्रह 'बम बम भोले' और उसमें छपे उनके व्यंग्यों की। इनके  व्यंग्यों को पढ़ कर हम आसानी से जान सकते हैं कि लेखक अपने आसपास के माहौल और ताज़ातरीन ख़बरों को समझने...जांचने और उनमें से अपने मतलब की माल निकाल लेने में माहिर एवं मंजे हुए खिलाड़ी हैं। उनकी व्यंग्य रचनाओं में कहीं किस्सागोई शैली की झलक मिलती है तो कहीं बतकही के रूप में इतनी सहजता से वे अपनी...अपने मन की बात कह जाते हैं कि बरबस ही पढ़ने वाले के चेहरे पर एक महीन सी मुस्कराहट तैर जाती है| 

इस संकलन के किसी व्यंग्य में रावण , बीमार पड़ने की वजह से रामलीला को एन बीच मंझधार में छोड़ ग़ैरहाज़िर होता नज़र आता है। इससे उपजी परिस्थितियों में एक तरफ़ रामलीला में मची अफरातफरी है तो दूसरी तरफ़ उसके चंदे में होने वाले घोटालों का जिक्र है। इसी संकलन के एक अन्य व्यंग्य में चेपू टाइप के साहित्यकारों पर गहरा कटाक्ष नज़र आता है कि किस तरह खुद को महान साबित करने के लिए वे क्या क्या जतन करते हैं।

इसी संकलन के किसी व्यंग्य में कहीं वैलेंटाइन की भेड़चाल में छोटा बड़ा..हर कोई फँसा नज़र आता है। तो कहीं किसी अन्य व्यंग्य में देवता समान अतिथि का आतिथ्य भूल..उसे घर के बाहर आवारा कुत्ते के संग सुलाया जा रहा है। कहीं किसी व्यंग्य में आपाधापी भरी आजकल की व्यस्त ज़िन्दगी के मद्देनज़र काम और मौज के बीच वर्क लाइफ बैलेंस के बहाने संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है।

कहीं किसी व्यंग्य में टीवी और उसके टी आर पी के खेल का झोलझाल नज़र आता है तो किसी अन्य व्यंग्य में मंगल ग्रह पर पानी की उपलब्धता सुर्खियाँ बटोरती नज़र आती है। किसी अन्य व्यंग्य में आजकल के तथाकथित पत्रकारों और उनकी पत्रकारिता की बात नज़र आती है। तो कहीं कहीं किसी व्यंग्य में चुनावों के दौरान विरोधियों का सूपड़ा साफ़ करने का मंसूबा बाँधा जा रहा है। कहीं किसी रचना में लेखक फेयर एंड लवली कम्पनी के गुण गाता दिखा तो किसी अन्य व्यंग्य में सेब की महिमा का बखान करता भी दिखा।

कहीं कंजूसी और शातिरपने की पराकाष्ठा के रूप में किसी व्यंग्य में प्लेटफार्म पर समोसे तथा ट्रेन में सूप बिकता दिखा। तो कहीं सदाबहार जींस और उसके दिन प्रतिदिन फटते फैशन सेंस की बात होती दिखाई देती है। इसी संकलन में कहीं शेरों और बाघों की विलुप्त होती प्रजाति पर चिंता जताई जाती दिखाई देती है। तो किसी अन्य व्यंग्य के माध्यम से लोकतंत्र में तमाम तरह की उठापटक के माध्यम से चुनावी दंगल में विरोधियों का सूपड़ा साफ़ होता दिखता है।

इस बात की तारीफ़ करनी होगी कि अपनी तरफ़ से लेखक उस भेड़चाल से भरसक बचता दिखाई दिया जिसके अंतर्गत किसी की खिंचाई या बात में से बात निकाल..उसे शब्दों में पिरोने के हुनर को ही मात्र व्यंग्य मान पाठकों के समक्ष परोस दिया जाता है। 

लेखक विनोद पाण्डेय के शहरों..कस्बों और शहरीकृत गांवों के किरदारों को ले कर मज़ेदार..आसान भाषा में रचे गए इस संकलन के व्यंग्य गहरी चोट या टीस देने के बजाय हलकी सी गुदगुदी या मुस्कुराहट बस पाठकों को दे संतोष कर लेते हैं। कुछ व्यंग्य मंच पर हास्यात्मक भाषण या मूल रचना पाठ से पहले की..मौसम या मूड बनाने की प्रक्रिया जैसी भूमिका बनाते अधिक लगे। बतौर सजग पाठक एवं एक लेखक/व्यंग्यकार होने के नाते मुझे इस संकलन के व्यंग्य आम औसत व्यंग्य से लगभग दुगने बड़े और खिंचे हुए भी लगे। जिस पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है।

कुछ एक जगहों पर छोटी छोटी वर्तनी की त्रुटियों के अतिरिक्त कुछ एक ऐसे व्यंग्य लेख भी दिखे जिनमें बस नाम मात्र को व्यंग्य या फिर कहीं कहीं तो वह भी नदारद दिखा। साथ ही कुछ व्यंग्यों को पढ़ते वक्त महसूस हुआ कि उनमें मामूली फेर बदल कर के उनके एक के बजाय दो व्यंग्य आसानी से बन सकते थे। किसी किसी व्यंग्य में तो व्यंग्य के शीर्षक तक पहुँचने में ही एक से डेढ़ पेज तक खर्च कर दिया गया। इन्हें एक तरह से व्यंग्य कम और संस्मरण टाइप बतकही जो सुनने में बढ़िया लगती है, कहा जाए तो बेहतर होगा। 

*पेज नम्बर 71 के एक व्यंग्य में लेखक दोनों हाथों में ब्रीफकेस ले, रेलगाड़ी में चढ़ते वक्त अपनी ही बात को काटता दिखाई दिया। इसमें वे लिखते हैं कि...

'ऊपर से ठंड में पसीना ऐसे निकल रहा था जैसे अभी अभी गंगा स्नान करके निकले हैं।'

इसकी अगली ही पंक्ति के बीच में लिखा दिखाई दिया कि..

'घर से लेकर ऑफिस तक एसी में पसीना का भी कई दिन से दम घुट रहा था।'

अब अगर ठंड का मौसम है तो दफ़्तर में ए.सी नहीं चलने चाहिए या फिर ठंड के बजाय मौसम गर्मी का है।

इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि..लंबे और एकरसता से भरे व्यंग्य/लेख को पाठक गंभीरता से पढ़ने के बजाय उन पर सरसरी नज़र दौड़ाता हुआ आगे बढ़ने की सोचता है, लेखक को चाहिए कि वे अपने व्यंग्यों की लंबाई कम करने के साथ साथ उन्हें और अधिक मारक..क्रिस्प और तीखाबनाने का प्रयास करें।

आकर्षक कवर डिज़ायन और बढ़िया पेज पर छपा यह व्यंग्य संकलन हालांकि मुझे उपहार स्वरूप मिला। मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि इस 108 पृष्ठीय व्यंग्य संग्रह के पेपरबैक संस्करण को छापा है सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा और इसका मूल्य रखा गया है 150/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

फुगाटी का जूता- मनीष वैद्य

जब कभी ज़माने की विद्रूपताएं एवं विसंगतियां हमारे मन मस्तिष्क को उद्वेलित कर उसमें अपना घर बनाने लगती हैं तो हताशा और अवसाद में जीते हुए हम में से बहुत से लोग अपने मन की भड़ास को कभी आपस में बोल बतिया कर तो कभी चीख चिल्ला कर शांत कर लिया करते हैं। इसके ठीक विपरीत कोई लेखक या फिर कवि ह्रदय जब इस तरह की बातों से व्यथित होता है तो अपने मन की भावनाओं को अमली जाम पहनने के लिए वो शब्दों का...अपनी लेखनी का सहारा लेता है।


इस तरह की तमाम विसंगतियों से व्यथित हो जब कोई कलमकार अपनी बात...अपनी व्यथा...अपने मनोभावों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए अपनी कलम उठाता है तो स्वत: ही उसकी लेखनी में वही बात...वही क्रोध...वही कटुता...वही हताशा स्वतः ही परिलक्षित होने लगती है। 

दोस्तों...आज मैं बात कर रहा हूँ प्रसिद्ध कहानीकार मनीष वैद्य जी के कहानी संकलन 'फुगाटी का जूता' की। निरंतर होती तरक्की के बीच पिछड़ते चरित्रों...उनके दुखों..उनके संघर्षों को संजीदगी से ज़ुबान देती हैं मनीष वैद्य जी के इस संग्रह की कहानियाँ।

 इसको पढ़ते वक्त मुझे अपनी एक पुरानी कविता की कुछ पँक्तियाँ स्वतः ही  याद आ गयी...

"सोने नहीं देती है 
दिल की चौखट पे..
ज़मीर की ठकठक
उथल पुथल करते 
विचारों के जमघट
जब बेबस हो...
तमाशाई हो
देखता हूँ अन्याय हर कहीं"



उनके इस संकलन की किसी कहानी में आज के इस यूज़ एंड थ्रो वाले  युग में पुराने सामान की मरम्मत करने वालों का दर्द और उनकी व्यथा दिखाई देती है तो किसी कहानी में बूढ़ी हो चुकी आँखों के ज़रिए भारत-पाकिस्तान से जुड़ी पुरानी यादों को फिर से  जीते हुए ताज़ा किया गया है। इसी संग्रह की एक अन्य कहानी में बात है किसी बड़े नेता के किसी पिछड़े इलाके में होने वाले दौरे और उसकी वजह से संपूर्ण अफसरशाही और मीडिया में मची घालमेल मिश्रित अफरा तफरी की। इसमें बात है अफसरशाही के द्वारा आनन फानन में इलाके को जैसे तैसे चमकाने को ले कर होने वाली कवायद की। इसमें बात है गरीब आदमी की बात को कुचलने...उसे गंभीरता से ना लेते हुए उसका माखौल उड़ा...उसे दबाने की।

इस संग्रह में बात है फौजी अफसर और आदिवासी लड़की के प्रेम और फिर विवाह की। इसमें बात है पुरानी चिट्ठियों के ज़रिए अपनापन महसूसते बूढ़े झुर्रीदार चेहरे की। इसमें बात है चिट्ठी की बाट जोहती बूढ़ी आँखों और उसकी हताशा की। इसमें बात है फौज द्वारा शहीद घोषित किए जा चुके फौजी के इंतज़ार की।

इस संग्रह की कहानी 'फुगाटी का जूता' में बात है 'उलटे बाँस बरेली' कहावत को चरितार्थ करने और नई-पुरानी पीढ़ी की सोच में आते बदलाव की तो किसी कहानी में बात है बुंदेलखंड के ओरछा के राजा जूदेव के बेटों जुझार सिंह और हरदौल की। इसमें बात है कान के कच्चे जुझार सिंह के अपनी पत्नी चंपावती और भी हरदौल को ले कर उत्पन्न हुए शक की। इसमें बात है भाभी का मान बचाने को अपनी जान देने वाले हरदौल की। 

इस संग्रह की किसी कहानी में बात है खुद को भीड़ से अलग...ऊँचा मानने और फिर इस सबका भ्रम टूटने की। तो किसी कहानी में बात है मृत करार दिए जा चुके व्यक्ति के खुद को ज़िंदा साबित करने की जद्दोजहद और टूटते रिश्तों के ज़रिए होते विश्वास के हनन की। 

इसमें बात है मशीनीकरण और आधुनिकीकरण के ज़रिए तररकी की राह पर बढ़ रहे देश और उसमें निरंतर बेरोज़गार होते हाथ के हुनरमंद लोगों की व्यथा की। इसमें बात है चलतेपुर्ज़े लोगों के जुगाड़ के ज़रिए राजनीति में उतरने और झूठे वायदों के दम पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने की। 

इसमें बात है गरीबी हटाने के नाम पर सरकार द्वारा दलितों/भूमिहीनों में बाँटे जा रहे भूमि के पट्टों और इस खेल के सारे गोरखधंधे की। इसमें बात है तानाशाह के अत्याचारों और बग़ावती सुरों की। इसमें बात है तरक्की की राह पर समय के साथ बदलते गांवों और साथ ही बदलते लोक व्यवहार से भौंचक हुए एक निराश बूढ़े और उसकी ज़िद की। 

लेखक की भाषा प्रवाहमयी एवं किस्सागोई शैली की है। पढ़ते वक्त आप कहानी के साथ..उसकी रौ में बहते चले जाते हैं इस पूरे संग्रह की कहानियों को पढ़ते वक्त मैंने नोट किया कि ज़्यादातर कहानियों में दुःख...अवसाद और निराशा की बात है। कहानियों की विषय सामग्री और उनके ट्रीटमेंट से पता चलता है कि लेखक, ज़माने के तौर तरीके, चलन तथा व्यवस्था से खासा नाराज़ है। एक तरह से हम कह सकते हैं कि वैश्वीकरण के इस युग में सरकारी नीतियों और ज़माने भर से मोहभंग हुए लोगों का कहानी संग्रह है 'फुगाटी का जूता'। लेखक से निवेदन है कि पूरे संग्रह में निराशा और अवसाद की कहानियों के साथ अगर साकारात्मता का पुट लिए हुए भी कुछ कहानियाँ और होती तो उनका यह संग्रह और भी ज़्यादा दमदार होता।

132 पृष्ठीय बढ़िया क्वालिटी के इस उम्दा कहानी संग्रह के पेपरबैक संस्करण को छापा है बोधि प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है मात्र ₹120/- जो कि बहुत जायज़ है। कम कीमत पर एक बढ़िया कहानी संग्रह उपलब्ध कराने के लिए लेखक तथा प्रकाशक को बहुत बहुत बधाई। आने वाले सुखद भविष्य के लिए दोनों को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

बन्द दरवाज़ों का शहर- रश्मि रविजा


अंतर्जाल पर जब हिंदी में लिखना और पढ़ना संभव हुआ तो सबसे पहले लिखने की सुविधा हमें ब्लॉग के ज़रिए मिली। ब्लॉग के प्लेटफार्म पर ही मेरी और मुझ जैसे कइयों की लेखन यात्रा शुरू हुई। ब्लॉग पर एक दूसरे के लेखन को पढ़ते, सराहते, कमियां निकालते और मठाधीषी करते हम लोग एक दूसरे के संपर्क में आए। बेशक एक दूसरे से हम लोग कभी ना मिले हों लेकिन अपने लेखन के ज़रिए हम लोग एक दूसरे से उसके नाम और काम(लेखन) से अवश्य परिचित थे। ऐसे में जब पता चला कि एक पुरानी ब्लॉगर साथी और आज के समय की एक सशक्त कहानीकार रश्मि रविजा जी का नया कहानी संग्रह "बन्द दरवाज़ों का शहर" आया है तो मैं खुद को उसे खरीदने से रोक नहीं सका। 

धाराप्रवाह शैली से लैस अपनी कहानियों के लिए रश्मि रविजा जी को विषय खोजने नहीं पड़ते। उनकी पारखी नज़र अपने आसपास के माहौल से ही चुन कर अपने लिए विषय एवं किरदार खुदबखुद छाँट लेती है। दरअसल... यतार्थ के धरातल पर टिकी कहानियों को पढ़ते वक्त लगता है कि कहीं ना कहीं हम खुद उन कहानियों से...किसी ना किसी रूप में खुद जुड़े हुए हैं। इस तरह के विषय हमें सहज...दिल के करीब एवं देखे भाले से लगते हैं। इसलिए हमें उनके साथ, अपना खुद का संबंध स्थापित करने में किसी किस्म की कोई परेशानी नहीं होती। आइए!...अब बात करते हैं उनके इस कहानी संग्रह की।

इस संकलन की एक कहानी में सपनों की बातें हैं कि हर जागता.. सोता इंसान सपने देखता है मगर सपने अगर सच हो जाएँ तो फिर उन्हें सपना कौन कहेगा? अपने सपनों के पूरा ना हो पाने की स्थिति में अक्सर हम अपने ही किसी नज़दीकी के ज़रिए अपने सपने के पूरे होने की आस लगा बैठते हैं। ऐसे में अगर हमारा अपना ही...हमारा सपना तोड़ चलता बने तो दिल पर क्या बीतती है? 

बचपन की शरारतें..झगड़े,  कब बड़े होने पर हौले हौले प्रेम में बदल जाते हैं...पता ही नहीं चलता। पता तब जा के चलता है जब बाज़ी हाथ से निकल चुकी या निकल रही होती है। ऐसे में बिछुड़ते वक्त एक कसक...एक मलाल तो रह ही जाता है मन में और ज़िंदगी भर हम उम्मीद का दामन थामे..अपने प्यार की बस एक झलक देखने की आस में बरसों जिए चले जाते हैं।

इस संकलन की एक अन्य कहानी में कॉलेज के समय से एक दूसरे के प्रेम में पड़े जोड़े के सामने जब जीवन में कैरियर बनाने की बात आती है तो अचानक ही पुरुष को अपने सपनों...अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के सामने स्त्री की इच्छाएँ...उसकी भावनाएँ गौण नज़र आने लगती हैं। ऐसे में क्या स्त्री का उस पुरुष के साथ बने रहना क्या सही होगा?
इसी संकलन की एक दूसरी कहानी में नशे की गर्त में डूबे युवा की मनोस्थिति का परत दर परत विश्लेषण है कि किस तरह  घर में किसी नयी संतान के जन्म के बाद पहले वाली संतान कुदरती तौर पर माँ- बाप की उपेक्षा का शिकार होने लगती है। ऐसे में उसे बहकते देर नहीं लगती और नौबत यहाँ तक पहुँच जाती है कि स्थिति , लाख संभाले नहीं संभालती। जब तक अभिभावक चेतते हैं बात बहुत आगे तक बढ़ चुकी होती है।

इसी संकलन की किसी कहानी में स्कूल की मामूली जान पहचान बरसों बाद कॉलेज की रीयूनियन पार्टी फिर से हुई मुलाकात पर प्यार में बदलने को बेताब हो उठती है। तो किसी कहानी में मैट्रो शहरों में खड़ी ऊँची ऊंची अट्टालिकाओं के बने कंक्रीट जंगल में सब इस कदर अपने कामों में व्यस्त हो जाते हैं कि किसी को किसी की सुध लेने की फुरसत ही नहीं होती। ऐसे में घरों में बचे खुचे लोग अपनी ज़िंदगी में स्थाई तौर पर बस चुकी बोरियत से इतने आज़िज़ आ जाते हैं कि सुकून के कुछ पलों को खोजने के लिए किसी ना किसी का साथ चाहने लगते हैं कि जिससे वे अपने मन की बात...अपने दिल की व्यथा कह सकें मगर हमारा समाज स्त्री-पुरुष की ऐसी दोस्ती को भली नज़र से भला कब देखता है?

इस संकलन की किसी कहानी में पढ़ाई पूरी करने के तीन साल बाद भी बेरोज़गारी की मार के चलते आस पड़ोस एवं नाते रिश्तेदारों के व्यंग्यबाणों को झेल रहे युवक की कशमकश उसका बनता काम बिगाड़ देती है। तो किसी कहानी में इश्क में धोखा खा चुकने के बाद, ब्याह में भी असफल हो चुकी युवती के दरवाजे पर फिर से दस्तक देता प्यार क्या उसके मन में फिर से उमंगे जवां कर पाता है? 

इसी संकलन की एक कहानी इस बात की तस्दीक करती है कि...हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती। दरअसल हम इंसानों को जो हासिल होता है, उसकी हम कद्र नहीं करते और जो हासिल नहीं होता, उसे पाने...या फिर उस जैसा बनने के लिए तड़पते रहते हैं। 

नयी बहु बेशक घर की जितनी भी लाडली हो लेकिन उसके विधवा होते ही उसको ले कर सबके रंग ढंग बदल जाते हैं और उसका दर्जा मालकिन से सीधा नौकरानी का हो उठता है। ऐसे में शारीरिक तथा मानसिक यंत्रणा झेलती उस स्त्री के जीवन में राहत के क्षण तभी आते हैं जब उसके अपने बच्चे लायक निकल आते हैं।

अच्छी नीयत के साथ देखे गए सपने ही जब बदलते वक्त के साथ नाकामयाबी में बदलने लगे और अपनों द्वारा ही जब उनकी...उनकी सपने की कद्र ना की जाए तो कितना दुख होता है। ऐसे में प्रोत्साहन की एक हलकी सी फुहार भी मन मस्तिष्क को फिर से ऊर्जावान कर उठती है।

इस कहानी संकलन में कुल 12 कहानियाँ हैं।  रश्मि रविजा जी की भाषा शैली ऐसी है कि एक बार शुरू करने पर वह खुद कहानी को पढ़वा ले जाती है। आखिर की कुछ कहानियाँ थोड़ी भागती सी लगी। उन पर थोड़ा तसल्लीबख्श ढंग से काम होना चाहिए था। काफ़ी जगहों पर अंग्रेज़ी तथा हिंदी के कुछ शब्द आपस में जुड़े हुए लगे जैसे:

जाकर, पाकर, लाकर, पीकर,भरकर, कसकर इत्यादि। मुझे लगता है कि सही शब्द में शब्द से  'कर' अलग लिखा जाना चाहिए। अब पता नहीं मैं सही हूँ या नहीं लेकिन मुझे इस तरह लिखे गए शब्द थोड़ा अखरे। कुछ जगहों पर अंग्रेज़ी शब्दों को इस तरह लिखा देखा कि उसके मायने ही बदल रहे थे जैसे..एक जगह लिखा था 'फिलिंग वेल' जिसका शाब्दिक अर्थ होता है कुएँ को भरना लेकिन असल में लेखिका कहना चाहती है 'फीलिंग वैल'-feeling well). एक जगह अंग्रेज़ी शब्द 'आयम' दिखाई दिया जिसे दरअसल 'आय एम' या फिर 'आई एम' होना चाहिए था। खैर!...ये सब छोटी छोटी कमियां हैं जिन्हें आने वाले संस्करणों तथा नयी किताबों में आराम से दूर किया जा सकता है।

180 पृष्ठों के इस कहानी संकलन के पेपरबैक संस्करण को छापा है अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली ने और इसका मूल्य रखा गया है ₹225/- जो कि किताब की क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

अभ्युदय-1- नरेंद्र कोहली(समीक्षा)

मिथकीय चरित्रों की जब भी कभी बात आती है तो सनातन धर्म में आस्था रखने वालों के बीच भगवान श्री राम, पहली पंक्ति में प्रमुखता से खड़े दिखाई देते हैं। बदलते समय के साथ अनेक लेखकों ने इस कथा पर अपने विवेक एवं श्रद्धानुसार कलम चलाई और अपनी सोच, समझ एवं समर्थता के हिसाब से उनमें कुछ ना कुछ परिवर्तन करते हुए, इसके किरदारों के फिर से चरित्र चित्रण किए। नतीजन...आज मूल कथा के एक समान होते हुए भी रामायण के कुल मिला कर लगभग तीन सौ से लेकर एक हज़ार तक विविध रूप पढ़ने को मिलते हैं। इनमें संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण सबसे प्राचीन मानी जाती है। इसके अलावा अनेक अन्य भारतीय भाषाओं में भी राम कथा लिखी गयीं। हिंदी, तमिल,तेलुगु,उड़िया के अतिरिक्त  संस्कृत,गुजराती, मलयालम, कन्नड, असमिया, नेपाली, उर्दू, अरबी, फारसी आदि भाषाएँ भी राम कथा के प्रभाव से वंचित नहीं रह पायीं।

राम कथा को इस कदर प्रसिद्धि मिली कि देश की सीमाएँ लांघ उसकी यशकीर्ति तिब्बत, पूर्वी तुर्किस्तान, इंडोनेशिया, नेपाल, जावा, बर्मा (म्यांम्मार), थाईलैंड के अलावा कई अनेक देशों तक जा पहुँची और थोड़े फेरबदल के साथ वहाँ भी नए सिरे से राम कथा को लिखा गया। कुछ विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि ग्रीस के कवि होमर का प्राचीन काव्य इलियड, रोम के कवि नोनस की कृति डायोनीशिया तथा रामायण की कथा में अद्भुत समानता है। राम कथा को आधार बना कर अमीश त्रिपाठी ने हाल फिलहाल में अंग्रेज़ी भाषा में इस पर हॉलीवुड स्टाइल का तीन भागों में एक वृहद उपन्यास रचा है तो हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार श्री नरेन्द्र कोहली भी इस अद्भुत राम कथा के मोहपाश से बच नहीं पाए हैं।

दोस्तों.... आज मैं बात करने जा रहा हूँ श्री नरेन्द्र कोहली द्वारा रचित "अभ्युदय-1" की। इस पूरी कथा को उन्होंने दो भागों में संपूर्ण किया है। इस उपन्यास में उन्होंने  देवताओं एवं राक्षसों को अलौकिक शक्तियों का स्वामी ना मानते हुए उनको आम इंसान के हिसाब से ही ट्रीट किया है। 

उनके अनुसार बिना मेहनत के जब भ्रष्टाचार, दबंगई तथा ताकत के बल पर कुछ व्यक्तियों को अकृत धन की प्राप्ति होने लगी तो उनमें नैतिक एवं सामाजिक भावनाओं का ह्रास होने के चलते लालच, घमंड, वैभव, मदिरा सेवन, वासना, लंपटता तथा दंभ इत्यादि की उत्पत्ति हुई। अत्यधिक धन तथा शस्त्र ज्ञान के बल पर अत्याचार इस हद तक बढ़े कि ताकत के मद में चूर ऐसे अधर्मी लोगों द्वारा सरेआम मारपीट तथा छीनाझपटी होने लगी। अपने वर्चस्व को साबित करने के लिए राह चलते बलात्कार एवं हत्याएं कर, उन्हीं के नर मांस को खा जाने जैसी अमानवीय एवं पैशाचिक करतूतों को करने एवं शह देने वाले लोग ही अंततः राक्षस कहलाने लगे।

शांति से अपने परिश्रम एवं ईमानदारी द्वारा जीविकोपार्जन करने के इच्छुक लोगों को ऐसी राक्षसी प्रवृति वालों के द्वारा सताया जाना आम बात हो गयी। आमजन को ऋषियों के ज्ञान एवं बौद्धिक नेतृत्व से वंचित रखने एवं शस्त्र ज्ञान प्राप्त करने से रोकने के लिए शांत एवं एकांत स्थानों पर बने गुरुकुलों एवं आश्रमों को राक्षसों द्वारा भीषण रक्तपात के बाद जला कर तहस नहस किया जाने लगा कि ज्ञान प्राप्त करने के बाद कोई उनसे, उनके ग़लत कामों के प्रति तर्क अथवा विरोध ना करने लगे।

वंचितो की स्थिति में सुधार के अनेक मुद्दों को अपने में समेटे हुए इस उपन्यास में मूल कहानी है कि अपने वनवास के दौरान अलग अलग आश्रमों तथा गांवों में राम,  किस तरह ऋषियों, आश्रम वासियों और आम जनजीवन को संगठित कर, शस्त्र शिक्षा देते हुए राक्षसों से लड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। पढ़ते वक्त कई स्थानों पर मुझे लगा कि शस्त्र शिक्षा एवं संगठन जैसी ज्ञान की बातों को अलग अलग आश्रमों एवं स्थानों पर बार बार घुमा फिरा कर बताया गया है। जिससे उपन्यास के बीच का हिस्सा थोड़ा बोझिल सा हो गया है जिसे संक्षेप में बता कर उपन्यास को थोड़ा और चुस्त दुरस्त किया जा सकता था। लेकिन हाँ!...श्रुपनखा का कहानी में आगमन होते ही उपन्यास एकदम रफ्तार पकड़ लेता है।

इस उपन्यास में कहानी है राक्षसी अत्याचारों से त्रस्त ऋषि विश्वामित्र के ऐसे राक्षसों के वध के लिए  महाराजा दशरथ से उनके पुत्रों, राम एवं लक्षमण को मदद के रूप में माँगने की। इसमें कहानी है अहल्या के उद्धार से ले कर ताड़का एवं अन्य राक्षसों के वध, राम-सीता विवाह, कैकयी प्रकरण, राम वनवास, अगस्त्य ऋषि एवं  कई अन्य उपकथाओं से ले कर सीता के हरण तक की। इतनी अधिक कथाओं के एक ही उपन्यास में होने की वजह से इसकी मोटाई तथा वज़न काफी बढ़ गया है। जिसकी वजह इसे ज़्यादा देर तक हाथों में थाम कर पढ़ना थोड़ा असुविधाजनक लगता है।

700 पृष्ठों के इस बड़े उपन्यास(पहला भाग) को पढ़ते वक्त कुछ स्थानों पर ऐसा भी भान होता है कि शायद लेखक ने कुछ स्थानों पर इसे स्वयं टाइप कर लिखने के बजाए किसी और से बोल कर इसे टाइप करवाया है क्योंकि कुछ जगहों पर शब्दों के सरस हिंदी में बहते हुए प्रवाह के बीच कर भोजपुरी अथवा मैथिली भाषा का कोई शब्द अचानक फुदक कर उछलते हुए कोई ऐसे सामने आ जाता है।

धाराप्रवाह लेखन से सुसज्जित इस उपन्यास को पढ़ने के बाद लेखक की इस मामले में भी तारीफ करनी होगी कि उन्होंने इसके हर किरदार के अच्छे या बुरे होने के पीछे की वजहों का, सहज मानवीय सोच के साथ मंथन करते हुए उसे तार्किक ढंग से प्रस्तुत किया है।

700 पृष्ठों के इस उपन्यास के पेपरबैक संस्करण की कीमत ₹450/- रुपए है और इसके प्रकाशक हैं डायमंड बुक्स। उपन्यास का कवर बहुत पतला है। एक बार पढ़ने पर ही मुड़ कर गोल होने लगा। अंदर के कागजों की क्वालिटी ठीकठाक है।फ़ॉन्ट्स का साइज़ थोड़ा और बड़ा होना चाहिए था। इन कमियों की तरफ ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। आने वाले भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।


 
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