B- 15 B फोर्थ फ्लोर- संजीव कुमार गंगवार

अमूमन अपनी जिंदगी में हम सैकड़ों हज़ारों लोगों को उनके नाम..उनके काम..उनकी पहचान से जानते हैं। मगर क्या वे सब के सब हमारे जीवन में इतना अधिक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं कि उन सभी का किसी कहानी या उपन्यास में असरदार तरीके से जिक्र या समावेश किया जा सके? 

मेरे ख्याल से..नहीं। ना ही ऐसा करना सही.. व्यवहारिक एवं तर्कसंगत भी होगा क्योंकि बिना ज़रूरत किसी भी कहानी में इतने अधिक किरदारों का समावेश उसे कुछ और नहीं बल्कि बस चूँ चूँ मुरब्बा ही बना देगा। मगर इसी अवधारणा को 
ग़लत साबित करने का प्रयास अपनी तरफ़ से लेखक संजीव कुमार गंगवार ने अपने उपन्यास 'B- 15 B फोर्थ फ्लोर (कहानी क्रिस्चियन कॉलोनी की' के माध्यम से किया है  अब इसमें वह कितने कामयाब या फिर असफल हुए हैं। इसके बारे में बात करने से पहले क्यों ना उपन्यास की कहानी..इसकी पृष्ठभूमि और गुण-दोषों की बात कर ली जाए?

इस उपन्यास में कहानी है दिल्ली के एजुकेशन हब माने जाने वाले इलाके मुखर्जी नगर और उसके आसपास बसे अधिकृत-अनाधिकृत इलाकों की और उनमें से भी एक खास इलाके, क्रिस्चियन कॉलोनी की जो कि दिल्ली यूनिवर्सिटी स्थित मौरिस नगर और विजय नगर के आसपास बसा है। इस उपन्यास में बातें हैं वहाँ के रहने वाले स्थानीय बाशिंदों और वहीं पर किराए पर रह कर upsc इत्यादि की तैयारी में जूझते युवा से अधेड़ होते सैंकड़ों अभ्यर्थियों की। 

 इस उपन्यास में एक तरफ़ जहाँ जगह जगह कुकुरमुत्तों के माफ़िक उगते प्रॉपर्टी डीलर नज़र आते हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ किराएदारों को ले कर मकान मालिकों के मनमाना अक्खड़ रवैया भी परिलक्षित होता है। कहीं इसमें घरेलू नौकरानियों के बढ़ते शोषण के मद्देनज़र प्लेसमेंट एजेंसीज़ के गोरखधंधे की बात दृष्टिगोचर होती दिखाई देती है। तो कहीं इसमें लार से भरे मुँह द्वारा हास्यास्पद तरीके से गुटका खाने के सही तरीके को बताने के साथ साथ  गुटखे के नामों एवं प्रकारों के आधार पर कुछ लोगों का नामकरण होता दिखाई देता है।

कहीं इसमें upsc रिज़ल्ट्स के ओपन होने के बाद की उत्सुकता.. उत्कंठा..हताशा दिखाई देती है। तो कहीं कुछ लोग डंके की चोट में स्वघोषित शैली में अग्रिम खुद के फेल होने की घोषणा करते दिखाई देते हैं। कहीं इसमें परीक्षा परिणामों के घोषित होने में निरंतर होती सालों साल की देरी युवाओं में फ्रस्ट्रेशन..असंतोष और कुंठा पैदा करती दिखाई देती है। तो कहीं गमगीन पलों को भी हँसी ठट्ठे में धुआँ उड़ाते युवा दिखाई देते हैं।

इस उपन्यास में अगर कहीं कोई क्रिकेट का इस कदर दीवाना होता दिखाई देता है कि किसी खिलाड़ी की रिटायरमेंट को ले कर आपस में शर्त तक लगाने को तैयार रहता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ इसी उपन्यास में कहीं कोई चोरी छुपे तो कोई खुलेआम अपनी अब तक की असफलताओं से निराश हो जगह जगह अपनी जन्मपत्री ज्योतिषी से बंचवाता फिरता है। इसी उपन्यास की कहानी में कहीं किसी को नारदमुनि बन बस इधर की उधर लगाने..याने के मुखबिरी करने में ही मज़ा आता है।

इसी उपन्यास में कहीं पीने के साफ़ पानी की किल्लत से हर कोई त्रस्त नज़र आता है। तो कहीं  कोई टिफ़िन सर्विस वालों द्वारा प्रदान किए जा रहे घटिया खाने से परेशान दिखाई देता है। कहीं इसमें मकान मालिक किराया बढ़ाने को ले कर झिकझिक करता दिखाई देता है तो कहीं इस बात को ले कर रोष उमड़ता दिखाई देता है कि किराए पर कमरा देने के मामले में मकान मालिक, नार्थ ईस्ट के अभ्यर्थियों को ज़्यादा तरजीह देते हैं।

इसी उपन्यास में कहीं बरसों तलक परीक्षाओं में असफल रहने वाले अधेड़ हो चुके युवा अपने गांव..घर और आस पड़ोस के लोगों के तानों से परेशान और व्यथित दिखाई देते है। तो कहीं वही सब एक दूसरे को सांत्वना देते..उनके संबल बनते..हिम्मत ना हारने की प्रेरणा देते दिखाई देते हैं।

कहीं इसमें दिल्ली की पहली बारिश के बहाने से जगह जगह होते जलभराव और सरकारों की अकर्मण्यता पर कटाक्ष नज़र आता है। तो कहीं इसमें पर्यावरणीय मसलों को ले कर होने वाले सम्मेलनों की सार्थकता पर सवाल उठता दिखाई देता है। कहीं इसमें देश की हर समस्या के मूल में निरंतर बढ़ती जनसंख्या पर चिंता जताई जाती है। तो कहीं इसी उपन्यास में भारत पाक संबन्धों में नई सुगबुगाहट अभ्यर्थियों में बेचैनी भरती नज़र आती है कि अब नए सिरे से उन्हें भारत पाक संबंधों से संबंधित सभी अव्ययों को भी आने वाली परीक्षाओं के मद्देनज़र पढ़ना होगा।

इसी उपन्यास में कहीं सरकारी लालफीताशाही के चलते निरंतर परीक्षाओं में होते विलंब और उससे युवाओं में उत्पन्न होती हताशा की बात की गई है। 
कहीं इस उपन्यास में UPSC में पारदर्शिता की कमी की बात की गयी है तो कहीं इसमें अचानक जोड़ दी गयी C-SAT की परीक्षा से चिंतित और बौखलाए हुए हिंदी पट्टी के अभ्यर्थी नज़र आते हैं।
कहीं इसमें पात्रों के बजाय लेखक खुद सीधे सीधे देश की व्यवस्था(?) के प्रति अपने मन की भड़ास निकालता नज़र आता है। 
 
 इसी उपन्यास में कहीं मूक जानवरों के प्रति प्रेम उमड़ता दिखाई देता है तो कहीं दिल्ली के सुप्रसिध्द निर्भया कांड में लिप्त अपराधियों के प्रति जनमानस में रोष..चिंता..हताश और आक्रोश उत्पन्न होता दिखाई देता है।

तबियत से बिखरे बेतरतीब चरित्रों से लैस इस उपन्यास में कहीं-कहीं व्यंग्य की हल्की झलक या सुगबुगाहट दिखाई देती है जो 300 पेजों के इस बड़े उपन्यास में कहीं कहीं राहत के छींटों के रूप में मुस्कुराहट के पल ले कर आती है। पढ़ते वक्त अनेकों जगह पर लगा कि पाठकों के सब्र का इम्तिहान लेते हुए लेखक उनसे अपनी यादाश्त..अपनी स्मृति का लोहा मनवाना चाहता है कि कितनी गलियां.. कितने चौराहे..कितने मोहल्ले..कितने मकान..कितनी सड़कें..कितने दुकानदार..कितने रेहड़ी पटरी वाले..कितने फ्लोर..कितने मकान मालिक..कितने पड़ोसी..कितने यार-दोस्त..कितने किराएदार इत्यादि सब का सब उसे याद है। 

 पेज नंबर 72 पर लिखा दिखाई दिया कि..

" वैसे उनका रिकॉर्ड बेहद शानदार व गौरवशाली है लेकिन अपने समदर्शी व्यक्तित्व के चलते कभी-कभी 'कचरा' (या उनके शब्दों में सुंदर लड़की) भी उठा लाते हैं।"

यहाँ किसी लड़की या महिला के लिए 'कचरा' शब्द का इस्तेमाल करना बतौर लेखक एवं पाठक मुझे सही नहीं लगा।

किसी भी उपन्यास में हर बात का..घटना का वर्णन कहानी को आगे बढ़ाने में अगर उपयुक्त साबित हो..तभी उसकी सार्थकता है। महज़ हँसी ठट्ठे के लिए पेज काले करना किसी भी परिस्थिति में तर्कसंगत या जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। 
भले ही रोचकता बढ़ाने के लिहाज़ से लेखक ने कुछ जगहों पर कुछ मनोरंजक घटनाओं को जोड़ने का अपनी तरफ़ से प्रयास किया है लेकिन कहानी की थीम या कॉन्टैक्स्ट के हिसाब से उनका अप्रासंगिक होना थोड़ी उकताहट पैदा करता है।

इस किताब में एक दो नहीं बल्कि अनेकों ऐसे उदाहरण देखने को मिले जिनका किताब में खामख्वाह के पेज भरने के अलावा और कोई मतलब नहीं था। उदाहरण के तौर पर पृष्ठ नंबर 211 पर लिखा दिखाई दिया कि..

[" मारू अपनी टेबल के सामने रखी हुई कुर्सी पर बैठा हुआ अपने अध्ययन कार्य में व्यस्त है। वह पूरी एकाग्रचित्तता के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था का अध्ययन कर रहा है। अचानक दीवार पर एक मकड़ी आ गई है। मारू उसकी तरफ देखता भर है और चुपचाप पढ़ने लगता है। मकड़ी धीरे-धीरे टेबल के पास वाले दीवार के भाग की ओर आ जाती है। मारू अपने पैन से दीवार को खटखटा देता है। मकड़ी भाग जाती है। थोड़ी देर बाद मकड़ी फिर उसी जगह पर वापस आ जाती है। वह एक बार फिर दीवार को खटखटा देता है। मकड़ी फिर भाग जाती है। थोड़ी देर बाद मकड़ी वापस उसी जगह की और आने लगती है। मारु बेचैन हो जाता है। वह फिर से मकड़ी को भगा देता है।"]

अभी गनीमत ये समझिए कि 3 पैराग्राफ़ के इस  मकड़ी प्रसंग का सिर्फ एक तिहाई हिस्सा ही मैंने यहाँ दिया है जबकि पूरा का पूरा चैप्टर ही मकड़ियों और चींटियों की बस बात कहता है। 

इसी तरह पेज नंबर 169 पर लिखा दिखाई दिया कि..

["हालात तो यह है कि संसार के सबसे युवा देश के युवाओं की स्थिति सोचनीय हो चुकी है।"]

यहाँ 'हालात' के बजाय 'हालत' आएगा और 'सोचनीय' के बजाय 'शोचनीय'। 

बेशक काल्पनिक और नाटकीय ही सही मगर पूरे उपन्यास के तंत या सार के रूप में सपने में देखा गया कोर्ट रूम ड्रामा प्रभावित करता है जिसमें एक तरह से पूरे उपन्यास की कहानी..उसका मर्म समाहित है।

अमूमन कोई भी लेखक अपने लेखन के मोह में इस कदर ग्रस्त होता है कि उसे लगने लगता है कि जो उसने लिख दिया..वही 'ब्रह्म वाक्य' हो गया..वही कालजयी हो गया लेकिन यकीन मानिए अपने लेखन पर आँखें मूंद कर यकीन करना ही हम लेखकों को सफल नहीं होने दे रहा। किसी भी सफल लेखक में लेखक से पहले एक निर्दयी संपादक का होना बेहद ज़रूरी है जो अपने ही लिखे को बार बार काट छाँट कर संपादित करने के बाद ही उसे पाठकों के समक्ष रखे। 

बतौर सजग पाठक एवं खुद के एक लेखक होने के नाते मेरा यह मानना है कि इस 300 पृष्ठीय उपन्यास का फिर से संपादन होना बेहद ज़रूरी है। अगर अनावश्यक घटनाओं..चरित्रों एवं बार बार रिपीट होने वाली बातों को अगर इस उपन्यास से हटा दिया जाए तो मूल कहानी को आराम से एक अच्छे पठनीय उपन्यास के रूप में लगभग 150-170 पृष्ठों में आसानी से समेटा जा सकता है।

उम्मीद है कि मेरी बात को अन्यथा ना लेते हुए लेखक दिए गए सुझावों को उपन्यास के आगामी संस्करणों तथा आने वाली नयी किताबों की रचना प्रक्रिया के दौरान अम्ल में लाएँगे। 

हालांकि यह उपन्यास मुझे लेखक की तरफ़ से उपहार स्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूँगा कि 300 पृष्ठीय इस उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है साहित्य संचय ने और इसका मूल्य रखा गया है 330/- रुपए जो कि कंटैंट को देखते हुए मुझे ज़्यादा लगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

अटकन चटकन- वंदना अवस्थी दुबे

क़ुदरती तौर पर कुछ चीज़ें..कुछ बातें...कुछ रिश्ते केवल और केवल ऊपरवाले की मर्ज़ी से ही संतुलित एवं नियंत्रित होते हैं। उनमें चाह कर भी अपनी मर्ज़ी से हम कुछ भी फेरबदल नहीं कर सकते जैसे...जन्म के साथ ही किसी भी परिवार के सभी सदस्यों के बीच, आपस का रिश्ता। हम चाह कर भी अपने माता-पिता या भाई बहनों को बदल नहीं सकते कि...

"हे!...मेरे परवरदिगार...है!...मेरे मौला, ये पिता या माँ अथवा भाई या बहन हमें पसंद नहीं। इन्हें बदल कर आप हमें दूसरे अभिभावक या भाई-बहन दे दीजिए।"

साथ ही हर व्यक्ति की पैदाइश के साथ ही ऊपरवाले द्वारा उसका स्वभाव...उसकी आदतें वगैरह भी सब तयशुदा मंज़िल की तरफ बढ़ने के लिए भेज दी जाती हैं कि वह मीठा...मिलनसार..दूसरों की मदद को तत्पर रहने वाला निकल कर सबका जीवन खुशमय करेगा अथवा कड़वा...कसैला...शंकालु एवं झगड़ालू बन के सबका जीवन नर्क बनाता हुआ हराम करेगा। इस बार ऐसे ही अटकते चटकते रिश्ते और एकदम विपरीत स्वभाव की दो बहनों की दास्तान पढ़ने को मिली मुझे प्रसिद्ध साहित्यकार वंदना अवस्थी जी के उपन्यास "अटकन चटकन" में।

जी!...हाँ...आपने सही सुना "अटकन चटकन"। अभी हाल फिलहाल ही एक फ़िल्म आयी है इसी...याने के "अटकन चकटन" के ही नाम से जिसे बनाया है प्रसिद्ध संगीत निर्देशक ए आर रहमान ने। वो कहते हैं ना कि...दुनिया गोल है। क्या ग़ज़ब का संयोग बनाया है ऊपरवाले ने? और मज़े की बात ये देखिए कि फ़िल्म की शुरुआत में ही एक किताब दिखाई देती है जिसका नाम भी हमारी वाली किताब की ही भांति "अटकन चटकन" है। यकीन मानिए कि बस नाम के अलावा कुछ भी समान नहीं है...सब का सब अलग है।

चलिए!...अब बात करते हैं इसकी कहानी की तो कहानी कुछ यूँ है कि एक ही परिवार में जन्मी दो बहनों की शक्ल सूरत और स्वभाव एक दूसरे से एकदम भिन्न है। एक को जहाँ ऊपरवाले ने दुनियां जहां की खूबसूरती की नेमत बक्शी है तो वहीं दूसरी तरफ दूसरी बहन शक्ल औ सूरत क्या...सीरत के मामले में भी उससे एकदम भिन्न। 

ऐसे में तो भय्यी...आप कुछ भी कह लो...थोड़ी बहुत ईर्ष्या..जलन तो बनती ही है...इसमें कोई शक नहीं लेकिन हद दर्ज़े की नफरत? ना बाबा ना...इसे तो भय्यी हम किसी भी कीमत पर जायज़ नहीं ठहरा सकते।

चलो!...माना कि बचपन बड़ा भोला होता है। गुस्से के मारे हो जाता है कि एक ने शरारत की और दूसरे की उसी वक्त...उसी के सामने...ढंके की चोट पर धड़ाधड़ बोलते हुए चुगली कर शिकायत लगा दी कि...इस बाबत मैनें तो जो करना था..कर दिया। अब तू देख तमाशा। तमाशे तो भय्यी उस छुटकी ने इतने किए...इतने किए कि बस पूछो मत। आए दिन घर के कभी बड़ों से तो कभी स्कूल में अध्यापकों से खामख्वाह में कानाफूसी करते इधर उधर की इतनी चुगलियाँ कि बड़की बेचारी कभी इहां डाँट खाएं तो कभी उहां आँसू बहा..रो..रो आँख सुजाए।

आँखें सुजाने में तो चुटकी का भी भय्यी बस पूछो मत। क्या ग़ज़ब रो रो के अपनी आँखें सुजाती कि सब उसको सच्चा और बड़की को झूठा मान..बड़की को ही गरियाते रहते और बड़की बेचारी..ना चूं...ना चां...ना हूँ हाँ, बस छुप छुप के अकेले में सुबक सुबक रोती रहती।

कहते हैं कि बढ़ती उम्र के साथ सब में समझ आ जाती है। अब अगर सच में आ जाती तो क्या बात थी। छुटकी का अब भी वही रोना धोना...वही नौटंकी..वही लटके झटके। हद तो इस बात की कि बड़की के उसके प्रति किए गए हर अच्छे काम में उसको कोई ना कोई साजिश नज़र..कोई ना कोई खोट नज़र आता। अब कोई उससे साजिश कर साफ़ बच के निकल जाए, ऐसा भला कैसे हो सकता था? बदले में वो अपनी कुंठाओं के चलते साजिशों..चालों का अंबार लगा देती। 

पढ़ते वक्त सोचा कि चलो...ब्याह के जब दोनों अपने अपने घर चली जाएँगी तो उनके साथ साथ हमें भी चैन आ जाएगा। मगर चैन कहाँ भला अपनी किस्मत में लिखा था? बड़की की मति फिर गयी जो उसी को अपनी जेठानी बना अपनी ही ससुराल में..अपनी ही छाती पे मूंग ढलने को ला बैठी कि... चलो!...बचपन तो इसका जैसे तैसे बीता...बाकी की जून ही कम से कम सुधर जाए। उसका कुछ सुधर या संवर जाए? वो भी बड़की के हाथों? ये भला छुटकी को कैसे मंज़ूर होता? हो गया नए सिरे से शुरू फिर वही नौटंकी..वही साजिशों का दौर।

कहानी...यूँ समझ लो कि शुरू से अंत तक बस मज़ेदार ही मज़ेदार है। अब सारी किस्सागोई अगर मैनें यहीं कर दी तो भय्यी इतनी बढ़िया किताब फिर पढ़ेगा कौन? शिक्षा...रोजगार और महिला सशक्तिकरण जैसे कई मुद्दों को अपने में समेटे इस लघु उपन्यास में बस इतना समझ लो कि एकदम से समय और पैसे..दोनों की फुल्ल बटा फुल्ल वसूली है। 

अब आप कहेंगे कि डायबिटीज़ के ज़माने में यहाँ तो सब मीठा ही मीठा हो गया। बैलेंस के लिए कम से कम थोड़ा बहुत नमकीन तो हो। अब वैसे तो कुछ खास नमकीन है नहीं मेरे झोले में मगर अब जब इतने प्यार से आप ज़िद कर ही रहे हैं तो वह भी लीजिए।

पूरे उपन्यास में स्थानीयता के पुट के चलते बुंदेलखंडी भाषा का खूब धड़ल्ले से इस्तेमाल हुआ है और यही इस्तेमाल शुरू में थोड़ा मेरी दुविधा का कारण भी बना। ये तो शुक्र मनाओ मेरे स्टाफ और बॉलीवुड की उन तमाम फिल्मों का जिनमें बुंदेलखंडी या फिर उससे मिलती जुलती भाषाओं का प्रयोग किया गया। मेरा तो चलो..जैसे तैसे गुज़ारा करते हुए काम चल गया मगर ये सोचो कि बुंदेलखंडी या ऐसी ही अन्य किसी भाषा को बिल्कुल भी ना जानने वाले हिंदी किताबों के शौकीन पाठकों का क्या होगा? कैसे वो किसी कहानी या उपन्यास के असली मर्म याने के भीतरी तहों तक पहुँच पाएँगे?

वैसे..एक सुझाव है तो सही कि या तो ऐसे संवादों को हिंदी मिश्रित स्थानीय भाषा में लिखा जाए। या फिर दो किरदारों में से कम से कम एक किरदार स्थानीय भाषा के बजाए हिंदी में बात करे। एक अन्य  तरीका यह भी हो सकता है कि स्थानीय भाषा के सभी संवादों के हिंदी अनुवाद भी साथ साथ दिए जाएँ।

संग्रहणीय क्वालिटी के इस 88 पृष्ठीय लघु उपन्यास के पेपरबैक संस्करण को छापा है शिवना पेपरबैक्स ने और इसका मूल्य महज़ ₹125/- रखा गया है जो कि किताब की क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए बहुत ही कम है। आने वाले सुखद भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

छाप तिलक सब छीनी- सुनीता सिंह

कहते हैं कि हर तरह की शराब में अलग अलग नशा होता है। किसी को पीते ही एकदम तेज़ नशा सोडे की माफ़िक फटाक से सर चढ़ता है जो उतनी ही तेज़ी से उतर भी जाता है। तो किसी को पीने के बाद इनसान धीरे धीरे सुरूर में आता है और देर तक याने के लंबे समय तक उसी में खोया रहता है। कुछ इसी तरह की बात किताबों को ले कर भी कही जा सकती है। कुछ किताबें शुरुआती दो चार पृष्ठों में ही पाठक को अपने रंग में रंग लेती हैं और किताब के समाप्त होने तक उसके ध्यान..उसकी एकाग्रता..उसकी तवज्जो को उससे दूर नहीं होने देती लेकिन बाद में उस किताब का हमारी स्मृति में कहीं कोई अता पता नहीं होता । वहीं दूसरी तरफ़ कुछ ऐसी भी किताबें होती हैं जो पहली बार में बेशक उतना व्यापक असर नहीं छोड़ पाती लेकिन उन्हें दूसरी या तीसरी बार याने के बार बार पढ़ने का मन करता है और हर बार अलग आनंद..अलग तजुर्बा..अलग नशा उनसे हासिल होता है। 

दोस्तों..आज मैं एक ऐसी ही याने के एक टिकाऊ किताब, जो कि एक कहानी संकलन है, 'छाप तिलक सब छीनी' का जिक्र करने जा रहा हूँ जिसे बहुत ही कम अंतराल में मैंने कम से कम दो बार पढ़ा है। इस कहानी संकलन की रचियता सुनीता सिंह हैं। 

आइए..अब बात करते हैं इस संकलन की कहानियों की तो इसकी शीर्षक कहानी आजकल के ज़माने में लिव इन के ज़रिए रिश्ता जुड़ने से पहले ही ब्रेकअप की संभावनाएं तलाशने वाली तथाकथित सोच से हट कर, उस समय की बात करती है जब किसी के दुनिया छोड़ कर चले जाने के बाद भी उसकी यादों को और उस रिश्ते की गरिमा को ताउम्र बरकरार रखा जाता था।

इसी संकलन की एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़ बताती है कि अपने बच्चों के लिए माँ की ममता सदा एक सी ही रहती है चाहे वो माँ, कोई मूक जानवर वो या फिर खुद को सभ्य मानने वाले हम मनुष्यों में से कोई एक। तो वहीं दूसरी तरफ़ किसी अन्य कहानी में कोई अपने जवानी के दिनों में किसी के द्वारा ठुकरा दिया जाता है मगर होनी के गर्भ में क्या छिपा है? यह कोई नहीं जानता। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में दहेज के लिए पैसा ना होने की वजह से एक बेहद खूबसूरत और गुणवती युवती की शादी एक एबी लड़के से कर दी जाती है। जिसकी परिणति अंततः उस युवती की आत्महत्या के साथ होती है। जो इस बात की तस्दीक करती है कि अपनों का अहित होते देख कर भी प्रत्यक्षत: दख़ल देने के बजाय तटस्थ या मूक रह कर भी हम उनका अहित ही करते हैं। तो वहीं एक अन्य कहानी में घर की इकलौती कमाऊ लड़की, घर परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझ, पूरी तरह से उनका निर्वाह कर रही है। इसी वजह से उम्र बीत जाने के बावजूद वह अपना विवाह तक नहीं करती। मगर जब उसे महज़ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी समझ लिया जाता है तो अंततः वह विद्रोह कर अपने सपनों को पूरा करने के लिए निकल पड़ती है। 

इसी संकलन की एक अन्य कहानी में ब्याह की प्रथम रात्रि ही एक बहु अपने ससुर को किसी अन्य स्त्री के साथ रात के घने अंधेरे में निवस्त्र गुत्थमगुत्था होते हुए देखती है तो उसका मन वितृष्णा से भर उठता है। मगर यह देख कर वह और भी हैरान रह जाती है कि उसकी सास ने यह सब जानते..देखते..समझते और महसूस करते हुए भी मौन साधा रखा है। 

 इसी संकलन की एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़ स्त्रियों की उस छठी इंद्री की बात करती है जिसके ज़रिए उन्हें बिना किसी के कहे ही सामने वाले की मंशा..बुरी नज़र का समय से पहले ही भान हो जाता है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी में 
अपने अजन्मे शिशु और नवब्याहता पत्नी को अकेला छोड़ विदेश जा बसा व्यक्ति वहीं अपना घर बसा लेता है। बरसों तलक बिना किसी संपर्क के रहने के बाद वह व्यक्ति अपनी जवान हो चुकी बेटी की शादी में वापिस लौटता है और अपनी पहली पत्नी के सामने अपने साथ विदेश चल कर साथ रहने का प्रस्ताव रखता है। मगर क्या अब पत्नी सब कुछ भुला उसके साथ चली जाएगी अथवा जाने से इनकार कर देगी?

एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़  सच का..सही का साथ देने की बात करती है। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी में तीन तीन प्रतिभाशाली बेटों के होते हुए भी एकाकीपन का दंश झेलते माता पिता में से पिता एक दिन बीमारी से मर जाता है और असाध्य बीमारी से ग्रस्त माँ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर झेलते हुए बिस्तर पकड़ लेती है।

एक अन्य कहानी जहाँ एक तरफ़ एक साथ दो विरोधी बातों को ले कर चलती है कि कहीं कोई अपने जीवनसाथी के असमय बिछुड़ने से दुखी है तो कोई अपने जीवनसाथी के साथ होने से। तो वहीं दूसरी तरफ़ एक अन्य कहानी एक ऐसे मृदभाषी.. सौम्य.. केयरिंग युवक की कहानी कहती है जो दरअसल में एक सेक्सुअली परवर्ट व्यक्ति है जो अपनी पत्नी पर अमानवीय अत्याचार  कर हमेशा उसे प्रताड़ित..अपमानित करता रहता है। 

इस संकलन की कुछ कहानियाँ मुझे बढ़िया लगी जिनके नाम इस प्रकार हैं..

*अहा! ज़िन्दगी 
*एक प्रेमपत्र
*ब्याहता
*विजया
*वैलेंटाइन्स डे
*साथी! हाथ बढ़ाना
*सवाल
*टयूलिप
*कीड़े
*प्रेम ना बाड़ी उपजै

मनमोहक शैली में लिखी गयी इस संकलन की कहानियों में कहीं कहीं क्षेत्रीय भाषा के शब्दों का इस्तेमाल भी दिखा। कहानी के साथ ही अगर उनका सरल हिंदी अनुवाद भी दिया जाता तो बेहतर था। पहली कहानी कहीं कहीं थोड़ा भाषण सा देती हुई प्रतीत हुई। तो कहीं किसी कहानी में बिना किसी खास कॉनसेप्ट..लिंक..मकसद या हिंट अथवा आवश्यकता के दो छोटी कहानियाँ अपने में विपरीत मुद्दों के समाए होने के बावजूद भी आपस जुड़ी हुई दिखाई दी। 

हालांकि यह बढ़िया कहानी संग्रह मुझे प्रकाशक की तरफ़ से उपहारस्वरूप मिला मगर अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैं बताना चाहूंगा इस बढ़िया कहानी संग्रह के 123 पृष्ठीय पेपरबैक संस्करण को छापा है साहित्य विमर्श प्रकाशन ने और इसका मूल्य रखा गया है 149/- रुपए जो कि क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए बहुत ही जायज़ है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।
 
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