हम नहीं चंगे..बुरा ना कोय- सुरेन्द्र मोहन पाठक

टीवी...इंटरनेट और मल्टीप्लेक्स से पहले एक समय ऐसा भी था जब मनोरंजन और जानकारी के साधनों के नाम पर हमारे पास दूरदर्शन, रेडियो,अखबारें और बस किताबें होती थी। ऐसे में रेडियो और दूरदर्शन के जलवे से बच निकलने के बाद ज़्यादातर हर कोई कुछ ना कुछ पढ़ता नज़र आता था और पढ़ने की कोई ना कोई सामग्री हर किसी के हाथ में अवश्य नज़र आती थी। भले ही वो बच्चों के हाथों में कॉमिक्स के रूप में तो बड़ों के हाथों मे कोई ना कोई कहानी/कविता संकलन अथवा उपन्यास अपनी हाज़री बजा..उपस्थिति दर्ज कराता हुआ नज़र आता था। बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर स्थित बुक स्टॉल्स तरह तरह की साहित्यिक पत्रिकाओं और उपन्यासों से पटे नज़र आते थे और उनमें भी उस साहित्य की अधिकतम भरमार होती थी जिसकी तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के साहित्यकारों द्वारा हमेशा से लुगदी साहित्य कह उसकी खिल्ली उड़ाई जाती रही है। लुगदी साहित्य, वो साहित्य जिसने अपनी तमाम भर्त्सनाओं एवं आलोचनाओं के बावजूद हिंदी को घर घर पहचान दी। हमारे आज के साहित्यकारों ने भी कभी ना कभी इस साहित्य को ज़रूर पढ़ा है। 

दोस्तों...आज मैं बात करने जा रहा हूँ इसी लुगदी साहित्य के एक ऐसे नामी गिरामी लेखक की, जिसके लिखे को उसके पाठकों ने हाथों हाथ उठा, उसे सेलिब्रिटी का स्टेटस दे, सर आँखों पे बिठाया। जी!...हाँ.. आपने सही पहचाना, मैं बात कर रहा हूँ श्री सुरेन्द्र मोहन पाठक जी और उनकी आत्मकथा के दूसरे भाग की जो "हम नहीं चंगे...बुरा ना कोय" के नाम से बाज़ार में आ, धूम मचा रहा है।

लुगदी साहित्य का एक ऐसा बड़ा नाम जो कभी महज़ चार पाँच सौ रुपए में अपना एक उपन्यास लिख कर प्रकाशकों को दे खुद को कृतार्थ किया करता था। फिर भी उनके लिखे उपन्यासों का ऐसा जलवा कि एक समय उनके लिखे नए उपन्यासों से ज़्यादा उनके रिप्रिंट से उनकी कमाई होती थी। ऐसा लेखक जिन पर कभी किसी लड़की ने उनकी स्क्रिप्ट की चोरी का इल्जाम लगाने की मंशा जताई थी। एक ऐसा लेखक जिन पर किसी ने दूर दराज के इलाके में महज़ इसलिए कोर्ट केस दर्ज करवा कर जज के सामने उनकी पेशी करवा दी  दी थी कि वो वकील उनसे आत्मीय मुलाकात कर सार्वजनिक रूप से उनका सम्मान करते हुए खुद को भाग्यशाली समझ सके। 

 एक ऐसा लेखक जो अब तक 300 या फिर उससे भी ज़्यादा उपन्यास लिख चुका है और उनके एक उपन्यास की तो अढ़ाई लाख तक प्रतियाँ बिकी। एक ऐसा लेखक जिसके लेखक होने की एवज में उसके घर पर पत्थर तक बरसे। एक ऐसा लेखक जिसने बातों बातों में उपहार स्वरूप अपने एक प्रशसंक को अपने चालीस दुर्लभ उपन्यास बतौर गिफ्ट दे दिए और उनका वह तथाकथित प्रशंसक उन्हें तुरंत बाज़ार में महँगे दामों पर बेच रफूचक्कर हो गया हो।

 इस आत्मकथा में बात है उनके दफ़्तरी कामकाज और टूर के बहाने होने वाली ऐश और दिक्कतों की। इसमें बात है अफसरशाही और भ्रष्टाचार की। इसमें बात है आपसी खुंदक निकालने को हरदम तैनात रहते अफसरों और मातहतों की। 
 
इसमें बात है दोगले..चालबाज़ रिश्तेदारों और उनके भुक्खपने की। इसमें बात है बतौर मेहमान घर आए लेखक को मेज़बान के परिवार द्वारा बेइज़्ज़त करने की जो कि स्वयं एक बड़ा नामी गिरामी लेखक एवं प्रकाशक था। इसमें बात है पुत्र मोह में आँखें मूंद सिर्फ अपना बेटा और उसके हित नज़र आने की। इसमें बात है प्रकाशकों द्वारा लेखकों को उनका ज़रखरीदा ग़ुलाम समझ अपनी मनमानी करने और मनवाने की।
 
इसमें बात है प्रकाशकों से लेखक के बनते बिगड़ते रिश्तों की। इसमें बात है औरों की देखादेखी नए प्रकाशकों के उभरने और फिर उनके फेल होने की। इसमें बात है कॉपीराइट को नज़रंदाज़ करने और उनसे फ़ायदा उठाने वाले लेखकों की। इसमें बात है बिना लेखक की मर्ज़ी के उसके दो भागों वाले उपन्यास को बेदर्दी से काट छाँट कर एक उपन्यास बनाने की। इसमें बात है फिल्मी पत्रिकाओं और उनके कर्ताधर्ताओं के घमंड की। इसमें बात है सफल  लेखक को ले कर प्रकाशकों में होती आपसी खींचतान की।  इसमें बात है प्रकाशक द्वारा स्क्रिप्ट हज़म कर भूल जाने की। 

इसमें बात है लेखकों द्वारा बड़ी बड़ी डींगें हांकने की। इसमें बात है लेखक से किए गए करार को तोड़ स्क्रिप्ट आगे बेच विश्वासघात करने की की। इसमें बात है लेखकों में बढ़ती शराबखोरी और अपनी कमज़ोरियों को स्वीकार करने और प्रकाशकों द्वारा भ्रम पैदा करने को झूठे आंकड़ों को फैलाने की। इसमें बात है असली प्रशसंकों बनाम ठग एवं दबंग पाठकों की। 

किस्सागोई शैली में लिखी गयी इस आत्मकथा में काफी कुछ ऐसा है जो पाठकों को लुभाएगा। अगर आप सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के फैन हैं या फिर लुगदी साहित्य और उससे जुड़ी बातें जानने के इच्छुक हैं तो रोचक शैली में लिखा गया यह आत्मकथा आपके मतलब की है। 422 पृष्ठीय इस किताब के पेपरबैक संस्करण को छापा है राजकमल पेपरबैक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 299/- जो कि किताब की क्वालिटी एवं कंटैंट को देखते हुए ज़्यादा नहीं है। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (27-10-2021) को चर्चा मंच         "कलम ! न तू, उनकी जय बोल"     (चर्चा अंक4229)       पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

मन की वीणा said...

सटीक, विश्लेषण।
उत्तम समालोचना।

राजीव तनेजा said...

शुक्रिया

राजीव तनेजा said...

शुक्रिया

 
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