सिंगला मर्डर केस- सुरेन्द्र मोहन पाठक

हमारी पीढ़ी के लोगों के बारे में एक तरह से कहा जा सकता है कि.. हम लोग बॉलीवुडीय फिल्मों के साए तले पले बढ़े हैं। शुरुआती तौर पर दूरदर्शन पर रविवार शाम को आने वाली पुरानी हिंदी फिल्मों ने और सिंगल स्क्रीन पर लगने वाली ताज़ातरीन हिंदी फिल्मों ने हमें इस कदर अपना मुरीद बनाया हुआ था कि हर समय बस उन्हीं को सोचते..जीते और महसूस करते थे। उन फिल्मों में कभी रोमांटिक दृश्यों को देख हम भाव विभोर हो उठते थे तो कभी भावुक दृश्यों को देख भावविह्वल हो उठते थे। कभी कॉमेडी दृश्यों को देख पेट पकड़ हँसते हुए खिलखिला कर लोटपोट हो उठते थे। तो कभी फाइटिंग और मुठभेड़ के दृश्यों को देख खुदबखुद हमारे भी हाथ पाँव भी..बेशक़ हवा में ही सही मगर अनदेखे..अनजाने दुश्मन पर चलने लगते थे। कभी किसी थ्रिलर कहानी या मर्डर मिस्ट्री की उलझती कहानी को देख उसे सुलझाने के प्रयास में हमारे रौंगटे खड़े होने को आते थे। 

उपरोक्त तमाम तरह की खूबियों से लैस उस समय के लुगदी साहित्य कहे जाने वाले तथाकथित उपन्यास भी हमारे भीतर लगभग इसी तरह भावनाएँ एवं जादू जगाते थे। दोस्तों..आज मैं बात करने जा रहा हूँ थ्रिलर उपन्यासों के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के 288 वें थ्रिलर उपन्यास 'सिंगला मर्डर केस' की जो कि उनकी 'सुनील' सीरीज़ का 121 वां उपन्यास है। नए पाठकों की जानकारी के लिए बात दूँ की सुनील, दोपहर को छपने वाले दैनिक अख़बार 'ब्लास्ट' का क्राइम रिपोर्टर है और मर्डर..क्राइम जैसी गुत्थियों को सुलझाना उसका रोज़मर्रा का काम है। 

अब चूंकि नाम से ही ज़ाहिर है कि यह उपन्यास एक मर्डर मिस्ट्री है तो आइए..हम लोग अब सीधे बात करते हैं इसकी कहानी की। तो कहानी कुछ यूँ है कि.. 

सुनील को शैलेश सिंगला नामक शख्स की बदौलत पता चलता है कि जिस स्टॉक ब्रोकर फर्म 'सिंगला एण्ड सिंगला' का वह पार्टनर है, उसी के, कैसेनोवा प्रवृत्ति के, दूसरे रईस पार्टनर हिमेश सिंगला का देर रात उसके (हिमेश सिंगला) घर में कत्ल हो गया है जोकि उसी का छोटा भाई भी था। एन माथे के बीचोंबीच गोली के लगे होने से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि यह किसी एक्सपर्ट का काम है। बिना किसी क्लू के रेत के ढेर में सुई ढूँढने जैसे इस केस में शक की सुई बारी बारी घर की हाउस कीपिंग मेड से ले कर..उस दिन उसके साथ डेट पर गयी युवती, उसके प्रेमी, धमकी देने वाले दोस्त के साथ साथ कुछ अन्य लोगों की तरफ़ भी इस कदर घूमती है कि सभी पर उसके कातिल होने का शुब्हा होता है क्योंकि सभी के पास उसका कत्ल करने की अपनी अपनी वजहें मौजूद हैं।

क्या सुनील इस पल पल उलझती..सुलझती या सुलझने का भान देती गुत्थी को सुलझा पाता है अथवा हर पल बदलती घटनाओं और खुलते रहस्यों में और उलझ कर रह जाता है? यह सब जानने के लिए तो खैर..)#आपको धाराप्रवाह शैली में लिखे गए इस तेज़ रफ़्तार उपन्यास को पूरा पढ़ना होगा। अंत में बोनस के रूप में इस उपन्यास के साथ बतौर फिलर एक छोटी थ्रिलर कहानी पाठकों के लिए सोने पे सुहागा वाली बात करती है। 

2014 में आए इस 317 पृष्ठीय बेहद रोचक उपन्यास को छापा है राजा पॉकेट बुक्स ने और इसका मूल्य रखा गया है 100/- रुपए। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।

1 comments:

विकास नैनवाल 'अंजान' said...

रोचक। उपन्यास के प्रति उत्सुकता जगाता आलेख। मैंने भी सिंगला मर्डर केस काफी पहले पढ़ा था।

 
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