शुगर डैडी - जयंती रंगनाथन
ज्यों-ज्यों इन्सान की उम्र बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों उसकी अपनों से छोटी उम्र के लोगों के साथ उठने-बैठने, गपियाने, फ्लर्ट करने की इच्छा स्वाभाविक रूप से बलवती होती जाती है। इसके पीछे शायद स्वयं की बढ़ती उम्र को छुपाने..नकारने अथवा अभी भी ख़ुद को जवान समझने की निर्दोष इच्छा या फ़िर कोई खुराफ़ाती मंशा छिपी रहती है।
दोस्तों... इस विषय को ध्यान में रख कर प्रसिद्ध लेखिका जयंती रंगनाथन ने इस बार "शुगर डैडी" के नाम से एक थ्रिलर उपन्यास की रचना की है। मूलतः इस उपन्यास में कहानी है काल्पी के एक रिसोर्ट में श्याम राजगीर नाम के बिज़नेसमैन के कत्ल और उसके बाद उससे जुड़ी पुलिसिया तफ़्तीश की। अड़तालीस वर्षीय श्याम राजगीर, जो कि पहले ही मिशेल और धीरा से दो अलग-अलग शादियाँ कर चुका है और अब रति नाम की एक सोशल वर्कर से भी तीसरी शादी रचाने का इरादा रखता है। वो श्याम राजगीर, रिसोर्ट में एक 19 वर्षीया कुंवारी लड़की 'मायरा' के साथ ठहरा हुआ था।
'मायरा' जो कि प्रसिद्ध मीडिया पर्सन अरूप विश्वास और गरिमा की बेटी है जो 10 साल पहले हुए अपने तलाक के बाद से अलग-अलग रह रहे हैं। मायरा का दावा है कि श्याम राजगीर ने उससे शादी का वादा किया था। बढ़ती कहानी के साथ इसमें अनेक नए-नए किरदार पैदा होते चलते जातें है और कहानी पहले से कहीं और अधिक उलझती चलती जाती है। ऊपरी दबाव के चलते एक तरफ़ केस को जल्द से जल्द सॉल्व करने की ज़िम्मेदारी इंस्पेक्टर सुलोचना के जिम्मे आती है तो दूसरी तरफ़ पत्रकारिता की फील्ड में नयी-नयी उतरी नीति भी अपने तरीके से इस केस को हल करने का प्रयास कर रही है। अब देखना ये है कि इन दोनों में से अंततः कौन सफ़ल हो पाता है।
कत्ल के शक की सुई मायरा, रति और धीरा से होती हुई अनेक छोटे-बड़े किरदारों की तरफ़ घूमती है। खोजी पत्रकारिता और पुलिसिया तफ़्तीश से भरे इस केस की छानबीन अनेक उतारों-चढ़ावों से गुज़रती हुई जब अपने मुकाम पर पहुँचती है तो पाठक के चेहरे पर स्वत: ही एक मुस्कान तैर जाती है।
उपन्यास को पढ़ने के दौरान मैंने इसे थोड़ा खिंचा हुआ पाया । साथ ही रिश्तों के गुंजल में फँसी इस हाई प्रोफाइल कहानी में समय-समय पर ऐसे रहस्योद्घाटन होते दिखाई दिए कि मेरे जैसा पाठक भी कुछ एक जगहों पर चौंकने के साथ-साथ और कन्फ्यूज़्ड होता चला जाता है। बेहतर होता कि उपन्यास के शुरू में या फ़िर अंत में कहानी के किरदारों से संबंधित एक फ्लो चार्ट दिया जाता जिससे कि पाठकों को कहानी और किरदारों के आपसी रिश्ते को समझने में सहायता मिलती।
पढ़ने के दौरान कुछ एक जगहों पर वर्तनी की त्रुटि एवं प्रूफरीडिंग की भी कुछ कमियाँ दिखाई दीं। उदाहरण के तौर पर पेज नंबर 27 में लिखा दिखाई दिया कि..
"एक बड़ी टीप मिली है अभी"
मेरे हिसाब से यहाँ 'टीप' के बजाय 'टिप' आना चाहिए।
इसी तरह पेज नंबर 105 में लिखा दिखाई दिया कि..
'एकेपी एक सेकंड के लिए रुके और नीति के चेहरे पनर आ जा रहे भावों को तौलते हुए बोले`
यहाँ 'पनर' की जगह पर ' पर' आएगा।
इसके बाद पेज नंबर 150 के अंत में लिखा दिखाई दिया कि..
'सान्या को अचानक स्कूटी भारी लगने
लगी '
यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि स्कूटी नीति चला रही थी और उसी ने सान्या को लिफ्ट दी थी। इसलिए कायदे से तो दो जनों के वज़न की वजह से नीति को स्कूटी भारी लगनी चाहिए थी ना कि सान्या को।
पेज नंबर 158 में लिखा दिखाई दिया कि..
"मैं बिल्कुल ठीक हूँ। क्या आप लोग मुझे घर से बाहर जाने दोगे?"
कहानी के दृश्य के हिसाब से इस समय नीति अपने घर में आराम से बैठी है और उसके कहीं आने-जाने पर कोई रोक-टोक नहीं है। इसलिए ऊपर दिए गए वाक्य में 'मैं बिल्कुल ठीक हूँ और 'क्या आप लोग मुझे घर से बाहर जाने दोगे?' के बीच में कोई ना कोई फिलर वाक्य या घटनाक्रम ज़रूर होना चाहिए था जो अगले वाक्य को सही से जस्टिफाई कर पाता।
पेज नंबर 165 में लिखा दिखाई दिया कि..' रितु का कहना था की गरिमा बचपन से कई कॉम्प्लेक्स से अब तक बाहर नहीं निकल पाई है'
यहाँ 'कॉम्प्लेक्स की जगह पर कॉम्प्लेक्सिटीज़ आना चाहिए।
लेड़ी - लेडी
फुलप्रूफ - फूलप्रूफ
